UPPCS इंटरव्यू में गूंजा UGC विवाद! लोकतंत्र बनाम तानाशाही पर पूछे गए तीखे सवाल

संवाद 24 डेस्क। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) के पीसीएस (PCS) इंटरव्यू 2024 के तीसरे दिन परीक्षा-पात्र से ऐसे प्रश्न किए गए, जिनमें न केवल सामान्य ज्ञान और शासन-नीति बल्कि राजनीतिक विषय, समसामयिक विवाद, और शैक्षणिक नीति से जुड़े मुद्दे शामिल थे। बोर्ड ने इस बार परीक्षार्थियों के सोचने, विश्लेषण करने और दृष्टिकोण स्पष्ट रखने की क्षमता पर विशेष ध्यान दिया, न कि केवल पुस्तकीय उत्तरों पर।
. इन प्रश्नों में प्रमुख रूप से पूछा गया:
समावेशी समाज क्या होता है?
लोकतंत्र और तानाशाही में क्या अंतर होता है?
भारत के आसपास कौन-कौन से देश तानाशाही से जुड़े हैं?
बांग्लादेश में हाल के चुनाव में कौन-सी पार्टियाँ प्रमुख रूप से जीतीं?
यूजीसी के नए नियम विवाद का कारण क्या है?
इन सवालों से स्पष्ट है कि आयोग ने समान्यता हासिल प्रश्नों के साथ-साथ समसामयिक नीति-प्रशासनिक तथा राजनीतिक विषयों पर भी अभ्यर्थियों की समझ को परखा।

यूपीपीसीएस इंटरव्यू में पूछा गया सवाल: लोकतंत्र और तानाशाही क्या हैं?
यह प्रश्न सार्वजनिक प्रशासन, शासन एवं राजनीतिक व्यवस्था की गहरी समझ को परखने के लिए था।
. लोकतंत्र क्या होता है?
लोकतंत्र एक शासन-व्यवस्था है जिसमें राजनीतिक शक्ति जनता के हाथ में होती है। लोकतंत्र में:
नागरिकों को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार होता है।
शासन निर्णय पारदर्शी और जन-हित में होते हैं।
मूल अधिकारों तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान होता है। भारत का संविधान भी लोकतंत्र की गारंटी देता है और “We, the People” ये दर्शाता है कि सत्ता का स्रोत जनता ही है।
. तानाशाही क्या होती है?
तानाशाही (Dictatorship) वह शासन-प्रणाली है जिसमें सत्ता एक व्यक्ति या छोटे समूह के हाथ में केंद्रित होती है। इसमें:
सत्ता का कोई निरपेक्ष नियंत्रण नहीं होता।
नागरिक-स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति बाधित होती हैं।
निर्णय बिना जन-समर्थन के लिये जा सकते हैं।
इन दोनों रूपों के बीच मूल अंतर यही है कि लोकतंत्र में सत्ता का स्रोत जनता है, जबकि तानाशाही में सत्ता का स्रोत सत्ता-धारी व्यक्ति या समूह होता है।
यह प्रश्न अभ्यर्थियों की राजनीतिक तर्क-शक्ति, वैध राजनीतिक सिद्धांतों की समझ, और आधुनिक शासन-कार्यों के प्रति सजगता को परखने का संकेत देता है।

UGC का विवाद: क्या है मामला?
यूजीसी (UGC – University Grants Commission) ही भारत में उच्च शिक्षा नीति ऑर विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों को नियंत्रित करने वाली मुख्य नियामक संस्था है।
. UGC के नए नियम क्या हैं?
13 जनवरी 2026 को UGC ने “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” नामक नए नियम लागू किए। इनका मूल उद्देश्य भारत के सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, धर्म और अन्य आधारों पर भेदभाव को रोकना और समानता सुनिश्चित करना था।
नियमों के मुख्य बिंदु:
Equity Committee तथा Equity Squad का गठन – ताकि भेदभाव की पहचान, निगरानी और समाधान सुनिश्चित हो सके।
प्रत्येक संस्था में Equal Opportunity Centre और 24×7 शिकायत निवारण प्रणाली।
भेदभाव की परिभाषा को विस्तृत करना ताकि कोई भी अनुचित व्यवहार छोड़ न जाए।
नियमों का पालन न करने वाले संस्थानों के लिए कड़ी सज़ा और पेनल्टी की धाराएँ।
इन नए नियमों के तहत अगर कोई विश्वविद्यालय भेदभाव रोकने के प्रावधानों का पालन नहीं करता है, तो UGC उसकी मान्यता रोक सकता है और उसे सरकारी योजनाओं तथा अनुदानों से वंचित कर सकता है।

यूजीसी नियम विवाद क्यों हुआ?
सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 को इस नए नियम पर स्थगन (Stay) लगा दी।
. विवाद के मुख्य कारण
✔️ नियम में भेदभाव की व्यापक और अस्पष्ट परिभाषा होने की आलोचना – आलोचक कहते हैं कि इससे वांछित मामलों के अलावा सामान्य प्रशासनिक निर्णयों को भी भेदभाव कहकर चुनौती दी जा सकती है। ✔️ झूठी शिकायतों पर दंड प्रावधान न होना – इससे शैक्षणिक संस्थानों में शिकायत तंत्र के दुरुपयोग का डर है। ✔️ कुछ छात्र और शिक्षकों का मानना है कि सामान्य वर्ग को भेदभाव के संदर्भ में निशाना बनाया जा रहा है और यह “Reverse Discrimination” का कारण बन सकता है। ✔️ राजनीतिक तथा सामाजिक समूहों ने इसे वैश्विक शिक्षा स्तर की गुणवत्ता के स्थान पर ‘ पहचान-आधारित राजनीति’ को बढ़ावा देने वाला नियम कहा।
इसके चलते लाखों छात्रों, शिक्षकों और संगठनों ने विरोध जताया, और सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दी गई।

विवाद की व्यापकता और सामाजिक प्रभाव
यूजीसी के नए नियम को लेकर देशभर में सार्वजनिक बहस और विरोध प्रदर्शन जारी हैं।
. इसके तहत विरोध का मुख्य स्वर:
छात्रों तथा शिक्षकों की चिंताएँ कि यह नियम भेदभाव को हटाने की बजाय विवाद बढ़ा सकता है।
कुछ विद्वानों का मानना कि किसी भी व्यापक नियम को लागू करते समय उसके सुसंगत प्रशासनिक संचरण तथा प्रणालियों को पहली प्राथमिकता देनी चाहिए।
राजनीतिक गलियारों में भी यह मामला बड़ी बहस का विषय बन गया है, जिसमें नियम के पक्ष और विपक्ष दोनों में शक्तिशाली तर्क प्रस्तुत हो रहे हैं।
इस बहस से स्पष्ट होता है कि शिक्षा, समानता और संवैधानिक अधिकारों जैसे विषय केवल शैक्षणिक नीति नहीं, किंतु सामाजिक संरचना और धर्म-राजनीति के केंद्र में भी हैं।

इंटरव्यू प्रश्नों का विश्लेषण: UGC नियम के सवाल का महत्व
UPPSC बोर्ड द्वारा यह सवाल केवल “क्या आप जानते हैं” के स्तर पर नहीं पूछा गया। बल्कि सवाल यह है कि क्या आप समसामयिक विवादों को समझते हैं, क्यों वे पैदा हुए, और उनके सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव पर आपका विचार क्या है?
यह प्रकार का प्रश्न आज के प्रशासन और सार्वजनिक नीति के संस्थागत मुद्दों को समझने की क्षमता को परखता है — जैसे:
नीति-निर्माण की प्रक्रियाएँ
संवैधानिक न्याय के अधिकार
सामूहिक विरोध का लोकतांत्रिक महत्व
नीति के सकारात्मक तथा प्रतिकूल प्रभाव की पहचान ये सब-ही गुण एक सफल जागरूक सरकारी अधिकारी के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

UPPCS साक्षात्कार के दौरान पूछे गए सवालों से यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि आयोग अब सिर्फ पारंपरिक ज्ञान पर मूल्यांकन नहीं कर रहा, बल्कि समसामयिक राष्ट्रीय मुद्दों पर अभ्यर्थी की सोच, विवेचना, तर्कशक्ति और संविधान-सामाजिक समझ को भी जाँचना चाहता है।
यूजीसी नियम विवाद जैसी राजनीतिक/शैक्षणिक बहसें केवल छात्रों के लिए परीक्षा-तैयारी का विषय नहीं हैं, बल्कि वे भारत में समानता, न्याय और संवैधानिक मूल्यों के संरक्षण संबंधी बड़े सार्वजनिक प्रश्नों से भी जुड़ी हैं।
इस तरह का सवाल यह संकेत देता है कि आज के प्रशासनिक और नीति-निर्माण क्षेत्र में ज्ञान के साथ-साथ विवेक और तार्किक विश्लेषण भी आवश्यक है।

Geeta Singh
Geeta Singh

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