टीचर भर्ती ही नहीं, पदोन्नति पर भी TET-CTET की शर्त, शिक्षा मंत्रालय का स्पष्ट आदेश

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संवार 24 डेस्क। भारतीय शिक्षा तंत्र में टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) तथा सेंट्रल टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (CTET) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। शिक्षण पेशे में गुणवत्ता, पारदर्शिता और मानकीकरण सुनिश्चित करने के लिए यह योग्यता जांच का एक बुनियादी मानदंड है। लंबे समय से यह नियम केवल नए नियुक्ति (recruitment) के संदर्भ में माना जाता था, परंतु अब केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह परीक्षा सेवारत शिक्षकों की पदोन्नति (promotion) के लिए भी अनिवार्य होगी।
यह स्पष्टता शिक्षक समुदाय के लिए जैसे एक नई चुनौती बन चुकी है और इसी पर केंद्र सरकार ने हाल ही में संसद में जवाब दिया है, जो शिक्षा नीति और कानून के भविष्य को प्रभावित करेगा।

शिक्षा मंत्रालय की घोषणा – लोकसभा में सरकार का स्पष्ट जवाब
10 फरवरी, 2026 को शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने लोकसभा में प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि अब टीईटी/सीटीईटी केवल नियुक्ति के लिए ही नहीं बल्कि पदोन्नति के लिए भी अनिवार्य है। उन्होंने बताया कि यह निर्णय आधुनिक शिक्षा प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में लिया गया है, और इसका उद्देश्य शिक्षकों के कौशल व दक्षता मानदंडों को‌ और अधिक प्रभावी बनाना है।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुरूप टीईटी पास करना आवश्यक है ताकि शिक्षक न केवल भर्ती में बल्कि अपनी पेशेवर प्रगति में भी योग्य साबित हो सकें। इस नीति का प्रभाव व्यापक होने के साथ ही यह लाखों शिक्षकों के करियर और भविष्य को प्रभावित करेगा।

सुप्रीम कोर्ट का पिछला निर्णय: संदर्भ और आवश्यकताएँ
इस फैसले की नींव सुप्रीम कोर्ट के 01 सितंबर, 2025 के निर्णय में निहित है, जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट किया कि टीईटी पास करना शिक्षक भर्ती के साथ-साथ सेवा में बने रहने और पदोन्नति के लिए भी आवश्यक है। अदालत ने यह भी कहा कि जिन शिक्षकों की सेवा में पाँच वर्ष से अधिक समय बचा है, उन्हें दो साल के भीतर टीईटी पास करना अनिवार्य होगा अन्यथा उन्हें सेवा से हटाया जा सकता है। जिनकी सेवा में पाँच वर्ष से कम समय बचा है, उन्हें सेवा में बने रहने की अनुमति है, पर वे बिना टीईटी के पदोन्नति के अधिकार से वंचित रहेंगे।
यह निर्णय RTE (Right to Education) Act के सेक्शन 23 के प्रावधानों के अनुरूप था, जिससे टीईटी की भूमिका मूलभूत योग्यता मानदंड के रूप में और स्पष्ट हो गई।

2011 से पूर्व सेवा में शामिल शिक्षकों की स्थिति और सरकार का जवाब
लोकसभा में उठाए गए एक प्रमुख प्रश्न में सांसदों ने यह भी पूछा कि 2011 से पहले नियुक्त हुए शिक्षकों पर टीईटी अनिवार्यता का क्या प्रभाव होगा, क्योंकि उस समय टीईटी अनिवार्य नहीं थी। शिक्षा मंत्री जयंत चौधरी ने जवाब में स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत रिलैक्सेशन दिया है ताकि जिन शिक्षकों की सेवा पाँच वर्ष से अधिक बची है, उन्हें दो वर्ष में टीईटी पास करने का अवसर प्रदान किया जा सके। वहीं जिनकी सेवा पाँच वर्ष से कम बची है, उन्हें रिटायरमेंट तक सेवा में बने रह सकते हैं पर बिना टीईटी प्रमोशन नहीं मिलेगा।
इस स्पष्टीकरण के बाद कई शिक्षकों में मिश्रित प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं— जहाँ कुछ को राहत मिली वहीं अन्य अब अपनी पेशेवर सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं।

शिक्षकों की प्रतिक्रिया – चिंता, असमंजस और संगठनात्मक प्रतिक्रिया
टीईटी/सीटीईटी अनिवार्यता पर निर्णय आने के बाद देशभर के शिक्षक संघ, संगठनों और स्वयं शिक्षकों मेंg अलग अलग प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली हैं:
शिक्षक संगठनों का विरोध: कई शिक्षक संघों ने इस निर्णय का विरोध किया है, यह कहते हुए कि यह नियम लाखों अनुभवी शिक्षकों के करियर को खतरे में डाल देगा। कुछ संगठनों ने समीक्षा याचिका दायर करने की भी मांग की है।
आंदोलन और प्रदर्शन: कई राज्यों में शिक्षकों ने प्रदर्शन किये हैं और केंद्र सरकार से पुनर्विचार की अपील की है।
शिक्षकों की चिंताएँ: सैकड़ों शिक्षक जिनकी सेवा में पाँच वर्ष से अधिक समय बचा है, वे अब दो साल के भीतर टीईटी पास करने के दबाव में हैं, जिससे मानसिक तनाव और करियर की अनिश्चितता पैदा हो गई है।
इन प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि नीति का समाजिक, भावनात्मक और आर्थिक स्तर पर भी व्यापक प्रभाव है। इसका असर न केवल शिक्षा तंत्र पर बल्कि शिक्षक समुदाय की मानसिकता पर भी देखा जा रहा है।

सरकारी नीति की मजबूती — गुणवत्ता, मानकीकरण और व्यावसायिकता
टीईटी/सीटीईटी अनिवार्यता की नीति के पीछे सरकार और सुप्रीम कोर्ट की सोच यह है कि शिक्षण पेशे में गुणवत्ता सुनिश्चित की जाए और मानकीकरण स्थापित किया जाए। शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, शिक्षक क्षमता का मूल्यांकन और बेहतर शैक्षणिक परिणाम प्राप्त करना इसके मुख्य उद्देश्य हैं।
टीईटी/सीटीईटी परीक्षा को उत्तीर्ण करना यह सुनिश्चित करता है कि शिक्षक न केवल विषय विशेषज्ञ हों बल्कि शिक्षण प्रक्रिया, शिक्षा मनोविज्ञान तथा शिक्षण कौशल की मूल बातें अच्छे से समझते हों। इस मानकीकरण की आवश्यकता वैश्विक दृष्टिकोण से भी जरूरी मानी जाती है।

अवसर और चुनौतियाँ – भविष्य की राह
हालांकि निर्णय से वर्तमान शिक्षकों की असमंजसपूर्ण स्थिति उत्पन्न हुई है, इसके साथ ही भविष्य के शिक्षण पेशे के लिए एक स्पष्ट और कठिन योग्यता मानदंड भी स्थापित हुआ है। इससे आने वाले वर्षों में शिक्षक भर्ती और सेवा सुधार प्रणाली को सुदृढ़, प्रतिस्पर्धात्मक और पारदर्शी बनाया जा सकता है।
अन्य चुनौतियों में शामिल हैं:
राज्यों द्वारा टीईटी परीक्षा की उपलब्धता और आवृत्ति की समस्या,
शिक्षकों को प्रशिक्षण व तैयारी का पर्याप्त समय मिलना,
संसाधन और मार्गदर्शन का अभाव,
अनुभवी शिक्षकों को नई आवश्यकताओं के अनुसार खुद को ढालने में कठिनाई।

शिक्षा तंत्र में बदलाव का समग्र प्रभाव
सरकार की इस घोषणा ने शिक्षा क्षेत्र की दिशा में एक बड़ा बदलाव ला दिया है। टीईटी/सीटीईटी अनिवार्यता नीति अब केवल भर्ती की मापदण्ड नहीं रह गई बल्कि यह शिक्षक की पेशेवर पहचान, सेवा सुरक्षा और पदोन्नति की मूल आधारशिला बन चुकी है। यह कदम शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने, शिक्षक क्षमता को मानकीकृत करने और देश के समग्र शिक्षण ढांचे को और अधिक प्रतिस्पर्धात्मक तथा परिणामोन्मुखी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण नीति बदलाव है।
शिक्षकों, नीति निर्माताओं और समाज को अब मिलकर यह सुनिश्चित करना है कि यह निर्णय न केवल कानूनी और गुणवत्ता दृष्टिकोण से सही हो, बल्कि यह शिक्षक समुदाय के हित, शैक्षणिक गुणवत्ता तथा बच्चों की शिक्षा के सर्वोत्तम परिणाम को सुनिश्चित करे।

Geeta Singh
Geeta Singh

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