अब अंकों के साथ भविष्य पर भी फोकस: CBSE ने सभी स्कूलों में करियर काउंसलर नियुक्त करने का दिया आदेश
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संवाद 24 डेस्क। शिक्षा व्यवस्था में बदलाव का ऐतिहासिक निर्णय
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने अपने संबद्ध सभी स्कूलों में करियर काउंसलर तथा सोशियो-इमोशनल काउंसलर की नियुक्ति को अनिवार्य कर दिया है। यह निर्णय 19 जनवरी, 2026 को बोर्ड द्वारा जारी एक सर्कुलर के माध्यम से लागू हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य छात्रों को शैक्षणिक तनाव और करियर अनिश्चितता से निपटने में सहायता प्रदान करना है।
यह फैसला केवल नई पॉलिसी नहीं है, बल्कि भारतीय शिक्षा ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है। अब CBSE के तहत आने वाले सभी स्कूलों — छोटे, बड़े, शहरी और ग्रामीण — को इस दिशा में कदम उठाने की जिम्मेदारी दी गई है, जिससे हर छात्र तक सकारात्मक बदलाव पहुँचा जा सके।
क्यों आया यह निर्णय?
CBSE की यह पहल छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षणिक दबाव, और भविष्य के बारे में अनिश्चितता को ध्यान में रखकर की गई है। पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि बोर्ड परीक्षा की चुनौतियों, करियर विकल्पों की अस्पष्टता, और सामाजिक अपेक्षाओं के कारण छात्रों में तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएँ काफी बढ़ी हैं।
राजस्थान हाईकोर्ट में जुलाई 2025 में दायर एक जनहित याचिका में यह भी कहा गया था कि स्कूल स्तर पर पर्याप्त मेंटल हेल्थ सपोर्ट न होने के कारण ज़्यादातर छात्र समय रहते मदद नहीं पा पा रहे हैं। इसी याचिका के परिणामस्वरूप CBSE ने अपने Affiliation Bye-Laws (धारा 2.4.12) में संशोधन किया।
भले ही पिछले साल से CBSE कुछ काउंसलिंग प्रयास कर रहा था जैसे कि “Counselling Hub and Spoke Model” लेकिन यह नया कदम इसे व्यवस्थित, नियमबद्ध और वैधानिक रूप देता है।
मुख्य बदलाव: नई पॉलिसी के प्रमुख बिंदु
CBSE के नए निर्देशों के अनुसार अब हर संबद्ध स्कूल में दो महत्वपूर्ण सेवाएँ अनिवार्य रूप से होनी चाहिए:
सोशियो-इमोशनल काउंसलर (Socio-Emotional Counselor)
यह काउंसलर छात्रों के भावनात्मक और सामाजिक स्वास्थ्य की देखभाल करेगा। उनका जिम्मा होगा छात्रों को तनाव, चिंता, आत्म-अंदेशा, और व्यवहारिक चुनौतियों से निपटने में समर्थन देना।
करियर काउंसलर (Career Counselor)
करियर काउंसलर का मुख्य कार्य छात्रों को करियर विकल्पों, आगे की पढ़ाई और प्रोफेशनल फैसलों में मार्गदर्शन देना है। यह निर्णय भविष्य की पढ़ाई, कोर्स चयन, करियर पथ और उच्च शिक्षा के विकल्पों को स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
काउंसलर हर स्कूल में क्यों अनिवार्य?
शैक्षणिक दबाव का बढ़ता प्रभाव
भारत में बोर्ड परीक्षा—विशेषकर कक्षा 10वीं और 12वीं—को लेकर छात्रों पर अत्यधिक दबाव रहता है। यह दबाव केवल अकादमिक प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य और आत्मविश्वास को प्रभावित करता है। कई अध्ययन और विशेषज्ञ यह मानते हैं कि पर्याप्त लोहा न मिलने पर यह दबाव अवसाद, चिंता और आत्महत्या जैसी चिंताजनक मानसिक स्थितियों तक पहुंच सकता है।
करियर अनिश्चितता के सामाजिक प्रभाव
आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में करियर विकल्पों की विविधता और उनकी जानकारी का अभाव छात्रों को भ्रम का शिकार बनाता है। सही जानकारी, गाइडेंस और करियर योजना की कमी के कारण कई छात्र गलत निर्णय ले लेते हैं, जिससे उनकी शैक्षणिक यात्रा प्रभावित होती है।
स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य समर्थन की कमी
अधिकतर स्कूलों में शिक्षण व्यवस्था केवल अकादमिक सीखने तक सीमित रहती थी और छात्रों की भावनात्मक जरूरतों को प्राथमिकता नहीं दी जाती थी। इससे छात्र अक्सर अपनी भावनात्मक समस्याओं को अभिभावकों या शिक्षकों से साझा नहीं कर पाते।
इन चुनौतियों को देखते हुए, CBSE ने यह निर्णय लिया कि स्कूल स्तर पर ही विशेषज्ञ counsellors के माध्यम से छात्रों को व्यक्तिगत सहायता मिलनी चाहिए।
नए नियमों की रूपरेखा
काउंसलर-से-स्टूडेंट अनुपात (Ratio)
CBSE ने यह सुनिश्चित किया है कि हर काउंसलर (सोशियो-इमोशनल या करियर) पर छात्रों की संख्या अधिकतम 500:1 रहे। इसका मतलब यह है कि:
500 छात्रों तक 1 सोशियो-इमोशनल काउंसलर अनिवार्य
500 छात्रों तक 1 करियर काउंसलर अनिवार्य
अगर स्कूल में 1000 छात्र हैं, तो उसे कम से कम 2 सोशियो-इमोशनल और 2 करियर काउंसलर नियुक्त करने होंगे।
योग्यता और प्रशिक्षण
सोशियो-इमोशनल काउंसलर
मनोविज्ञान (Psychology) में स्नातक/परास्नातक।
सामाजिक कार्य (Social Work) में विशेषज्ञता।
या किसी भी विषय में डिग्री + स्कूल या चाइल्ड काउंसलिंग में डिप्लोमा।
साथ ही CBSE-अनुमोदित 50-घंटे के Capacity Building Program को पूरा करना अनिवार्य होगा।
करियर काउंसलर
मानविकी, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, शिक्षा, प्रबंधन या तकनीकी क्षेत्र में स्नातक/परास्नातक डिग्री।
करियर गाइडेंस, शैक्षणिक विकल्प, प्रवेश प्रक्रियाएं, उच्च शिक्षा सपोर्ट आदि का ज्ञान होना आवश्यक है।
छोटे स्कूलों के लिए विशेष मॉडल
हर स्कूल के लिए पूर्ण-कालिक काउंसलर रखने की प्रतिबद्धता मुश्किल हो सकती है—विशेषकर छोटे या ग्रामीण स्कूलों के लिए। इसलिए CBSE ने „Counselling Hub-and-Spoke Model“ पेश किया है, जिसमें एक बड़े (Hub) स्कूल के पास प्रशिक्षित counsellors होंगे जो आसपास के छोटे (Spoke) स्कूलों को सपोर्ट देंगे।
यह मॉडल विशेष रूप से ग्रामीण और सीमांत इलाकों में कार्यान्वयन को सुदृढ़ करेगा तथा संसाधनों का कुशलतम उपयोग सुनिश्चित करेगा।
स्कूल, अभिभावक और विद्यार्थी: लाभ और संभावित प्रभाव
छात्र के लिए लाभ
मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान
तनाव प्रबंधन
करियर स्पष्टता और मार्गदर्शन
आत्म-विश्वास और लक्ष्य निर्धारण
परीक्षा-तैयारी के दौरान सपोर्ट
अभिभावकों के लिए सकारात्मक परिणाम
अब अभिभावक अपने बच्चों को करियर निर्णयों पर विशेषज्ञ सलाह उपलब्ध पाएँगे। कई बार माता-पिता भी करियर विकल्पों के बारे में अपर्याप्त जानकारी महसूस करते हैं—अब यह दबाव कम होगा।
शिक्षा प्रणाली में समग्र सुधार
यह निर्णय CBSE के नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 (NEP 2020) के विचारों के अनुरूप है, जो छात्रों के समग्र विकास, मानसिक स्वास्थ्य, और बहुआयामी सीखने की आवश्यकता पर जोर देता है।
चुनौतियाँ और कार्यान्वयन की वास्तविकता
कुशल काउंसलरों की कमी
भारत में पर्याप्त प्रशिक्षित काउंसलरों की कमी एक वास्तविक चुनौती है। इस नीति के सफल कार्यान्वयन के लिए प्रशिक्षित manpower तैयार करना आवश्यक होगा।
संसाधनों का सही वितरण
गांव-देहात के स्कूलों में काउंसलर की भर्ती और प्रशिक्षण दूसरों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
स्कूल प्रशासन अवरोध
कुछ स्कूल वित्तीय या प्रशासनिक दृष्टि से सक्रिया रूप से सभी नियमों का पालन करने में असमर्थ हो सकते हैं—जिसके लिए बोर्ड या राज्य सरकार से अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता हो सकती है।
शिक्षा नीति और भविष्य
CBSE का यह नवीनतम निर्णय भारतीय शिक्षा व्यवस्था में मेंटल हेल्थ और करियर योजना को मानकीकृत करने का एक बड़ा कदम है। यह न केवल शैक्षणिक दबाव को कम करेगा, बल्कि भविष्य का करियर तय करने की प्रक्रिया को भी अधिक सूचित, समर्थ और नैदानिक-रूप से सक्षम बनाएगा।
भविष्य में इस पहल का सकारात्मक प्रभाव तब स्पष्ट होगा जब यह नीति सबसे दूरदराज के स्कूलों तक भी प्रभावी रूप से पहुँच पाएगी।
CBSE का यह निर्णय केवल एक नियम परिवर्तन नहीं है—यह एक शिक्षा-विजन परिवर्तन है, जो छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, करियर स्पष्टता और समग्र विकास को प्राथमिकता देता है। आज की प्रतिस्पर्धात्मक दुनिया में, जहाँ हर निर्णय छात्र के भविष्य को प्रभावित करता है, ऐसे समय में यह कदम एक समयोजित, यथार्थवादी और दूरदर्शी नीति सिद्ध हो सकता है। संवाद 24 के पाठकों को यह समझना जरूरी है कि अब शिक्षा केवल अंक और परिणाम तक सीमित नहीं रह गई है; बल्कि यह अब छात्रों के दिमाग, भावना, और भविष्य की दिशा की भी जिम्मेदारी ले रही है।






