व्यक्तित्व निर्माण से राष्ट्र निर्माण तक: एबीवीपी की भूमिका

डॉ. धरवेश कठेरिया। भारत को प्रायः युवाओं का देश कहा जाता है। देश की जनसंख्या का एक बड़ा भाग विद्यार्थियों और युवाओं से मिलकर बना है। यही कारण है कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवा वर्ग की सोच, चरित्र, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक प्रतिबद्धता पर निर्भर करता है। यदि विद्यार्थी केवल परीक्षा और रोजगार तक सीमित रह जाएँ, तो वे व्यक्तिगत सफलता तो प्राप्त कर सकते हैं, किंतु यदि उनमें सामाजिक उत्तरदायित्व, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रबोध का विकास हो, तो वे राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में भी सक्रिय भागीदार बन सकते हैं। इसी संदर्भ में छात्र संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

भारत में अनेक छात्र संगठन सक्रिय रहे हैं, जिन्होंने विभिन्न समयों पर विद्यार्थियों के हितों, शैक्षिक सुधारों और सामाजिक प्रश्नों पर अपनी भूमिका निभाई है। इन्हीं संगठनों में से एक है अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी), जिसने स्वयं को केवल छात्र समस्याओं तक सीमित न रखते हुए व्यक्तित्व निर्माण, नेतृत्व विकास और सामाजिक चेतना के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की व्यापक अवधारणा से जोड़ा है। स्थापना दिवस जैसे अवसर केवल संगठन के इतिहास को स्मरण करने के लिए नहीं होते, बल्कि उसके योगदान, उपलब्धियों और भविष्य की संभावनाओं का मूल्यांकन करने का अवसर भी प्रदान करते हैं।

एबीवीपी का उद्भव और ऐतिहासिक विकास

स्वतंत्र भारत के प्रारंभिक वर्षों में यह अनुभव किया गया कि राष्ट्र के भविष्य के निर्माण में विद्यार्थियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी दृष्टि से 9 जुलाई, 1949 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की स्थापना हुई। संगठन के प्रारंभिक विकास में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ता बलराज मधोक की महत्वपूर्ण भूमिका रही। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राष्ट्र निर्माण, सांस्कृतिक जागरूकता और छात्र शक्ति को सकारात्मक दिशा देने के उद्देश्य से इस संगठन ने अपने कार्यों का प्रारंभ किया। यह केवल एक छात्र संगठन के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जीवन में विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी के मंच के रूप में विकसित होने का प्रयास था। एबीवीपी प्रतिवर्ष 9 जुलाई को अपना स्थापना दिवस “राष्ट्रीय विद्यार्थी दिवस” के रूप में मनाती है। इस अवसर पर देशभर में विद्यार्थियों, शिक्षकों और युवा कार्यकर्ताओं की सहभागिता से विभिन्न शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यह दिवस विद्यार्थियों की रचनात्मक शक्ति, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय योगदान की संभावनाओं को रेखांकित करने का अवसर भी माना जाता है।

एबीवीपी के संगठनात्मक विस्तार और वैचारिक निर्माण में प्रोफेसर यशवंतराव केलकर का विशेष योगदान माना जाता है। उनके मार्गदर्शन में संगठन ने “ज्ञान, शील और एकता” को अपना प्रेरक सूत्र बनाया। इस सूत्र में शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रीय एकात्मता की भावना का समावेश दिखाई देता है। समय के साथ संगठन ने देशभर के विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में अपनी उपस्थिति स्थापित की। “ज्ञान” बौद्धिक विकास, “शील” चरित्र निर्माण तथा “एकता” सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकात्मता का प्रतीक माना जाता है। संगठन की अनेक गतिविधियों में इन तीनों मूल्यों की झलक दिखाई देती है।

आज एबीवीपी देश के लगभग सभी राज्यों में सक्रिय उपस्थिति रखने वाला एक व्यापक छात्र संगठन है। एबीवीपी के सदस्य और कार्यकर्ताओं की संख्या 50 लाख से अधिक है, जिसके आधार पर उसे विश्व के सबसे बड़े छात्र संगठनों में गिना जाता है।

समय के साथ एबीवीपी ने अपने कार्यक्षेत्र का निरंतर विस्तार किया। प्रारंभ में छात्र समुदाय को संगठित करने के उद्देश्य से शुरू हुई यह यात्रा आगे चलकर शिक्षा, सामाजिक जागरूकता, नेतृत्व विकास और राष्ट्रीय मुद्दों पर छात्र सहभागिता के व्यापक मंच के रूप में विकसित हुई। विभिन्न शैक्षणिक परिसरों में संगठन की सक्रिय उपस्थिति ने उसे देश के प्रमुख छात्र संगठनों में स्थान दिलाया।

विश्वविद्यालय परिसरों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक संगठन ने विद्यार्थियों की भागीदारी बढ़ाने का प्रयास किया। विभिन्न शैक्षिक, सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर विद्यार्थियों की आवाज़ को संगठित करने के साथ-साथ नेतृत्व निर्माण को भी प्राथमिकता दी गई। इस प्रक्रिया में संगठन ने स्वयं को केवल छात्र राजनीति के एक मंच के रूप में नहीं, बल्कि छात्र विकास और सामाजिक जागरूकता के एक माध्यम के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

स्वतंत्रता के बाद विभिन्न राष्ट्रीय और छात्र आंदोलनों में भी संगठन की सक्रिय भागीदारी देखी गई। विशेष रूप से 1970 के दशक में छात्र आंदोलनों के दौर ने भारतीय छात्र राजनीति को नई दिशा दी, जिसमें एबीवीपी से जुड़े विद्यार्थियों की उपस्थिति भी उल्लेखनीय रही। ऐसे अनुभवों ने संगठन को केवल एक छात्र मंच ही नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय विमर्श से जुड़ी इकाई के रूप में भी स्थापित करने में योगदान दिया।

संगठन ने विद्यार्थी, शिक्षक और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों को व्यापक शैक्षिक परिवार का हिस्सा मानने की अवधारणा को भी महत्व दिया, जिसके माध्यम से शिक्षा संस्थानों को केवल अध्ययन के केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक विकास के मंच के रूप में देखने का प्रयास किया गया। किसी भी संगठन का मूल्यांकन केवल उसके आकार से नहीं, बल्कि उसके दीर्घकालिक प्रभाव से किया जाता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो एबीवीपी की यात्रा छात्र संगठन से एक व्यापक छात्र आंदोलन तक पहुँचने की कहानी के रूप में देखी जा सकती है।

व्यक्तित्व निर्माण की प्रयोगशाला के रूप में एबीवीपी

एबीवीपी लंबे समय से “छात्र शक्ति – राष्ट्र शक्ति” की अवधारणा को रेखांकित करती रही है। इस विचार के अनुसार छात्र केवल भविष्य के नागरिक नहीं, बल्कि वर्तमान राष्ट्रीय जीवन के सक्रिय सहभागी भी हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं है। शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य व्यक्ति के समग्र विकास में निहित है। व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया में आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, संवाद कौशल, अनुशासन, सामाजिक संवेदनशीलता और निर्णय क्षमता जैसे गुण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

स्वामी विवेकानंद के “व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण” के विचार को भारतीय युवा चेतना के महत्वपूर्ण सूत्रों में माना जाता है। एबीवीपी की अनेक गतिविधियों में भी व्यक्तित्व विकास को व्यापक राष्ट्रीय दायित्वों से जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है। इस दृष्टि से छात्र जीवन को केवल शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित न मानकर चरित्र, नेतृत्व और सामाजिक उत्तरदायित्व के विकास का महत्वपूर्ण काल माना जाता है।

एबीवीपी स्वयं को लंबे समय से ऐसे मंच के रूप में प्रस्तुत करती रही है जहाँ विद्यार्थियों को विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से नेतृत्व और संगठनात्मक अनुभव प्राप्त होता है। महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में आयोजित कार्यक्रम, चर्चा सत्र, प्रशिक्षण शिविर, अध्ययन वर्ग, संगोष्ठियाँ और सामाजिक अभियान विद्यार्थियों को केवल श्रोता नहीं रहने देते, बल्कि उन्हें सक्रिय भागीदारी का अवसर प्रदान करते हैं।

नेतृत्व और संगठनात्मक विकास के साथ-साथ विद्यार्थियों की रचनात्मक प्रतिभाओं को अभिव्यक्ति देने पर भी बल दिया गया है। साहित्य, कला, संस्कृति, संगीत, नाट्य और अन्य सृजनात्मक गतिविधियों से जुड़े मंच विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा विकसित करने तथा भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर प्रदान करते हैं। इससे व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया केवल शैक्षणिक या संगठनात्मक प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि रचनात्मक अभिव्यक्ति तक भी विस्तारित होती है।

एबीवीपी की कार्यपद्धति में प्रशिक्षण शिविर, अध्ययन वर्ग, विचार-विमर्श, नेतृत्व कार्यशालाएँ और संगठनात्मक अभ्यास महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन गतिविधियों का उद्देश्य केवल वैचारिक संवाद नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, निर्णय क्षमता, संवाद कौशल और सार्वजनिक जीवन के लिए आवश्यक नेतृत्व गुणों का विकास करना भी है।

किसी भी युवा के लिए सार्वजनिक मंच पर बोलना, टीम का नेतृत्व करना, किसी कार्यक्रम का संचालन करना या सामाजिक विषयों पर अपनी राय व्यक्त करना एक महत्वपूर्ण सीख होती है। अनेक विद्यार्थियों के लिए ऐसे अनुभव भविष्य के व्यावसायिक और सामाजिक जीवन में भी उपयोगी सिद्ध होते हैं। यही कारण है कि छात्र संगठन अक्सर नेतृत्व निर्माण की प्रयोगशाला के रूप में देखे जाते हैं।

व्यक्तित्व निर्माण का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष अनुशासन और सामूहिकता की भावना है। आधुनिक समाज में व्यक्तिवाद का प्रभाव बढ़ा है, किंतु किसी भी बड़े सामाजिक लक्ष्य की प्राप्ति सामूहिक प्रयासों से ही संभव होती है। छात्र जीवन में सहयोग, समन्वय और टीमवर्क का अभ्यास भविष्य में उत्तरदायी नागरिक और प्रभावी नेतृत्व तैयार करने में सहायक होता है। विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत अनेक शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, प्रशासक और जनप्रतिनिधि अपने छात्र जीवन में संगठनात्मक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं। इससे छात्र नेतृत्व और सार्वजनिक जीवन के बीच संबंध को समझा जा सकता है।

छात्र हित से समाज हित तक

किसी छात्र संगठन की प्राथमिक जिम्मेदारी विद्यार्थियों के हितों और समस्याओं से जुड़ी होती है। शिक्षा की गुणवत्ता, परीक्षा प्रणाली, छात्र सुविधाएँ, पुस्तकालय, छात्रावास, शोध संसाधन और रोजगारोन्मुख शिक्षा जैसे प्रश्न लंबे समय से छात्र समुदाय के केंद्र में रहे हैं। एबीवीपी ने भी विभिन्न अवसरों पर इन विषयों को उठाया है और शैक्षिक सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया है।

हालाँकि, किसी संगठन का प्रभाव तब अधिक व्यापक माना जाता है जब वह परिसर की सीमाओं से बाहर निकलकर समाज के प्रश्नों से भी जुड़ता है। इसी संदर्भ में सेवा गतिविधियों, जनजागरण अभियानों और सामाजिक सहभागिता को महत्वपूर्ण माना जाता है। संगठनात्मक गतिविधियों में रचनात्मक कार्यों और जनसरोकारों से जुड़े आंदोलनों, दोनों को समान महत्व दिया गया है। इस दृष्टिकोण का उद्देश्य केवल समस्याओं को उजागर करना नहीं, बल्कि उनके समाधान की दिशा में सकारात्मक सहभागिता को प्रोत्साहित करना भी है।

भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में शिक्षा और समाज को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। विद्यार्थियों को सामाजिक वास्तविकताओं से परिचित कराना, ग्रामीण क्षेत्रों की चुनौतियों को समझाना, पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य जागरूकता, आपदा सहायता और सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर संवेदनशील बनाना भी शिक्षा की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है। विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों की सहायता हेतु अध्ययन सहयोग, निःशुल्क मार्गदर्शन तथा शैक्षणिक सहायता संबंधी पहलें भी समय-समय पर संचालित की गई हैं। ऐसे प्रयास शिक्षा को केवल अवसर प्राप्त लोगों तक सीमित न रखकर अधिक व्यापक और समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

ऐसी गतिविधियाँ विद्यार्थियों में यह समझ विकसित करती हैं कि उनका ज्ञान और क्षमता केवल व्यक्तिगत प्रगति के लिए नहीं, बल्कि समाज के व्यापक हित के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं। यही सोच आगे चलकर उत्तरदायी नागरिकता का आधार बनती है। सेवा गतिविधियों में रक्तदान, स्वास्थ्य जागरूकता, शिक्षा सहयोग तथा सामाजिक सहायता कार्यक्रमों के माध्यम से भी विद्यार्थियों की सहभागिता को प्रोत्साहित किया गया है। विभिन्न अवसरों पर विद्यार्थियों की भागीदारी को पर्यावरण संरक्षण, जनजागरण, आपदा सहायता तथा सामाजिक समरसता से जुड़े कार्यक्रमों के माध्यम से समाज से जोड़ने का प्रयास किया गया है। छात्राओं की सुरक्षा, आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता के विकास को लेकर भी समय-समय पर विभिन्न पहलें संचालित की गई हैं। आत्मरक्षा, जागरूकता और महिला सशक्तीकरण से जुड़े कार्यक्रमों ने छात्र जीवन में आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और सामाजिक सहभागिता की भावना को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया है।

राष्ट्र निर्माण की अवधारणा और एबीवीपी

राष्ट्र निर्माण एक व्यापक और बहुआयामी अवधारणा है। इसे केवल आर्थिक विकास या राजनीतिक स्थिरता तक सीमित नहीं किया जा सकता। राष्ट्र निर्माण में शिक्षा, सामाजिक एकता, नागरिक उत्तरदायित्व, सांस्कृतिक जागरूकता, लोकतांत्रिक सहभागिता और नैतिक मूल्यों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। किसी भी राष्ट्र की प्रगति केवल आर्थिक संसाधनों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसके नागरिकों की शिक्षा, चरित्र, सामाजिक चेतना और उत्तरदायित्व पर भी आधारित होती है। इसीलिए शिक्षा और राष्ट्र निर्माण को परस्पर पूरक प्रक्रियाओं के रूप में देखा जाता है।

किसी भी राष्ट्र की प्रगति का आधार केवल उसकी नीतियाँ या संस्थाएँ नहीं होतीं, बल्कि वे नागरिक होते हैं जो उन संस्थाओं को जीवंत बनाते हैं। इस दृष्टि से व्यक्तित्व निर्माण राष्ट्र निर्माण की आधारभूत प्रक्रिया है। चरित्रवान, जागरूक, अनुशासित और उत्तरदायी नागरिक ही एक मजबूत लोकतांत्रिक समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।

इस संदर्भ में प्रश्न उठता है कि छात्र संगठन राष्ट्र निर्माण में क्या भूमिका निभा सकते हैं? इसका उत्तर विद्यार्थियों की सामाजिक स्थिति में निहित है। आज का विद्यार्थी कल का शिक्षक, वैज्ञानिक, पत्रकार, प्रशासक, उद्यमी, जनप्रतिनिधि या सामाजिक कार्यकर्ता बन सकता है। इसलिए छात्र जीवन में विकसित मूल्य और दृष्टिकोण भविष्य के राष्ट्रीय जीवन को प्रभावित करते हैं। इसी कारण छात्र जीवन को राष्ट्र के दीर्घकालिक भविष्य से जोड़कर देखा जाता है।

एबीवीपी लंबे समय से इस विचार को रेखांकित करती रही है कि छात्र केवल भविष्य का नागरिक नहीं, बल्कि वर्तमान सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन का सक्रिय सहभागी भी है। यही दृष्टिकोण विद्यार्थियों को समकालीन राष्ट्रीय प्रश्नों से जोड़ने का आधार बनता है। एबीवीपी की विचारधारा और गतिविधियों में राष्ट्रहित, सामाजिक उत्तरदायित्व और सक्रिय नागरिकता जैसे विषय प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। संगठन का मानना रहा है कि शिक्षित और जागरूक युवा ही राष्ट्र की वास्तविक शक्ति हैं। इसी कारण व्यक्तित्व निर्माण और राष्ट्र निर्माण को परस्पर जुड़ी हुई प्रक्रियाओं के रूप में देखा जाता है।

हालाँकि, राष्ट्र निर्माण की अवधारणा पर विभिन्न विचारधाराओं और सामाजिक समूहों के अपने-अपने दृष्टिकोण भी हो सकते हैं। लोकतांत्रिक समाज में यह स्वाभाविक है। इसलिए किसी भी संगठन की भूमिका का मूल्यांकन उसके घोषित उद्देश्यों, कार्यों और सामाजिक प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए।

एबीवीपी की उपलब्धियाँ और योगदान

एबीवीपी की उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल चुनावी सफलता या संगठनात्मक विस्तार के आधार पर नहीं किया जा सकता। किसी छात्र संगठन का सबसे बड़ा योगदान उन युवाओं के विकास में निहित होता है जो उसके माध्यम से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होते हैं। वर्षों के दौरान अनेक विद्यार्थी संगठनात्मक अनुभव प्राप्त कर शिक्षा, सामाजिक कार्य, प्रशासन, पत्रकारिता, राजनीति, उद्यमिता और विभिन्न पेशेवर क्षेत्रों में आगे बढ़े हैं। नेतृत्व विकास की यह प्रक्रिया किसी भी छात्र संगठन की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा सकती है।

विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय अनेक सार्वजनिक व्यक्तित्वों ने अपने छात्र जीवन में संगठनात्मक गतिविधियों से जुड़कर नेतृत्व अनुभव प्राप्त किया। इससे यह समझा जा सकता है कि छात्र जीवन में विकसित नेतृत्व क्षमता, संगठनात्मक कौशल और सामाजिक दृष्टि का प्रभाव आगे चलकर सार्वजनिक जीवन और विभिन्न पेशेवर क्षेत्रों में भी दिखाई देता है।

शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थियों की भागीदारी को बढ़ावा देने, शैक्षणिक वातावरण से जुड़े प्रश्नों को उठाने तथा विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर छात्र समुदाय को जागरूक करने के प्रयासों ने एबीवीपी को केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक सक्रिय छात्र मंच के रूप में स्थापित करने में योगदान दिया है। समय-समय पर आयोजित अध्ययन, संवाद और सहभागिता आधारित कार्यक्रमों ने विद्यार्थियों को सामाजिक एवं राष्ट्रीय विषयों पर अपनी भूमिका समझने का अवसर प्रदान किया है।

विभिन्न सांस्कृतिक और भौगोलिक क्षेत्रों के विद्यार्थियों के बीच संवाद बढ़ाने तथा राष्ट्रीय एकात्मता की भावना को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से भी समय-समय पर अनेक कार्यक्रम और पहल संचालित की गई हैं। इन पहलों ने विविधताओं से भरे भारतीय समाज को समझने तथा विभिन्न क्षेत्रों के युवाओं के बीच परस्पर संवाद और सहयोग को प्रोत्साहित करने में योगदान दिया है। साथ ही, उन्होंने केवल सांस्कृतिक परिचय तक सीमित न रहकर पारस्परिक समझ, भावनात्मक एकात्मता और राष्ट्रीय समरसता को भी मजबूत करने का प्रयास किया है। इस प्रकार की गतिविधियाँ भारत की विविधता को अनुभवात्मक रूप से समझने का अवसर प्रदान करती हैं।

इसके अतिरिक्त शिक्षा संबंधी मुद्दों पर संवाद, राष्ट्रीय विषयों पर छात्र सहभागिता, सेवा गतिविधियाँ और विभिन्न सामाजिक अभियानों में भागीदारी भी संगठन की सक्रियता को दर्शाती हैं। विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत पूर्व छात्र कार्यकर्ताओं की उपस्थिति यह संकेत देती है कि छात्र जीवन में प्राप्त अनुभव दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ सकते हैं।

संगठन ने विभिन्न समयों पर राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर भी अपनी सक्रियता दिखाई है। समर्थकों द्वारा धारा 370, अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ, राष्ट्रीय एकता तथा लोकतांत्रिक आंदोलनों से जुड़े विषयों पर संगठन की भूमिका को उसके सार्वजनिक हस्तक्षेप के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इन विषयों पर भिन्न-भिन्न राजनीतिक और वैचारिक दृष्टिकोण मौजूद हैं, फिर भी छात्र सहभागिता के संदर्भ में इन अभियानों का उल्लेख किया जाता है।

इन पहलों के अतिरिक्त विभिन्न राष्ट्रीय और सामाजिक चुनौतियों के समय भी संगठन से जुड़े विद्यार्थियों और स्वयंसेवकों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली है। कोविड-19 महामारी के दौरान भी विभिन्न क्षेत्रों में विद्यार्थियों और युवा स्वयंसेवकों द्वारा राहत, जागरूकता और सेवा संबंधी गतिविधियों में सहभागिता देखी गई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि छात्र संगठन केवल परिसर आधारित गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि संकट की परिस्थितियों में सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने की क्षमता भी रखते हैं।

चुनौतियाँ, आलोचनाएँ और समकालीन विमर्श

किसी भी बड़े संगठन की तरह एबीवीपी भी चुनौतियों और आलोचनाओं से मुक्त नहीं है। लोकतांत्रिक समाज में यह अपेक्षित भी है। छात्र राजनीति को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। कुछ लोग इसे नेतृत्व विकास का माध्यम मानते हैं, जबकि कुछ इसे शैक्षणिक वातावरण के लिए चुनौतीपूर्ण मानते हैं।

डिजिटल युग ने भी छात्र संगठनों के सामने नई परिस्थितियाँ प्रस्तुत की हैं। आज का विद्यार्थी सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वैश्विक अवसरों और तेजी से बदलती तकनीकों के बीच अपना भविष्य निर्मित कर रहा है। ऐसे में छात्र संगठनों को भी अपने कार्य और संवाद के तरीकों को समयानुकूल बनाना होगा।

इसके अतिरिक्त रोजगार, कौशल विकास, मानसिक स्वास्थ्य, शोध संस्कृति और नवाचार जैसे विषय भी आज के छात्र समुदाय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं। भविष्य में किसी भी छात्र संगठन की प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इन नए प्रश्नों को किस प्रकार समझता और संबोधित करता है।

वर्तमान भारत में एबीवीपी की प्रासंगिकता

कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल शिक्षा, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, स्टार्टअप संस्कृति और कौशल-आधारित अर्थव्यवस्था के इस दौर में छात्र संगठनों के सामने नई चुनौतियाँ और नए अवसर दोनों उपस्थित हैं। भारत आज ऐसे परिवर्तनकारी समय से गुजर रहा है, जहाँ शिक्षा, कौशल, नवाचार और युवा नेतृत्व को विशेष महत्व दिया जा रहा है। नई शिक्षा नीति, डिजिटल तकनीकों के बढ़ते उपयोग और वैश्विक प्रतिस्पर्धा ने विद्यार्थियों की भूमिका को पहले की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।

पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास, स्थानीय संसाधनों के उपयोग और सामाजिक नवाचार जैसे विषय भी आज युवा विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे विषयों पर विद्यार्थियों की भागीदारी यह संकेत देती है कि राष्ट्र निर्माण की अवधारणा अब केवल राजनीतिक या आर्थिक प्रश्नों तक सीमित नहीं रही, बल्कि पर्यावरणीय और सामाजिक उत्तरदायित्व से भी जुड़ चुकी है।

ऐसे समय में छात्र संगठनों की भूमिका केवल विरोध या समर्थन तक सीमित नहीं रह सकती। उन्हें विद्यार्थियों को नेतृत्व, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय विकास की प्रक्रिया से जोड़ने वाले मंच के रूप में भी कार्य करना होगा।

एबीवीपी की प्रासंगिकता इसी संदर्भ में देखी जा सकती है। यदि कोई संगठन विद्यार्थियों को व्यक्तित्व विकास, सामाजिक सहभागिता और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना से जोड़ने में सफल होता है, तो उसका योगदान केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह व्यापक सामाजिक प्रभाव उत्पन्न कर सकता है।

व्यक्तित्व निर्माण और राष्ट्र निर्माण दो अलग-अलग प्रक्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई अवधारणाएँ हैं। राष्ट्र की गुणवत्ता अंततः उसके नागरिकों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है, और नागरिकों का निर्माण छात्र जीवन से ही प्रारंभ होता है। इसी कारण छात्र संगठनों की भूमिका केवल तात्कालिक छात्र मुद्दों तक सीमित नहीं मानी जा सकती।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की यात्रा इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि उसने विद्यार्थियों को नेतृत्व, संगठन, सामाजिक सहभागिता और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने का प्रयास किया है। इसके योगदान, उपलब्धियों, चुनौतियों और आलोचनाओं का मूल्यांकन अलग-अलग दृष्टिकोणों से किया जा सकता है, किंतु यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि भारत के छात्र जीवन और युवा नेतृत्व के विमर्श में एबीवीपी ने एक उल्लेखनीय स्थान बनाया है।

आज जब भारत युवा शक्ति के बल पर भविष्य की ओर अग्रसर है, तब व्यक्तित्व निर्माण, उत्तरदायी नागरिकता और राष्ट्र निर्माण के बीच संबंध को समझना पहले से अधिक आवश्यक हो गया है। इसी संदर्भ में एबीवीपी जैसी संस्थाओं की भूमिका पर गंभीर और संतुलित चर्चा न केवल उपयोगी है, बल्कि लोकतांत्रिक समाज के लिए आवश्यक भी है। 

भारतीय लोकतंत्र की शक्ति केवल उसकी संस्थाओं में नहीं, बल्कि उन जागरूक नागरिकों में निहित है जो इन संस्थाओं को जीवंत बनाए रखते हैं। छात्र जीवन में विकसित नेतृत्व, चरित्र और सामाजिक चेतना इसी प्रक्रिया की आधारशिला बनते हैं।

अंततः किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसकी युवा पीढ़ी की दिशा, दृष्टि और चरित्र पर निर्भर करती है। यदि छात्र जीवन में ज्ञान, चरित्र, नेतृत्व और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास होता है, तो वही ऊर्जा आगे चलकर एक जागरूक समाज और सशक्त राष्ट्र की आधारशिला बनती है।

संप्रति:
एसोसिएट प्रोफेसर, जनसंचार विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा।

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