शक्ति, समृद्धि और स्वाभिमान की प्रतीक:कोल्हापुर की श्री महालक्ष्मी (अंबाबाई)

संवाद 24 डेस्क। भारत की धार्मिक चेतना में शक्ति और समृद्धि की देवी महालक्ष्मी का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। जहाँ एक ओर वे वैष्णव परंपरा में भगवान विष्णु की अर्धांगिनी हैं, वहीं दूसरी ओर शाक्त संप्रदाय में वे स्वयं पूर्ण ब्रह्मस्वरूपा देवी मानी जाती हैं। महाराष्ट्र के कोल्हापुर नगर में स्थित श्री महालक्ष्मी (अंबाबाई) मंदिर इसी शाक्त परंपरा का एक अत्यंत प्राचीन, प्रभावशाली और जीवंत केंद्र है।

यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि महाराष्ट्र, कर्नाटक और गोवा के जनजीवन, सांस्कृतिक स्मृति और सामाजिक आचरण में गहराई से रचा-बसा है। कोल्हापुर की महालक्ष्मी को यहाँ “अंबाबाई” कहा जाता है एक ऐसी देवी जो केवल समृद्धि नहीं, बल्कि न्याय, साहस, आत्मसम्मान और कर्मशीलता की प्रेरणा भी देती हैं।

कोल्हापुर: एक प्राचीन नगरी
कोल्हापुर, महाराष्ट्र के दक्षिण-पश्चिम भाग में स्थित, पंचगंगा नदी के तट पर बसा एक ऐतिहासिक नगर है। इसे प्राचीन ग्रंथों में करवीर, दक्षिण काशी और शक्तिपीठों की भूमि कहा गया है।

मंदिर का निर्माण काल
इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के अनुसार, महालक्ष्मी मंदिर का वर्तमान स्वरूप लगभग 7वीं–8वीं शताब्दी ईस्वी का है। मंदिर का निर्माण चालुक्य कालीन स्थापत्य शैली में हुआ माना जाता है।
कुछ विद्वान इसे राष्ट्रकूट काल से भी जोड़ते हैं।

महालक्ष्मी: देवी का स्वरूप और तात्त्विक अर्थ

महालक्ष्मी का शाक्त स्वरूप
कोल्हापुर की महालक्ष्मी को केवल धन की देवी के रूप में नहीं, बल्कि महाशक्ति के रूप में पूजा जाता है। यहाँ वे—
• असुरों का नाश करने वाली
• धर्म की रक्षा करने वाली
• और भक्तों को आत्मबल प्रदान करने वाली
देवी मानी जाती हैं।

मूर्ति का विवरण
मंदिर की गर्भगृह में स्थित देवी की प्रतिमा:
• काले पत्थर से निर्मित
• लगभग 3 फीट ऊँची
• चार भुजाओं वाली
• हाथों में: गदा, खड्ग, ढाल और पानपात्र

देवी मुकुटधारी हैं और उनकी मुद्रा अत्यंत तेजस्वी एवं आत्मविश्वास से परिपूर्ण है।

पौराणिक संदर्भ और मान्यताएँ

कोल्हासुर वध की कथा
लोकमान्यता के अनुसार, कोल्हापुर का नाम कोल्हासुर नामक असुर से जुड़ा है।
कहा जाता है कि कोल्हासुर के अत्याचारों से त्रस्त देवताओं की प्रार्थना पर देवी महालक्ष्मी ने अवतार लेकर उसका वध किया।
इसलिए देवी को यहाँ “कोल्हासुर मर्दिनी” भी कहा जाता है।

शक्तिपीठ परंपरा
कुछ परंपराओं में कोल्हापुर को 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ माता सती की त्रिनेत्र गिरी थी।

मंदिर स्थापत्य और वैज्ञानिक विशेषताएँ
स्थापत्य शैली
• चालुक्य स्थापत्य
• काले बेसाल्ट पत्थर का प्रयोग
• गर्भगृह, मंडप, सभा मंडप और प्रांगण का संतुलित संयोजन

सूर्य-किरणों की अद्भुत व्यवस्था
मंदिर की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि हर वर्ष मार्च और सितंबर में सूर्य की किरणें ठीक गर्भगृह में देवी के चरणों को स्पर्श करती हैं।
यह प्राचीन भारतीय खगोल ज्ञान का अद्भुत उदाहरण है।

दैनिक पूजा, अनुष्ठान और उत्सव

नित्य पूजा
• काकड आरती
• महापूजा
• दोपहर आरती
• संध्या आरती

प्रमुख उत्सव
• नवरात्रि
• किरणोत्सव
• लक्ष्मी पूजन
• रथोत्सव

नवरात्रि के दौरान मंदिर क्षेत्र में लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं।

कोल्हापुरकर और अंबाबाई
कोल्हापुर के लोगों के लिए अंबाबाई केवल देवी नहीं, बल्कि—
• घर की कुलदेवी
• संकट की संरक्षिका
• और सामाजिक न्याय की प्रतीक हैं

किसी भी शुभ कार्य से पहले “अंबाबाईची कृपा असो” कहना आम बात है।

महिलाओं में विशेष आस्था
यह मंदिर महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। विवाह, संतान, व्यवसाय और आत्मबल के लिए देवी से प्रार्थना की जाती है।

आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव
मंदिर ने कोल्हापुर को:
• एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्र
• हस्तशिल्प, कोल्हापुरी चप्पल, साड़ी उद्योग का केंद्र
• और सांस्कृतिक उत्सवों की भूमि
बनाया है।

🧭 टूरिज़्म गाइड: श्री महालक्ष्मी मंदिर, कोल्हापुर

📍 कैसे पहुँचे
• ✈️ निकटतम हवाई अड्डा: कोल्हापुर / पुणे
• 🚆 रेलवे स्टेशन: कोल्हापुर (CST)
• 🚌 राज्य परिवहन बसें उपलब्ध

🕰️ दर्शन का सर्वोत्तम समय
• सुबह 5:00 – 10:00
• शाम 4:00 – 9:30
नवरात्रि में विशेष व्यवस्था रहती है।

ठहरने की सुविधा
• मंदिर ट्रस्ट धर्मशाला
• बजट होटल
• मिड-रेंज और प्रीमियम होटल

स्थानीय भोजन
• कोल्हापुरी मिसल 🌶️
• तांबडा–पांढरा रस्सा
• भाकरी
• पुरणपोली

शॉपिंग
• कोल्हापुरी चप्पल 👡
• हस्तनिर्मित आभूषण
• पारंपरिक साड़ियाँ

आसपास के दर्शनीय स्थल
• पन्हाला किला 🏰
• रंकाला झील 🌊
• ज्योतिबा मंदिर
• न्यू पैलेस म्यूज़ियम

कोल्हापुर की श्री महालक्ष्मी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय चेतना, स्त्री-शक्ति और सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत प्रतीक है। यहाँ आकर भक्त केवल देवी के दर्शन नहीं करते, बल्कि एक ऐसी परंपरा से जुड़ते हैं जो साहस, आत्मसम्मान और कर्मयोग की शिक्षा देती है।

अंबाबाई आज भी कोल्हापुर के जनजीवन में उसी शक्ति और करुणा के साथ विराजमान हैं, जैसी सदियों पहले थीं—और यही इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है। 🌺

Radha Singh
Radha Singh

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Get regular updates on your mail from Samvad 24 News