दुनिया के लिए मिसाल: क्यों ‘विविधता में एकता’ है भारतीय संस्कृति की अनोखी पहचान!

संवाद 24 डेस्क। को यदि किसी एक वाक्य में परिभाषित करना हो तो वह है “विविधता में एकता।” यह केवल एक नारा या सांस्कृतिक आदर्श नहीं, बल्कि भारतीय समाज की ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक संरचना का वास्तविक स्वरूप है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक फैला यह विशाल देश भाषाई, धार्मिक, जातीय, भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधताओं से परिपूर्ण है, फिर भी इसकी आत्मा एक है। हजारों वर्षों के इतिहास, विभिन्न आक्रमणों, साम्राज्यों, आंदोलनों और सामाजिक परिवर्तनों के बावजूद भारत की मूल पहचान अक्षुण्ण बनी रही है। यही विशेषता भारत को विश्व समुदाय में एक अद्वितीय स्थान प्रदान करती है।

भारत की भौगोलिक संरचना ही विविधता का प्रथम परिचायक है। हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाएँ, गंगा-यमुना का उपजाऊ मैदान, पश्चिम का थार मरुस्थल, दक्षिण का दक्कन का पठार और पूर्वोत्तर के हरे-भरे पर्वतीय क्षेत्र—प्रत्येक क्षेत्र की जलवायु, जीवनशैली और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ भिन्न हैं। इन भौगोलिक भिन्नताओं ने विभिन्न प्रकार की जीवनशैलियों, खान-पान, वस्त्रों और लोक परंपराओं को जन्म दिया। फिर भी इन सबके केंद्र में भारतीयता का साझा भाव विद्यमान है।

भाषाई विविधता भारत की सबसे सशक्त विशेषताओं में से एक है। भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है, जबकि देश में सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं। हिंदी, तमिल, बंगाली, मराठी, गुजराती, पंजाबी, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, उर्दू जैसी प्रमुख भाषाएँ अपनी समृद्ध साहित्यिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के लिए जानी जाती हैं। भाषाई भिन्नताओं के बावजूद भारतीय समाज में पारस्परिक संवाद और सम्मान की भावना बनी रहती है। यह तथ्य उल्लेखनीय है कि भाषा की विविधता कभी राष्ट्रीय एकता के लिए बाधा नहीं बनी, बल्कि इसने भारतीय साहित्य और विचार परंपरा को और अधिक समृद्ध किया है।

धार्मिक विविधता भी भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख आयाम है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी और यहूदी—सभी धर्मों के अनुयायी भारत में सदियों से साथ-साथ निवास करते आए हैं। भारत ने न केवल विभिन्न धर्मों को जन्म दिया, बल्कि बाहरी धर्मों को भी खुले दिल से स्वीकार किया। यहाँ विभिन्न धार्मिक पर्व—दीवाली, ईद, गुरुपर्व, क्रिसमस, बुद्ध पूर्णिमा—समान उत्साह से मनाए जाते हैं। यह साझा उत्सवधर्मिता भारतीय समाज में सामाजिक सद्भाव और पारस्परिक सम्मान की भावना को सुदृढ़ करती है।

सांस्कृतिक विविधता का एक महत्वपूर्ण पहलू भारतीय कला और संगीत परंपरा में देखा जा सकता है। देश के विभिन्न भागों में शास्त्रीय नृत्य की अलग-अलग शैलियाँ विकसित हुईं—भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी, कुचिपुड़ी, कथकली, मणिपुरी आदि। इसी प्रकार हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत परंपराएँ अपनी-अपनी विशिष्टताओं के साथ विकसित हुईं। लोकनृत्य और लोकसंगीत की अनगिनत शैलियाँ—भांगड़ा, गरबा, घुमर, बिहू, लावणी—स्थानीय जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। इन विविध कलात्मक अभिव्यक्तियों के बावजूद उनमें भारतीय संस्कृति की मूल संवेदना समान रूप से परिलक्षित होती है।

भारतीय परिधान और खान-पान भी विविधता का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उत्तर भारत में जहाँ गेहूँ आधारित भोजन और पारंपरिक सलवार-कमीज या साड़ी प्रचलित है, वहीं दक्षिण भारत में चावल आधारित भोजन और विशेष प्रकार की साड़ियों व धोती का चलन है। पूर्वोत्तर भारत में पारंपरिक वस्त्र और भोजन की शैली पूरी तरह अलग है। फिर भी भारतीय थाली में मसालों की समानता और भारतीय वस्त्रों में पारंपरिक सौंदर्यबोध एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में बंधे हुए हैं।

भारतीय इतिहास इस बात का प्रमाण है कि विविधता के बावजूद राष्ट्रीय एकता की भावना समय-समय पर प्रकट होती रही है। प्राचीन काल में विभिन्न जनपदों और महाजनपदों के रूप में राजनीतिक विविधता थी, किंतु सांस्कृतिक आदान-प्रदान निरंतर चलता रहा। मौर्य और गुप्त काल में व्यापक राजनीतिक एकता स्थापित हुई। मध्यकाल में भक्ति और सूफी आंदोलनों ने सामाजिक समरसता का संदेश दिया। आधुनिक काल में स्वतंत्रता आंदोलन ने देश के विभिन्न क्षेत्रों, भाषाओं और धर्मों के लोगों को एक साझा लक्ष्य के लिए संगठित किया। महात्मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, सरदार पटेल जैसे नेताओं ने राष्ट्रीय एकता की भावना को सुदृढ़ किया।

भारतीय संविधान विविधता में एकता की अवधारणा का विधिक स्वरूप है। संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करते हुए धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को अपनाया। संघीय ढाँचा राज्यों को स्वायत्तता देता है, जिससे क्षेत्रीय विविधताओं का सम्मान बना रहता है, जबकि केंद्र सरकार राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करती है। यह संतुलन भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का आधार है।

शिक्षा और मीडिया भी विविधता में एकता को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विद्यालयों में राष्ट्रीय प्रतीकों, स्वतंत्रता संग्राम और सांस्कृतिक विरासत के बारे में शिक्षा दी जाती है। समाचार माध्यम और डिजिटल प्लेटफॉर्म देश के विभिन्न हिस्सों की घटनाओं और परंपराओं को एक-दूसरे तक पहुँचाते हैं। इससे लोगों में पारस्परिक समझ और सम्मान की भावना विकसित होती है।

आर्थिक दृष्टि से भी भारत की विविधता उसकी शक्ति है। विभिन्न राज्यों की अपनी-अपनी आर्थिक विशेषताएँ हैं—पंजाब और हरियाणा कृषि उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं, महाराष्ट्र और गुजरात औद्योगिक विकास में अग्रणी हैं, कर्नाटक और तेलंगाना सूचना प्रौद्योगिकी के केंद्र हैं, जबकि पूर्वोत्तर क्षेत्र जैव विविधता और पर्यटन के लिए जाना जाता है। यह विविध आर्थिक संरचना राष्ट्रीय विकास को संतुलित और बहुआयामी बनाती है।

हालाँकि विविधता के साथ चुनौतियाँ भी आती हैं। भाषाई विवाद, क्षेत्रीय असमानताएँ, धार्मिक तनाव और सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दे समय-समय पर सामने आते रहे हैं। किंतु भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, न्यायपालिका और सक्रिय नागरिक समाज ने इन चुनौतियों का समाधान खोजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संवाद, सहिष्णुता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता ही इन समस्याओं का स्थायी समाधान है।

वैश्वीकरण के दौर में भारतीय प्रवासी समुदाय भी विविधता में एकता की भावना का प्रतिनिधित्व करता है। विश्व के विभिन्न देशों में बसे भारतीय अपनी-अपनी क्षेत्रीय पहचान के साथ-साथ भारतीय संस्कृति का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर योग, आयुर्वेद, भारतीय भोजन और त्योहारों की लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है कि भारतीय संस्कृति अपनी विविधता के कारण ही वैश्विक स्तर पर आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

डिजिटल युग में सोशल मीडिया और संचार के आधुनिक साधनों ने देश के विभिन्न हिस्सों को और अधिक निकट ला दिया है। अब केरल का ओणम, असम का बिहू या गुजरात का नवरात्रि उत्सव पूरे देश में देखा और मनाया जाता है। इससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान को नई गति मिली है। हालांकि डिजिटल माध्यमों के दुरुपयोग से सामाजिक विभाजन की आशंका भी रहती है, इसलिए जिम्मेदार संवाद की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है।

भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक परंपरा भी विविधता में एकता का संदेश देती है। “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” जैसे वैदिक मंत्र इस विचार को स्पष्ट करते हैं कि सत्य एक है, परंतु उसे विभिन्न रूपों में समझा और अभिव्यक्त किया जा सकता है। यही दृष्टिकोण भारतीय समाज में सहिष्णुता और बहुलतावाद को आधार प्रदान करता है। विभिन्न मतों और विचारधाराओं के सह-अस्तित्व की परंपरा भारत की सांस्कृतिक स्थिरता का मूल कारण है।

आज जब विश्व के कई देशों में सांस्कृतिक असहिष्णुता और पहचान की राजनीति के कारण तनाव बढ़ रहे हैं, तब भारत का “विविधता में एकता” का मॉडल वैश्विक समुदाय के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है। यह मॉडल इस विचार पर आधारित है कि भिन्नताएँ संघर्ष का कारण नहीं, बल्कि समृद्धि का स्रोत हो सकती हैं, यदि उन्हें सम्मान और समझ के साथ स्वीकार किया जाए।

विविधता में एकता केवल भारतीय संस्कृति की पहचान ही नहीं, बल्कि उसकी शक्ति भी है। यह वह सूत्र है जिसने सदियों से इस देश को एकजुट रखा है और आगे भी रखेगा। आवश्यक है कि हम संवैधानिक मूल्यों, पारस्परिक सम्मान और सामाजिक सद्भाव की भावना को सुदृढ़ करते हुए इस विरासत को आगे बढ़ाएँ। भारत की असली ताकत उसकी विविधता में ही निहित है, और यही विविधता उसे विश्व पटल पर विशिष्ट बनाती है।

Geeta Singh
Geeta Singh

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