क्यों कहा जाता है भारत को त्योहारों का देश? जानिए क्यों त्योहार हैं हमारी संस्कृति की धड़कन?

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संवाद 24डेस्क। भारतीय संस्कृति की पहचान उसकी विविधता, सहिष्णुता और उत्सवधर्मिता से होती है। यहां वर्ष का शायद ही कोई महीना ऐसा हो, जब किसी न किसी क्षेत्र में कोई त्योहार या धार्मिक आयोजन न मनाया जाता हो। भारत में त्योहार केवल परंपरागत अनुष्ठान भर नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक निरंतरता और आध्यात्मिक चेतना के जीवंत प्रतीक हैं। यही कारण है कि त्योहार और धार्मिक आयोजन भारतीय समाज के मूल आधार के रूप में स्थापित हैं। वे न केवल आस्था का प्रकटीकरण हैं, बल्कि समाज को जोड़ने और पीढ़ियों के बीच संवाद बनाए रखने का सशक्त माध्यम भी हैं।

भारत की सांस्कृतिक संरचना बहुधार्मिक और बहुभाषिक है। यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी सहित अनेक धर्मों के अनुयायी निवास करते हैं। प्रत्येक समुदाय के अपने विशिष्ट त्योहार और धार्मिक अनुष्ठान हैं, जिनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है। दीपावली, होली, नवरात्रि, ईद, बकरीद, गुरुपर्व, क्रिसमस, बुद्ध पूर्णिमा, महावीर जयंती जैसे त्योहार केवल धार्मिक महत्व नहीं रखते, बल्कि वे भारतीय समाज की साझी विरासत को भी दर्शाते हैं। इन अवसरों पर लोग अपने-अपने धर्म की परंपराओं का पालन करते हुए भी एक-दूसरे की खुशियों में सहभागी बनते हैं, जो भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को सुदृढ़ करता है।

त्योहारों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि वे प्राचीन काल से ही भारतीय जीवन का हिस्सा रहे हैं। वैदिक काल में ऋतुओं के परिवर्तन, कृषि चक्र और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए विभिन्न यज्ञ और अनुष्ठान किए जाते थे। समय के साथ इन अनुष्ठानों ने त्योहारों का रूप ले लिया। उदाहरण के लिए, मकर संक्रांति सूर्य की उत्तरायण गति का प्रतीक है, जबकि बैसाखी और पोंगल कृषि आधारित उत्सव हैं। इसी प्रकार नवरात्रि और दुर्गा पूजा शक्ति की आराधना से जुड़े हैं। इन सभी आयोजनों में धर्म, प्रकृति और समाज के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है।

धार्मिक आयोजनों की सामाजिक भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। गांवों और कस्बों में मेलों, यात्राओं और जुलूसों के माध्यम से समुदाय एकत्रित होता है। कुंभ मेला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां करोड़ों श्रद्धालु एक साथ पवित्र स्नान के लिए जुटते हैं। यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद और सामाजिक संगठन का भी प्रतीक है। इसी प्रकार जगन्नाथ रथ यात्रा, अमरनाथ यात्रा, अजमेर शरीफ उर्स और हज यात्रा जैसे आयोजन भी आस्था और अनुशासन का अद्भुत संगम प्रस्तुत करते हैं।

त्योहार भारतीय परिवार व्यवस्था को भी मजबूत करते हैं। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में जहां पारिवारिक संवाद सीमित होता जा रहा है, वहीं त्योहार रिश्तों को पुनर्जीवित करने का अवसर प्रदान करते हैं। रक्षाबंधन पर भाई-बहन का स्नेह, करवा चौथ पर दांपत्य विश्वास, ईद पर गले मिलकर बधाई देना, क्रिसमस पर परिवार संग प्रार्थना ये सभी परंपराएं पारिवारिक मूल्यों को सुदृढ़ करती हैं। संयुक्त परिवार प्रणाली के क्षीण होने के बावजूद त्योहार लोगों को एकजुट होने का अवसर देते हैं।

आर्थिक दृष्टि से भी त्योहारों का महत्व कम नहीं है। भारत में उत्सव आधारित अर्थव्यवस्था का व्यापक प्रभाव देखा जाता है। दीपावली के दौरान बाजारों में खरीदारी का उछाल, ईद पर कपड़ों और मिठाइयों की बिक्री, नवरात्रि में सजावट और पूजा सामग्री की मांग, क्रिसमस पर उपहार और सजावटी वस्तुओं की बिक्री ये सभी छोटे और बड़े व्यापारियों के लिए अवसर लेकर आते हैं। हस्तशिल्प, लोक कला, मिठाई उद्योग, वस्त्र उद्योग और पर्यटन क्षेत्र को भी इन आयोजनों से विशेष लाभ मिलता है। ग्रामीण क्षेत्रों में मेलों और हाट बाजारों से स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलती है।

सांस्कृतिक संरक्षण के दृष्टिकोण से त्योहारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा, क्षेत्रीय व्यंजन और पारंपरिक कला-शिल्प का प्रदर्शन प्रायः त्योहारों के अवसर पर ही होता है। गुजरात का गरबा, पंजाब का भांगड़ा, असम का बिहू, केरल का ओणम, तमिलनाडु का पोंगल ये सभी उत्सव क्षेत्रीय पहचान को राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करते हैं। इनके माध्यम से नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ती है और सांस्कृतिक निरंतरता बनी रहती है।

धार्मिक आयोजनों का एक महत्वपूर्ण पक्ष आध्यात्मिक शुद्धि और नैतिक जागरण भी है। व्रत, उपवास, दान-पुण्य, कीर्तन, प्रवचन और सामूहिक प्रार्थनाएं व्यक्ति को आत्मचिंतन और अनुशासन की ओर प्रेरित करती हैं। रमजान के दौरान रोज़ा रखना आत्मसंयम का संदेश देता है, जबकि नवरात्रि में उपवास और साधना आत्मशक्ति के विकास का प्रतीक है। इसी प्रकार लंगर, भंडारा और जकात जैसी परंपराएं सेवा और परोपकार की भावना को बढ़ावा देती हैं।

हालांकि बदलते समय के साथ त्योहारों के स्वरूप में भी परिवर्तन आया है। शहरीकरण, तकनीकी विकास और वैश्वीकरण के प्रभाव से पारंपरिक आयोजनों में आधुनिकता का समावेश हुआ है। डिजिटल निमंत्रण, ऑनलाइन पूजा, वर्चुअल सत्संग और सोशल मीडिया के माध्यम से शुभकामनाओं का आदान-प्रदान अब सामान्य हो चुका है। इसके सकारात्मक पहलू यह हैं कि दूर-दराज रहने वाले लोग भी जुड़ाव महसूस करते हैं, लेकिन इसके साथ ही पारंपरिक सामूहिकता में कमी आने की आशंका भी व्यक्त की जाती है।

पर्यावरणीय दृष्टि से भी त्योहारों की भूमिका पर गंभीर विचार आवश्यक है। कुछ आयोजनों में प्लास्टिक, रासायनिक रंगों और पटाखों के अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है। हालांकि हाल के वर्षों में पर्यावरण-संवेदनशील उत्सवों की दिशा में जागरूकता बढ़ी है। मिट्टी की प्रतिमाओं का उपयोग, हरित गणेशोत्सव, इको-फ्रेंडली होली और कम ध्वनि वाले पटाखों का प्रयोग सकारात्मक संकेत हैं। समाज और प्रशासन के सहयोग से त्योहारों को अधिक पर्यावरण अनुकूल बनाया जा सकता है।

धार्मिक आयोजनों के माध्यम से सामाजिक सेवा और जनजागरूकता का भी विस्तार होता है। अनेक संस्थाएं त्योहारों के अवसर पर रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य जांच शिविर, स्वच्छता अभियान और जरूरतमंदों को वस्त्र वितरण जैसे कार्यक्रम आयोजित करती हैं। इससे उत्सव का स्वरूप केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित न रहकर सामाजिक उत्तरदायित्व का माध्यम बन जाता है। यह प्रवृत्ति भारतीय संस्कृति के उस मूल भाव को दर्शाती है, जिसमें ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना निहित है।

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी त्योहारों का विशेष महत्व है। विभिन्न धर्मों के पर्वों पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किए जाते हैं, जिससे राज्य की धर्मनिरपेक्ष भावना परिलक्षित होती है। प्रशासनिक स्तर पर सुरक्षा, स्वच्छता और यातायात की व्यवस्थाएं की जाती हैं, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि आयोजन शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हों। यह समन्वय राज्य और समाज के बीच सहयोग का उदाहरण प्रस्तुत करता है।

समकालीन परिप्रेक्ष्य में यह भी आवश्यक है कि त्योहारों को सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता के माध्यम के रूप में देखा जाए। विविधता में एकता भारत की पहचान है, और त्योहार इस पहचान को जीवंत बनाए रखते हैं। जब एक समुदाय दूसरे समुदाय के पर्व में सहभागी बनता है, तो पारस्परिक विश्वास और सम्मान की भावना सुदृढ़ होती है। यह प्रवृत्ति सामाजिक तनाव को कम करने और सकारात्मक संवाद को बढ़ावा देने में सहायक होती है।

कहा जा सकता है कि त्योहार और धार्मिक आयोजन भारतीय संस्कृति के जीवंत स्तंभ हैं। वे केवल आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक संगठन, आर्थिक प्रगति, सांस्कृतिक संरक्षण और नैतिक जागरण के सशक्त माध्यम हैं। बदलते समय के साथ इनके स्वरूप में परिवर्तन स्वाभाविक है, किंतु इनके मूल मूल्य समरसता, सेवा, सहयोग और आध्यात्मिकता आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम इन उत्सवों को आधुनिक संदर्भों के अनुरूप संवेदनशील, पर्यावरण-अनुकूल और समावेशी बनाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी भारतीय संस्कृति की इस समृद्ध परंपरा से प्रेरणा प्राप्त करती रहें।

Geeta Singh
Geeta Singh

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