नाद से राष्ट्र तक: कैसे संगीत बना भारतीय संस्कृति की आत्मा

संवाद 24 डेस्क। भारतीय संस्कृति में संगीत केवल एक कला नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का आधार है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक संगीत ने भारतीय समाज के धार्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन को दिशा दी है। वेदों की ऋचाओं से लेकर मंदिरों की आरती, सूफी दरगाहों की कव्वाली, गुरुद्वारों के कीर्तन और शास्त्रीय संगीत की महफिलों तक—संगीत ने भारतीय जीवन को एक सूत्र में पिरोया है। यह आत्मा की अभिव्यक्ति भी है और सामूहिक चेतना का माध्यम भी। भारतीय परंपरा में संगीत को ‘नाद ब्रह्म’ कहा गया है, जिसका अर्थ है—ध्वनि ही ब्रह्म है। इस अवधारणा ने संगीत को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की है।

भारतीय संगीत की जड़ें वैदिक काल में मिलती हैं। सामवेद को भारतीय संगीत का मूल स्रोत माना जाता है। सामवेद में ऋग्वेद की ऋचाओं को विशेष स्वर-पद्धति में गाया जाता था, जिससे मंत्रोच्चारण में लय और माधुर्य उत्पन्न होता था। वैदिक यज्ञों में मंत्रों का गायन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि ध्वनि और ऊर्जा के संतुलन का वैज्ञानिक प्रयास भी था। वैदिक काल में स्वर, लय और छंद की जो परंपरा विकसित हुई, वही आगे चलकर शास्त्रीय संगीत की आधारशिला बनी।

प्राचीन ग्रंथों में संगीत को एक व्यवस्थित शास्त्र के रूप में प्रस्तुत किया गया। नाट्यशास्त्र, जिसे भरतमुनि द्वारा रचित माना जाता है, भारतीय संगीत, नृत्य और नाट्य का मूल ग्रंथ है। इसमें राग, ताल, भाव और रस की विस्तृत व्याख्या की गई है। बाद में शारंगदेव के ‘संगीत रत्नाकर’ जैसे ग्रंथों ने इस परंपरा को और समृद्ध किया। इन ग्रंथों ने भारतीय संगीत को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया और इसे पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित रखा।

मध्यकाल में भारतीय संगीत ने नई ऊंचाइयाँ प्राप्त कीं। इस काल में भक्ति आंदोलन और सूफी परंपरा ने संगीत को जन-जन तक पहुंचाया। तानसेन जैसे महान संगीतज्ञों ने ध्रुपद और ख्याल जैसी शैलियों को लोकप्रिय बनाया। मुगल दरबार में संगीत को विशेष संरक्षण मिला, जिससे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का विकास हुआ। इसी समय दक्षिण भारत में कर्नाटक संगीत की परंपरा भी सुदृढ़ हुई, जिसमें त्यागराज, मुथुस्वामी दीक्षितर और श्यामा शास्त्री जैसे संत-संगीतकारों का योगदान अमूल्य रहा।

भारतीय शास्त्रीय संगीत मुख्यतः दो परंपराओं में विभाजित है—हिंदुस्तानी और कर्नाटक। हिंदुस्तानी संगीत उत्तर भारत में विकसित हुआ, जबकि कर्नाटक संगीत दक्षिण भारत में प्रचलित है। दोनों परंपराओं में राग और ताल की समृद्ध परंपरा है, किंतु प्रस्तुति और शैली में भिन्नता दिखाई देती है। राग केवल सुरों का संयोजन नहीं, बल्कि भावनाओं की अभिव्यक्ति है। प्रत्येक राग का एक विशेष समय और वातावरण माना गया है, जो प्रकृति और मन के सामंजस्य को दर्शाता है।

धार्मिक जीवन में संगीत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। मंदिरों में भजन और आरती, गुरुद्वारों में कीर्तन, मस्जिदों और दरगाहों में सूफी संगीत—ये सभी भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा हैं। मीरा बाई और कबीर जैसे संतों ने भक्ति गीतों के माध्यम से समाज में प्रेम और समानता का संदेश दिया। भजन और कीर्तन ने समाज के विभिन्न वर्गों को एक मंच पर लाकर सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया।

भारतीय त्योहारों और संस्कारों में भी संगीत का विशेष स्थान है। विवाह, नामकरण, जन्मोत्सव और अन्य संस्कारों में पारंपरिक गीत गाए जाते हैं। होली के फाग, दीपावली के मंगल गीत, नवरात्रि के गरबा और बिहू के लोकगीत—ये सभी सामाजिक एकता के प्रतीक हैं। लोकसंगीत क्षेत्रीय विविधताओं को दर्शाते हुए भी राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करता है। राजस्थान का मांड, पंजाब का भांगड़ा, बंगाल का बाउल और महाराष्ट्र का लावणी ये सब भारतीय संगीत की विविधता के उदाहरण हैं।

शास्त्रीय नृत्यों के साथ संगीत का गहरा संबंध है। भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी और कुचिपुड़ी जैसे नृत्य रूपों में संगीत ही अभिव्यक्ति का आधार है। नृत्य की प्रत्येक मुद्रा और भाव को ताल और राग के माध्यम से सजीव किया जाता है। इस प्रकार संगीत और नृत्य का संबंध अविभाज्य है, जो भारतीय सांस्कृतिक परंपरा को सशक्त बनाता है।

आधुनिक काल में भी भारतीय संगीत ने वैश्विक पहचान बनाई है। रवि शंकर ने सितार को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित किया और भारतीय संगीत को विश्वव्यापी पहचान दिलाई। आज बॉलीवुड संगीत, इंडी-पॉप और फ्यूजन शैली के माध्यम से भारतीय संगीत नई पीढ़ी तक पहुंच रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया ने संगीत के प्रसार को और अधिक व्यापक बना दिया है।

संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक संतुलन का माध्यम भी है। संगीत चिकित्सा (म्यूजिक थेरेपी) के माध्यम से तनाव, अवसाद और मानसिक विकारों के उपचार में सकारात्मक परिणाम देखे गए हैं। भारतीय रागों के विशिष्ट स्वर संयोजन मन को शांत करने और ऊर्जा प्रदान करने में सहायक माने जाते हैं। इस प्रकार संगीत का वैज्ञानिक और चिकित्सकीय महत्व भी प्रमाणित हो रहा है।

भारतीय समाज में संगीत सामाजिक एकता का सूत्रधार है। विभिन्न भाषाओं, धर्मों और परंपराओं के बावजूद संगीत ने हमेशा लोगों को जोड़े रखा है। राष्ट्रीय आंदोलनों के दौरान भी देशभक्ति गीतों ने स्वतंत्रता संग्राम को ऊर्जा प्रदान की। “वंदे मातरम्” और “जन गण मन” जैसे गीतों ने राष्ट्रीय चेतना को जागृत किया और आज भी यह भावना को सुदृढ़ करते हैं।

समकालीन दौर में चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। पारंपरिक संगीत शैलियों को आधुनिकता और व्यावसायिकता के दबाव का सामना करना पड़ रहा है। युवा पीढ़ी में पश्चिमी संगीत के प्रति बढ़ते आकर्षण के कारण शास्त्रीय और लोक संगीत के संरक्षण की आवश्यकता महसूस की जा रही है। हालांकि कई संस्थान और कलाकार इन परंपराओं को जीवित रखने के लिए प्रयासरत हैं। संगीत विद्यालय, विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक अकादमियाँ इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

सरकार और विभिन्न सांस्कृतिक संगठनों द्वारा संगीत के संरक्षण और संवर्धन के लिए अनेक योजनाएँ चलाई जा रही हैं। संगीत नाटक अकादमी और अन्य संस्थान प्रतिभाशाली कलाकारों को मंच प्रदान कर रहे हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगीत महोत्सवों के माध्यम से भारतीय संगीत की समृद्ध विरासत को प्रदर्शित किया जा रहा है।

भारतीय संस्कृति में संगीत आत्मा के समान है, जो मानव जीवन को अर्थ और दिशा प्रदान करता है। यह अतीत की विरासत भी है और भविष्य की आशा भी। धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर सामाजिक उत्सवों और आधुनिक मंचों तक संगीत ने भारतीय समाज को एकजुट रखा है। समय के साथ इसकी शैली और स्वरूप में परिवर्तन अवश्य आया है, किंतु इसकी मूल भावना आज भी वही है—मानव हृदय को स्पर्श करना और समाज में सद्भाव स्थापित करना। संवाद 24 के पाठकों के लिए यह समझना आवश्यक है कि भारतीय संगीत केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवंत धरोहर है, जिसे संरक्षित और संवर्धित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

Geeta Singh
Geeta Singh

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