सुहागिन स्त्री की पहचान: सोलह श्रृंगार, सुहाग, सौंदर्य और संस्कृति का अद्भुत संगम।
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संवाद 24 डेस्क। संस्कृति में “सोलह श्रृंगार” केवल सौंदर्य-वर्धन का साधन नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक परंपरा का प्रतीक हैं। विशेष रूप से विवाहित हिंदू महिलाओं के लिए सोलह श्रृंगार उनके सुहाग, समर्पण, समृद्धि और वैवाहिक जीवन की मंगलकामना से जुड़े होते हैं। सिर से लेकर पैर तक धारण किए जाने वाले ये सोलह अलंकार स्त्री की पूर्णता, नारीत्व और गृहस्थ जीवन के आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारतीय परंपरा में यह विश्वास है कि सोलह श्रृंगार धारण करने वाली स्त्री देवी स्वरूपा मानी जाती है, क्योंकि वह लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती जैसे देवी स्वरूपों का प्रतीक होती है। विवाह, करवा चौथ, तीज, हरतालिका, नवरात्र और अन्य मांगलिक अवसरों पर सुहागिन महिलाएं इन श्रृंगारों को विशेष रूप से धारण करती हैं।
सोलह श्रृंगार की परंपरा का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों और पुराणों में मिलता है। वैदिक युग से ही नारी के श्रृंगार को शुभ और मंगलकारी माना गया है। ‘श्रृंगार’ शब्द संस्कृत के ‘श्रृंग’ से बना है, जिसका अर्थ है अलंकृत करना या सुसज्जित करना। समय के साथ इस परंपरा में क्षेत्रीय विविधताएं जुड़ती गईं, किंतु मूल भाव वही रहा—विवाहिता स्त्री का सौभाग्य और उसके पति की दीर्घायु की कामना। भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन माना जाता है। ऐसे में सोलह श्रृंगार स्त्री के नए जीवन की औपचारिक और सांस्कृतिक शुरुआत का भी संकेत हैं।
सोलह श्रृंगार की सूची में पहला स्थान सिंदूर का होता है। सिंदूर को वैवाहिक जीवन का सबसे प्रमुख प्रतीक माना जाता है। विवाह के समय वर द्वारा वधू की मांग में भरा गया सिंदूर उसके सुहाग का चिह्न बन जाता है।
बिंदी, जो माथे के मध्य में लगाई जाती है, आज भले ही फैशन का हिस्सा बन गई हो, किंतु इसका आध्यात्मिक महत्व भी है। इसे आज्ञा चक्र का केंद्र माना जाता है, जो एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।
मांगटीका या माथापट्टी भी सोलह श्रृंगार का महत्वपूर्ण अंग है। यह सिर के मध्य भाग में धारण किया जाता है और स्त्री के मस्तक की शोभा बढ़ाता है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, मांगटीका मन और भावनाओं के संतुलन का प्रतीक है। विवाह समारोहों में दुल्हन विशेष रूप से इसे धारण करती है, जिससे उसका स्वरूप पूर्ण और आकर्षक दिखाई देता है।
काजल या अंजन का प्रयोग आंखों की सुंदरता के लिए किया जाता है। भारतीय परंपरा में यह माना जाता है कि काजल लगाने से नजर दोष से रक्षा होती है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से भी पारंपरिक काजल आंखों के लिए लाभकारी माना गया है। आंखें भावनाओं का दर्पण कही जाती हैं, और काजल उन्हें और अधिक अभिव्यक्तिपूर्ण बनाता है।
नथ या नथनी भी विवाहित स्त्री की पहचान मानी जाती है। भारत के विभिन्न राज्यों में नथ के स्वरूप और आकार में विविधता देखने को मिलती है। उत्तर भारत में बड़ी गोल नथ प्रचलित है, जबकि महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में इसकी शैली अलग होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नथ पहनना स्त्री के सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक है।
मंगलसूत्र को विवाह का सबसे पवित्र प्रतीक माना जाता है। काले मोतियों और स्वर्ण से बना यह हार पति-पत्नी के अटूट बंधन का प्रतिनिधित्व करता है। हिंदू विवाह संस्कार में वर द्वारा वधू के गले में मंगलसूत्र पहनाना एक महत्वपूर्ण रस्म है। यह बुरी नजर से रक्षा और दांपत्य जीवन की स्थिरता का प्रतीक माना जाता है।
कर्णफूल या झुमके भी श्रृंगार का अभिन्न हिस्सा हैं। कानों में पहने जाने वाले आभूषण केवल सौंदर्य ही नहीं बढ़ाते, बल्कि आयुर्वेदिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। कहा जाता है कि कान छिदवाने से स्वास्थ्य संबंधी लाभ होते हैं। भारत में सोने, चांदी और रत्नों से बने विविध प्रकार के कर्णफूल प्रचलित हैं।
हार या नेकलेस भी सोलह श्रृंगार का एक अंग है। विवाह और विशेष अवसरों पर महिलाएं स्वर्ण, मोती या रत्नों से बने हार पहनती हैं। हार केवल आभूषण नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा
और पारिवारिक समृद्धि का भी संकेत है।
चूड़ियां भारतीय नारी की पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। कांच, सोने, चांदी या लाख की चूड़ियां अलग-अलग राज्यों में लोकप्रिय हैं। माना जाता है कि चूड़ियों की मधुर ध्वनि घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। विवाहित महिलाओं के लिए चूड़ियां सुहाग का प्रतीक मानी जाती हैं।
बाजूबंद, जो भुजा पर पहना जाता है, भी श्रृंगार का हिस्सा है। प्राचीन काल में यह राजघरानों की महिलाओं में अधिक प्रचलित था। आज भी विवाह और पारंपरिक समारोहों में इसे धारण किया जाता है। यह शक्ति और सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है।
मेहंदी का विशेष स्थान है। विवाह से पहले मेहंदी की रस्म भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। हाथों और पैरों पर रची मेहंदी प्रेम, सौभाग्य और खुशहाली का प्रतीक है। मान्यता है कि मेहंदी का गहरा रंग पति के प्रेम की गहराई को दर्शाता है।
अंगूठी भी श्रृंगार का हिस्सा है। विवाह में अंगूठी पहनाने की रस्म पति-पत्नी के परस्पर विश्वास और प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह परंपरा आधुनिक समय में भी उतनी ही लोकप्रिय है।
कमरबंद या करधनी, जो कमर पर धारण की जाती है, स्त्री के रूप को और अधिक आकर्षक बनाती है। यह प्राचीन काल से राजसी और पारंपरिक परिधानों के साथ जुड़ी रही है।
पायल और बिछिया पैरों का श्रृंगार हैं। पायल की मधुर ध्वनि को शुभ माना जाता है। बिछिया, जिसे पैर की अंगुली में पहना जाता है, विवाहित स्त्री का विशेष चिह्न है। हिंदू परंपरा में बिछिया को सुहाग का अनिवार्य प्रतीक माना गया है।
इत्र या सुगंध भी श्रृंगार का हिस्सा है। प्राचीन भारत में प्राकृतिक पुष्पों और जड़ी-बूटियों से बने इत्र का प्रयोग होता था। सुगंध को पवित्रता और आकर्षण का प्रतीक माना गया है।
सोलह श्रृंगार केवल बाहरी सजावट नहीं, बल्कि भारतीय नारी की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक हैं। यह परंपरा स्त्री के आत्मसम्मान, उसकी भूमिका और परिवार में उसके महत्व को रेखांकित करती है। आधुनिक समय में भले ही इन श्रृंगारों को धारण करने के तरीके और शैली में परिवर्तन आया हो, किंतु उनका सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व आज भी कायम है।
सोलह श्रृंगार भारतीय संस्कृति की जीवंत विरासत हैं। यह परंपरा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान में भी प्रासंगिक है। बदलते समय के साथ इन श्रृंगारों का स्वरूप भले ही आधुनिकता से प्रभावित हुआ हो, परंतु उनका मूल भाव—सौभाग्य, समर्पण और सौंदर्य—आज भी उतना ही प्रभावशाली है। भारतीय समाज में सोलह श्रृंगार नारी के गौरव और उसके वैवाहिक जीवन की मंगलकामना का शाश्वत प्रतीक बने हुए हैं।






