भारतीय परंपरा, पहचान और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक, सिर्फ परिधान नहीं, संस्कृति की विरासत है धोती!
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संवाद 24 डेस्क। भारत विविधताओं का देश है, जहाँ परिधान केवल शरीर ढकने का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान और परंपरा का जीवंत प्रतीक होते हैं। इन्हीं परिधानों में से एक है धोती, जो भारत की सबसे प्राचीन और प्रमुख पारंपरिक पोशाकों में गिनी जाती है। सूती या रेशमी कपड़े के एक लंबे, बिना सिले आयताकार टुकड़े से बनी धोती सदियों से भारतीय पुरुषों की वेशभूषा का हिस्सा रही है। यह परिधान न केवल सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर पहना जाता है, बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों, पारिवारिक आयोजनों और पारंपरिक समारोहों में भी इसकी विशेष उपस्थिति रहती है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और प्राचीनता
धोती का इतिहास भारतीय सभ्यता जितना ही पुराना माना जाता है। वैदिक काल से लेकर आज तक यह परिधान विभिन्न रूपों में प्रचलित रहा है। प्राचीन मूर्तियों, भित्ति चित्रों और ग्रंथों में पुरुषों को कमर के चारों ओर लपेटे गए वस्त्र में दर्शाया गया है, जो आधुनिक धोती का ही प्रारंभिक रूप माना जाता है। सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर गुप्त और मौर्य काल तक के शिल्प और चित्रण इस बात की पुष्टि करते हैं कि बिना सिले वस्त्र भारतीय समाज का अभिन्न अंग थे।
भारतीय दर्शन और जीवनशैली में सादगी को महत्व दिया गया है। धोती उसी सादगी का प्रतीक है। बिना सिलाई का यह वस्त्र प्राकृतिक जीवनशैली और पारंपरिक मूल्यों को दर्शाता है।
संरचना और पहनने की शैली
धोती सामान्यतः 4 से 5 मीटर लंबी होती है और इसे कमर के चारों ओर लपेटकर पैरों के बीच से निकालते हुए बांधा जाता है। क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार इसे पहनने की शैली में अंतर देखने को मिलता है। उत्तर भारत में इसे साधारण तरीके से कमर पर लपेटा जाता है, जबकि दक्षिण भारत में इसे विशेष तहों के साथ बांधा जाता है।
दक्षिण भारत में धोती को “वेष्टि” या “मुंडु” कहा जाता है, जहाँ इसे अक्सर सुनहरे बॉर्डर के साथ पहना जाता है। वहीं पश्चिम बंगाल में इसे अलग अंदाज में पहना जाता है, जिसे बंगाली शैली की धोती कहा जाता है।
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
धोती का भारतीय धार्मिक परंपराओं में विशेष स्थान है। मंदिरों में पूजा-अर्चना, यज्ञ, विवाह और अन्य धार्मिक संस्कारों में पुरुषों द्वारा धोती धारण करना शुद्धता और परंपरा का प्रतीक माना जाता है। हिंदू धर्म में बिना सिले वस्त्र को पवित्र माना जाता है, इसलिए पूजा-पाठ में धोती पहनने की परंपरा आज भी प्रचलित है।
विवाह समारोहों में दूल्हे द्वारा रेशमी धोती पहनना कई समुदायों में परंपरा का हिस्सा है। दक्षिण भारत में विवाह के समय सफेद या क्रीम रंग की रेशमी वेष्टि पहनना शुभ माना जाता है।
स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक प्रभाव
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान धोती ने एक प्रतीकात्मक भूमिका निभाई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सादगी और स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए खादी की धोती को अपनाया। उनका यह परिधान ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आत्मनिर्भरता और भारतीय पहचान का प्रतीक बन गया। गांधीजी की धोती ने यह संदेश दिया कि भारतीय परंपराएं ही देश की वास्तविक शक्ति हैं।
उनके इस कदम ने ग्रामीण उद्योगों, विशेषकर चरखा और खादी को नया जीवन दिया। परिणामस्वरूप, धोती केवल एक परिधान नहीं रही, बल्कि स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का प्रतीक बन गई।
क्षेत्रीय विविधताएँ
भारत के विभिन्न राज्यों में धोती के अलग-अलग नाम और रूप देखने को मिलते हैं। तमिलनाडु और केरल में इसे “वेष्टि” या “मुंडु” कहा जाता है। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में भी यह पारंपरिक परिधान के रूप में लोकप्रिय है। महाराष्ट्र में पारंपरिक ब्राह्मण समुदाय विशेष शैली की धोती पहनता है।
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा जैसे अवसरों पर पुरुष पारंपरिक सफेद धोती-कुर्ता पहनते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण इलाकों में यह आज भी दैनिक जीवन का हिस्सा है।
कपड़े और निर्माण प्रक्रिया
धोती सामान्यतः सूती कपड़े से बनाई जाती है, क्योंकि यह गर्म जलवायु के लिए उपयुक्त और आरामदायक होती है। विशेष अवसरों के लिए रेशमी धोती का उपयोग किया जाता है, जिसमें सुनहरी या रंगीन किनारी होती है।
हाथकरघा उद्योग से जुड़ी अनेक इकाइयाँ आज भी पारंपरिक तरीके से धोती का निर्माण करती हैं। यह उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देता है और स्थानीय कारीगरों को रोजगार प्रदान करता है। खादी और हाथ से बुनी हुई धोती पर्यावरण के अनुकूल भी मानी जाती है।
आधुनिक समय में प्रासंगिकता
शहरीकरण और पाश्चात्य परिधानों के बढ़ते प्रभाव के बावजूद धोती की प्रासंगिकता बनी हुई है। ग्रामीण भारत में यह आज भी दैनिक पहनावे का हिस्सा है। वहीं शहरी क्षेत्रों में इसे विशेष अवसरों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और धार्मिक आयोजनों में पहना जाता है।
फैशन डिज़ाइनरों ने भी धोती को आधुनिक रूप में प्रस्तुत किया है। “धोती पैंट” और फ्यूजन वियर के रूप में इसे युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया जा रहा है। बॉलीवुड फिल्मों और मंच प्रस्तुतियों में भी इसका प्रयोग बढ़ा है।
सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान
धोती केवल एक परिधान नहीं, बल्कि भारतीय पहचान का प्रतीक है। यह सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक निरंतरता और पारंपरिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करती है। गाँवों में बुजुर्गों से लेकर युवा पीढ़ी तक, कई लोग इसे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव के रूप में देखते हैं।
धोती पहनना सादगी, शालीनता और परंपरा के सम्मान का प्रतीक माना जाता है। यह भारतीय समाज की उस सोच को दर्शाती है, जिसमें आधुनिकता और परंपरा का संतुलन संभव है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य
विश्व स्तर पर भी भारतीय पारंपरिक परिधानों के प्रति रुचि बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय नेता और सांस्कृतिक प्रतिनिधि जब पारंपरिक परिधान धारण करते हैं, तो यह भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाता है।
विदेशों में बसे भारतीय समुदायों में भी धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के दौरान धोती पहनने की परंपरा देखी जाती है। इससे भारतीय संस्कृति की निरंतरता और वैश्विक विस्तार का परिचय मिलता है।
चुनौतियाँ और संरक्षण
तेजी से बदलती जीवनशैली और आधुनिक फैशन के कारण धोती का दैनिक उपयोग कुछ क्षेत्रों में कम हुआ है। युवा पीढ़ी पश्चिमी परिधानों की ओर अधिक आकर्षित हो रही है। हालांकि, सांस्कृतिक आयोजनों और पारिवारिक परंपराओं के माध्यम से इसे संरक्षित रखने के प्रयास किए जा रहे हैं।
सरकार और विभिन्न सांस्कृतिक संगठनों द्वारा हाथकरघा उद्योग को प्रोत्साहन देने की योजनाएँ भी चलाई जा रही हैं, जिससे पारंपरिक परिधानों का संरक्षण संभव हो सके।
धोती भारतीय सभ्यता की जीवंत धरोहर है, जो समय के साथ बदलते परिवेश में भी अपनी पहचान बनाए हुए है। यह केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और आत्मसम्मान का प्रतीक है। वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक धोती ने भारतीय समाज के हर चरण को देखा है और हर दौर में स्वयं को प्रासंगिक बनाए रखा है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी इस पारंपरिक परिधान के महत्व को समझे और इसे केवल समारोहों तक सीमित न रखे, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान के रूप में स्वीकार करे।






