पगड़ी: केवल शिरोवस्त्र नहीं, भारतीय संस्कृति, सम्मान और अस्मिता का शाश्वत प्रतीक!
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संवाद 24 डेस्क। संस्कृति में पगड़ी—जिसे विभिन्न क्षेत्रों में साफा, पाग, फेंटा, फेटा या दस्तार कहा जाता है—केवल सिर ढकने का साधन नहीं, बल्कि गरिमा, अस्मिता और सामाजिक प्रतिष्ठा का जीवंत प्रतीक है। भारतीय उपमहाद्वीप में सिर ढकने की परंपरा अत्यंत प्राचीन मानी जाती है। पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर सिंधु–सरस्वती सभ्यता के अवशेषों और मूर्तियों में सिर पर बंधे वस्त्रों के संकेत मिलते हैं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि सिर पर वस्त्र धारण करना सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवहार का हिस्सा था। हालांकि 10,000 ईसा पूर्व जैसी अत्यंत प्राचीन तिथि के प्रत्यक्ष प्रमाण सीमित हैं, किंतु यह निर्विवाद है कि सहस्राब्दियों से भारतीय समाज में पगड़ी सम्मान और पहचान का द्योतक रही है।
वैदिक और उत्तरवैदिक काल में भी सिर पर वस्त्र धारण करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। संस्कृत साहित्य में ‘उष्णीष’ शब्द का प्रयोग सिर पर बांधे जाने वाले वस्त्र के लिए किया गया है। यह केवल धूप या धूल से बचाव का साधन नहीं था, बल्कि सामाजिक मर्यादा का चिह्न भी था। महाकाव्यों और पुराणों में राजाओं, योद्धाओं और सभ्रांत व्यक्तियों के सिर पर विशेष प्रकार के मुकुट या पग के उल्लेख मिलते हैं, जो उनके पद और शक्ति का संकेत देते थे।
प्राचीन भारतीय मूर्तिकला और चित्रकला में भी पगड़ी का स्पष्ट चित्रण मिलता है। सांची और भरहुत के स्तूपों की शिल्पाकृतियों में पुरुषों को सिर पर लिपटे वस्त्रों के साथ दर्शाया गया है। मौर्य और गुप्त कालीन मूर्तियों में राजपुरुषों की विशिष्ट शिरोभूषा उनके अधिकार और प्रतिष्ठा को दर्शाती है। इस काल में पगड़ी केवल वस्त्र नहीं थी, बल्कि राज्य और समाज में व्यक्ति की स्थिति का प्रतीक बन चुकी थी।
मध्यकालीन भारत में पगड़ी की परंपरा और भी अधिक सशक्त रूप में सामने आती है। विशेषकर राजपूत शासकों के बीच पगड़ी सम्मान, स्वाभिमान और वीरता का पर्याय बन गई। राजस्थान और मारवाड़ क्षेत्र में विभिन्न रंगों और शैलियों की पगड़ियाँ सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं। युद्ध के समय विशेष रंग की पगड़ी बांधना साहस और बलिदान का प्रतीक माना जाता था। ‘पगड़ी उछालना’ आज भी अपमान का द्योतक माना जाता है, जबकि ‘पगड़ी पहनाना’ सम्मान का प्रतीक है।
पंजाब में पगड़ी का स्वरूप विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। सिख परंपरा में दस्तार केवल परिधान नहीं, बल्कि आस्था और आत्मसम्मान का प्रतीक है। दसवें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना के साथ केशधारण और दस्तार को सिख पहचान का अभिन्न अंग बनाया। आज भी दुनिया भर में सिख समुदाय अपनी विशिष्ट पगड़ी के माध्यम से अपनी धार्मिक पहचान को संरक्षित रखे हुए है।
मराठा परंपरा में ‘फेटा’ विशेष महत्व रखता है। छत्रपति शिवाजी महाराज के चित्रों में उनके सिर पर विशिष्ट शैली की पगड़ी दिखाई देती है, जो मराठा गौरव और स्वराज्य का प्रतीक बन गई। महाराष्ट्र में आज भी विशेष अवसरों—जैसे विवाह, उत्सव और सार्वजनिक सम्मान—के समय फेटा बांधने की परंपरा जीवित है।
दक्षिण भारत में भी पगड़ी के विविध रूप देखने को मिलते हैं। मैसूर के राजाओं की शाही पगड़ी, तमिलनाडु और कर्नाटक के ग्रामीण समाज में सिर पर बांधे जाने वाले अंगवस्त्र, और आंध्र प्रदेश की पारंपरिक पगड़ियाँ क्षेत्रीय विविधता को दर्शाती हैं। टीपू सुल्तान की विशिष्ट शिरोभूषा भी ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा रही है।
मुगल काल में पगड़ी का शाही और सौंदर्यपरक रूप सामने आया। अकबर के दरबार में विभिन्न शैली की पगड़ियाँ प्रतिष्ठा और पदानुक्रम का प्रतीक थीं। दरबारी प्रोटोकॉल के अनुसार पगड़ी का रंग और आकार व्यक्ति की स्थिति को दर्शाता था। मुगल चित्रकला में रंग-बिरंगी और रत्नजटित पगड़ियों का उल्लेख मिलता है, जो तत्कालीन कला और फैशन के स्तर को दर्शाता है।
राजस्थान की पगड़ी अपनी विविधता और रंग-संयोजन के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यहां हर क्षेत्र की पगड़ी की अलग पहचान है—जैसे जोधपुरी साफा, जयपुरी पगड़ी, मेवाड़ी पगड़ी आदि। मौसम, पर्व और सामाजिक अवसर के अनुसार रंगों का चयन किया जाता है। उदाहरण के लिए, केसरिया रंग वीरता और बलिदान का प्रतीक है, जबकि हरा रंग समृद्धि और खुशहाली को दर्शाता है।
हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पगड़ी सामाजिक सम्मान का प्रतीक है। ग्रामीण समाज में पंचायत के बुजुर्ग और मुखिया पगड़ी धारण करते हैं, जो नेतृत्व और जिम्मेदारी का संकेत देती है। विवाह जैसे अवसरों पर दूल्हे को विशेष पगड़ी पहनाई जाती है, जो नए जीवन की गरिमा और सामाजिक स्वीकृति का प्रतीक है।
गुजरात में ‘पाघड़ी’ की परंपरा भी विशिष्ट है। कच्छ और सौराष्ट्र क्षेत्र में पगड़ी के आकार और बांधने की शैली से व्यक्ति की जातीय और क्षेत्रीय पहचान स्पष्ट होती है। पारंपरिक लोकनृत्यों और उत्सवों में रंगीन पगड़ियाँ सांस्कृतिक जीवंतता को अभिव्यक्त करती हैं।
पगड़ी केवल पुरुषों तक सीमित नहीं रही। भारत के कई क्षेत्रों में महिलाएं भी विशेष अवसरों पर पगड़ी या सिर पर बंधा वस्त्र धारण करती हैं। विशेषकर राजस्थानी लोकसंस्कृति में महिलाओं द्वारा ओढ़नी या घूंघट का सिर पर विशेष ढंग से धारण करना सामाजिक शालीनता और परंपरा का प्रतीक है।
स्वतंत्रता संग्राम के दौर में पगड़ी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बन गई। कई क्रांतिकारी और नेता पारंपरिक पगड़ी या सिर पर कपड़ा बांधकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपनी सांस्कृतिक पहचान को प्रकट करते थे। बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय जैसे नेताओं की विशिष्ट शिरोभूषा उनकी पहचान का हिस्सा बन गई थी।
आधुनिक भारत में पगड़ी का महत्व औपचारिक और सांस्कृतिक आयोजनों में आज भी बरकरार है। विभिन्न राज्यों में विशिष्ट अतिथियों को पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया जाता है। यह परंपरा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि ‘अतिथि देवो भव’ की भावना का प्रतीक है।
फिल्मों और लोकप्रिय संस्कृति ने भी पगड़ी को नई पहचान दी है। ऐतिहासिक फिल्मों में राजाओं और योद्धाओं की पगड़ी उनके चरित्र की गरिमा और परंपरा को सशक्त बनाती है। वहीं समकालीन फैशन में भी डिजाइनर पगड़ियों और साफों का प्रयोग देखने को मिलता है, जो परंपरा और आधुनिकता का संगम है।
आज वैश्वीकरण के युग में भी पगड़ी भारतीय प्रवासी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण अंग बनी हुई है। विदेशों में बसे भारतीय समुदाय विशेष अवसरों पर पगड़ी धारण कर अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश देते हैं। यह परिधान भारतीयता का वैश्विक प्रतीक बन चुका है।
समाजशास्त्रीय दृष्टि से पगड़ी एक ‘सांकेतिक पूंजी’ के रूप में देखी जा सकती है, जो व्यक्ति को सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान करती है। पगड़ी बांधने की कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही है, जिससे यह सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बन गई है।
पगड़ी भारतीय संस्कृति की बहुरंगी और बहुआयामी परंपरा का सशक्त प्रतीक है। यह इतिहास, आस्था, वीरता, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक विविधता का जीवंत दस्तावेज है। बदलते समय में भले ही परिधान शैली में परिवर्तन आया हो, किंतु पगड़ी का सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक महत्व आज भी अक्षुण्ण है। यह केवल सिर पर बंधा वस्त्र नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की गरिमा और आत्मसम्मान का ध्वज है, जो सदियों से समाज की चेतना में प्रतिष्ठित है।






