महामृत्युंजय मंत्र का सच: रचयिता कौन, और क्या है इसका असली इतिहास?
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संवाद 24 डेस्क। हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान शिव को ‘महामृत्युंजय’- अर्थात मृत्यु पर विजय पाने वाले – के रूप में वर्णित किया गया है। शिव की इसी उपाधि से जुड़ा है एक अत्यंत प्रभावशाली और प्राचीन वैदिक मंत्र, जिसे सामान्यतः ‘महामृत्युंजय मंत्र’ या ‘संजीवनी मंत्र’ कहा जाता है। यह मंत्र न केवल आध्यात्मिक साधना का आधार है, बल्कि भारतीय वैदिक परंपरा में आयु, आरोग्य और आध्यात्मिक उत्थान का प्रतीक भी माना जाता है। प्रश्न उठता है कि इस मंत्र का प्रथम उच्चारण किस ऋषि ने किया था, इसका रचयिता कौन था और इसका वैदिक इतिहास क्या है? प्रस्तुत है एक तथ्यात्मक और विश्लेषणात्मक दृष्टि से तैयार विशेष लेख।
महामृत्युंजय मंत्र: मूल स्वरूप और अर्थ
महामृत्युंजय मंत्र का मूल पाठ इस प्रकार है—
“ॐ त्र्यंबकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥”
यह मंत्र भगवान शिव के त्रिनेत्र स्वरूप की उपासना का मंत्र है। ‘त्र्यंबक’ का अर्थ है तीन नेत्रों वाला, ‘सुगंधिं’ का तात्पर्य है जो जीवन में दिव्यता और पवित्रता का प्रसार करे, ‘पुष्टिवर्धनम्’ का आशय है पोषण करने वाला। ‘उर्वारुकमिव बन्धनात्’ में जीवन की तुलना पक चुके फल से की गई है, जो सहज रूप से डंठल से अलग हो जाता है। मंत्र का भावार्थ है—हे त्रिनेत्रधारी प्रभु, हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें और अमृतत्व की ओर ले जाएं।
यहां ‘अमृत’ का अर्थ शारीरिक अमरता नहीं, बल्कि आत्मिक मुक्ति और मोक्ष से है। वैदिक व्याख्या में यह मंत्र जीवन के संतुलन, स्वास्थ्य और आत्मबोध की साधना का प्रतीक माना गया है।
वैदिक स्रोत: ऋग्वेद और यजुर्वेद में उल्लेख
महामृत्युंजय मंत्र का मूल स्रोत ऋग्वेद के सप्तम मंडल में मिलता है। विशेष रूप से यह मंत्र ऋग्वेद (7.59.12) में वर्णित है। इसके अतिरिक्त यजुर्वेद में भी इसका उल्लेख मिलता है, विशेषकर शुक्ल यजुर्वेद के अध्याय 3 में।
ऋग्वेद में यह मंत्र रुद्र देवता की स्तुति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उस समय ‘रुद्र’ को ही शिव का प्राचीन वैदिक स्वरूप माना जाता था। वैदिक युग में रुद्र को रोगनाशक, औषधियों के स्वामी और जीवनदाता के रूप में पूजा जाता था। यही कारण है कि महामृत्युंजय मंत्र को आरोग्य और आयु वृद्धि से जोड़ा गया।
ऋग्वैदिक संदर्भों में यह मंत्र केवल मृत्यु से रक्षा के लिए नहीं, बल्कि जीवन की पूर्णता और संतुलन की कामना के रूप में प्रयुक्त हुआ है। बाद के काल में पुराणों और आगम शास्त्रों ने इसे ‘संजीवनी मंत्र’ के रूप में लोकप्रिय बनाया।
मंत्र के प्रथम उच्चारणकर्ता: ऋषि वशिष्ठ या मार्कंडेय?
महामृत्युंजय मंत्र के प्रथम उच्चारण को लेकर दो प्रमुख परंपराएं प्रचलित हैं।
पहली परंपरा के अनुसार, इस मंत्र के ऋषि (मंत्रद्रष्टा) ऋषि वशिष्ठ माने जाते हैं। ऋग्वेद के सप्तम मंडल के अधिकांश सूक्त वशिष्ठ गोत्र के ऋषियों से संबद्ध हैं। अतः विद्वानों का मत है कि इस मंत्र के द्रष्टा भी वशिष्ठ ही थे। वैदिक परंपरा में ‘रचयिता’ शब्द की अपेक्षा ‘द्रष्टा’ शब्द का प्रयोग अधिक उपयुक्त है, क्योंकि मंत्रों को ईश्वरप्रदत्त दिव्य अनुभूति माना गया है, न कि मानवीय रचना।
दूसरी लोकप्रिय पौराणिक कथा मार्कंडेय से जुड़ी है। कथा के अनुसार, ऋषि मार्कंडेय को अल्पायु का श्राप मिला था। उन्होंने शिव की आराधना करते हुए इसी मंत्र का जप किया और यमराज के प्रकोप से मुक्त हो गए। शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें चिरायु का वरदान दिया। इसी कथा के कारण यह मंत्र ‘मृत्युंजय’ नाम से विख्यात हुआ।
हालांकि ऐतिहासिक और वैदिक दृष्टि से देखा जाए तो मंत्र के प्रथम द्रष्टा ऋषि वशिष्ठ ही माने जाते हैं, जबकि मार्कंडेय से जुड़ी कथा पुराणिक परंपरा का अंग है।
‘संजीवनी मंत्र’ की संज्ञा कैसे मिली?
महामृत्युंजय मंत्र को ‘संजीवनी मंत्र’ कहे जाने का कारण इसकी जीवनदायी और रोगनाशक प्रतिष्ठा है। वैदिक यज्ञों और आयुर्वेदिक अनुष्ठानों में इस मंत्र का प्रयोग स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए किया जाता रहा है।
‘संजीवनी’ शब्द का उल्लेख रामायण में भी मिलता है, जहां लक्ष्मण के उपचार हेतु संजीवनी बूटी लाई गई थी। यद्यपि दोनों प्रसंग भिन्न हैं, परंतु ‘संजीवनी’ का आशय जीवन को पुनः जागृत करने वाली शक्ति से है। इसी अर्थ में महामृत्युंजय मंत्र को प्रतीकात्मक रूप से संजीवनी कहा गया।
रुद्र से शिव तक: वैदिक देवता का विकास
ऋग्वेद में ‘रुद्र’ को उग्र, किंतु करुणामय देवता के रूप में वर्णित किया गया है। कालांतर में रुद्र का स्वरूप विकसित होकर ‘शिव’ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। पुराणों में शिव को संहारक और पुनर्सृष्टि के देवता के रूप में चित्रित किया गया।
महामृत्युंजय मंत्र इस संक्रमण काल का साक्षी है—जहां रुद्र की औषधीय और आरोग्यदायी छवि शिव के कल्याणकारी रूप में रूपांतरित होती दिखाई देती है। यह वैदिक और पुराणिक परंपराओं के संगम का उत्कृष्ट उदाहरण है।
तांत्रिक और आगमिक परंपराओं में महत्व
मध्यकालीन तांत्रिक ग्रंथों में महामृत्युंजय मंत्र को अत्यंत शक्तिशाली बीज मंत्रों के साथ संयोजित कर साधना की विधियां विकसित की गईं। ‘महामृत्युंजय यज्ञ’ और ‘रुद्राभिषेक’ जैसे अनुष्ठान आज भी प्रचलित हैं।
ज्योतिषीय दृष्टि से भी यह मंत्र ‘मारक दशा’ या गंभीर रोग की स्थिति में जपने की परंपरा रही है। हालांकि शास्त्रों में यह स्पष्ट किया गया है कि मंत्र का उद्देश्य आध्यात्मिक जागृति और मनोबल सुदृढ़ करना है।
दार्शनिक व्याख्या: मृत्यु से मुक्ति का तात्पर्य
उपनिषदों और वेदांत दर्शन में मृत्यु को अज्ञान का प्रतीक माना गया है। ‘मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्’ का गूढ़ अर्थ है—अज्ञान और सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर आत्मज्ञान की प्राप्ति।
आदि शंकराचार्य और अन्य आचार्यों ने इस मंत्र को आत्मा की अमरता के सिद्धांत से जोड़ा है। इस प्रकार महामृत्युंजय मंत्र केवल आयु वृद्धि का साधन नहीं, बल्कि आत्मबोध का मार्ग भी है।
आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिकता
आज के तनावपूर्ण जीवन में यह मंत्र मानसिक शांति और सकारात्मकता का माध्यम बन चुका है। वैज्ञानिक अध्ययनों में भी यह पाया गया है कि नियमित जप से मन की एकाग्रता बढ़ती है और तनाव कम होता है।
हालांकि इसे चमत्कारिक उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए, किंतु आस्था और ध्यान की दृष्टि से यह मानसिक स्वास्थ्य में सहायक सिद्ध हो सकता है।
महामृत्युंजय मंत्र का वैदिक मूल ऋग्वेद में निहित है और इसके द्रष्टा ऋषि वशिष्ठ माने जाते हैं। पुराणिक परंपरा में मार्कंडेय की कथा ने इसे जनमानस में विशेष स्थान दिलाया। रुद्र से शिव तक की वैचारिक यात्रा इस मंत्र की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समृद्ध बनाती है।
‘संजीवनी मंत्र’ के रूप में इसकी प्रतिष्ठा केवल जीवन रक्षा की कामना नहीं, बल्कि आत्मिक मुक्ति की आकांक्षा का प्रतीक है। वैदिक दर्शन, पुराणिक आख्यान और आधुनिक आध्यात्मिकता तीनों के संगम पर स्थित यह मंत्र भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है।






