शिव तांडव: सृष्टि और संहार के ब्रह्मांडीय रहस्य का दिव्य नृत्य
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संवाद 24 डेस्क। हिंदू पौराणिक परंपरा में शिव तांडव केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय चेतना की गतिशील अभिव्यक्ति है। भगवान शिव, जिन्हें सृष्टि के संहारक और पुनर्सृजन के अधिष्ठाता देव के रूप में जाना जाता है, अपने तांडव के माध्यम से सृजन, पालन और विनाश के शाश्वत चक्र को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह नृत्य ब्रह्मांड की ऊर्जा, लय और संतुलन का दार्शनिक प्रतिरूप है, जिसमें हर गति, हर मुद्रा और हर भाव एक गहन आध्यात्मिक अर्थ समेटे हुए है।
शिव तांडव की अवधारणा वैदिक और पुराणिक साहित्य में विविध रूपों में वर्णित मिलती है। विशेष रूप से शिव पुराण, लिंग पुराण तथा स्कंद पुराण में शिव के तांडव का विस्तृत उल्लेख है। इन ग्रंथों के अनुसार तांडव उस समय प्रकट होता है जब ब्रह्मांडीय संतुलन विचलित हो जाता है या जब सृष्टि के किसी नए चरण की शुरुआत होती है। यह नृत्य दैवी शक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव है, जिसमें शिव अपनी जटाओं में गंगा, मस्तक पर अर्धचंद्र और गले में सर्प धारण कर ब्रह्मांडीय सत्ता का प्रतिनिधित्व करते हैं।
शिव तांडव का सबसे प्रसिद्ध रूप नटराज के स्वरूप में देखने को मिलता है। नटराज का अर्थ है “नृत्य का राजा”। दक्षिण भारत, विशेषकर तमिल परंपरा में यह स्वरूप अत्यंत पूजनीय है। चिदंबरम नटराज मंदिर में स्थापित नटराज की प्रतिमा तांडव की दार्शनिक व्याख्या का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस प्रतिमा में शिव अग्नि से घिरे हुए वृत्त (प्रभामंडल) के भीतर नृत्य करते हुए दिखाई देते हैं। यह अग्नि ब्रह्मांडीय ऊर्जा और अनंत समय का प्रतीक है, जबकि शिव का एक पाँव अज्ञान के दैत्य अपस्मार पर रखा हुआ है, जो अविद्या और अहंकार के दमन को दर्शाता है।
नटराज की मूर्ति में चार भुजाएँ विशेष महत्व रखती हैं। एक हाथ में डमरू है, जो सृजन की ध्वनि और ब्रह्मांड की उत्पत्ति का प्रतीक है। दूसरे हाथ में अग्नि है, जो विनाश और परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करती है। तीसरा हाथ अभय मुद्रा में है, जो संरक्षण और निर्भयता का संकेत देता है। चौथा हाथ गज-हस्त मुद्रा में उठे हुए चरण की ओर इंगित करता है, जो मोक्ष और मुक्ति का मार्ग दर्शाता है। इस प्रकार शिव तांडव केवल विनाश का नहीं, बल्कि संतुलन और नवसृजन का भी प्रतीक है।
शिव तांडव के विभिन्न रूपों का उल्लेख भी ग्रंथों में मिलता है। आनंद तांडव, रौद्र तांडव, संहार तांडव, संध्या तांडव आदि इसके प्रमुख रूप हैं। आनंद तांडव शिव का वह रूप है, जिसमें वे सृष्टि के आनंद और सौंदर्य को व्यक्त करते हैं। वहीं रौद्र तांडव क्रोध और संहार की अवस्था का प्रतीक है। पुराणों में वर्णित है कि जब माता सती ने यज्ञकुंड में देह त्याग दी, तब शिव ने शोक और क्रोध में रौद्र तांडव किया, जिससे समस्त लोकों में कंपन उत्पन्न हो गया।
इस प्रसंग का संबंध भागवत पुराण और अन्य पुराणों से भी जुड़ा है, जहाँ दक्ष यज्ञ की कथा विस्तार से वर्णित है। दक्ष प्रजापति द्वारा शिव का अपमान किए जाने पर सती का आत्मदाह और उसके पश्चात शिव का तांडव ब्रह्मांडीय संतुलन को विचलित कर देता है। अंततः भगवान विष्णु द्वारा सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंगों को पृथक किया जाता है, जिससे शक्ति पीठों की स्थापना होती है। यह प्रसंग तांडव की तीव्रता और उसके व्यापक प्रभाव को दर्शाता है।
दार्शनिक दृष्टि से शिव तांडव अद्वैत वेदांत और कश्मीरी शैव दर्शन से भी जुड़ा हुआ है। कश्मीरी शैव मत में शिव को ‘चैतन्य’ का मूल स्रोत माना गया है। तांडव उस चैतन्य की स्पंदनशील अभिव्यक्ति है। यह विचार बताता है कि ब्रह्मांड स्थिर नहीं, बल्कि निरंतर गति और परिवर्तन की अवस्था में है। आधुनिक विज्ञान में भी ब्रह्मांड के विस्तार और ऊर्जा के संरक्षण का सिद्धांत इसी सतत परिवर्तन की पुष्टि करता है, जो शिव तांडव की प्रतीकात्मकता से मेल खाता है।
भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपराओं पर भी शिव तांडव का गहरा प्रभाव रहा है। भरतनाट्यम और कथक सहित कई नृत्य शैलियों में तांडव और लास्य के संतुलन को महत्व दिया गया है। तांडव शक्ति और वीर रस का प्रतीक है, जबकि लास्य कोमलता और सौंदर्य का। यह संतुलन भारतीय कला और संस्कृति में पुरुष और प्रकृति, शिव और शक्ति की एकता को दर्शाता है।
शिव तांडव स्तोत्र भी इस परंपरा का महत्वपूर्ण अंग है। परंपरा के अनुसार इसका रचनाकार लंकापति रावण को माना जाता है, जिसने शिव की आराधना में यह स्तोत्र रचा। शिव तांडव स्तोत्र में शिव के तांडव की लयात्मकता और अलंकारिक वर्णन मिलता है, जो संस्कृत साहित्य की उत्कृष्ट काव्य परंपरा का उदाहरण है। इस स्तोत्र का पाठ आज भी अनेक मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है।
आधुनिक समय में भी शिव तांडव की प्रतीकात्मकता प्रासंगिक बनी हुई है। कला, साहित्य, संगीत और सिनेमा में तांडव का उल्लेख निरंतर दिखाई देता है। यह केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है। भारत की मूर्तिकला और स्थापत्य कला में नटराज की प्रतिमा विश्वभर में भारतीय संस्कृति की पहचान बन चुकी है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नटराज की प्रतिमा को वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टि से सराहा गया है। यूरोप के वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्रों में भी नटराज की प्रतिमा स्थापित है, जो ब्रह्मांडीय नृत्य और कणों की गति के बीच साम्य को दर्शाती है। यह दर्शाता है कि प्राचीन भारतीय चिंतन आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी संवाद स्थापित करता है।
शिव तांडव का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव भी व्यापक है। महाशिवरात्रि जैसे पर्वों पर तांडव की कथा और उसकी महिमा का विशेष रूप से वर्णन किया जाता है। मंदिरों में रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन और विशेष पूजन के माध्यम से भक्त शिव के इस दिव्य रूप का स्मरण करते हैं। यह पर्व आध्यात्मिक जागृति और आत्मचिंतन का अवसर प्रदान करता है।
शिव तांडव केवल पौराणिक कथा का हिस्सा नहीं, बल्कि भारतीय दार्शनिक और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। यह नृत्य हमें यह सिखाता है कि परिवर्तन ही जीवन का मूल तत्व है। सृजन और विनाश विरोधी नहीं, बल्कि एक ही प्रक्रिया के दो पक्ष हैं। शिव का तांडव इस शाश्वत सत्य की स्मृति दिलाता है कि ब्रह्मांड निरंतर गतिशील है और हर अंत एक नई शुरुआत का संकेत है।
इस प्रकार, शिव तांडव की अवधारणा धार्मिक आस्था, दार्शनिक चिंतन, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और वैज्ञानिक प्रतीकात्मकता का अद्भुत संगम है। यह भारतीय परंपरा की उस गहराई को दर्शाता है, जिसमें कला, अध्यात्म और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक बनकर मानवता को व्यापक दृष्टि प्रदान करते हैं।






