प्राचीन ग्रंथों से आधुनिक कानून तक: किन्नरों की पहचान का सफर
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संवाद 24 डेस्क। भारतीय समाज की संरचना जितनी विविध और बहुरंगी रही है, उतनी ही जटिल भी। इसी विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है किन्नर समुदाय, जिसे अलग-अलग क्षेत्रों में हिजड़ा, ट्रांसजेंडर या तीसरे लिंग के रूप में जाना जाता है। हजारों वर्षों से यह समुदाय भारतीय सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा रहा है। कभी इन्हें राजदरबारों में सम्मानित स्थान मिला, तो कभी समाज के हाशिए पर धकेल दिया गया। आज के बदलते सामाजिक और कानूनी परिदृश्य में किन्नर समुदाय एक नए आत्मविश्वास और पहचान के साथ उभर रहा है। यह लेख किन्नर समुदाय के ऐतिहासिक गौरव, सामाजिक संघर्ष और वर्तमान परिवर्तन की तथ्यात्मक पड़ताल प्रस्तुत करता है।
प्राचीन भारतीय ग्रंथों और पुराणों में तीसरे लिंग का उल्लेख मिलता है। रामायण में वर्णित कथा के अनुसार, जब भगवान राम वनवास के लिए अयोध्या छोड़ रहे थे, तब पुरुषों और महिलाओं को लौट जाने का आदेश दिया गया, लेकिन किन्नर वहीं प्रतीक्षा करते रहे। इस निष्ठा से प्रसन्न होकर राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया। इसी प्रकार महाभारत में शिखंडी और अर्जुन के ब्रिहन्नला रूप का उल्लेख मिलता है, जो दर्शाता है कि प्राचीन समाज में लैंगिक विविधता को किसी न किसी रूप में स्वीकार किया गया था।
मध्यकालीन भारत में किन्नर समुदाय को विशेष सामाजिक और राजनीतिक महत्व प्राप्त था। दिल्ली सल्तनत और मुगल काल में हिजड़ों को हरम की सुरक्षा, प्रशासनिक जिम्मेदारियों और शाही खजाने की देखरेख जैसे महत्वपूर्ण पद दिए जाते थे। वे शासकों के विश्वस्त माने जाते थे और दरबार में सम्मानित स्थान रखते थे। यह स्थिति दर्शाती है कि उस दौर में किन्नर समुदाय केवल सांस्कृतिक पहचान तक सीमित नहीं था, बल्कि सत्ता संरचना का भी हिस्सा था।
ब्रिटिश शासनकाल में किन्नर समुदाय की सामाजिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया। 1871 में लागू ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ के तहत हिजड़ा समुदाय को ‘अपराधी जनजाति’ घोषित कर दिया गया। इस कानून ने उन्हें सामाजिक रूप से कलंकित कर दिया और उनके पारंपरिक पेशों तथा सामाजिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाए। परिणामस्वरूप, समुदाय को हाशिए पर धकेल दिया गया और उनके प्रति सामाजिक पूर्वाग्रह गहराते गए। यह औपनिवेशिक दृष्टिकोण स्वतंत्रता के बाद भी लंबे समय तक मानसिकता में बना रहा।
स्वतंत्र भारत में संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर किन्नर समुदाय को लंबे समय तक पहचान और सम्मान नहीं मिला। उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहना पड़ा। सामाजिक भेदभाव, पारिवारिक अस्वीकार्यता और आर्थिक कठिनाइयों ने उनके जीवन को चुनौतीपूर्ण बना दिया।
21वीं सदी में किन्नर समुदाय के अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। 2014 में National Legal Services Authority v. Union of India (NALSA) मामले में Supreme Court of India ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ‘तीसरे लिंग’ के रूप में संवैधानिक मान्यता दी। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे इस समुदाय को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग मानते हुए आरक्षण और अन्य कल्याणकारी योजनाएँ उपलब्ध कराएं। यह फैसला भारतीय न्यायिक इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ।
इसके बाद 2019 में संसद ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून पारित किया। Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019 का उद्देश्य भेदभाव को रोकना और शिक्षा, रोजगार तथा स्वास्थ्य सेवाओं में समान अवसर सुनिश्चित करना है। हालांकि इस कानून को लेकर समुदाय के भीतर कुछ असंतोष भी रहा, विशेषकर पहचान प्रमाणन की प्रक्रिया को लेकर। बावजूद इसके, यह कानून नीतिगत स्तर पर एक महत्वपूर्ण कदम माना गया।
राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्र में भी किन्नर समुदाय की भागीदारी बढ़ी है। देश के विभिन्न राज्यों में किन्नर प्रतिनिधि स्थानीय निकायों और विधानसभाओं में चुने गए हैं। उदाहरण के तौर पर शबनम मौसी मध्य प्रदेश विधानसभा की सदस्य बनीं और उन्होंने सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाई। इसी तरह जॉयिता मंडल को लोक अदालत में न्यायाधीश नियुक्त किया गया, जो ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि थी। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि समाज की सोच धीरे-धीरे बदल रही है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी सकारात्मक पहल देखने को मिल रही है। कई विश्वविद्यालयों ने ट्रांसजेंडर छात्रों के लिए विशेष छात्रवृत्तियाँ और प्रवेश नीतियाँ लागू की हैं। कुछ राज्यों ने अलग से ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड स्थापित किए हैं, जो समुदाय की समस्याओं के समाधान के लिए कार्य कर रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में जेंडर-अफर्मेशन सर्जरी और मानसिक स्वास्थ्य सहायता जैसी सुविधाओं को संस्थागत रूप दिया जा रहा है, हालांकि इनकी पहुँच अभी भी सीमित है।
सामाजिक स्तर पर चुनौतियाँ अभी भी कम नहीं हैं। परिवारों द्वारा अस्वीकार किए जाने के कारण कई किन्नर बच्चे कम उम्र में ही घर छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। शिक्षा अधूरी रह जाती है और जीविका के लिए पारंपरिक बधाई प्रथा या भीख मांगने जैसे कार्यों पर निर्भर रहना पड़ता है। आधुनिक समाज में रोजगार के अवसर बढ़े हैं, लेकिन भेदभाव और पूर्वाग्रह अब भी बाधा बने हुए हैं।
मीडिया और सिनेमा ने भी किन्नर समुदाय की छवि गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पहले फिल्मों में किन्नर पात्रों को हास्य या भय के प्रतीक के रूप में दिखाया जाता था, लेकिन हाल के वर्षों में संवेदनशील और यथार्थपरक चित्रण बढ़ा है। वेब सीरीज और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों में उनकी वास्तविक संघर्षगाथाएँ सामने आ रही हैं, जिससे समाज में जागरूकता बढ़ी है।
डिजिटल युग ने किन्नर समुदाय को अपनी आवाज बुलंद करने का नया मंच दिया है। सोशल मीडिया के माध्यम से वे अपने अनुभव साझा कर रहे हैं, अभियान चला रहे हैं और अधिकारों के लिए संगठित हो रहे हैं। इससे समुदाय के भीतर आत्मसम्मान और एकजुटता की भावना मजबूत हुई है।
आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में स्वयं सहायता समूह, कौशल विकास कार्यक्रम और स्टार्टअप पहलें शुरू की गई हैं। कुछ राज्यों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को स्वरोजगार के लिए ऋण और अनुदान उपलब्ध कराए जा रहे हैं। निजी कंपनियाँ भी विविधता और समावेशन नीतियों के तहत ट्रांसजेंडर कर्मचारियों को अवसर दे रही हैं। हालांकि व्यापक स्तर पर यह प्रक्रिया अभी प्रारंभिक चरण में है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ट्रांसजेंडर अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न मानवाधिकार संगठनों ने लैंगिक विविधता को मानवाधिकार का हिस्सा माना है। भारत में भी इन वैश्विक विमर्शों का प्रभाव देखा जा सकता है, जिससे नीतिगत और सामाजिक सुधारों को गति मिली है।
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि केवल कानून बना देने से सामाजिक मानसिकता तुरंत नहीं बदलती। किन्नर समुदाय को वास्तविक सम्मान और समान अवसर तभी मिल सकते हैं जब शिक्षा प्रणाली, परिवार और समाज मिलकर समावेशी दृष्टिकोण अपनाएँ। विद्यालयों में लैंगिक संवेदनशीलता पर आधारित पाठ्यक्रम, कार्यस्थलों पर भेदभाव विरोधी नीतियाँ और मीडिया में सकारात्मक प्रस्तुति—ये सभी परिवर्तन की दिशा में आवश्यक कदम हैं।
किन्नर समुदाय का इतिहास यह बताता है कि भारतीय समाज ने समय-समय पर उन्हें सम्मान भी दिया है और उपेक्षा भी। आज आवश्यकता है कि इतिहास के गौरवशाली पक्ष को याद रखते हुए वर्तमान की चुनौतियों का समाधान खोजा जाए। न्यायिक फैसलों, विधायी सुधारों और सामाजिक पहलों ने परिवर्तन की आधारशिला रख दी है, लेकिन वास्तविक परिवर्तन तभी संभव है जब समाज की मानसिकता में समावेश और समानता की भावना गहराई से स्थापित हो।
किन्नर समुदाय की कहानी केवल संघर्ष की कथा नहीं है, बल्कि आत्मसम्मान, साहस और पुनर्निर्माण की भी है। हजारों साल पुरानी यह पहचान आज नए दौर में प्रवेश कर रही है, जहाँ अधिकार, गरिमा और अवसर की मांग केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी भी बन चुकी है।






