कुकी समुदाय का ईसाईकरण, मिशनरी हस्तक्षेप और मूल संस्कृति से दूरी की कड़वी कहानी

संवाद 24 संजीव सोमवंशी। मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में बसे कुकी समुदाय को समझे बिना पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक राजनीति को समझना अधूरा है। यह समुदाय कभी अपने पारंपरिक पर्वों, प्रकृति पूजा, युद्ध-शौर्य, लोककथाओं और पुश्तैनी आस्था के लिए पहचाना जाता था। लेकिन समय के साथ, विशेषकर 19वीं–20वीं सदी में, जब ब्रिटिश मिशनरियों का प्रवेश हुआ, तो एक ऐसे परिवर्तन की शुरुआत हुई जिसने उनकी पूरी सांस्कृतिक आत्मा को बदलकर रख दिया। यह परिवर्तन सिर्फ़ धार्मिक नहीं था, बल्कि एक व्यवस्थित और रणनीतिक सांस्कृतिक पुनर्गठन था, जिसके प्रभाव आज भी स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।

कुकी समुदाय मूलतः एक ही सांस्कृतिक भाषाई परिवार की अनेक जनजातियों का समूह है। ये न सिर्फ़ मणिपुर की पहाड़ियों में, बल्कि नागालैंड, असम, त्रिपुरा, मेघालय और मिज़ोरम जैसे पूर्वोत्तर राज्यों के साथ साथ म्यांमार और बांग्लादेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी बसे हुए हैं।

ब्रिटिश काल और उससे पहले के औपनिवेशिक दस्तावेज़ों में इन्हें कभी–कभी “Old Kuki” और “New Kuki” जैसी श्रेणियों में बाँटा गया, जिसमें थाडौ, पैते, ह्मार, गांगते, वैपेई, ज़ो, सिम्ते आदि अनेक उप–समूह शामिल बताए गए। हालांकि आज अधिकांश आधुनिक शोधकर्ता मानते हैं कि यह भेद ज़्यादा प्रशासनिक सुविधा और औपनिवेशिक वर्गीकरण पर आधारित था, न कि सख़्त नृ–वैज्ञानिक आधार पर।

आधुनिक भारत के संवैधानिक ढाँचे में मणिपुर के कुकी–जो समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) के रूप में मान्यता है। वे प्रायः पहाड़ी ज़िलों चुराचांदपुर, कांगपोकपी, चंदेल, सेनापति आदि में बहुलता से बसते हैं। इन पहाड़ी क्षेत्रों की दुर्गमता, सीमित आधारभूत ढांचे और सुरक्षा चुनौतियों ने कुकी समाज के आर्थिक सामाजिक विकास की गति पर गहरा प्रभाव डाला है।

कुकी लोग पारंपरिक रूप से पहाड़ी ढलानों और चोटियों पर बसे छोटे–छोटे गाँवों में रहते रहे हैं। इन गाँवों की संरचना अक्सर सामुदायिक सुरक्षा और सामूहिक जीवन–शैली को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। गाँव के मध्य में अक्सर सामुदायिक सभा–स्थल, चर्च या पारंपरिक सामुदायिक घर रहा है, जिसके आसपास घरों की कतारें दिखती हैं।

पहले अधिकांश घर लकड़ी, बांस और सूखी घास (थैच) से बनते थे। आज भी परंपरागत ढाँचे के साथ–साथ टिन की छत और कंक्रीट के नए घर दिखाई देने लगे हैं, लेकिन घरों का आंतरिक विन्यास अब भी सामुदायिकता और साझा जीवन–शैली का संदेश देता है, जैसे बड़ा किचन स्पेस, जहाँ परिवार और पड़ोसी मिलकर भोजन और बातचीत करते हैं।

कुकी समुदाय का जीवन लंबे समय तक shifting cultivation या झूम खेती से जुड़ा रहा है। वे पहाड़ी ढलानों पर जंगल साफ़ कर अस्थायी खेत बनाते, कुछ वर्षों तक फसल लेते और फिर आगे दूसरी ढलान पर चले जाते थे। इस खेती के साथ अनेक धार्मिक–सांस्कृतिक मान्यताएँ और पर्व जुड़े हैं, जिनमें धरती, वर्षा और फसल के देवताओं को धन्यवाद देने की परंपरा शामिल है।

झूम खेती के अलावा आज कई कुकी परिवार स्थायी खेती, सब्ज़ी उत्पादन, छोटे–स्तर के बाग़ान, पशुपालन, सूअर और मुर्गी पालन, तथा छोटे कारोबारों के ज़रिये रोज़गार प्राप्त कर रहे हैं। सड़कों, बाज़ारों और शहरीकरण में वृद्धि ने उन्हें व्यापार और मज़दूरी के नए अवसर दिए हैं, लेकिन इसके साथ ही भूमि–संसाधनों पर प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है, जो बाद में जातीय तनावों की पृष्ठभूमि का हिस्सा बनती है।

कुकी समाज परंपरागत रूप से पितृसत्तात्मक है, यानी वंश और संपत्ति पिता की ओर से चलती है। कई समूहों में कबीलाई प्रमुख (chief) या गाँव प्रमुख की संस्था रही है, जो भूमि–वितरण, विवाद–निपटान और सामाजिक–धार्मिक आयोजन जैसे कामों में निर्णायक भूमिका निभाती थी।

हालाँकि, आधुनिक लोकतांत्रिक संस्थाओं, चर्च आधारित समिति संरचनाओं और छात्र संगठनों की सक्रियता ने इन पारंपरिक संस्थाओं की शक्ति को कुछ हद तक संतुलित किया है। कुकी युवा बड़ी संख्या में शिक्षा, सरकारी नौकरी, सुरक्षा बलों, एनजीओ और प्राइवेट सेक्टर की ओर भी बढ़ रहे हैं।

खान–पान: साधारण सामग्री, विविध स्वाद
कुकी समुदाय का भोजन पहाड़ी जीवन, कृषि और स्थानीय जैव–विविधता से गहराई से जुड़ा है।
(क) मुख्य आहार
चावल (rice) प्रमुख मुख्य भोजन है, जैसे कि पूर्वोत्तर के अधिकांश समुदायों में। चावल के साथ सब्ज़ियाँ, जंगली साग, फलियाँ, बांस की कोपलें, कद्दू, लौकी, याम आदि प्रचुर मात्रा में खाए जाते हैं। पशु आधारित प्रोटीन में सूअर का मांस, मुर्गी, मछली और कभी–कभी जंगली जानवरों का मांस पारंपरिक भोजन का हिस्सा रहा है (आज कई जगह शिकार पर कानूनी प्रतिबंध और सामाजिक परिवर्तन के कारण इसमें कमी आई है)।
भोजन पकाने का तरीका अपेक्षाकृत सरल, उबाला या भाप में पकाया हुआ, और मसालों में कम लेकिन सुगंधित होता है। कई व्यंजन बाँस की कोपलों, किण्वित उत्पादों और स्मोक्ड मीट पर आधारित होते हैं।

(ख) किण्वित खाद्य पदार्थ और पेय
पूर्वोत्तर की तरह कुकी समाज में भी किण्वित (fermented) खाद्य पदार्थों की परंपरा है, जो भोजन के स्वाद, संरक्षण और पोषण–मूल्य को बढ़ाते हैं। स्थानीय स्तर पर चावल से बने हल्के पारंपरिक पेय भी कुछ सांस्कृतिक अवसरों पर प्रयोग होते रहे हैं, हालांकि ईसाईकरण के बाद कई समुदायों में मदिरा सेवन को हतोत्साहित करने की प्रवृत्ति भी दिखती है।

(ग) पर्व–त्योहारों का सामूहिक भोजन
कुकी पर्वों विशेषकर फसल उत्सवों में सामूहिक भोज (community feast) अत्यंत महत्वपूर्ण है। मिम कुट और छावंग कुट जैसे त्योहारों में पूरा गाँव एक साथ जुटकर नए चावल, सब्ज़ियाँ, मांस–भोजन और पारंपरिक पेय के साथ दिन–भर नाच–गान और मिलन–मेला करता है।

साझा भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक बंधन, सामूहिक पहचान और सामाजिक समता का प्रतीक है—जहाँ अमीर–गरीब, युवक–युवती और बुज़ुर्ग सभी एक पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं।

वेशभूषा: रंगों, पैटर्न और पहचान की भाषा
कुकी–जो समुदाय की पारंपरिक वेशभूषा उनकी सांस्कृतिक पहचान का सशक्त प्रतीक है।
(क) पारंपरिक वस्त्रों की विशेषताएँ
कुकी, चिन और मिज़ो समुदायों के परिधानों पर किए गए अध्ययनों में कहा गया है कि इनके लिए कपड़े “अनलिखित संविधान” की तरह हैं यानी किसी व्यक्ति का सामाजिक स्तर, आयु, वैवाहिक स्थिति और कभी–कभी युद्ध–वीरता भी वस्त्रों और शॉल के डिज़ाइन से समझी जा सकती है। पारंपरिक कपड़े अक्सर हाथ–करघे (handloom) पर तैयार होते हैं। रंगों में लाल, काला, सफेद, हरा और पीले संयोजन प्रमुख हैं। शॉल और लंगोटी/स्कर्ट पर ज्यामितीय आकृतियाँ, धारियाँ, चेक, पक्षियों जानवरों और प्रकृति से प्रेरित पैटर्न बुने जाते हैं। इनके अलग अलग नाम और प्रतीकात्मक अर्थ होते हैं, जो प्रत्येक उप जनजाति के इतिहास और लोक–कथाओं से जुड़े रहते हैं।

(ख) पुरुषों और महिलाओं की वेशभूषा
परंपरागत रूप से:
पुरुष: कमर पर लपेटा जाने वाला वस्त्र (loincloth), शॉल, सिर पर बंधा कपड़ा या पगड़ी; ठंड और युद्ध–संदर्भ में विशेष शॉल जिनका पैटर्न वीरता या विशिष्ट सामाजिक दर्जे का प्रतीक होता था।
महिलाएँ: कमर से नीचे लपेटी जाने वाली स्कर्ट–नुमा पोशाक (जिसके अलग–अलग स्थानीय नाम हैं), उसके साथ ब्लाउज़ या टॉप, और कंधे पर डालने के लिए विशेष शॉल या दुपट्टा।
कई परिधानों के पैटर्न और रंग इस बात का संकेत देते हैं कि पहनने वाली महिला विवाहित है या अविवाहित, किसी विशेष त्योहार में भाग ले रही है या सामान्य दिनचर्या का हिस्सा है।

(ग) आभूषण और अलंकरण
कुकी महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले पारंपरिक आभूषणों में रंग–बिरंगी मनकों की मालाएँ, धातु के कंगन, कानों के बड़े–बड़े झुमके और सिर के लिए सजावटी बैंड शामिल होते हैं। पुरुष भी कभी–कभी दाँत, पंजे, शंख या धातु से बने आभूषण पहनते रहे हैं, जो शिकार, युद्ध और सामाजिक–धार्मिक मान्यता से जुड़े थे।
आधुनिक समय में युवाओं के बीच वेस्टर्न परिधान और सामान्य भारतीय फैशन (जीन्स–टीशर्ट, शर्ट–ट्राउज़र, साड़ी आदि) प्रचलित हो चुके हैं, लेकिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों और त्योहारों में पारंपरिक पोशाकों का गर्व से प्रदर्शन किया जाता है।

परंपराएँ, त्योहार और धार्मिक जीवन
(क) धर्म और ईसाईकरण
ऐतिहासिक रूप से कुकी–जो समुदाय प्रकृति–पूजक, पूर्वज–पूजक और स्थानीय देवताओं में विश्वास रखने वाला रहा है। परंतु 19वीं–20वीं सदी में मिशनरियों के आगमन के बाद बड़ी संख्या में कुकी लोगों ने ईसाई धर्म (विशेषकर बैपटिस्ट और प्रोटेस्टेंट मिशनों) को अपनाया।

आज अधिकांश कुकी गाँवों में चर्च सामाजिक–धार्मिक जीवन का केंद्र है। रविवार की प्रार्थना, क्रिसमस और ईस्टर के उत्सव, चर्च कोयर और युवा फ़ेलोशिप जैसी गतिविधियाँ उनकी सामाजिकता का अहम हिस्सा हैं। साथ ही कई जगह पारंपरिक मान्यताएँ और लोक–विश्वास ईसाई आस्था के साथ–साथ चल रहे हैं—जैसे प्रकृति के प्रति आदर, पूर्वजों के प्रति सम्मान और कुछ रीतिगत प्रथाएँ।

(ख) प्रमुख त्योहार: मिम कुट और छावंग कुट
कुकी समुदाय कृषि आधारित फसल उत्सवों के लिए प्रसिद्ध है।
मिम कुट (Mim Kut) –
यह पोस्ट–हार्वेस्ट यानी कटाई के बाद मनाया जाने वाला उत्सव है, जिसमें फसल के साथ–साथ पूर्वजों को याद किया जाता है। ताज़ा उपज, चावल, फल, सब्ज़ियों, और पारंपरिक पेय को देवताओं और पूर्वजों के नाम पर अर्पित कर आशीर्वाद मांगा जाता है। उत्सव के दौरान रात–भर गाने, नृत्य और सामूहिक दावतें चलती हैं।

छावंग कुट (Chavang Kut) –
इसे अक्सर autumn harvest festival या धान कटाई से जुड़ा प्रमुख पर्व माना जाता है, जो प्रायः नवंबर माह में मनाया जाता है। इस दिन कुकी–चिन–मिज़ो समूह देवताओं को अच्छी फसल के लिए धन्यवाद देते हैं। पारंपरिक नृत्य, लोक–गीत, खेल–कूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जो आजकल शहरी क्षेत्रों और अन्य राज्यों में बसे कुकी प्रवासियों द्वारा भी बड़े स्तर पर मनाए जाते हैं।

इन त्योहारों के माध्यम से कुकी समाज न सिर्फ़ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मज़बूती से थामे रहता है, बल्कि युवाओं में सामुदायिक गर्व और सामूहिकता की भावना भी विकसित करता है।

(ग) विवाह, परिवार और सामाजिक रीतियाँ
थाडौ–कुकी और अन्य उप–समूहों के विवाह–संस्कारों में पारंपरिक पुजारी (Thiempu) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कुछ समुदायों में विवाह के समय मुर्गे की बलि, उसके पंखों का जोड़े के सिर पर रखना, और फिर एक विशेष धागे से दोनों को प्रतीकात्मक रूप से बाँधने जैसी प्रथाएँ दिखाई देती थीं।

हालाँकि ईसाई चर्च–विवाह और आधुनिक क़ानूनी–रजिस्ट्रेशन अब प्रचलित हैं, फिर भी कई पारंपरिक प्रतीकों जैसे सामुदायिक दावत, गीत–संगीत, और कुछ स्थानीय रिवाज़ को आज भी विवाह एवं अन्य संस्कारों में शामिल किया जाता है। शोक संस्कारों में भी समुदाय सामूहिक रूप से परिवार के साथ खड़ा होता है, और कई दिनों तक प्रार्थना, सांत्वना और सामूहिक भोजन का सिलसिला चलता है।

संगीत, नृत्य और लोक–संस्कृति
कुकी समुदाय के लोक–गीत और नृत्य उनकी ऐतिहासिक स्मृति, वीरता, प्रेम और प्रकृति–प्रेम को अभिव्यक्त करते हैं। पारंपरिक ढोल, बांसुरी और अन्य वाद्य–यंत्र त्योहारों में बजाए जाते हैं। हाल के शोधों में थाडौ–कुकी समुदाय के ढोल को आध्यात्मिक गुणों से युक्त माना गया है, जो कई अनुष्ठानों और रीतियों में केंद्रीय भूमिका निभाता है। आज आधुनिक चर्च–संगीत, गॉस्पेल गाने और पाश्चात्य वाद्य–यंत्र भी प्रचलित हो गए हैं, लेकिन परंपरागत नृत्य–रूपों का प्रयोग अब भी सांस्कृतिक महोत्सवों, राजकीय कार्यक्रमों और युवा त्योहारों में देखा जा सकता है।

ईसाईकरण से पहले कुकी क्या थे? “असभ्य” या मिशनरी नैरेटिव का शिकार?
ईसाईकरण से पहले कुकी समाज किसी आध्यात्मिक खालीपन या असभ्यता का शिकार नहीं था। उनका धार्मिक ढांचा पूरी तरह संगठित और जीवंत था। इसमें प्रकृति को देवत्व का रूप दिया जाता था, पूर्वज-पूजा ने नैतिक ढांचे को जकड़े रखा था, गांवों में चुने हुए मुखिया सामाजिक संतुलन का संचालन करते थे, और अनुष्ठानों, नृत्यों तथा त्योहारों के द्वारा सामुदायिक एकता बनाए रखी जाती थी। उनके लिए देवता पहाड़, जंगल, नदियां और मौसम थे। इन मान्यताओं में कोई हीनता नहीं थी, लेकिन मिशनरियों के आगमन के बाद इन्हीं आस्थाओं को “अंधविश्वास”, “पाप” और “पिछड़ापन” जैसे शब्दों से जोड़कर समुदाय में शर्म पैदा की गई।

सभ्यता के नाम पर ‘मनोवैज्ञानिक कब्ज़ा’? शिक्षा की आड़ में आत्मा का परिवर्तन
मिशनरियों ने “सभ्यता, शिक्षा और प्रगति” के नाम पर प्रवेश किया। स्कूल खोले गए, चिकित्सा सेवाएँ दी गईं, बाइबिल की शिक्षा फैलाई गई, और पूरा वातावरण एक नए नैतिक ढांचे के अनुरूप ढाला गया। लेकिन इन सेवाओं के साथ-साथ यह विचार भी स्थापित किया गया कि पारंपरिक कुकी पहचान हीन, पिछड़ी और परिवर्तन योग्य है। लोगों को यह समझाया गया कि अगर वे “सभ्य” बनना चाहते हैं तो ईसाई पहचान स्वीकार करना ही होगा। यह एक मानसिक रणनीति थी, पहले आत्मसम्मान तोड़ो, फिर नई पहचान थमा दो।

नेतृत्व बदला और साथ ही पूरी सत्ता! क्या चर्च ने गाँव की आत्मा पर कब्ज़ा कर लिया?
ईसाईकरण के बाद सबसे पहला परिवर्तन सामाजिक नेतृत्व में देखने को मिला। पहले तक ग्राम प्रमुख ही विवाद निपटारण, सामाजिक आयोजन और धार्मिक मार्गदर्शन के केंद्र में होते थे, लेकिन अब यह भूमिका चर्च और पादरियों ने ले ली। इस नेतृत्व परिवर्तन से केवल धार्मिक रुझान नहीं बदला, बल्कि सामुदायिक सत्ता-संतुलन भी बदल गया। शक्ति का केंद्र परंपरागत प्रणाली से हटकर चर्च आधारित ढांचे में चला गया। यह परिवर्तन शांत नहीं था; यह व्यवस्था बदलाव का सीधा संकेत था — अब समाज अपनी नहीं, किसी बाहरी संरचना के निर्देशों पर चलने लगा था।

वेशभूषा से त्योहार तक: क्या संस्कृति को “पाप” कहकर मिटाया गया?
इसके बाद परिवर्तन संस्कृति पर हुआ। पारंपरिक पोशाकों, शॉलों और हस्तनिर्मित वस्त्रों को “कच्चा”, “असभ्य” या “अनुचित” कहकर हतोत्साहित किया गया। विवाह, शौर्य, नृत्य और पूर्वजों की पूजा से जुड़े अनुष्ठान “पाप” कहकर रोके गए। पारंपरिक भोज, सामूहिक दावतें, झूम खेती से जुड़ी रीतियाँ और त्योहार भी धीरे-धीरे चर्च-आधारित परिभाषाओं में ढाले गए। जहां पहले लोकगीत और युद्ध-नृत्य सामूहिक गौरव का प्रतीक थे, वहीं अब गॉस्पेल गीत और आधुनिक वाद्ययंत्रों ने उनकी जगह ले ली। अब नई पीढ़ी को अपने ही पूर्वजों की संस्कृति पर अपराधबोध महसूस कराया जाने लगा।

यह धर्म परिवर्तन नहीं, ‘पहचान का स्थानापन्न’ था, असल चोट कहाँ लगी?
ईसाईकरण को सिर्फ विश्वास परिवर्तन कहना गलत होगा। यह जड़ों का परिवर्तन था। किसी समुदाय के धर्म को बदला जाए तो पूजा बदलती है, लेकिन उसकी पहचान नहीं बदलती। लेकिन कुकी समाज के मामले में सबसे पहले पहचान बदली गई, फिर पूजा भी बदल दी गई। उनके पूर्वजों को गलती साबित किया गया, उनकी मान्यताओं को दकियानूसी कहा गया, और उनकी संस्कृति को “पाप” घोषित किया गया। यह सुधार नहीं था; यह मानसिक उपनिवेशवाद था। यह आध्यात्मिक विकास का दावा करते हुए सांस्कृतिक नियंत्रण की रणनीति थी।

क्या “भलाई” एक सौदा थी? सुविधाओं के बदले विरासत खोने का दर्द
यह सवाल इसलिए तगड़ा होता है क्योंकि मिशनरियों द्वारा दिया गया “भला” केवल एकतरफा भलाई नहीं थी। स्कूल खुले, चिकित्सा मिली, शिक्षा फैली, यह स्वीकारना ज़रूरी है। लेकिन क्या इन सुविधाओं के माध्यम से मानसिक निर्भरता नहीं बनाई गई? क्या यह बदलाव इसलिए नहीं हुआ ताकि समुदाय स्वयं पर नहीं, बल्कि चर्च और बाहरी ढांचे पर निर्भर हो जाए? जब किसी समाज को प्रगति के लिए अपनी आत्मा गिरवी रखनी पड़े, तो यह सुधार नहीं, परास्ति है। और यही इस कहानी का सबसे आक्रामक सच है।

आज का असमंजस: क्या कुकी समाज दो हिस्सों में बंट चुका है?
आज का कुकी समाज पहचान के संकट में है। एक वर्ग चर्च आधारित पहचान के साथ जी रहा है, जबकि दूसरा वर्ग अपनी पारंपरिक जड़ों को वापस पाने की इच्छा रखता है। दो दिशाओं में बंटा यह समाज केवल धार्मिक मतभेद का नहीं, बल्कि अस्मिता संघर्ष का प्रमाण है। आधुनिक शिक्षा और चर्च की व्यवस्था ने सुविधा दी है, पर मूल्य-प्रणाली, इतिहास और लोक-गौरव की कीमत पर। यह वह कीमत है जो शायद समुदाय ने मजबूरी, लालच या विश्वास के नाम पर चुका दी।

अंतिम सवाल: क्या खोई हुई पहचान वापस पाई जा सकती है?
अंत में सवाल यही खड़ा होता है कि क्या यह परिवर्तन वैध था? क्या इसे प्रगति कहा जाए या सांस्कृतिक अधिग्रहण? क्या कुकी समुदाय अपनी खोयी पहचान वापस पा सकता है या अब यात्रा इतनी दूर आ चुकी है कि वापसी कठिन है? यह प्रश्न खुले हैं, और जवाब समय तय करेगा। लेकिन यह सच स्वीकार करना आवश्यक है कि मिशनरियों द्वारा किया गया ईसाईकरण धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना पर कब्जे जैसा था और इसका सबसे बड़ा नुकसान पहचान के मिटने के रूप में दर्ज हुआ।

Samvad 24 Office
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