जिस समस्या से दुनिया जूझ रही थी, क्या उसका समाधान भारत ने खोज लिया? भारत की ऊर्जा क्रांति

संवाद 24 डेस्क। भारत ने एक बार फिर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। MIT वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी (MIT-WPU) के शोधकर्ताओं ने हाइड्रोजन ऊर्जा के सुरक्षित तथा किफायती परिवहन के लिए Liquid Organic Hydrogen Carrier (LOHC) नामक एक उन्नत प्रणाली विकसित की है, जिससे देश ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन और वितरण के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर हो सकता है। इस प्रणाली की खोज न केवल ऊर्जा लॉजिस्टिक्स की मौजूदा चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करती है, बल्कि भारत को कार्बन-मुक्त अर्थव्यवस्था की दिशा में भी एक निर्णायक बढ़त दे सकती है।

हाइड्रोजन: भविष्य का ईंधन, लेकिन सबसे बड़ी परेशानी क्या है?
हाइड्रोजन, परंपरागत fossil fuel की तुलना में अत्यंत स्वच्छ ऊर्जा स्रोत माना जाता है क्योंकि इसका उत्सर्जन केवल पानी होता है और यह कार्बन और अन्य प्रदूषणकारी गैसों का उत्सर्जन नहीं करता. इसलिए इसे ग्रीन हाइड्रोजन के रूप में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) में एक महत्वपूर्ण घटक माना जाता है। हालाँकि, हाइड्रोजन का सबसे बड़ा मुद्दा इसका भंडारण और परिवहन रहा है। क्योंकि हाइड्रोजन गैस रूप में अत्यधिक ज्वलनशील है और पारंपरिक तरीके उच्च दबाव के सिलेंडर या -253°C पर तरलीकरण महंगे और जोखिम भरे हैं। इन कारणों से हाइड्रोजन-आधारित ऊर्जा ढांचे के बड़े पैमाने पर उपयोग को रोकने वाली बाधाएँ बनी हुई हैं।

जब समाधान असंभव लग रहा था: वहीं से शुरू हुई LOHC की खोज
Liquid Organic Hydrogen Carrier (LOHC) प्रणाली एक रासायनिक आधारित विधि है जिसमें हाइड्रोजन को किसी विशेष कार्बनिक तरल में सुसंगठित कर सुरक्षित रूप से परिवहन और भंडारण किया जा सकता है। इसका सिद्धांत सरल है: हाइड्रोजन को एक विशेष जैविक लिक्विड के साथ हाइड्रोजनेशन प्रक्रिया के माध्यम से स्थिरता से जोड़ा जाता है और जरूरत पड़ने पर उसे डिहाइड्रोजनेशन द्वारा वापस मुक्त किया जा सकता है। इस प्रक्रिया के दौरान यह तरल न तो अत्यधिक तापमान और न ही उच्च दबाव की आवश्यकता रखता है, जिससे जोखिम और लागत दोनों में कमी आती है। इसके अलावा LOHC प्रणाली गैर-ज्वलनशील, गैर-विस्फोटशील और सामान्य तापमान तथा दबाव पर संभाली जा सकती है, जिससे पारंपरिक तकनीकों की तुलना में सुरक्षा बहुत अधिक बढ़ जाती है।

50 दिन की असफलता और 10 महीने की जिद: MIT-WPU की प्रयोगशाला की कहानी
इस उन्नत LOHC प्रणाली का विकास MIT-WPU, पुणे में एक समर्पित शोध टीम ने किया। यह शोध ओम क्लीनटेक प्राइवेट लिमिटेड (OCPL) की चुनौती से उत्पन्न हुआ, जिसने MIT-WPU से हाइड्रोजन परिवहन की एक व्यवहारगत समस्या का समाधान माँगा। एक ऐसी समस्या जिसे देश के प्रमुख अनुसंधान संस्थान भी हल नहीं कर पाए थे।

शोध का नेतृत्व प्रोफेसर डॉ. राजीब कुमार सिन्हराय ने किया, जिन्होंने बताया कि शुरुआत के पहले लगभग 50 दिनों तक कोई ठोस परिणाम नहीं मिला। इसके बावजूद शोध टीम ने प्रयासों को जारी रखा और लगभग 10 महीनों और 100 से अधिक प्रयोगों के बाद वह सफलता प्राप्त की, जो विश्व स्तर पर LOHC प्रणालियों के विकास में निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है। यह खोज पूर्णतः शून्य से विकसित की गई, क्योंकि दुनिया में पहले से प्रकाशित कोई सुसंगत तरीका उपलब्ध नहीं था। शोधकर्ताओं ने पूरी प्रक्रिया को रचनात्मक और मूल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तैयार किया।

LOHC प्रणाली की रासायनिक प्रक्रिया
LOHC प्रणाली दो प्रमुख चरणों में काम करती है:
हाइड्रोजनेशन चरण: इस चरण में हाइड्रोजन को एक विशेष जैविक तरल में जोड़ा जाता है, जिससे वह स्थिर, सुरक्षित और गैर-ज्वलनशील रूप में परिवर्तित होता है।
डिहाइड्रोजनेशन चरण: जब हाइड्रोजन की आवश्यकता होती है, तो इसे तरल से अलग करके पुनः मुक्त किया जाता है। इसके बाद LOHC टेक्नोलॉजी वाले तरल को फिर से दोबारा उपयोग किया जा सकता है।

यह विधि पारंपरिक क्रायोजेनिक सिस्टम या उच्च दबाव वाले सिलेंडरों की तुलना में बहुत कम ऊर्जा-गहन है और शिपिंग / लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को सरल बनाती है।

जो आग नहीं पकड़ता, जो फटता नहीं: हाइड्रोजन ट्रांसपोर्ट का नया रूप
शोध में LOHC प्रणाली का परीक्षण करने पर उत्कृष्ट परिणाम सामने आए। MIT-WPU की टीम ने हाइड्रोजन स्टोरेज प्रक्रिया को केवल 2 घंटे में पूरा किया, जबकि वैश्विक स्तर पर समान प्रक्रियाएँ आमतौर पर करीब 18 घंटे लेती हैं। इसके साथ ही यह प्रक्रिया 130°C तापमान पर हुई, जो पारंपरिक तरल हाइड्रोजन भंडारण तापमान (लगभग 170°C) से काफी कम है।

लैब परीक्षणों में 15.6 लीटर LOHC तरल में लगभग 11,000 लीटर हाइड्रोजन का भंडारण सफल रहा, और डिहाइड्रोजनेशन में करीब 86% हाइड्रोजन की वापसी हासिल की गई। ये परिणाम दर्शाते हैं कि LOHC प्रणाली न केवल सुरक्षित है बल्कि ऊर्जा दक्षता और लागत प्रभावशीलता के मामले में भी श्रेष्ठ प्रदर्शन करती है।

लैब से बाज़ार तक: पेटेंट, उद्योग साझेदारी और कमर्शियल प्लान
इस LOHC तकनीक का व्यावसायिक रूप से उपयोग करने के लिए OCPL ने अंतरराष्ट्रीय पेटेंट के लिए आवेदन किया है और भविष्य में इसे बाजार में एक कमर्शियल प्रोडक्ट के रूप में लाने की तैयारी कर रही है। यह साझेदारी अकादमिक शोध और उद्योग-व्यापार आवश्यकताओं के बीच एक उत्तम मॉडल पेश करती है, जहां वैज्ञानिक नवाचार को व्यावसायिक उत्पादों के रूप में विकसित किया जा सकता है।

ऊर्जा की लागत घटेगी, सुरक्षा बढ़ेगी: आम आदमी तक असर कैसे पहुंचेगा
LOHC प्रणाली का विकास भारत के National Green Hydrogen Mission और आत्मनिर्भर ऊर्जा नीति दोनों के लिए महत्वपूर्ण योगदान देता है। यह तकनीक निम्नलिखित क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रभाव डाल सकती है
ऊर्जा लॉजिस्टिक्स लागत में कमी: पारंपरिक भंडारण और परिवहन की तुलना में LOHC प्रणाली में कम जोखिम, कम लागत और कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
सुरक्षा में सुधार: गैस को गैर-ज्वलनशील तरल प्रकार में परिवर्तित करने से सड़क, रेल और पाईपलाइन नेटवर्क पर सुरक्षा जोखिम काफी कम हो जाते हैं।
पर्यावरणीय प्रभाव: हाइड्रोजन के व्यापक उपयोग से कार्बन उत्सर्जन में कमी और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य के प्रति अग्रसरता में तेजी आएगी।
वैश्विक प्रतिस्पर्धा: इस तकनीक के साथ भारत ग्रीन हाइड्रोजन की आपूर्ति श्रृंखला में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।

सरकार की भूमिका और नीति समर्थन
भारत सरकार की National Green Hydrogen Mission ने पहले ही ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक राष्ट्रीय रूपरेखा तैयार कर रखी है। LOHC जैसी तकनीकों का समावेश इस मिशन को लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति क्षमता के क्षेत्र में मजबूती से आगे बढ़ाने में सहायता करेगा। इसके अतिरिक्त, आर्थिक प्रोत्साहन, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP), और नवाचार अनुदान जैसे उपाय भारत को एक वैश्विक हाइड्रोजन हब के रूप में उभारने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

क्या भारत बनेगा ग्लोबल हाइड्रोजन हब?
हाइड्रोजन ऊर्जा विश्व भर में अगले दशक में ऊर्जा संक्रमण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने जा रही है। कई विकसित देशों ने पहले ही हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था को अपनाने के लिए व्यापक नीति समर्थन और अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। LOHC जैसी तकनीकों के साथ भारत भी उच्च-दक्षता ऊर्जा नेटवर्क और लॉजिस्टिक्स प्रतिस्पर्धा में भाग ले सकता है।

नियम, निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर: आगे की राह क्या कहती है?
हालाँकि LOHC तकनीक ने पारंपरिक चुनौतियों का समाधान प्रदान किया है, इसके व्यापक औद्योगिक उत्पादन, लागत-प्रभाव मूल्यांकन, और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क इंटीग्रेशन पर अधिक परीक्षण और निवेश की आवश्यकता होगी। तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए मानकीकरण, नियामकीय अनुमोदन, और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे कदम महत्वपूर्ण होंगे।

ऊर्जा भविष्य की दिशा में एक प्रगतिशील कदम
MIT-WPU द्वारा विकसित LOHC प्रणाली न केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि है, बल्कि यह ऊर्जा लॉजिस्टिक्स, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भारत के दीर्घकालिक लक्ष्यों को साकार करने में एक निर्णायक भूमिका निभा सकती है। यह तकनीक भारत को ग्रीन हाइड्रोजन में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में अग्रसर कर सकती है और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में एक मजबूत आधार तैयार कर सकती है।

भविष्य की ऊर्जा प्रणाली में LOHC और इसी तरह की उन्नत तकनीकों का प्रभाव तब तक और बढ़ेगा जब इनका औद्योगिक लाभ, नीतिगत समर्थन और वैश्विक साझेदारी एक साथ मिलकर कार्य करेंगे, ताकि भारत ऊर्जा-निर्माण और ऊर्जा-लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में एक स्वायत्त और अग्रणी राष्ट्र के रूप में उभर सके।

Samvad 24 Office
Samvad 24 Office

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Get regular updates on your mail from Samvad 24 News