BRICS का विस्तार: थाइलैंड की सदस्यता की दावेदारी से बदलता भू-राजनीतिक समीकरण
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संवाद 24 संजीव सोमवंशी। दक्षिण-पूर्व एशिया की उभरती अर्थव्यवस्था थाइलैंड ने BRICS समूह में पूर्ण सदस्यता के लिए अपना औपचारिक दावा मजबूत कर दिया है। बैंकॉक ने जिस तरह भारत से विशेष समर्थन की अपील की है, वह यह संकेत देता है कि BRICS अब एक ऐसा बहुआयामी मंच बन चुका है जो न सिर्फ आर्थिक सहयोग का केंद्र है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन के पुनर्निर्माण का भी प्रमुख कारक बन गया है। थाइलैंड का यह कदम उस समय आया है, जब दुनिया अमेरिका, चीन और रूस के बीच बढ़ती ध्रुवीयता देख रही है, और विकासशील देशों के लिए BRICS एक व्यवहारिक और अधिक स्वतंत्र मंच के रूप में उभर रहा है।
थाइलैंड की सदस्यता की दावेदारी
थाइलैंड के विदेश मंत्रालय ने हालिया बयान में कहा है कि देश BRICS को ASEAN, APEC और BIMSTEC जैसे मंचों से जोड़ने वाला “कूटनीतिक पुल” बनने के लिए तैयार है। भू-रणनीतिक रूप से देखें तो थाइलैंड दक्षिण-पूर्व एशिया का केंद्रीय देश है, जो एशिया-प्रशांत व्यापार मार्गों, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
थाइलैंड यदि BRICS में आता है, तो समूह को तीन बड़े फायदे मिलेंगे –
- ASEAN के साथ सीधा कनेक्शन, जिससे व्यापार और लॉजिस्टिक सहयोग बढ़ेगा
- इंडो-पैसिफिक रणनीति में संतुलन बनाने की क्षमता
- पर्यटन, कृषि, डिजिटल अर्थव्यवस्था और ऑटोमोबाइल सेक्टर में निवेश का विस्तार
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि थाइलैंड भारत के साथ न सिर्फ ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंध साझा करता है, बल्कि वह BIMSTEC का प्रभावी सदस्य भी है। इसलिए उसका BRICS में प्रवेश भारत की “Act East Policy” को भी मजबूती देगा।

BRICS का विस्तार: वैश्विक दक्षिण की आवाज़ को मिल रही नई ताकत
BRICS ने हाल के वर्षों में अपने दायरे को तेजी से बढ़ाया है। 2024–25 में ईरान, मिस्र, यूएई, सऊदी अरब और इथियोपिया जैसे देश शामिल हुए, जिससे यह समूह अब तेल, ऊर्जा, वित्त और रणनीतिक व्यापार का बड़ा केंद्र बन चुका है।
BRICS विस्तार के तीन बड़े कारण:
- डॉलर पर निर्भरता कम करना
- न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) से सस्ता निवेश प्राप्त करना
- पश्चिमी दबावों के विकल्प के रूप में बहुध्रुवीय विश्व का निर्माण
थाइलैंड, इंडोनेशिया, वियतनाम, कजाखस्तान सहित कई देश खुलकर अपनी रुचि व्यक्त कर चुके हैं। इससे यह स्पष्ट है कि BRICS अब केवल पांच देशों का समूह नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण के लिए एक आर्थिक-राजनीतिक धुरी बन चुका है।
भारत की भूमिका: BRICS का संतुलन-स्तंभ
भारत इस पूरे विस्तार-प्रक्रिया में “बैलेंसिंग पावर” की भूमिका निभा रहा है। भारत रूस और चीन दोनों के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन उनकी नीतियों के अति-प्रभाव को संतुलित करता है। NDB के गठन से लेकर लोकल करेंसी ट्रेड की दिशा में भारत ने कई निर्णायक योगदान दिए हैं।
नए सदस्यों की एंट्री में भारत लोकतांत्रिक, विकास-उन्मुख और पारदर्शी देशों को प्राथमिकता देने की वकालत करता रहा है।
थाइलैंड का भारत से विशेष समर्थन मांगना इस बात का प्रमाण है कि BRICS में प्रवेश के लिए भारत अब एक “गेटकीपर” के रूप में देखा जा रहा है, जो चीन के भारी प्रभाव को नियंत्रित कर संतुलित विस्तार सुनिश्चित कर सकता है।
अमेरिका की अड़ंगेबाजी: BRICS की लोकप्रियता से बेचैनी क्यों?
थाइलैंड ने सदस्यता की घोषणा ऐसे समय में की है, जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों पर व्यापारिक दबाव बनाने या टैरिफ बढ़ाने की धमकी दे रहे हैं।
अमेरिका की चिंता के तीन प्रमुख कारण हैं –
- डॉलर की वैश्विक पकड़ कमजोर होने का डर
BRICS देशों द्वारा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की पहल से डॉलर की मोनोपॉली को चुनौती मिलती है। - एशिया-प्रशांत में अपने प्रभाव क्षेत्र की कमी
थाइलैंड, इंडोनेशिया, वियतनाम जैसे देश यदि अमेरिकी ब्लॉक से हटकर अधिक स्वतंत्र नीतियाँ अपनाते हैं तो वाशिंगटन की रणनीति कमजोर होती है। - चीन-रूस को नियंत्रित करने में कठिनाई
BRICS विस्तार का मतलब है कि चीन और रूस की आर्थिक एवं भू-रणनीतिक पकड़ मजबूत होगी, जिसे अमेरिका रोकना चाहता है।
इसी कारण अमेरिका पर्दे के पीछे कई देशों को BRICS से दूरी बनाए रखने की सलाह देता रहा है, लेकिन थाइलैंड का यह कदम बताता है कि अमेरिका की रणनीति अब प्रभावी नहीं रह गई।
BRICS–ASEAN–India: एशिया का नया शक्ति-त्रिकोण?
थाइलैंड की सदस्यता से BRICS को ASEAN के भीतर एक स्थायी रणनीतिक “एंकर” मिलेगा, जबकि भारत इस त्रिकोण का तीसरा और सबसे संतुलित नेतृत्वकारी स्तंभ बनेगा।
यह तीनों मिलकर –
- ग्लोबल ट्रेड रूट्स
- ऊर्जा सुरक्षा
- आपसी निवेश
- डिजिटल अर्थव्यवस्था
- पर्यटन और स्वास्थ्य सहयोग
को एक नई दिशा दे सकते हैं।
भारत के लिए यह एक बड़ा कूटनीतिक अवसर है, BRICS को चीन-प्रधान मंच से संतुलित और बहुध्रुवीय संगठन के रूप में विकसित करने का।
BRICS में थाइलैंड की दस्तक सिर्फ सदस्यता नहीं, बल्कि नई वैश्विक राजनीति का संकेत
थाइलैंड की BRICS सदस्यता की महत्वाकांक्षा यह दिखाती है कि दुनिया का भू-राजनीतिक मानचित्र तेजी से बदल रहा है। सुपरपावर मॉडल पुराना हो रहा है और इसके स्थान पर क्षेत्रीय शक्तियों का समूह-आधारित सहयोग उभर रहा है, जिसमें BRICS सबसे प्रभावी मंच के रूप में सामने आया है।
भारत की भूमिका इस पूरे बदलाव में निर्णायक है, वह न सिर्फ BRICS का “संतुलित चेहरा” है, बल्कि उस बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का भी प्रमुख निर्माता है जिसकी ओर दुनिया बढ़ रही है। थाइलैंड की दस्तक इस बात की पुष्टि करती है कि BRICS अब सिर्फ एक संगठन नहीं, बल्कि नए विश्व-व्यवस्था की दिशा निर्धारित करने वाला मंच बन चुका है।






