अहोई अष्टमी पर कब करें पूजा और कब खोलें व्रत? जानिए सही तारीख, शुभ मुहूर्त और जरूरी नियम

संवाद 24 डेस्क। कार्तिक मास में आने वाले प्रमुख व्रतों में अहोई अष्टमी का विशेष धार्मिक और पारिवारिक महत्व है। यह पर्व संतान के सुख, अच्छे स्वास्थ्य, लंबी आयु और उज्ज्वल भविष्य की कामना से जुड़ा हुआ है। इस दिन माताएं अहोई माता की पूजा-अर्चना करती हैं और अपनी संतान की खुशहाली के लिए निर्जला या अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपवास रखती हैं। करवा चौथ के चार दिन बाद आने वाला यह व्रत उत्तर भारत में विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। वर्ष 2026 में अहोई अष्टमी की तारीख को लेकर भी लोगों के मन में सवाल हैं। कोई 1 नवंबर को व्रत रखने की बात कर रहा है तो कोई 2 नवंबर को लेकर जानकारी तलाश रहा है। ऐसे में पंचांग के अनुसार सही तिथि, पूजा का शुभ समय, तारों के दर्शन और व्रत की परंपराओं को जानना जरूरी है। इस वर्ष अहोई अष्टमी का व्रत रविवार, 1 नवंबर 2026 को रखा जाएगा। इस दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि दोपहर में शुरू होगी और अगले दिन दोपहर तक रहेगी। उदया तिथि और व्रत की परंपरा के अनुसार 1 नवंबर को ही अहोई माता की पूजा की जाएगी। इस दिन महिलाएं सुबह से उपवास रखकर शाम को विधि-विधान से पूजा करती हैं। इसके बाद तारों को अर्घ्य देकर संतान की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

कब है अहोई अष्टमी 2026? जानें सही तारीख और अष्टमी तिथि
हिंदू पंचांग के अनुसार अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। यह पर्व दीपावली से लगभग आठ दिन पहले और करवा चौथ के चार दिन बाद आता है। वर्ष 2026 में करवा चौथ 29 अक्टूबर को मनाया गया है, जबकि अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर, रविवार को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि का आरंभ 1 नवंबर 2026 को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट पर होगा। इसका समापन 2 नवंबर 2026 को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट पर होगा। चूंकि 1 नवंबर को ही व्रत की पूजा और संध्या के समय धार्मिक अनुष्ठान करने की परंपरा है, इसलिए इसी दिन अहोई अष्टमी मनाई जाएगी। अहोई अष्टमी को अहोई आठे के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर भारत के कई हिस्सों में इसे विशेष रूप से संतान की लंबी आयु और परिवार की खुशहाली के लिए मनाया जाता है। इस दिन अहोई माता की पूजा के साथ-साथ तारों की पूजा का भी विशेष महत्व माना गया है।

अहोई अष्टमी 2026 पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?
अहोई अष्टमी पर संध्या के समय पूजा करने का विशेष विधान है। मान्यता है कि सूर्यास्त के आसपास अहोई माता की पूजा करने से संतान के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। इस दौरान महिलाएं माता के सामने दीपक जलाती हैं, रोली, अक्षत, फूल और मिठाई अर्पित करती हैं तथा व्रत कथा का पाठ करती हैं। वर्ष 2026 में नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार अहोई अष्टमी की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 36 मिनट से शाम 6 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। पूजा की अवधि लगभग 1 घंटा 18 मिनट है। वहीं, कुछ अन्य पंचांग गणनाओं में पूजा का समय शाम 4 बजकर 59 मिनट से 6 बजकर 15 मिनट तक भी बताया गया है। इस अंतर का कारण स्थानीय सूर्यास्त और पंचांग गणना में अंतर होना है। इसलिए व्रत रखने वाली महिलाओं को अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का समय देखना चाहिए। तारों के दर्शन का समय भी इस पर्व में महत्वपूर्ण है। नई दिल्ली में 1 नवंबर को शाम लगभग 6 बजे तारे दिखाई देने का अनुमान है। हालांकि मौसम, बादलों और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के कारण वास्तविक दर्शन का समय कुछ आगे-पीछे हो सकता है।

अहोई अष्टमी पर तारों को अर्घ्य देने की परंपरा क्यों है खास?
अहोई अष्टमी की सबसे प्रमुख परंपराओं में तारों का दर्शन और उन्हें अर्घ्य देना शामिल है। करवा चौथ में महिलाएं चंद्रमा को देखकर व्रत खोलती हैं, जबकि अहोई अष्टमी में अधिकांश परंपराओं के अनुसार तारों के दर्शन के बाद उपवास पूरा किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तारे देवताओं और सकारात्मक ऊर्जा के प्रतीक माने जाते हैं। अहोई अष्टमी पर तारों को जल अर्पित करके माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुरक्षित भविष्य की प्रार्थना करती हैं। पूजा के बाद तांबे या अन्य स्वच्छ पात्र में जल लेकर तारों की दिशा में अर्घ्य दिया जाता है। कुछ परिवारों में तारों को दूध और जल मिलाकर अर्घ्य देने की भी परंपरा है। कुछ क्षेत्रों और परिवारों में अहोई अष्टमी का व्रत चंद्रमा के दर्शन के बाद खोलने की मान्यता भी प्रचलित है। हालांकि चंद्रमा का उदय काफी देर से होता है, इसलिए उत्तर भारत में सामान्यतः तारों के दर्शन के बाद व्रत खोलने की परंपरा अधिक प्रचलित है। इस दिन व्रत का समापन किस प्रकार करना है, यह परिवार की परंपरा और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तय किया जाता है।

अहोई अष्टमी की पूजा के लिए कौन-कौन सी सामग्री जुटाएं?
अहोई अष्टमी की पूजा करने से पहले सभी आवश्यक सामग्री एकत्र कर लेना अच्छा रहता है। इससे पूजा के दौरान किसी वस्तु की कमी नहीं होती और धार्मिक अनुष्ठान व्यवस्थित ढंग से पूरे किए जा सकते हैं। पूजा के लिए अहोई माता का चित्र या दीवार पर बनाया गया पारंपरिक चित्र, लकड़ी की चौकी, लाल या पीला कपड़ा, रोली, अक्षत, हल्दी, फूल, माला, दीपक, घी, धूप, अगरबत्ती, कलश, स्वच्छ जल, फल, मिठाई और पूजा की थाली रखी जा सकती है। इसके अलावा तारों को अर्घ्य देने के लिए एक पात्र में जल रखना चाहिए। कई परिवारों में पूजा के दौरान चांदी की अहोई, जिसे स्याऊ माता से भी जोड़ा जाता है, रखने की परंपरा है। इसे परिवार की परंपरा के अनुसार पूजा में शामिल किया जाता है। कुछ स्थानों पर गेहूं, चावल और अन्य अनाज भी पूजा में रखे जाते हैं। पूजा सामग्री की सूची अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार बदल सकती है।

अहोई अष्टमी की पूजा विधि: इस तरह करें अहोई माता का पूजन
अहोई अष्टमी के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद अहोई माता का स्मरण करके संतान की सुख-समृद्धि के लिए व्रत का संकल्प लिया जाता है। परंपरागत रूप से कई महिलाएं पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं, जबकि कुछ महिलाएं अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार या जल ग्रहण करके व्रत करती हैं। शाम को पूजा स्थल की सफाई करके वहां चौकी स्थापित की जाती है। चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर अहोई माता का चित्र रखा जाता है। पारंपरिक रीति में दीवार पर अहोई माता और उनके साथ साही या उसके बच्चों का चित्र भी बनाया जाता है। इसके बाद माता के सामने दीपक जलाया जाता है और रोली, अक्षत, फूल तथा अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा के दौरान अहोई माता को फल और मिठाई का भोग लगाया जाता है। इसके बाद अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनी या पढ़ी जाती है। कथा के बाद संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, शिक्षा, सुख और उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थना की जाती है। संध्या के समय जब आसमान में तारे दिखाई देने लगें, तब महिलाएं तारों को अर्घ्य देती हैं। इसके बाद परिवार की परंपरा के अनुसार व्रत का पारण किया जाता है। कुछ परिवारों में संतान के हाथों से पूजा की सामग्री या दान भी कराया जाता है।

अहोई अष्टमी की व्रत कथा: क्यों की जाती है अहोई माता की पूजा?
अहोई अष्टमी से जुड़ी एक प्रचलित लोककथा के अनुसार प्राचीन समय में एक साहूकार की पत्नी अपने सात पुत्रों के साथ रहती थी। दीपावली से पहले घर की मरम्मत और सफाई के लिए वह मिट्टी लेने जंगल गई। वहां वह मिट्टी खोदने लगी। इसी दौरान अनजाने में उसकी खुरपी से साही के एक बच्चे को चोट लग गई और उसकी मृत्यु हो गई।
इस घटना से दुखी साही ने साहूकार की पत्नी को श्राप दिया कि उसके भी पुत्रों का सुख छिन जाएगा। लोककथा के अनुसार कुछ समय बाद उसके सातों पुत्रों की मृत्यु हो गई। अपने बच्चों को खोने के दुख में वह अत्यंत व्याकुल रहने लगी और उसे अपनी गलती का पश्चाताप होने लगा। एक दिन उसने अपनी पीड़ा अन्य महिलाओं को बताई। महिलाओं ने उसे अहोई माता की आराधना करने और अपनी भूल के लिए प्रायश्चित करने की सलाह दी। इसके बाद साहूकार की पत्नी ने श्रद्धा के साथ अहोई माता का व्रत और पूजन किया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने उसे संतान सुख का आशीर्वाद दिया। मान्यता है कि माता की कृपा से उसके पुत्रों को दोबारा जीवन प्राप्त हुआ।

अहोई अष्टमी का धार्मिक महत्व क्या है?
हिंदू धर्म में अहोई अष्टमी को मातृत्व, संतान के प्रति प्रेम और पारिवारिक कल्याण का पर्व माना जाता है। इस दिन महिलाएं केवल अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए ही नहीं, बल्कि उसके अच्छे स्वास्थ्य, सुखी जीवन, सफलता और उज्ज्वल भविष्य के लिए भी प्रार्थना करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अहोई माता को संतान की रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। ऐसा विश्वास है कि सच्चे मन और श्रद्धा से माता की आराधना करने पर परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। यह व्रत माताओं को अपनी संतान के प्रति जिम्मेदारियों और प्रेम का भाव भी याद दिलाता है।
अहोई अष्टमी का पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह परिवार के सदस्यों को एक साथ जोड़ने और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को आगे बढ़ाने का अवसर भी प्रदान करता है। इस दिन घरों में पूजा, कथा और धार्मिक गतिविधियों के माध्यम से पारिवारिक एकता का वातावरण बनता है।

अहोई अष्टमी और करवा चौथ में क्या है अंतर?
करवा चौथ और अहोई अष्टमी दोनों ही महिलाओं के प्रमुख व्रत हैं, लेकिन इनका उद्देश्य और पूजा की परंपरा अलग-अलग है। करवा चौथ का व्रत मुख्य रूप से पति की लंबी आयु और वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है। इसमें महिलाएं दिनभर उपवास रखने के बाद रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। इसके विपरीत अहोई अष्टमी का व्रत संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना के लिए रखा जाता है। इसमें अहोई माता की पूजा की जाती है और तारों को अर्घ्य देने की परंपरा है। करवा चौथ के चार दिन बाद अहोई अष्टमी आने के कारण दोनों पर्वों का संबंध कार्तिक मास की धार्मिक परंपराओं से भी जुड़ता है। एक अन्य महत्वपूर्ण अंतर यह है कि अहोई अष्टमी का व्रत केवल पुत्रों के लिए ही सीमित नहीं माना जाना चाहिए। वर्तमान समय में माताएं अपनी बेटियों और बेटों, दोनों के अच्छे स्वास्थ्य, सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य के लिए यह व्रत रखती हैं।

अहोई अष्टमी पर इन बातों का रखें विशेष ध्यान
अहोई अष्टमी का व्रत श्रद्धा और नियमों के साथ किया जाता है। इस दिन पूजा स्थल की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। अहोई माता की पूजा करते समय मन में सकारात्मक विचार रखने और किसी के प्रति बुरा भाव न रखने की परंपरा है। इस दिन किसी भी जीव को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। अहोई अष्टमी की प्रचलित कथा में साही के बच्चे को अनजाने में चोट लगने का प्रसंग आता है। इसलिए इस पर्व का एक महत्वपूर्ण संदेश जीव-जंतुओं के प्रति दया और करुणा रखना भी है। व्रत के दौरान अपनी शारीरिक क्षमता का ध्यान रखना भी जरूरी है। निर्जला उपवास करना हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होता। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों, मधुमेह से पीड़ित लोगों या नियमित दवाएं लेने वालों को बिना चिकित्सकीय सलाह के कठिन उपवास नहीं रखना चाहिए। आवश्यकता के अनुसार फलाहार और जल ग्रहण किया जा सकता है। धार्मिक आस्था के साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है।

संतान की खुशहाली के लिए श्रद्धा से करें अहोई माता की आराधना
अहोई अष्टमी का पर्व भारतीय संस्कृति में मां और संतान के बीच अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। इस दिन माताएं पूरे मन से अहोई माता की पूजा करती हैं और अपनी संतान के जीवन में आने वाली परेशानियों को दूर करने की प्रार्थना करती हैं। वर्ष 2026 में यह पर्व 1 नवंबर, रविवार को मनाया जाएगा। अष्टमी तिथि दोपहर 2 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 2 नवंबर को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार पूजा का शुभ समय शाम 5 बजकर 36 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट तक है। शाम लगभग 6 बजे तारों के दर्शन का अनुमान है। अलग-अलग शहरों में पूजा और तारों के दर्शन के समय में अंतर हो सकता है। इसलिए अहोई अष्टमी का व्रत रखने वाली महिलाओं को अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का समय निर्धारित करना चाहिए। श्रद्धा, विश्वास और परिवार की परंपराओं के साथ किया गया यह पर्व मातृत्व के प्रेम और संतान के प्रति मंगलकामना को अभिव्यक्त करने का विशेष अवसर है।

Geeta Singh
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