
संवाद 24 डेस्क। नवंबर 2026 का महीना धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण रहने वाला है। इस महीने हिंदू पंचांग के कार्तिक और मार्गशीर्ष मास से जुड़े कई प्रमुख व्रत और त्योहार मनाए जाएंगे। दीपावली, धनतेरस, नरक चतुर्दशी, गोवर्धन पूजा, भाई दूज, छठ पूजा, देवउठनी एकादशी, तुलसी विवाह और देव दीपावली जैसे पर्व इस महीने की धार्मिक रौनक बढ़ाएंगे। इसके अलावा अहोई अष्टमी, रमा एकादशी, गोपाष्टमी, अक्षय नवमी और कार्तिक पूर्णिमा जैसे महत्वपूर्ण अवसर भी आएंगे।
त्योहारों के इस सिलसिले में नवंबर का पहला पखवाड़ा विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहेगा। महीने की शुरुआत संतान की सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना से जुड़े अहोई अष्टमी व्रत से होगी। इसके बाद धनतेरस और दीपावली के साथ दीपोत्सव की शुरुआत होगी। वहीं महीने के दूसरे हिस्से में छठ महापर्व, देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह जैसे धार्मिक आयोजन श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखेंगे। ऐसे में आइए जानते हैं नवंबर 2026 में पड़ने वाले प्रमुख व्रत-त्योहारों की तारीखें, धार्मिक मान्यताएं और उनका महत्व।
नवंबर 2026 के व्रत-त्योहारों की पूरी सूची, एक नजर में
तारीख | दिन | व्रत और त्योहार
1 नवंबर | रविवार | अहोई अष्टमी, राधा कुंड स्नान, कालाष्टमी
5 नवंबर | गुरुवार | रमा एकादशी, गोवत्स द्वादशी
6 नवंबर | शुक्रवार | धनतेरस, धनत्रयोदशी, यम दीपदान, प्रदोष व्रत
7 नवंबर | शनिवार | काली चौदस, हनुमान पूजा, मासिक शिवरात्रि
8 नवंबर | रविवार | नरक चतुर्दशी, दीपावली, लक्ष्मी पूजा, काली पूजा
9 नवंबर | सोमवार | कार्तिक अमावस्या
10 नवंबर | मंगलवार | गोवर्धन पूजा, अन्नकूट, गुजराती नववर्ष
11 नवंबर | बुधवार | भाई दूज, यम द्वितीया, चित्रगुप्त पूजा
13 नवंबर | शुक्रवार | छठ पूजा का नहाय-खाय, लाभ चतुर्थी 14 नवंबर | शनिवार | छठ पूजा का खरना, लाभ पंचमी
15 नवंबर | रविवार | छठ पूजा का संध्या अर्घ्य, स्कंद षष्ठी 16 नवंबर | सोमवार | छठ पूजा का उषा अर्घ्य, वृश्चिक संक्रांति
17 नवंबर | मंगलवार | गोपाष्टमी, मासिक दुर्गाष्टमी
18 नवंबर | बुधवार | अक्षय नवमी, आंवला नवमी, जगद्धात्री पूजा
20 नवंबर | शुक्रवार | देवउठनी एकादशी, प्रबोधिनी एकादशी 21 नवंबर | शनिवार | तुलसी विवाह, योगेश्वर द्वादशी 22 नवंबर | रविवार | रवि प्रदोष व्रत
23 नवंबर | सोमवार | वैकुंठ चतुर्दशी 24 नवंबर | मंगलवार | देव दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, गुरु नानक जयंती |
25 नवंबर | बुधवार | मार्गशीर्ष मास प्रारंभ, रोहिणी व्रत
27 नवंबर | शुक्रवार | गणाधिप संकष्टी चतुर्थी
महीने की शुरुआत होगी अहोई अष्टमी से, संतान की खुशहाली के लिए रखा जाएगा व्रत
नवंबर महीने का पहला प्रमुख पर्व 1 नवंबर को अहोई अष्टमी के रूप में मनाया जाएगा। यह व्रत विशेष रूप से माताओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना से व्रत रखती हैं। उत्तर भारत में इस पर्व का विशेष महत्व है। महिलाएं सुबह से व्रत रखकर शाम को अहोई माता की पूजा करती हैं। पूजा के दौरान अहोई माता की कथा सुनी जाती है और तारों को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोला जाता है। इसी दिन कालाष्टमी और राधा कुंड स्नान का भी धार्मिक महत्व रहेगा। कालाष्टमी पर भगवान शिव के रौद्र स्वरूप कालभैरव की पूजा की जाती है।
5 नवंबर को रमा एकादशी, भगवान विष्णु की पूजा का विशेष अवसर
5 नवंबर को कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी मनाई जाएगी। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं। मान्यता है कि रमा एकादशी का व्रत करने से पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करने और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने की परंपरा भी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत में सात्विक आहार, संयम और भक्ति का विशेष महत्व होता है।
6 नवंबर को धनतेरस, 7 नवंबर को छोटी दिवाली से जुड़े आयोजन
दीपोत्सव की शुरुआत 6 नवंबर को धनतेरस से होगी। इसे धनत्रयोदशी भी कहा जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर मनाए जाने वाले इस पर्व का संबंध धन, आरोग्य और समृद्धि से है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और आरोग्य का देवता माना जाता है। इस दिन उनकी पूजा के साथ माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की आराधना भी की जाती है। परंपरा के अनुसार, धनतेरस पर सोना, चांदी, बर्तन और अन्य उपयोगी वस्तुओं की खरीदारी शुभ मानी जाती है। शाम को यमराज के नाम से दीपदान करने की भी परंपरा है।
7 नवंबर को काली चौदस, हनुमान पूजा और मासिक शिवरात्रि के धार्मिक आयोजन होंगे। काली चौदस को कुछ क्षेत्रों में नरक चतुर्दशी से जुड़ी परंपराओं के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन मां काली की पूजा की जाती है। वहीं, हनुमान भक्त विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। मासिक शिवरात्रि पर भगवान शिव की आराधना और रात्रि जागरण का महत्व माना जाता है।
8 नवंबर को दीपावली, एक ही दिन मनाई जाएगी नरक चतुर्दशी और लक्ष्मी पूजा
8 नवंबर को इस वर्ष दीपावली का प्रमुख पर्व मनाया जाएगा। कार्तिक अमावस्या पर आने वाला यह त्योहार अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की खुशी में दीप जलाने की परंपरा से दीपावली का विशेष संबंध बताया जाता है। शाम के समय घरों और मंदिरों में दीप प्रज्वलित किए जाते हैं। माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। मान्यता है कि दीपावली की रात विधि-विधान से लक्ष्मी-गणेश पूजन करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है।
इस वर्ष 8 नवंबर को नरक चतुर्दशी और मुख्य दीपावली एक ही दिन पड़ रही हैं। नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन नरकासुर नामक असुर का वध करके हजारों बंदियों को मुक्त कराया था। इस दिन सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करने की परंपरा है। दीपावली के अवसर पर मां काली की पूजा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी यह दिन महत्वपूर्ण रहेगा।
9 नवंबर को कार्तिक अमावस्या से जुड़े स्नान, दान और धार्मिक अनुष्ठानों का महत्व रहेगा। श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान करके जरूरतमंदों को दान करते हैं।
10 नवंबर को गोवर्धन पूजा, 11 नवंबर को भाई दूज से बढ़ेगी उत्सव की रौनक
दीपावली के बाद 10 नवंबर को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का पर्व मनाया जाएगा। यह त्योहार भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र की पूजा के स्थान पर प्रकृति और गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का संदेश दिया था। जब इंद्र ने क्रोधित होकर ब्रज में भारी वर्षा की, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की थी। इसी घटना की स्मृति में गोवर्धन पूजा की जाती है।
इस दिन घरों और मंदिरों में अन्नकूट का आयोजन होता है। भगवान श्रीकृष्ण को विभिन्न प्रकार के पकवानों और व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। कई स्थानों पर गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाकर उसकी पूजा की जाती है। गायों की सेवा और पूजा को भी इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। गुजरात में इसी दिन गुजराती नववर्ष मनाने की परंपरा भी है।
11 नवंबर को भाई दूज और यम द्वितीया मनाई जाएगी। यह पर्व भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का प्रतीक है। इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक लगाकर उनकी लंबी आयु और सुखी जीवन की कामना करती हैं। भाई अपनी बहनों को उपहार देकर उनके प्रति प्रेम और सम्मान प्रकट करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यमराज अपनी बहन यमुना के घर इसी दिन गए थे। यमुना ने उनका स्वागत और सत्कार किया था। तभी से भाई दूज मनाने की परंपरा प्रचलित हुई। इस दिन चित्रगुप्त पूजा का भी विशेष महत्व है।
13 से 16 नवंबर तक चलेगा छठ महापर्व, सूर्य उपासना का दिखेगा विशेष महत्व
नवंबर के मध्य में छठ महापर्व की रौनक देखने को मिलेगी। यह पर्व विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। हालांकि, अब देश के लगभग सभी प्रमुख शहरों में भी छठ पूजा की व्यापक तैयारियां देखने को मिलती हैं। यह पर्व भगवान सूर्य और छठी मैया को समर्पित है। इसमें प्रकृति, जल, सूर्य और परिवार की खुशहाली के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।
चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व की शुरुआत 13 नवंबर को नहाय-खाय से होगी। इस दिन व्रती स्नान करके शुद्ध और सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। 14 नवंबर को खरना मनाया जाएगा। इस दिन व्रती पूरे दिन उपवास रखने के बाद शाम को पूजा करते हैं और गुड़ की खीर तथा रोटी का प्रसाद ग्रहण करते हैं। इसके बाद लगभग 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है।
15 नवंबर को छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण चरण संध्या अर्घ्य होगा। इस दिन व्रती नदी, तालाब या निर्धारित जलाशय के किनारे पहुंचकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। 16 नवंबर की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ छठ महापर्व का समापन होगा। इस दौरान बांस की टोकरी, सूप, फल, ठेकुआ और अन्य पारंपरिक प्रसाद का विशेष महत्व रहता है। छठ पूजा में स्वच्छता, पवित्रता, अनुशासन और प्रकृति के प्रति सम्मान को विशेष स्थान दिया गया है।
गोपाष्टमी और अक्षय नवमी पर होगी विशेष पूजा-अर्चना
17 नवंबर को गोपाष्टमी मनाई जाएगी। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण और गायों से जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने पहली बार गायों को चराने का कार्य शुरू किया था। इसलिए इस दिन गायों की पूजा, सेवा और उन्हें भोजन कराने की परंपरा है। विशेष रूप से मथुरा और वृंदावन में गोपाष्टमी का पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इसी दिन मासिक दुर्गाष्टमी भी पड़ेगी, जिस पर मां दुर्गा की आराधना की जाएगी।
18 नवंबर को अक्षय नवमी या आंवला नवमी मनाई जाएगी। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर आने वाले इस पर्व का विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करने की परंपरा है। मान्यता है कि आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का निवास होता है। श्रद्धालु आंवले के पेड़ के नीचे पूजा-पाठ करते हैं और भोजन ग्रहण करते हैं। इस दिन दान-पुण्य और धार्मिक कार्यों को भी शुभ माना जाता है। इसी अवसर पर कुछ क्षेत्रों में जगद्धात्री पूजा भी आयोजित की जाती है।
20 नवंबर को देवउठनी एकादशी, फिर शुरू होंगे मांगलिक कार्य
20 नवंबर को देवउठनी एकादशी मनाई जाएगी। इसे देवोत्थान एकादशी और प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में इस दिन का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागते हैं। इसी कारण इसे देवउठनी एकादशी कहा जाता है।
इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं। कई घरों में भगवान विष्णु के प्रतीक शालिग्राम की पूजा की जाती है। तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाकर विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। मान्यता है कि देवउठनी एकादशी के बाद विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है। हालांकि, इन आयोजनों के लिए अलग-अलग शुभ मुहूर्त और पंचांग का विचार करना जरूरी होता है।
21 नवंबर को तुलसी विवाह, 24 नवंबर को देव दीपावली और कार्तिक पूर्णिमा
21 नवंबर को तुलसी विवाह का आयोजन किया जाएगा। इस दिन माता तुलसी का विवाह भगवान विष्णु के स्वरूप शालिग्राम के साथ कराने की परंपरा है। इसे हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ माना जाता है। घरों और मंदिरों में तुलसी के पौधे को सजाया जाता है। विधि-विधान से पूजा करके विवाह के पारंपरिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि तुलसी विवाह कराने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और परिवार में समृद्धि आती है।
22 नवंबर को रवि प्रदोष व्रत रखा जाएगा। प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। इस दिन शाम के समय भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने का विशेष महत्व माना जाता है। 23 नवंबर को वैकुंठ चतुर्दशी मनाई जाएगी। इस दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव की संयुक्त आराधना का विशेष महत्व है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, इस अवसर पर दोनों देवताओं की पूजा करने से भक्तों को विशेष पुण्य प्राप्त होता है।
24 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा, देव दीपावली और गुरु नानक जयंती का पावन संयोग रहेगा। कार्तिक पूर्णिमा को हिंदू धर्म में स्नान, दान और दीपदान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वाराणसी में देव दीपावली का पर्व विशेष आकर्षण का केंद्र होता है। इस दिन गंगा के घाटों पर हजारों दीप जलाए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि देव दीपावली के दिन देवता स्वयं पृथ्वी पर आकर गंगा के घाटों पर दीपोत्सव मनाते हैं।
इसी दिन सिख धर्म के प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी की जयंती भी मनाई जाएगी। इसे प्रकाश पर्व के नाम से भी जाना जाता है। गुरुद्वारों में कीर्तन, अरदास, प्रभात फेरी और लंगर का आयोजन होता है। गुरु नानक देव जी ने समाज को समानता, सेवा, प्रेम और मानवता का संदेश दिया था। उनका जीवन और उनकी शिक्षाएं आज भी लोगों को सद्भाव और सच्चाई के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं।
27 नवंबर को गणाधिप संकष्टी चतुर्थी, भगवान गणेश की होगी आराधना
नवंबर महीने के अंतिम प्रमुख व्रतों में 27 नवंबर को गणाधिप संकष्टी चतुर्थी शामिल है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और भक्तों को सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखकर भगवान गणेश की पूजा करते हैं। शाम को चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलने की परंपरा है। महीने के अंतिम सप्ताह में मार्गशीर्ष मास से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों की भी शुरुआत हो चुकी होगी।
नवंबर में त्योहारों की तैयारी से पहले जान लें पंचांग से जुड़ी जरूरी बातें
नवंबर 2026 का महीना दीपोत्सव से लेकर सूर्य उपासना और देव दीपावली तक अनेक धार्मिक अवसर लेकर आ रहा है। इस दौरान कई पर्व ऐसे हैं, जिनका संबंध परिवार, संतान, भाई-बहन, प्रकृति और सामाजिक सद्भाव से है। यही कारण है कि इन त्योहारों का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि ये भारतीय संस्कृति और पारिवारिक परंपराओं को भी मजबूत बनाते हैं।
हालांकि, व्रत और त्योहारों की तारीख निर्धारित करते समय तिथि, सूर्योदय, सूर्यास्त और स्थानीय पंचांग का विशेष ध्यान रखना चाहिए। कई बार चंद्र तिथि अंग्रेजी कैलेंडर की दो तारीखों में फैली होती है। ऐसे में अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा और व्रत की परंपरा के अनुसार तारीख में अंतर दिखाई दे सकता है। विशेष रूप से दीपावली, नरक चतुर्दशी, छठ पूजा और देवउठनी एकादशी के लिए अपने शहर के पंचांग के अनुसार पूजा का समय और व्रत संबंधी नियम अवश्य देख लें।






