
संवाद 24 डेस्क। मनुष्य के जीवन में ज्ञान, शक्ति, सफलता और संपन्नता का अपना महत्त्व है, लेकिन इन सभी गुणों को मानवीय गरिमा प्रदान करने वाला तत्त्व करुणा है। किसी दूसरे व्यक्ति के दुख को समझना, उसकी पीड़ा के प्रति संवेदनशील होना और यथासंभव उसे दूर करने का प्रयास करना करुणा की मूल भावना है। जब यह भावना केवल मन में उठने वाले विचार तक सीमित न रहकर व्यक्ति के आचरण, व्यवहार और जीवन-दृष्टि का हिस्सा बन जाती है, तब इसे एक साधना का रूप दिया जा सकता है। इसी व्यापक संदर्भ में करुणा योग को समझा जाता है।
करुणा योग का सामान्य अर्थ है अपने भीतर दया, सहानुभूति, मैत्री और संवेदनशीलता को विकसित करते हुए जीवन जीने का अभ्यास। यह व्यक्ति को केवल अपने सुख-दुख तक सीमित रहने के बजाय दूसरों के अनुभवों को भी महत्त्व देना सिखाता है। इसके केंद्र में यह विचार है कि आध्यात्मिक विकास केवल एकांत में ध्यान करने या धार्मिक अनुष्ठान करने से ही नहीं, बल्कि अपने दैनिक व्यवहार में मानवीय मूल्यों को स्थान देने से भी होता है।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि करुणा योग कोई एक सर्वमान्य, निश्चित शारीरिक आसनों वाला योग-क्रम नहीं है। अलग-अलग आध्यात्मिक परंपराओं में करुणा, मैत्री-भावना, ध्यान और सेवा के अभ्यास अलग रूपों में मिलते हैं। इसलिए करुणा योग को करुणा-आधारित साधना और जीवन-पद्धति के व्यापक अर्थ में समझना अधिक उचित है।
करुणा और दया में क्या अंतर है? भावना से आगे बढ़कर कर्म तक पहुँचने का मार्ग
दया और करुणा को अक्सर एक ही अर्थ में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन दोनों के बीच एक सूक्ष्म अंतर समझना उपयोगी है। दया किसी की कठिन परिस्थिति देखकर उत्पन्न होने वाली भावना हो सकती है, जबकि करुणा में उसकी पीड़ा को समझने के साथ-साथ सहायता करने की प्रेरणा भी शामिल होती है। दया में कभी-कभी व्यक्ति स्वयं को दूसरे से अधिक सक्षम या श्रेष्ठ समझ सकता है, लेकिन परिपक्व करुणा दूसरे व्यक्ति की गरिमा और समानता को स्वीकार करती है।
उदाहरण के लिए, सड़क पर किसी जरूरतमंद को देखकर दुख महसूस करना संवेदना है। उसकी परिस्थिति को समझना, उसकी आवश्यकता के अनुसार सहायता करना और उसे सम्मानपूर्वक संबोधित करना करुणा का अधिक व्यापक रूप है। इसी तरह, किसी विद्यार्थी को पढ़ाई में कठिनाई होने पर उसका उपहास करने के बजाय उसकी परेशानी समझना और उसे सीखने में मदद करना भी करुणापूर्ण व्यवहार है।
करुणा योग व्यक्ति को यह समझने में सहायता करता है कि सहायता का अर्थ हमेशा किसी की समस्या को तुरंत समाप्त कर देना नहीं होता। कई बार किसी की बात धैर्य से सुनना, उसे निर्णय लेने की स्वतंत्रता देना या कठिन समय में उसके साथ खड़े रहना भी महत्त्वपूर्ण होता है। इस प्रकार करुणा व्यक्ति को भावनात्मक संवेदनशीलता के साथ विवेकपूर्ण कर्म करना सिखाती है।
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में करुणा का स्थान
भारतीय आध्यात्मिक चिंतन में करुणा को मानवीय जीवन का महत्त्वपूर्ण गुण माना गया है। योग, बौद्ध दर्शन, जैन दर्शन और अनेक भक्ति परंपराओं में जीवों के प्रति संवेदनशीलता, अहिंसा, मैत्री और परोपकार को विशेष स्थान प्राप्त है। यद्यपि इन परंपराओं की दार्शनिक मान्यताएँ और साधना-पद्धतियाँ अलग-अलग हैं, फिर भी दूसरों के प्रति अनावश्यक हिंसा और क्रूरता से बचने का विचार इनमें महत्त्वपूर्ण रूप से दिखाई देता है।
पतंजलि के योगसूत्र में चित्त को शांत और संतुलित रखने के लिए मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा के भावों का उल्लेख मिलता है। सुखी व्यक्तियों के प्रति मैत्री, दुखी व्यक्तियों के प्रति करुणा, सद्गुणी व्यक्तियों के प्रति प्रसन्नता और अनुचित आचरण करने वालों के प्रति विवेकपूर्ण तटस्थता का अभ्यास मानसिक संतुलन के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। यह दृष्टिकोण बताता है कि व्यक्ति की आंतरिक शांति का संबंध उसके भावनात्मक व्यवहार से भी है।
बौद्ध परंपरा में करुणा का विशेष महत्त्व है। वहाँ करुणा का आशय प्राणियों के दुख को कम करने की कामना से जुड़ा है, जबकि मैत्री का संबंध उनके कल्याण की भावना से है। जैन दर्शन में अहिंसा और जीवों के प्रति संवेदनशीलता केंद्रीय सिद्धांतों में शामिल हैं। भक्ति परंपराओं में भी सेवा, प्रेम और परोपकार को आध्यात्मिक जीवन के महत्त्वपूर्ण अंग के रूप में देखा गया है।
इन विविध परंपराओं से यह समझ विकसित होती है कि करुणा केवल भावुकता नहीं, बल्कि स्वयं के विचारों, प्रतिक्रियाओं और व्यवहार को अधिक सजग बनाने का अभ्यास भी है।
करुणा योग का मूल आधार: स्वयं को समझना भी है जरूरी
दूसरों की पीड़ा को समझने से पहले अपने मन की प्रतिक्रियाओं को पहचानना उपयोगी होता है। कभी-कभी हम किसी दुखी व्यक्ति की बात सुनते हुए अधीर हो जाते हैं, तुरंत सलाह देने लगते हैं या उसकी परिस्थिति की तुलना अपने अनुभवों से करने लगते हैं। कई बार दूसरों की कठिनाइयों को समझने के बजाय हम उन्हें उनकी गलतियों का परिणाम मानकर दोषी ठहरा देते हैं।
करुणा योग का अभ्यास ऐसी प्रतिक्रियाओं को पहचानने और उनके स्थान पर अधिक सजग दृष्टिकोण विकसित करने का अवसर देता है। इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति हर व्यवहार को सही मानने लगे। बल्कि वह व्यक्ति और उसके व्यवहार के बीच अंतर समझने का प्रयास करता है। किसी के गलत कार्य का विरोध करते हुए भी उसके साथ अमानवीय व्यवहार से बचा जा सकता है।
आत्मनिरीक्षण के दौरान व्यक्ति अपने भीतर ईर्ष्या, क्रोध, असुरक्षा, भय और पूर्वाग्रह जैसी भावनाओं को पहचान सकता है। जब इन भावनाओं की उपस्थिति स्वीकार की जाती है, तब उन पर विवेकपूर्ण प्रतिक्रिया देना आसान हो सकता है। इस तरह करुणा का विकास केवल दूसरों के प्रति व्यवहार सुधारने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आत्मबोध की प्रक्रिया को भी गहरा करता है।
करुणा ध्यान: मन को संवेदनशील बनाने की एक सरल विधि
करुणा योग में ध्यान को उपयोगी अभ्यास के रूप में अपनाया जा सकता है। इसका उद्देश्य मन को जबरन विचारों से खाली करना नहीं, बल्कि अपने और दूसरों के प्रति शुभभावना विकसित करना है। नियमित अभ्यास के लिए शांत स्थान पर बैठकर कुछ समय अपनी श्वास पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है।
सबसे पहले शरीर को सहज अवस्था में रखें। आँखें बंद करना चाहें तो बंद कर सकते हैं, अन्यथा दृष्टि को किसी शांत स्थान पर टिकाएँ। कुछ मिनट तक स्वाभाविक श्वास के आने-जाने को महसूस करें। श्वास को नियंत्रित करने या किसी विशेष लय में लेने की आवश्यकता नहीं है। जब ध्यान भटके, तो स्वयं को दोष देने के बजाय उसे धीरे से श्वास पर वापस ले आएँ।
इसके बाद मन में अपने लिए शुभकामना उत्पन्न करें। उदाहरण के लिए, मन ही मन कह सकते हैं—मैं स्वस्थ और सुरक्षित रहूँ, मेरा मन शांत रहे और मैं कठिनाइयों का सामना विवेक से कर सकूँ। फिर यही शुभभावना किसी प्रिय व्यक्ति के लिए उत्पन्न करें। धीरे-धीरे इसे किसी परिचित, किसी अनजान व्यक्ति और व्यापक रूप से सभी प्राणियों तक ले जाने का प्रयास किया जा सकता है।
कभी-कभी किसी विशेष व्यक्ति के प्रति करुणा महसूस करना कठिन हो सकता है, विशेषकर तब जब उससे दुखद अनुभव जुड़े हों। ऐसे समय में स्वयं पर कोई भावना थोपने की आवश्यकता नहीं है। तटस्थ व्यक्ति से शुरुआत करना या केवल सभी के दुख कम होने की कामना करना पर्याप्त है। यदि अभ्यास के दौरान तीव्र भावनात्मक परेशानी उत्पन्न हो, तो विराम लेना उचित है।
शुरुआत में पाँच से दस मिनट का अभ्यास पर्याप्त हो सकता है। नियमितता अवधि से अधिक महत्त्वपूर्ण है। ध्यान के बाद यह विचार करना उपयोगी है कि दिनभर के व्यवहार में करुणा को किस छोटे कार्य के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है।
क्या करुणा योग मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है?
करुणा-आधारित ध्यान और मैत्री-भावना के अभ्यासों पर हुए वैज्ञानिक अध्ययनों में तनाव, भावनात्मक संतुलन, सकारात्मक सामाजिक भावनाओं और मानसिक स्वास्थ्य के कुछ पहलुओं पर संभावित लाभों की जाँच की गई है। कुछ शोध सकारात्मक परिणामों की ओर संकेत करते हैं, लेकिन उनके निष्कर्ष अभ्यास की प्रकृति, अवधि, प्रतिभागियों और अध्ययन की गुणवत्ता के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
करुणा का अभ्यास व्यक्ति को अपनी भावनाओं को पहचानने, तत्काल प्रतिक्रिया देने से पहले रुकने और दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण पर विचार करने में सहायता कर सकता है। उदाहरण के लिए, विवाद की स्थिति में सामने वाले की बात पूरी सुनना और अपनी प्रतिक्रिया सोच-समझकर देना संबंधों में अनावश्यक तनाव कम करने का एक व्यावहारिक तरीका हो सकता है।
अपने प्रति करुणा भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। असफलता के बाद स्वयं को लगातार अपमानित करना या छोटी गलती के लिए अपनी पूरी योग्यता पर संदेह करना मानसिक दबाव बढ़ा सकता है। इसके विपरीत, गलती स्वीकार करते हुए उससे सीखने का प्रयास अधिक संतुलित दृष्टिकोण प्रदान कर सकता है। आत्मकरुणा का अर्थ अपनी जिम्मेदारियों से बचना नहीं, बल्कि कठिन परिस्थिति में स्वयं के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना है।
हालाँकि, करुणा योग को मानसिक रोगों का निश्चित उपचार नहीं माना जाना चाहिए। गंभीर चिंता, अवसाद या अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सहायता आवश्यक हो सकती है। ध्यान को उपयुक्त उपचार के पूरक के रूप में अपनाया जा सकता है, उसके विकल्प के रूप में नहीं।
रिश्तों में करुणा योग: सुनने की कला से मजबूत होते हैं संबंध
व्यक्तिगत संबंधों में कई विवाद इसलिए बढ़ जाते हैं क्योंकि लोग एक-दूसरे को समझने से पहले अपनी बात मनवाने का प्रयास करते हैं। परिवार, मित्रता और कार्यस्थल पर विचारों का अंतर स्वाभाविक है, लेकिन असहमति व्यक्त करने का तरीका संबंधों को प्रभावित करता है। करुणापूर्ण व्यवहार इस अंतर को समझने और संवाद को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है।
जब कोई व्यक्ति अपनी परेशानी साझा करता है, तो तुरंत समाधान बताने के बजाय पहले उसकी बात ध्यान से सुनना उपयोगी होता है। उससे पूछा जा सकता है कि उसे किस तरह की सहायता चाहिए। संभव है कि वह केवल अपनी बात कहना चाहता हो, जबकि हम अनावश्यक रूप से सलाह देने लगें। उसकी आवश्यकता समझना करुणा को व्यवहार में बदलने का सरल उदाहरण है।
करुणा का अर्थ यह भी नहीं कि व्यक्ति हर माँग स्वीकार करे या दूसरों के अनुचित व्यवहार को सहन करता रहे। स्वस्थ संबंधों में सम्मान दोनों पक्षों के लिए आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति बार-बार अपमानित करता है, दबाव डालता है या नुकसान पहुँचाता है, तो स्पष्ट सीमाएँ बनाना उचित है। करुणा और आत्मसम्मान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। वास्तव में, संतुलित करुणा दोनों की रक्षा करने का प्रयास करती है।
करुणा योग और सेवा: छोटे कार्यों में छिपा बड़ा परिवर्तन
करुणा की वास्तविक परीक्षा दैनिक जीवन में होती है। ध्यान के दौरान शुभकामनाएँ व्यक्त करना उपयोगी हो सकता है, लेकिन यदि व्यवहार में असंवेदनशीलता बनी रहे तो साधना अधूरी रह जाती है। करुणा को कर्म में बदलने के लिए बड़े अवसर की प्रतीक्षा करना आवश्यक नहीं है।
परिवार के किसी सदस्य की बात धैर्य से सुनना, किसी सहपाठी को कठिन विषय समझाना, जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना, सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता बनाए रखना और पशु-पक्षियों के प्रति जिम्मेदार व्यवहार करना करुणा की व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ हैं। किसी व्यक्ति की निजी समस्या को उसकी अनुमति के बिना दूसरों के सामने साझा न करना भी संवेदनशीलता का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
सेवा करते समय सहायता पाने वाले व्यक्ति की गरिमा बनाए रखना आवश्यक है। सहायता का उद्देश्य किसी को अपने ऊपर निर्भर बनाना या अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करना नहीं होना चाहिए। वास्तविक सेवा में सामने वाले की आवश्यकताओं, इच्छाओं और स्वतंत्रता का सम्मान शामिल होता है।
सामाजिक स्तर पर करुणा शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, बुजुर्गों की देखभाल और वंचित समुदायों के सहयोग जैसे क्षेत्रों में सार्थक भूमिका निभा सकती है। जब करुणा व्यक्तिगत सद्भावना से आगे बढ़कर जिम्मेदार सामाजिक भागीदारी बनती है, तब उसका प्रभाव व्यापक हो सकता है।
करुणा योग के मार्ग में आने वाली बाधाएँ और उनसे निपटने के उपाय
करुणा विकसित करने की प्रक्रिया हमेशा सरल नहीं होती। अत्यधिक व्यस्तता, प्रतिस्पर्धा, पुराने कटु अनुभव, थकान और दूसरों के प्रति बने पूर्वाग्रह संवेदनशीलता को प्रभावित कर सकते हैं। कभी-कभी लगातार दूसरों की समस्याएँ सुनने से व्यक्ति स्वयं भावनात्मक रूप से थका हुआ महसूस कर सकता है। इसलिए करुणा का अभ्यास संतुलन और आत्मदेखभाल के साथ होना चाहिए।
पहली बाधा है हर समस्या को तुरंत हल करने की इच्छा। हर व्यक्ति की कठिनाई का समाधान हमारे पास हो, यह आवश्यक नहीं। कभी-कभी उचित सहायता की दिशा बताना या धैर्य से सुनना ही पर्याप्त होता है। दूसरी बाधा है सभी लोगों के प्रति एक जैसी भावनाएँ महसूस करने की अपेक्षा। करुणा धीरे-धीरे विकसित होती है और इसके लिए निरंतर अभ्यास की आवश्यकता हो सकती है।
तीसरी बाधा है अपनी आवश्यकताओं की उपेक्षा करना। यदि कोई व्यक्ति दूसरों की सहायता करते-करते अपनी नींद, स्वास्थ्य, पढ़ाई, काम या भावनात्मक आवश्यकताओं को लगातार नजरअंदाज करता है, तो वह थक सकता है। इसलिए अपनी सीमाओं को पहचानना, आवश्यकतानुसार सहायता माँगना और विश्राम करना भी महत्त्वपूर्ण है।
करुणा का एक व्यावहारिक नियम यह हो सकता है कि सहायता करने से पहले तीन बातों पर विचार किया जाए—क्या सामने वाले को वास्तव में इस सहायता की आवश्यकता है, क्या मैं इसे अपनी क्षमता के भीतर कर सकता हूँ और क्या मेरा तरीका उसकी गरिमा तथा स्वतंत्रता का सम्मान करता है? ये प्रश्न भावुक प्रतिक्रिया के स्थान पर विवेकपूर्ण व्यवहार को प्रोत्साहित करते हैं।
विद्यार्थियों, युवाओं और कार्यस्थल के लिए करुणा योग की उपयोगिता
आज के प्रतिस्पर्धी वातावरण में उपलब्धियों, अंकों, आर्थिक सफलता और सामाजिक स्वीकृति पर बहुत जोर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति कभी-कभी अपनी तुलना दूसरों से करने लगता है और असफलता को अपनी योग्यता की अंतिम कसौटी मान लेता है। करुणा-आधारित अभ्यास इस दृष्टिकोण को संतुलित करने का अवसर प्रदान कर सकते हैं।
विद्यार्थियों के लिए इसका एक उपयोगी रूप है—अपनी गलतियों से सीखना, दूसरे विद्यार्थियों का उपहास न करना और सहयोग की भावना विकसित करना। किसी सहपाठी के कम अंक आने पर उसका मजाक बनाने के बजाय उसे प्रोत्साहित करना स्वस्थ शैक्षिक वातावरण बनाने में मदद करता है। इसी प्रकार, स्वयं परीक्षा में अपेक्षित परिणाम न मिलने पर अपनी कमियों का विश्लेषण करना अधिक उपयोगी है, बजाय इसके कि स्वयं को असफल व्यक्ति मान लिया जाए।
कार्यस्थल पर करुणा का अर्थ सहकर्मियों की परिस्थितियों को समझना, सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करना और मतभेदों को गरिमापूर्ण ढंग से सुलझाना है। नेतृत्व की भूमिका निभाने वाले व्यक्तियों के लिए यह दृष्टिकोण विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि निर्णय लेते समय कर्मचारियों की आवश्यकताओं और परिस्थितियों को समझना संगठनात्मक विश्वास को मजबूत कर सकता है।
हालाँकि, करुणा का अर्थ अनुशासन और जवाबदेही को समाप्त करना नहीं है। किसी कार्य में गलती होने पर उचित सुधार और जिम्मेदारी आवश्यक हैं। अंतर केवल इतना है कि सुधार की प्रक्रिया अपमान या भय के बजाय स्पष्टता, सम्मान और समाधान पर आधारित हो।
करुणा योग का दैनिक अभ्यास कैसे बनाएँ?
करुणा योग को जीवन में शामिल करने के लिए किसी विशेष उपकरण या जटिल व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है। सुबह कुछ मिनट ध्यान से दिन की शुरुआत की जा सकती है। इसके बाद यह संकल्प लिया जा सकता है कि आज किसी की बात बीच में काटने से बचेंगे, किसी जरूरतमंद की सहायता करेंगे या किसी विवाद में प्रतिक्रिया देने से पहले थोड़ा रुकेंगे।
दिनभर में जब क्रोध या चिड़चिड़ापन महसूस हो, तो कुछ क्षण रुककर अपनी श्वास पर ध्यान देना उपयोगी हो सकता है। इसके बाद परिस्थिति को समझने और उचित प्रतिक्रिया चुनने का प्रयास करें। रात में दिनभर के व्यवहार पर संक्षिप्त विचार करें—कहाँ आपने धैर्य रखा, कहाँ प्रतिक्रिया अधिक कठोर रही और अगली बार क्या बेहतर किया जा सकता है।
इस आत्मनिरीक्षण का उद्देश्य स्वयं को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि सीखना होना चाहिए। यदि किसी के साथ अनुचित व्यवहार हुआ है, तो आवश्यक होने पर क्षमा माँगना भी करुणा का हिस्सा है। वहीं, यदि किसी अन्य व्यक्ति ने गलती की है, तो क्षमा का अर्थ यह नहीं कि उसे अपनी सीमाओं का उल्लंघन करने की अनुमति दे दी जाए।
नियमित अभ्यास के साथ करुणा धीरे-धीरे एक सचेत निर्णय से स्वाभाविक आदत का रूप ले सकती है। इसकी सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि व्यक्ति कितनी बार ध्यान करता है, बल्कि इस बात से भी कि उसके व्यवहार में कितना धैर्य, विवेक और सम्मान दिखाई देता है।
करुणा योग केवल साधना नहीं, बेहतर मनुष्य बनने की दिशा है
करुणा योग मनुष्य को अपने भीतर की संवेदनशीलता पहचानने और उसे जिम्मेदार व्यवहार में बदलने की प्रेरणा देता है। यह सिखाता है कि दूसरों के दुख को समझना कमजोरी नहीं, बल्कि भावनात्मक परिपक्वता का संकेत हो सकता है। साथ ही, करुणा को विवेक, आत्मसम्मान और स्वस्थ सीमाओं के साथ जोड़ना आवश्यक है, ताकि सहायता की भावना स्वयं या दूसरे व्यक्ति के लिए नुकसान का कारण न बने।
इस साधना में ध्यान, आत्मनिरीक्षण, मैत्री-भावना और सेवा एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं। ध्यान मन को अपने विचारों और प्रतिक्रियाओं के प्रति सजग बनाने में सहायता करता है, आत्मनिरीक्षण व्यवहार की कमियों को पहचानने का अवसर देता है और सेवा करुणा को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से जोड़ती है।
आज जब व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा, सामाजिक तनाव और संवाद की कमी अनेक स्तरों पर दिखाई देती है, तब करुणा का महत्त्व और बढ़ जाता है। इसकी शुरुआत किसी बड़े त्याग या असाधारण उपलब्धि से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे निर्णयों से हो सकती है—किसी को ध्यान से सुनना, बिना अपमान किए असहमति जताना, जरूरतमंद की मदद करना और अपनी गलतियों को स्वीकार करना।
अंततः करुणा योग का सार केवल दूसरों के प्रति अच्छा महसूस करना नहीं, बल्कि ऐसा विवेक विकसित करना है जो विचारों, शब्दों और कर्मों में मानवीय गरिमा को स्थान दे। जब करुणा जीवन की आदत बनती है, तब आध्यात्मिक साधना व्यक्तिगत शांति से आगे बढ़कर परिवार, समाज और व्यापक मानवीय संबंधों में भी सकारात्मक योगदान दे सकती है।






