
संवाद 24 डेस्क। भारत में चावल के उत्पादन, प्रसंस्करण और निर्यात को वैश्विक बाजार से जोड़ने की दिशा में भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस 2026 की शुरुआत हो गई है। नई दिल्ली के भारत मंडपम में 23 से 25 अक्टूबर तक आयोजित हो रहे इस तीन दिवसीय सम्मेलन में दुनिया के अलग-अलग देशों के खरीदार, निर्यातक, चावल मिल संचालक, नीति निर्माता और कृषि कारोबार से जुड़े प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य केवल चावल के व्यापार को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि वैश्विक मांग और आपूर्ति का आकलन करना, वर्ष 2027 में कीमतों की संभावित दिशा समझना और भारतीय चावल के लिए नए अंतरराष्ट्रीय बाजार तलाशना है। अमर उजाला की रिपोर्ट और सम्मेलन से संबंधित उपलब्ध जानकारियों के अनुसार, इस आयोजन के लिए 153 देशों के 4,856 खरीदारों समेत कुल 32,467 पंजीकरण दर्ज किए गए हैं। ऐसे में यह सम्मेलन भारतीय कृषि निर्यात के भविष्य और वैश्विक खाद्य बाजार में भारत की भूमिका के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस 2026 क्या है और क्यों है महत्वपूर्ण?
भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस यानी बीआईआरसी 2026 का आयोजन इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन की ओर से किया जा रहा है। इसका उद्देश्य चावल उद्योग से जुड़े विभिन्न पक्षों को एक मंच पर लाकर व्यापारिक सहयोग, बाजार विस्तार और निर्यात की संभावनाओं को बढ़ाना है। इस सम्मेलन में 65 वक्ताओं की भागीदारी, नौ ज्ञान सत्र और कारोबारियों के बीच पहले से निर्धारित 2,038 व्यावसायिक बैठकों का कार्यक्रम रखा गया है। प्रदर्शनी में 180 से अधिक कंपनियों के शामिल होने की जानकारी भी सामने आई है। भारत के 23 राज्यों के प्रतिभागियों की भागीदारी से यह आयोजन देश के विभिन्न चावल उत्पादक और प्रसंस्करण क्षेत्रों को अंतरराष्ट्रीय खरीदारों से जोड़ने का अवसर प्रदान कर सकता है
इस सम्मेलन की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि चावल भारत की खाद्य व्यवस्था के साथ-साथ कृषि निर्यात का एक प्रमुख आधार है। भारत में बड़ी आबादी की आजीविका धान की खेती, चावल की मिलिंग, भंडारण, पैकेजिंग और परिवहन से जुड़ी हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढ़ने पर किसानों, मिल संचालकों, निर्यातकों और लॉजिस्टिक्स कंपनियों के लिए अवसर पैदा होते हैं। दूसरी ओर, उत्पादन में गिरावट, मौसम की अनिश्चितता या व्यापार नीतियों में बदलाव होने पर कीमतों और निर्यात उपलब्धता पर दबाव भी पड़ सकता है। इसी वजह से सम्मेलन में बाजार के रुझानों और संभावित जोखिमों का विश्लेषण प्रमुख विषय बना हुआ है।
2027 में चावल सस्ता होगा या महंगा? बाजार के सामने सबसे बड़ा सवाल
सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण विषय वर्ष 2027 के लिए वैश्विक चावल की मांग और आपूर्ति का अनुमान है। कारोबारियों के सामने यह सवाल है कि आने वाले समय में बाजार में पर्याप्त चावल उपलब्ध रहेगा या उत्पादन संबंधी चुनौतियां कीमतों में तेजी ला सकती हैं। बासमती और गैर-बासमती चावल की कीमतों का रुख अलग-अलग हो सकता है, क्योंकि दोनों की मांग, गुणवत्ता, उपभोक्ता वर्ग और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा की प्रकृति अलग है। सम्मेलन में फसल सर्वेक्षण, उत्पादन के अनुमान और वैश्विक मांग से जुड़े आंकड़ों के आधार पर इन संभावनाओं पर चर्चा की जा रही है। हालांकि, कीमतों में तेजी या गिरावट को लेकर किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए उत्पादन, निर्यात नीतियों, माल ढुलाई की लागत और आयातक देशों की खरीद क्षमता का आकलन जरूरी होगा।
वैश्विक बाजार की दिशा तय करने में मौसम की भूमिका भी अहम है। एसएंडपी ग्लोबल की 16 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, अल नीनो से जुड़ी संभावित मौसमी परिस्थितियों को लेकर भारतीय चावल उत्पादन और निर्यात उपलब्धता पर चिंता जताई जा रही है। रिपोर्ट में अमेरिकी कृषि विभाग के अनुमान का हवाला देते हुए विपणन वर्ष 2026-27 में भारत के चावल उत्पादन के लगभग 147 मिलियन मीट्रिक टन रहने की संभावना बताई गई है, जो पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 7 मिलियन मीट्रिक टन कम हो सकता है। यह एक अनुमान है, अंतिम उत्पादन आंकड़ा नहीं। वास्तविक स्थिति मानसून, फसल की दशा, सिंचाई, कटाई और अन्य मौसमी परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
यदि उत्पादन अनुमान से कम रहता है और अंतरराष्ट्रीय मांग मजबूत बनी रहती है, तो निर्यात के लिए उपलब्ध अतिरिक्त चावल की मात्रा प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बनने की आशंका रहेगी। इसके विपरीत, यदि प्रमुख उत्पादक देशों में अच्छी फसल होती है और बाजार में पर्याप्त आपूर्ति रहती है, तो खरीदारों को अपेक्षाकृत अनुकूल कीमतें मिल सकती हैं। इसलिए सम्मेलन में प्रस्तुत होने वाले पूर्वानुमान निर्यातकों के लिए खरीद, भंडारण और अनुबंध तय करने में उपयोगी साबित हो सकते हैं, लेकिन उन्हें निश्चित भविष्यवाणी के बजाय संभावित परिदृश्यों के रूप में देखना चाहिए।
वैश्विक चावल कारोबार में भारत की मजबूत स्थिति
भारत अंतरराष्ट्रीय चावल व्यापार में प्रमुख स्थान रखता है। देश में बासमती और गैर-बासमती दोनों प्रकार के चावल का उत्पादन होता है। बासमती चावल अपनी सुगंध, लंबे दाने और विशेष गुणवत्ता के कारण प्रीमियम बाजार में पहचान रखता है, जबकि गैर-बासमती चावल अनेक देशों में रोजमर्रा के भोजन और खाद्य सुरक्षा की जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दोनों श्रेणियों के निर्यात बाजार, कीमतें और खरीदारों की प्राथमिकताएं अलग-अलग होने के कारण भारतीय निर्यातकों को अपनी रणनीति भी उसी अनुरूप बनानी पड़ती है।
भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध 2024-25 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने इस अवधि में लगभग 20.19 मिलियन मीट्रिक टन चावल का निर्यात किया। इसमें करीब 6.07 मिलियन मीट्रिक टन बासमती और 11.73 मिलियन मीट्रिक टन गैर-बासमती चावल का उल्लेख है। वेबसाइट पर कुल निर्यात मूल्य लगभग 12.3 अरब अमेरिकी डॉलर बताया गया है। इन आंकड़ों के आधार पर चावल भारत के कृषि निर्यात के सबसे महत्वपूर्ण उत्पादों में शामिल है।
वहीं, वाणिज्य विभाग की ओर से 10 जून 2026 को जारी जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का चावल निर्यात मूल्य लगभग 11.5 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। यह आंकड़ा कृषि निर्यात में चावल के महत्व को रेखांकित करता है। हालांकि, कृषि वर्ष, विपणन वर्ष और वित्त वर्ष की समय-सीमाएं अलग हो सकती हैं। इसलिए अलग-अलग स्रोतों के आंकड़ों की तुलना करते समय उनकी गणना अवधि और परिभाषा को समझना जरूरी है।
भारत के लिए यह स्थिति अवसर के साथ जिम्मेदारी भी लेकर आती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़ी हिस्सेदारी बनाए रखने के लिए केवल अधिक मात्रा में चावल भेजना पर्याप्त नहीं है। निर्यातकों को गुणवत्ता, समय पर आपूर्ति, प्रतिस्पर्धी कीमतों, खाद्य सुरक्षा मानकों और खरीदारों के साथ भरोसेमंद कारोबारी संबंधों पर भी ध्यान देना होगा। यदि भारतीय चावल लगातार तय मानकों पर खरा उतरता है, तो इससे देश की वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में विश्वसनीयता मजबूत हो सकती है।
नए निर्यात बाजारों की तलाश, किन देशों पर रहेगी नजर?
भारतीय चावल निर्यात के लिए नए बाजारों की पहचान सम्मेलन का एक प्रमुख उद्देश्य है। परंपरागत खरीदार देशों पर निर्भरता कम करना और अलग-अलग क्षेत्रों में कारोबार का विस्तार करना निर्यातकों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। एसएंडपी ग्लोबल की रिपोर्ट में फिलीपींस, सूडान, यमन और लैटिन अमेरिका को भारतीय चावल निर्यात के लिए संभावनाओं वाले बाजारों के रूप में रेखांकित किया गया है। इन बाजारों में विस्तार की संभावनाएं वहां की मांग, आयात नियमों, प्रतिस्पर्धी आपूर्तिकर्ताओं, भुगतान की शर्तों और परिवहन लागत पर निर्भर करेंगी।
फिलीपींस विशेष रूप से ध्यान देने योग्य बाजार है। एसएंडपी ग्लोबल की रिपोर्ट में वहां सालाना चावल आयात की मात्रा लगभग 5 से 5.7 मिलियन मीट्रिक टन बताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय निर्यातकों की वहां मौजूदगी बढ़ाने की संभावनाएं हैं, लेकिन इसके लिए स्थानीय गुणवत्ता मानकों को पूरा करना और खरीदारों की आवश्यकताओं के अनुरूप आपूर्ति करना जरूरी होगा। किसी बड़े आयातक देश में मांग अधिक होने का अर्थ यह नहीं है कि भारतीय निर्यातकों को स्वतः उतना ही बाजार मिल जाएगा। उन्हें अन्य देशों के निर्यातकों से प्रतिस्पर्धा करनी होगी और अपने उत्पाद की गुणवत्ता, कीमत तथा समय पर आपूर्ति के आधार पर खरीदारों का विश्वास जीतना होगा।
नए बाजारों में प्रवेश के लिए व्यापारिक समझौतों, स्थानीय वितरकों और अंतरराष्ट्रीय खाद्य कंपनियों के साथ साझेदारी की भी अहम भूमिका हो सकती है। निर्यातकों को यह समझना होगा कि किस देश में किस प्रकार के चावल की मांग है, वहां उपभोक्ता किस कीमत पर खरीदारी करते हैं और किन प्रमाणपत्रों की आवश्यकता होती है। इस तरह बाजार का चयन केवल संभावित बिक्री के आधार पर नहीं, बल्कि लागत और जोखिम के समग्र आकलन के आधार पर किया जाना चाहिए।
मौसम का जोखिम और अल नीनो, क्या प्रभावित हो सकता है चावल का कारोबार?
चावल की खेती पानी और मौसम की परिस्थितियों से गहराई से जुड़ी हुई है। भारत के कई क्षेत्रों में धान की खेती मानसून पर निर्भर करती है। बारिश की कमी, अत्यधिक वर्षा, बाढ़, तापमान में बदलाव और सिंचाई की उपलब्धता में अंतर फसल की उत्पादकता को प्रभावित कर सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जब किसी प्रमुख उत्पादक देश में उत्पादन घटने की आशंका पैदा होती है, तो आयातक देश अपनी जरूरतों के लिए पहले से खरीदारी करने लग सकते हैं। इससे बाजार में कीमतों और उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता बढ़ सकती है।
एसएंडपी ग्लोबल की रिपोर्ट में अल नीनो से जुड़े उत्पादन जोखिमों को आगामी चावल कारोबार के लिए महत्वपूर्ण कारक बताया गया है। रिपोर्ट में भारतीय चावल की कीमतों पर संभावित दबाव की चर्चा की गई है, लेकिन कीमतों का वास्तविक रुख बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। मौसम संबंधी आशंकाओं के अलावा घरेलू धान की कीमतें, सरकारी नीतियां, निर्यात के लिए उपलब्ध मात्रा और दूसरे उत्पादक देशों की फसल भी महत्वपूर्ण रहेंगी।
ऐसी परिस्थितियों में निर्यातकों के लिए केवल मौजूदा कीमतों को देखकर बड़े अनुबंध करना जोखिमपूर्ण हो सकता है। उन्हें फसल के अनुमानों, भंडार की स्थिति और संभावित आपूर्ति के बारे में लगातार जानकारी रखनी होगी। किसानों के लिए भी मौसम के अनुरूप खेती, पानी का बेहतर प्रबंधन और कृषि सलाह का पालन महत्वपूर्ण होगा। लंबे समय में जल संरक्षण और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना भारतीय चावल क्षेत्र की उत्पादन क्षमता को मजबूत करने में मदद कर सकता है।
गुणवत्ता प्रमाणन और खाद्य सुरक्षा, वैश्विक बाजार में क्यों जरूरी?
अंतरराष्ट्रीय चावल कारोबार में गुणवत्ता एक निर्णायक भूमिका निभाती है। अलग-अलग देशों में आयातित खाद्य उत्पादों के लिए अलग मानक हो सकते हैं। चावल में कीटनाशक अवशेषों की निर्धारित सीमा, नमी, टूटे दानों का अनुपात, स्वच्छता, पैकेजिंग और उत्पाद की पहचान जैसे पहलुओं पर खरीदार ध्यान देते हैं। किसी खेप में गुणवत्ता संबंधी कमी मिलने पर उसका प्रवेश रोका जा सकता है या अतिरिक्त जांच की आवश्यकता पड़ सकती है। इससे निर्यातक की लागत बढ़ती है और कारोबारी प्रतिष्ठा पर भी असर पड़ सकता है।
भारत सरकार के वाणिज्य विभाग ने जून 2026 में जारी जानकारी में कृषि निर्यात के लिए गुणवत्ता प्रमाणन, उत्पादों की ट्रेसबिलिटी और अंतरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मानकों के पालन पर जोर दिया था। विभाग के अनुसार, बदलते वैश्विक मानकों के अनुरूप भारतीय निर्यातकों को गुणवत्ता आश्वासन और अनुपालन प्रणालियों को मजबूत करना होगा। चावल के मामले में कीटनाशक अवशेषों और अफ्लाटॉक्सिन जैसे संदूषकों का प्रभावी प्रबंधन भी महत्वपूर्ण है।
भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस में गुणवत्ता और प्रमाणन पर चर्चा इसी व्यापक चुनौती से जुड़ी है। यदि निर्यातक उत्पादन से लेकर मिलिंग, पैकेजिंग और शिपमेंट तक गुणवत्ता की निगरानी बेहतर बनाते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय खरीदारों का भरोसा बढ़ सकता है। इससे भारतीय चावल को नए बाजारों में प्रवेश करने और मौजूदा बाजारों में अपनी स्थिति मजबूत करने में सहायता मिल सकती है।
निर्यात की लागत, शिपिंग और भुगतान का जोखिम भी अहम
चावल के निर्यात में मुनाफा केवल अंतरराष्ट्रीय बिक्री मूल्य से तय नहीं होता। बंदरगाह तक माल पहुंचाने, भंडारण, पैकेजिंग, समुद्री माल ढुलाई, बीमा, बैंकिंग और दस्तावेजी प्रक्रिया की लागत भी अंतिम लाभ को प्रभावित करती है। इसके अलावा विदेशी खरीदारों से भुगतान में देरी या भुगतान न मिलने का जोखिम भी रहता है। इसलिए सम्मेलन में दस्तावेजी प्रक्रिया, निर्यात बीमा, ऋण सुविधा, थोक और कंटेनर शिपिंग जैसे विषयों को प्रमुखता दी गई है।
निर्यातकों के लिए यह समझना जरूरी है कि अलग-अलग देशों में व्यापार करने की लागत और जोखिम एक जैसे नहीं होते। किसी बाजार में अधिक मांग होने के बावजूद यदि माल ढुलाई महंगी है या भुगतान की शर्तें प्रतिकूल हैं, तो कारोबार का लाभ सीमित रह सकता है। इसके विपरीत, अपेक्षाकृत छोटे बाजार में स्थिर खरीदारों और बेहतर भुगतान व्यवस्था के कारण अधिक भरोसेमंद व्यापार विकसित हो सकता है।
सम्मेलन में पहले से निर्धारित व्यावसायिक बैठकों से निर्यातकों और आयातकों को सीधे बातचीत करने का अवसर मिलेगा। इन बैठकों का महत्व केवल तत्काल सौदे तय करने तक सीमित नहीं है। इनके जरिए खरीदारों की जरूरतों, गुणवत्ता संबंधी अपेक्षाओं, कीमतों और भविष्य की आपूर्ति के बारे में जानकारी मिल सकती है। हालांकि, निर्धारित बैठकें अपने आप में अंतिम बिक्री या पक्के निर्यात ऑर्डर का प्रमाण नहीं हैं। वास्तविक कारोबारी परिणाम बातचीत और उसके बाद होने वाले समझौतों पर निर्भर करेंगे।
पिछले सम्मेलन का अनुभव और इस बार की बड़ी भागीदारी
भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस का पहला आयोजन 2025 में हुआ था। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले सम्मेलन में 10,854 लोगों ने भाग लिया था और 90 से अधिक देशों के 1,083 अंतरराष्ट्रीय खरीदार शामिल हुए थे। आयोजकों के हवाले से दी गई ईवाई की आयोजन के बाद की आकलन रिपोर्ट में लगभग 33,453 करोड़ रुपये की कारोबारी प्रतिबद्धताओं का उल्लेख किया गया था। ये प्रतिबद्धताएं करीब 86.3 लाख टन चावल से जुड़ी थीं।
वर्ष 2026 में पंजीकरण और अंतरराष्ट्रीय खरीदारों की संख्या में वृद्धि इस आयोजन के प्रति उद्योग की दिलचस्पी को दर्शाती है। हालांकि, पिछले वर्ष की कारोबारी प्रतिबद्धताओं को वास्तविक रूप से पूरी हुई बिक्री या प्राप्त राजस्व के समान नहीं माना जाना चाहिए। प्रतिबद्धताओं का वास्तविक कारोबार में बदलना अनुबंधों की शर्तों, कीमतों, आपूर्ति की उपलब्धता और भुगतान जैसे कारकों पर निर्भर करता है।
इस वर्ष सम्मेलन में नौ विशेष अनुभव क्षेत्रों के माध्यम से चावल की विभिन्न किस्मों, कृषि समुदायों, खाद्य संस्कृति और व्यावसायिक उपयोगों को प्रदर्शित करने की भी योजना है। ग्लोबल राइस आर्काइव में भारत और अन्य देशों की लगभग 200 चावल किस्मों को प्रदर्शित किया जाएगा। 25 अक्टूबर को आम लोगों के लिए राइस फेस्टिवल आयोजित किया जाएगा, जिसमें खानपान से जुड़े कार्यक्रम, शेफ प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक गतिविधियां और प्रश्नोत्तरी शामिल होंगी। इससे चावल को केवल एक कृषि उत्पाद के रूप में नहीं, बल्कि खाद्य संस्कृति और व्यावसायिक नवाचार से जुड़े उत्पाद के रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा।
क्या किसानों को भी मिलेगा फायदा?
अंतरराष्ट्रीय चावल व्यापार के विस्तार का लाभ किसानों तक पहुंचना इस पूरे आयोजन की सफलता का एक महत्वपूर्ण पैमाना होगा। निर्यातकों को नए खरीदार मिलना और विदेशी बाजारों में मांग बढ़ना उद्योग के लिए सकारात्मक हो सकता है, लेकिन इससे किसानों की आय में कितनी वृद्धि होगी, यह कई कारकों पर निर्भर करेगा। धान की खरीद कीमत, उत्पादन लागत, स्थानीय बाजारों में मांग, सरकारी खरीद व्यवस्था और किसानों की बाजार तक पहुंच इसमें अहम भूमिका निभाते हैं।
यदि निर्यात की मांग मजबूत रहती है, तो कुछ परिस्थितियों में धान की कीमतों को समर्थन मिल सकता है। लेकिन इसका लाभ सभी किसानों और सभी किस्मों को समान रूप से मिलेगा, यह निश्चित नहीं है। निर्यात योग्य गुणवत्ता, भंडारण की सुविधा, बाजार तक पहुंच और फसल की किस्म के आधार पर किसानों को मिलने वाला लाभ अलग-अलग हो सकता है।
इसलिए निर्यात कारोबार को किसानों से जोड़ने के लिए बेहतर भंडारण, वैज्ञानिक खेती, गुणवत्ता जांच, प्रसंस्करण सुविधाओं और बाजार संबंधी जानकारी का विस्तार जरूरी है। किसान उत्पादक संगठनों और कृषि कारोबार से जुड़ी संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय से छोटे उत्पादकों को भी बड़े बाजारों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है। टिकाऊ खेती और पानी के कुशल उपयोग पर ध्यान देना भी जरूरी होगा, ताकि निर्यात विस्तार के साथ प्राकृतिक संसाधनों पर अनावश्यक दबाव न बढ़े।
भारत के चावल कारोबार के लिए अवसर और चुनौतियों का निर्णायक दौर
भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस 2026 ऐसे समय आयोजित हो रहा है, जब वैश्विक चावल बाजार में उत्पादन, मौसम, कीमतों और व्यापार नीतियों को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल मौजूद हैं। 153 देशों के खरीदारों की भागीदारी, पहले से निर्धारित व्यावसायिक बैठकें और नए बाजारों पर केंद्रित चर्चा भारतीय चावल उद्योग के लिए कारोबारी अवसर पैदा कर सकती है। साथ ही, संभावित उत्पादन जोखिम, गुणवत्ता संबंधी शर्तें, माल ढुलाई की लागत और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भारत के सामने अब केवल अधिक मात्रा में चावल निर्यात करने की चुनौती नहीं है, बल्कि बेहतर गुणवत्ता, मूल्य संवर्धन, भरोसेमंद आपूर्ति और नए बाजारों में स्थायी उपस्थिति बनाने का अवसर भी है। सम्मेलन का वास्तविक महत्व इस बात से तय होगा कि यहां होने वाली चर्चाएं और कारोबारी बैठकें कितने ठोस समझौतों, बेहतर बाजार पहुंच और दीर्घकालिक व्यापारिक संबंधों में बदलती हैं। यदि निर्यात वृद्धि के साथ किसानों की आय, गुणवत्ता और टिकाऊ उत्पादन को भी प्राथमिकता दी जाती है, तो भारत वैश्विक चावल व्यापार में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।






