
संवाद 24 डेस्क। भारतीय सिनेमा के सबसे सशक्त, बेबाक और संवेदनशील चेहरों में शुमार दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं रहे। 75 वर्ष की उम्र में गोवा स्थित उनके आवास पर अचानक दिल का दौरा पड़ने (कार्डियक अरेस्ट) से उनका दुखद निधन हो गया। गुरुवार तड़के आई इस मनहूस खबर ने न सिर्फ बॉलीवुड और मराठी फिल्म जगत, बल्कि पूरे देश को गहरे सदमे में डाल दिया है। अपनी रौबदार आवाज, अनूठी संवाद अदायगी और समाज के लिए धड़कने वाले दिल के लिए पहचाने जाने वाले नाना पाटेकर के जाने से अभिनय और सामाजिक सरोकार का एक स्वर्णिम अध्याय हमेशा के लिए समाप्त हो गया।
तड़के बिगड़ी तबीयत, डॉक्टरों की भरसक कोशिशें रहीं नाकाम
प्राप्त जानकारी के अनुसार, नाना पाटेकर गोवा के डोना पाउला स्थित अपने आवास पर थे। गुरुवार तड़के करीब 4 बजे उन्हें अचानक अत्यधिक पसीना आने और सांस लेने में भारी तकलीफ महसूस हुई। उनके करीबी मित्रों और देखभाल करने वाले कर्मचारियों ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए फौरन एंबुलेंस और आपातकालीन चिकित्सा टीम को सूचित किया। अस्पताल की इमरजेंसी मेडिकल टीम जब मौके पर पहुंची, तब तक वे अचेत हो चुके थे। डॉक्टरों ने तत्काल सीपीआर (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन) शुरू किया और उन्हें गंभीर हालत में नजदीकी अस्पताल ले जाया गया। करीब 45 मिनट तक लगातार जीवन रक्षक प्रयास और कार्डियक मसाज देने के बावजूद उन्हें होश में नहीं लाया जा सका और सुबह डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
रंगमंच की मिट्टी से बॉलीवुड के शिखर तक का सफर
1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में जन्मे विश्वनाथ पाटेकर (नाना पाटेकर) का जीवन संघर्ष, स्वाभिमान और अदम्य प्रतिभा की जीती-जागती मिसाल रहा। मुंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से वाणिज्यिक कला की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने रंगमंच से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। 1978 में फिल्म ‘गमन’ से बड़े पर्दे पर कदम रखने वाले नाना को 1989 की फिल्म ‘परिंदा’ से वह पहचान मिली, जिसने हिंदी सिनेमा में खलनायकी और चरित्र अभिनय की परिभाषा ही बदल दी। इस फिल्म में ‘अन्ना’ के किरदार के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके बाद ‘प्रहार’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्नि साक्षी’, ‘तिरंगा’, ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’, ‘यशवंत’ और ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ जैसी कालजयी फिल्मों ने उन्हें अभिनय का पर्याय बना दिया। ‘क्रांतिवीर’ में उनका बोला गया संवाद—”ये मुसलमान का खून, ये हिंदू का खून… बता इसमें मुसलमान का कौन सा, हिंदू का कौन सा?”—आज भी सामाजिक सौहार्द और व्यवस्था पर चोट करने वाला सबसे असरदार संवाद माना जाता है। गंभीर किरदारों के साथ-साथ उन्होंने ‘वेलकम’ और ‘टैक्सी नंबर 9211’ जैसी फिल्मों में अपनी हास्य शैली का लोहा मनवाकर साबित किया कि वे किसी एक सांचे में बंधने वाले कलाकार नहीं थे। मराठी फिल्म ‘नटसम्राट’ में उनके अभिनय को भारतीय सिनेमा के इतिहास के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में गिना जाता है।
कारगिल का फौजी और किसानों का मसीहा
नाना पाटेकर केवल परदे के नायक नहीं थे, बल्कि असल जिंदगी में भी वे एक सच्चे जननायक थे। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ एक मानद मेजर के रूप में अग्रिम मोर्चों पर जाकर सैनिकों का हौसला बढ़ाया था। वे बाद में टेरिटोरियल आर्मी में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद तक पहुंचे। जब महाराष्ट्र का विदर्भ और मराठवाड़ा भयंकर सूखे और किसानों की आत्महत्या के संकट से जूझ रहा था, तब नाना पाटेकर ने मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘नाम फाउंडेशन’ (NAAM Foundation) की नींव रखी। उन्होंने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा सूखा प्रभावित किसानों के परिवारों, विधवाओं और बच्चों की शिक्षा के लिए दान कर दिया। नदियों को गहरा करने और जल संचयन के उनके अभियानों ने हजारों गांवों की तकदीर बदल दी। वे चकाचौंध भरी जिंदगी से दूर एक सादगीपूर्ण जीवन जीते थे।
राजकीय सम्मान के साथ होगा अंतिम संस्कार
नाना पाटेकर के पार्थिव शरीर को पोस्टमार्टम व आवश्यक औपचारिकताओं के बाद उनके परिजनों को सौंपने की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। जानकारी के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार पुणे के पास स्थित उनके फार्महाउस पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ संपन्न होगा। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों तथा फिल्म जगत की तमाम हस्तियों ने उनके असामयिक निधन पर गहरा शोक जताया है। सिनेमाई पर्दे पर सच की तरह गरजने वाली वह आवाज भले ही खामोश हो गई हो, लेकिन उनका काम, उनका त्याग और उनका सादा जीवन आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देता रहेगा।






