
संवाद 24 डेस्क। भारत में प्रशासनिक सेवाओं में जाने का सपना देखने वाले लाखों युवाओं के लिए संघ लोक सेवा आयोग का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। प्रत्येक वर्ष आयोजित होने वाली सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और अन्य केंद्रीय सेवाओं के लिए अधिकारियों का चयन करने वाली यह संस्था आज देश की संवैधानिक संस्थाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। लेकिन जिस संस्था को आज संघ लोक सेवा आयोग के नाम से जाना जाता है, उसका जन्म इसी नाम से नहीं हुआ था। इसकी शुरुआत आज से ठीक 100 वर्ष पहले, 1 अक्टूबर 1926 को लोक सेवा आयोग के रूप में हुई थी। आज 1 अक्टूबर 2026 को आयोग अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर रहा है। केंद्र सरकार और आयोग की ओर से वर्ष 2025 से शुरू हुआ शताब्दी वर्ष समारोह अब अपने समापन चरण में पहुंच चुका है। 30 सितंबर और 1 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में शताब्दी समारोह आयोजित किए जा रहे हैं। इस अवसर पर आयोग की एक सदी की यात्रा, प्रशासनिक सेवाओं में उसकी भूमिका और भविष्य की चुनौतियों पर चर्चा की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 1 अक्टूबर को आयोजित शताब्दी समारोह में शामिल होने और स्मारक सिक्का तथा डाक टिकट जारी करने का कार्यक्रम भी निर्धारित किया गया है।
आखिर आज के आयोग की शुरुआत किस नाम से हुई थी?
आज जिस संस्था को संघ लोक सेवा आयोग कहा जाता है, उसकी स्थापना 1 अक्टूबर 1926 को लोक सेवा आयोग के नाम से हुई थी। उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और आयोग का स्वरूप आज की तरह स्वतंत्र संवैधानिक संस्था का नहीं था। यह मुख्य रूप से एक सलाहकारी संस्था थी। इसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति लंदन में बैठे भारत सचिव की ओर से की जाती थी। उस समय आयोग के पास आज जैसे व्यापक संवैधानिक अधिकार नहीं थे। इसके बावजूद 1926 में इस संस्था का गठन भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, क्योंकि पहली बार भारत में लोक सेवाओं से जुड़े चयन और भर्ती मामलों को देखने के लिए एक स्थायी केंद्रीय निकाय स्थापित किया गया था। आगे चलकर इसी संस्था के स्वरूप, अधिकार और नाम में परिवर्तन होते गए और अंततः भारतीय संविधान के लागू होने के साथ इसे संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ।
पहले अध्यक्ष कौन थे?
लोक सेवा आयोग के पहले अध्यक्ष सर रॉस बार्कर थे। वे ब्रिटेन की गृह सिविल सेवा के अधिकारी थे। संघ लोक सेवा आयोग के आधिकारिक इतिहास के अनुसार 1 अक्टूबर 1926 को स्थापित पहले लोक सेवा आयोग में अध्यक्ष के अतिरिक्त चार सदस्य थे और सर रॉस बार्कर ने इसके पहले अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभाली। सर रॉस बार्कर का कार्यकाल अगस्त 1932 तक रहा। आयोग के आधिकारिक अभिलेखों में उनका कार्यकाल अक्टूबर 1926 से अगस्त 1932 तक दर्ज है। उनके बाद सर डेविड पेट्री ने अध्यक्ष का पद संभाला। इस तरह संघ लोक सेवा आयोग के इतिहास में सर रॉस बार्कर का नाम पहले अध्यक्ष के रूप में दर्ज है। यह तथ्य आज इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि 1926 में आयोग की स्थापना के समय इसका नेतृत्व एक ब्रिटिश अधिकारी के हाथ में था, जबकि स्वतंत्र भारत में यही संस्था संविधान द्वारा संरक्षित एक स्वतंत्र संवैधानिक आयोग बन गई। यह बदलाव भारत की प्रशासनिक व्यवस्था के विकास की लंबी यात्रा को दर्शाता है।
लोक सेवा आयोग की जरूरत आखिर क्यों महसूस हुई?
इस कहानी को समझने के लिए 1926 से कुछ दशक पीछे जाना होगा। ब्रिटिश शासन के शुरुआती दौर में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियां आज की तरह खुली प्रतियोगिता के आधार पर नहीं होती थीं। नियुक्तियों में सिफारिश और नामांकन की महत्वपूर्ण भूमिका थी। बाद में प्रशासनिक सेवाओं में योग्यता आधारित प्रतियोगिता की अवधारणा को बढ़ावा दिया गया। 1855 में भारतीय सिविल सेवा के लिए प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था शुरू हुई। लेकिन उस समय परीक्षा मुख्य रूप से लंदन में आयोजित होती थी। इसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि भारतीय युवाओं के लिए इस परीक्षा में शामिल होना आर्थिक, भौगोलिक और सामाजिक दृष्टि से कठिन बना रहा। भारत के किसी विद्यार्थी को परीक्षा देने के लिए इंग्लैंड तक जाना पड़ता था। भारतीयों की प्रशासनिक सेवाओं में भागीदारी का प्रश्न धीरे-धीरे राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का महत्वपूर्ण विषय बन गया। भारतीय नेताओं की ओर से लंबे समय तक यह मांग उठती रही कि सरकारी सेवाओं में नियुक्तियां अधिक निष्पक्ष और योग्यता आधारित हों तथा भारतीयों को प्रशासन में पर्याप्त अवसर मिलें।
सत्येंद्रनाथ टैगोर से लेकर भारत में परीक्षा केंद्र तक
भारतीयों के लिए भारतीय सिविल सेवा में प्रवेश का संघर्ष आसान नहीं था। इसी दौर में एक ऐतिहासिक उपलब्धि सामने आई। रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा में सफल होने वाले पहले भारतीय बने। उन्होंने 1863 में परीक्षा उत्तीर्ण की और 1864 में सेवा में शामिल हुए। हालांकि परीक्षा व्यवस्था में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने के बावजूद मुख्य परीक्षा केंद्र लंबे समय तक लंदन ही रहा। वर्ष 1922 में पहली बार भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा भारत में भी आयोजित की गई। इसका पहला भारतीय केंद्र इलाहाबाद था। बाद में 1928 में परीक्षा केंद्र दिल्ली स्थानांतरित किया गया।
यह बदलाव केवल परीक्षा केंद्र बदलने तक सीमित नहीं था। इससे यह संकेत भी मिला कि भारत में प्रशासनिक सेवाओं की भर्ती व्यवस्था को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करने की आवश्यकता लगातार बढ़ रही थी।
1919 के अधिनियम में पहली बार आयोग की व्यवस्था
भारत में लोक सेवा आयोग की स्थापना की औपचारिक पृष्ठभूमि भारत सरकार अधिनियम, 1919 से जुड़ी है। इस अधिनियम की धारा 96(ग) में भारत में लोक सेवा आयोग स्थापित करने का प्रावधान किया गया था। आयोग को सरकारी सेवाओं में भर्ती और उनसे संबंधित नियंत्रण के मामलों में निर्धारित कार्य सौंपे जाने की कल्पना की गई थी। लेकिन अधिनियम में प्रावधान होने के बावजूद आयोग तत्काल अस्तित्व में नहीं आया। आयोग के गठन, उसके अधिकार और कार्यप्रणाली को लेकर ब्रिटिश सरकार, भारत सरकार और प्रांतीय सरकारों के बीच लंबे समय तक विचार-विमर्श चलता रहा। इस प्रक्रिया में कई वर्ष बीत गए।
यही वह समय था जब एक विशेष आयोग को इस पूरे प्रश्न का अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी गई।
ली आयोग ने दी थी निर्णायक सिफारिश
भारत में उच्च प्रशासनिक सेवाओं की संरचना और भर्ती व्यवस्था पर विचार करने के लिए रॉयल आयोग ऑन द सुपीरियर सिविल सर्विसेज इन इंडिया का गठन किया गया था। इसके अध्यक्ष लॉर्ड ली थे, इसलिए इसे सामान्यतः ली आयोग कहा जाता है। ली आयोग ने 1924 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। आयोग ने भारत में एक वैधानिक लोक सेवा आयोग की स्थापना की सिफारिश की। संघ लोक सेवा आयोग के आधिकारिक इतिहास के अनुसार ली आयोग की सिफारिश के बाद ही लोक सेवा आयोग की स्थापना की दिशा में निर्णायक कदम आगे बढ़ा। 30 सितंबर 2026 को जारी भारत सरकार के पृष्ठभूमि विवरण में भी कहा गया है कि ली आयोग ने 1924 में वैधानिक लोक सेवा आयोग की तत्काल स्थापना की सिफारिश की थी। इसके दो वर्ष बाद 1 अक्टूबर 1926 को पहला लोक सेवा आयोग अस्तित्व में आया।
1 अक्टूबर 1926 को आया वह ऐतिहासिक दिन
आखिरकार वह दिन आया जब भारत में पहली बार लोक सेवा आयोग का गठन हुआ। तारीख थी 1 अक्टूबर 1926। आयोग का मुख्य उद्देश्य सरकारी सेवाओं में भर्ती से जुड़े मामलों को संस्थागत रूप देना था। इसके अध्यक्ष सर रॉस बार्कर थे और उनके साथ चार सदस्य नियुक्त किए गए थे। आयोग को नई दिल्ली के मेटकाफ हाउस में स्थापित किया गया था। शुरुआती दौर में इसका स्वरूप सीमित था और यह मुख्य रूप से सलाह देने वाली संस्था के रूप में कार्य करता था। उसके अधिकार आज के संघ लोक सेवा आयोग की तुलना में काफी सीमित थे। फिर भी इस संस्था की स्थापना का महत्व कम नहीं था। पहली बार भारत में सरकारी सेवाओं की भर्ती के लिए एक स्थायी आयोग अस्तित्व में आया था। यही संस्था आगे चलकर प्रशासनिक भर्ती की आधुनिक व्यवस्था की नींव बनी।
1935 में बदला स्वरूप, नाम हुआ संघीय लोक सेवा आयोग
लोक सेवा आयोग का इतिहास यहीं नहीं रुका। भारत के संवैधानिक विकास के अगले चरण में भारत शासन अधिनियम, 1935 आया। इस व्यवस्था के तहत लोक सेवा आयोग का स्वरूप बदलकर संघीय लोक सेवा आयोग किया गया। आधिकारिक अभिलेखों और भारत सरकार की जानकारी के अनुसार यह परिवर्तन 1937 में प्रभावी हुआ। इस बदलाव ने आयोग की भूमिका को पहले की तुलना में व्यापक स्वरूप दिया। हालांकि भारत अभी स्वतंत्र नहीं हुआ था, लेकिन प्रशासनिक सेवाओं के लिए एक केंद्रीय आयोग की आवश्यकता अब स्थापित हो चुकी थी। यही वह संस्था थी जिसने आगे चलकर स्वतंत्र भारत में एक नए संवैधानिक स्वरूप को जन्म दिया।
आजादी के बाद आया सबसे बड़ा बदलाव
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। इसके बाद देश की प्रशासनिक व्यवस्था को लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप ढालने की आवश्यकता थी। सरकारी सेवाओं में नियुक्ति के लिए ऐसी संस्था जरूरी थी जो राजनीतिक हस्तक्षेप से अपेक्षाकृत स्वतंत्र रहते हुए योग्यता और निर्धारित नियमों के आधार पर भर्ती प्रक्रिया संचालित कर सके। स्वतंत्रता के बाद संघीय लोक सेवा आयोग का नाम बदलकर संघ लोक सेवा आयोग किया गया। इसके बाद 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ और आयोग को संवैधानिक दर्जा मिला। संघ लोक सेवा आयोग के आधिकारिक इतिहास में इस परिवर्तन को संस्था की यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव बताया गया है। भारत सरकार के अनुसार 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ आयोग को वर्तमान संवैधानिक स्वरूप प्राप्त हुआ। संविधान के भाग 14 में अनुच्छेद 315 से 323 तक संघ और राज्यों के लोक सेवा आयोगों से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।
संविधान ने आयोग को दी स्वतंत्र पहचान
संघ लोक सेवा आयोग को संवैधानिक संस्था बनाने के पीछे एक महत्वपूर्ण विचार था—सरकारी सेवाओं में नियुक्ति की प्रक्रिया को संस्थागत, निष्पक्ष और निर्धारित नियमों के अधीन रखना। संविधान के अनुच्छेद 315 में संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोगों की व्यवस्था की गई है। अनुच्छेद 316 सदस्यों की नियुक्ति और कार्यकाल से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 317 पद से हटाने और निलंबन की व्यवस्था से संबंधित है। इसी तरह अनुच्छेद 320 आयोग के कार्यों को परिभाषित करता है। इसमें संघ की सेवाओं में नियुक्ति के लिए परीक्षाएं आयोजित करना तथा भर्ती की विधियों, पदोन्नति और अनुशासनात्मक मामलों जैसे विषयों पर सरकार को सलाह देना शामिल है। इस संवैधानिक ढांचे ने आयोग को एक सामान्य सरकारी विभाग से अलग पहचान दी। आयोग को संविधान में स्थान मिलने का अर्थ यह था कि उसकी भूमिका केवल किसी एक परीक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि संघ की सेवाओं में भर्ती से जुड़ी व्यापक संस्थागत जिम्मेदारियां उसके पास आईं।
सिविल सेवा परीक्षा से आगे भी है आयोग की भूमिका
आम लोगों के बीच संघ लोक सेवा आयोग का नाम मुख्य रूप से सिविल सेवा परीक्षा के कारण जाना जाता है। लेकिन इसकी जिम्मेदारियां इससे कहीं अधिक व्यापक हैं। आयोग संघ की विभिन्न सेवाओं और पदों पर भर्ती के लिए अलग-अलग परीक्षाएं आयोजित करता है। इसके अलावा पदोन्नति, भर्ती नियमों और कुछ अनुशासनात्मक मामलों में भी आयोग की भूमिका रहती है।
संघ लोक सेवा आयोग के अनुसार उसका संवैधानिक दायित्व संघ की सेवाओं में भर्ती के लिए परीक्षाएं आयोजित करना तथा निर्धारित मामलों में सरकार को सलाह देना है। आयोग हर वर्ष अपनी गतिविधियों की रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है।
यही कारण है कि आयोग को केवल परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था के रूप में देखना उसके वास्तविक संवैधानिक दायरे को छोटा करके देखने जैसा होगा।
धौलपुर हाउस से जुड़ी है एक और दिलचस्प कहानी
आज संघ लोक सेवा आयोग का मुख्यालय नई दिल्ली के धौलपुर हाउस में है। यह भवन मूल रूप से धौलपुर रियासत के महाराजा-राणा उदय भान सिंह का राजधानी निवास था और वर्ष 1920 में बनाया गया था। स्वतंत्रता के बाद 1952 में इसे आयोग के मुख्यालय के रूप में निर्धारित किया गया। इस भवन ने पिछले कई दशकों में भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के विकास को करीब से देखा है। देश के लाखों अभ्यर्थियों के लिए धौलपुर हाउस केवल एक सरकारी भवन नहीं, बल्कि उस चयन प्रक्रिया का प्रतीक बन चुका है जिसके माध्यम से देश की प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकारी चुने जाते हैं।
पहले अध्यक्ष से लेकर संवैधानिक संस्था तक का सफर
यदि संघ लोक सेवा आयोग की पूरी यात्रा को एक नजर में देखें तो इसकी कहानी कई चरणों में दिखाई देती है। 1 अक्टूबर 1926 को लोक सेवा आयोग के रूप में इसकी शुरुआत हुई। इसके पहले अध्यक्ष सर रॉस बार्कर थे। इसके बाद 1937 में यह संघीय लोक सेवा आयोग बना। स्वतंत्रता के बाद इसका नाम संघ लोक सेवा आयोग हुआ और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ इसे संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ। इस पूरी यात्रा में संस्था का नाम भले बदलता रहा, लेकिन सरकारी सेवाओं में योग्य व्यक्तियों के चयन की मूल आवश्यकता बनी रही। स्वतंत्र भारत में इसी उद्देश्य को लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के साथ जोड़ा गया।
100 वर्ष पूरे होने पर क्यों महत्वपूर्ण है आज का दिन?
1 अक्टूबर 2026 केवल आयोग की स्थापना की वर्षगांठ नहीं है, बल्कि एक सदी की संस्थागत यात्रा का पड़ाव है। आयोग ने जिस समय काम शुरू किया था, उस समय भारत औपनिवेशिक शासन के अधीन था। आज वही संस्था स्वतंत्र भारत के संविधान के तहत काम करने वाली संवैधानिक संस्था है। एक सदी के दौरान देश की शासन व्यवस्था, तकनीक, शिक्षा, परीक्षा पद्धति और प्रशासनिक जरूरतों में बड़े बदलाव हुए। आयोग की भर्ती व्यवस्था भी समय के साथ बदलती रही। आज परीक्षा प्रक्रिया में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है और पारदर्शिता तथा अभ्यर्थियों की पहचान की सुरक्षा जैसे विषयों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। भारत सरकार के 30 सितंबर 2026 के विवरण के अनुसार आयोग ने हाल के वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित चेहरे की पहचान जैसी तकनीकी पहल भी अपनाई है।
आज की पीढ़ी के लिए इतिहास का क्या संदेश है?
संघ लोक सेवा आयोग की एक सदी की यात्रा यह बताती है कि संस्थाएं एक दिन में अपने वर्तमान स्वरूप तक नहीं पहुंचतीं। 1926 में एक सीमित सलाहकारी निकाय के रूप में शुरू हुई संस्था ने संवैधानिक विकास के कई पड़ाव पार किए और 1950 में संविधान के तहत स्वतंत्र संवैधानिक पहचान प्राप्त की।
आज देश के लाखों विद्यार्थी संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। उनके लिए यह संस्था प्रशासनिक सेवा में प्रवेश का माध्यम है, लेकिन इतिहास के नजरिए से देखें तो यह भारत की प्रशासनिक व्यवस्था के विकास की एक लंबी कहानी भी है। सर रॉस बार्कर से शुरू हुआ अध्यक्षों का सिलसिला आज अलग संवैधानिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के साथ आगे बढ़ रहा है।
नाम बदला, स्वरूप बदला, लेकिन उद्देश्य की जरूरत बनी रही
संघ लोक सेवा आयोग की स्थापना की कहानी केवल एक सरकारी संस्था के गठन की कहानी नहीं है। यह भारत में योग्यता आधारित सरकारी भर्ती की उस प्रक्रिया की कहानी है, जिसकी शुरुआत औपनिवेशिक काल में हुई और जिसने स्वतंत्र भारत में संवैधानिक रूप ग्रहण किया। 1 अक्टूबर 1926 को स्थापित संस्था का पहला नाम लोक सेवा आयोग था। इसके पहले अध्यक्ष सर रॉस बार्कर थे। 1937 में यह संघीय लोक सेवा आयोग बना और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ संघ लोक सेवा आयोग के रूप में संवैधानिक संस्था बन गया।
आज जब यह संस्था अपने 100 वर्ष पूरे कर रही है, तब इसके इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि एक सीमित सलाहकारी निकाय से शुरू हुई यात्रा ने भारतीय गणराज्य की संवैधानिक व्यवस्था में एक स्थायी स्थान बनाया। 1926 का वह छोटा-सा प्रशासनिक प्रयोग आज ऐसी संस्था में बदल चुका है, जिसके माध्यम से देश की सार्वजनिक सेवाओं के लिए अधिकारियों के चयन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई जाती है।






