
संवाद 24 डेस्क। दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई परिवर्तन योजना के दायरे को और व्यापक बनाने पर विचार किया जा रहा है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार सरकार इस योजना में तरलीकृत प्राकृतिक गैस से चलने वाले वाहनों को भी शामिल करने की संभावना पर विचार कर रही है। यदि इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो पुराने और अधिक प्रदूषण फैलाने वाले ट्रकों तथा बसों को बदलने वाले वाहन मालिकों के सामने स्वच्छ ईंधन वाले वाहनों का एक और विकल्प उपलब्ध हो सकता है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि फिलहाल तरलीकृत प्राकृतिक गैस वाहनों को योजना में शामिल करने का अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। वर्तमान व्यवस्था में मुख्य रूप से भारत चरण-6 या उससे अधिक कड़े उत्सर्जन मानकों वाले वाहनों और विद्युत वाहनों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
आखिर क्या है परिवर्तन योजना और क्यों पड़ी इसकी जरूरत?
परिवर्तन योजना का पूरा उद्देश्य दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पुराने, अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले व्यावसायिक वाहनों को धीरे-धीरे हटाकर अपेक्षाकृत स्वच्छ और आधुनिक वाहनों को सड़क पर लाना है। केंद्र सरकार ने जून 2026 में इस योजना को मंजूरी दी थी। इसके लिए कुल 9,585 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रावधान किया गया है, जिसमें केंद्र सरकार की ओर से 5,041 करोड़ रुपये का बजटीय सहयोग शामिल है। योजना का लक्ष्य दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पंजीकृत दो लाख से अधिक पुराने ट्रकों और बसों को चरणबद्ध तरीके से बदलना है।
योजना का क्रियान्वयन सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के माध्यम से किया जा रहा है तथा इसमें दिल्ली के साथ हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र वाले जिले शामिल हैं। इसका मूल उद्देश्य केवल पुराने वाहन हटाना नहीं है, बल्कि ऐसे वाहनों को बढ़ावा देना है जिनसे परिवहन क्षेत्र में प्रदूषण का भार कम हो। यही वजह है कि अब तरलीकृत प्राकृतिक गैस को संभावित विकल्प के रूप में देखने की चर्चा महत्वपूर्ण हो गई है।
पुराने ट्रक और बस ही क्यों हैं निशाने पर?
दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण की समस्या केवल निजी कारों तक सीमित नहीं है। भारी व्यावसायिक वाहन भी प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार सड़क परिवहन क्षेत्र में भारी वाहनों का योगदान प्रदूषण के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है और भारी वाहनों के लिए संपीड़ित प्राकृतिक गैस की तुलना में तरलीकृत प्राकृतिक गैस को लंबी दूरी के परिवहन में एक संभावित विकल्प माना गया है।
भारी ट्रकों की समस्या इसलिए भी अलग है क्योंकि उन्हें अधिक भार के साथ लंबी दूरी तय करनी होती है। ऐसे वाहनों के लिए ईंधन की उपलब्धता, वाहन की दूरी तय करने की क्षमता और ईंधन भरने में लगने वाला समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसी कारण सरकार और उद्योग जगत लंबे मार्गों पर चलने वाले भारी वाहनों के लिए वैकल्पिक ईंधनों पर लगातार विचार कर रहे हैं।
तरलीकृत प्राकृतिक गैस क्या है और इसे स्वच्छ विकल्प क्यों माना जाता है?
तरलीकृत प्राकृतिक गैस प्राकृतिक गैस को अत्यधिक कम तापमान पर तरल अवस्था में बदलकर तैयार की जाती है। तरल रूप में इसका आयतन काफी कम हो जाता है, जिससे इसे विशेष टैंकों में संग्रहित और लंबी दूरी तक परिवहन किया जा सकता है। वाहनों में इसका उपयोग मुख्य रूप से भारी और लंबी दूरी तय करने वाले वाहनों के संदर्भ में चर्चा में रहा है।
भारत में तरलीकृत प्राकृतिक गैस को परिवहन ईंधन के रूप में बढ़ावा देने की संभावना पर पहले भी सरकारी स्तर पर चर्चा हो चुकी है। नीति आयोग से जुड़ी एक विस्तृत रिपोर्ट में इसे मध्यम और भारी व्यावसायिक वाहनों के लिए डीजल के संभावित विकल्प के रूप में देखा गया था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि प्राकृतिक गैस आधारित इंजन तकनीक पहले से विकसित है और भारी वाहनों में इसके इस्तेमाल की संभावनाओं पर काम किया जा सकता है।
प्रदूषण में कितनी कमी आ सकती है?
तरलीकृत प्राकृतिक गैस को लेकर सबसे बड़ा आकर्षण इसके अपेक्षाकृत कम स्थानीय वायु प्रदूषण उत्सर्जन में देखा जाता है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड से संबंधित हालिया अध्ययन में तरलीकृत प्राकृतिक गैस से चलने वाले ट्रकों के लिए नाइट्रोजन ऑक्साइड और सूक्ष्म कणों के उत्सर्जन में डीजल की तुलना में उल्लेखनीय कमी की संभावना बताई गई है। अध्ययन में कुछ परिस्थितियों में नाइट्रोजन ऑक्साइड में लगभग 59 प्रतिशत और सूक्ष्म कणों में 91 से 98 प्रतिशत तक कमी के आंकड़े दिए गए हैं। साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 15 से 30 प्रतिशत तक कमी की संभावना बताई गई है।
हालांकि इन आंकड़ों को हर वाहन और हर परिचालन परिस्थिति पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता। वाहन की तकनीक, ईंधन की गुणवत्ता, इंजन की स्थिति, वाहन का भार, चलने का मार्ग और ईंधन आपूर्ति व्यवस्था जैसे अनेक कारक वास्तविक उत्सर्जन को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा प्राकृतिक गैस के पूरे जीवनचक्र का आकलन करते समय मीथेन के रिसाव जैसे मुद्दों को भी ध्यान में रखना पड़ता है। इसलिए तरलीकृत प्राकृतिक गैस को प्रदूषण की समस्या का पूर्ण समाधान मानने के बजाय संक्रमणकालीन स्वच्छ ईंधन के विकल्प के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
अगर योजना में शामिल हुआ तो किसे मिलेगा फायदा?
यदि सरकार तरलीकृत प्राकृतिक गैस से चलने वाले वाहनों को परिवर्तन योजना में औपचारिक रूप से शामिल करती है, तो इसका सबसे सीधा लाभ उन पुराने ट्रक और बस मालिकों को मिल सकता है जो अपने प्रदूषणकारी वाहनों को बदलना चाहते हैं। वर्तमान योजना में पात्र वाहन मालिकों को कई प्रकार की आर्थिक सुविधाएं दी जा रही हैं। इनमें वाहन ऋण पर पांच प्रतिशत ब्याज सहायता, दस वर्षों के लिए सड़क कर में छूट, पंजीकरण शुल्क से पूरी छूट और नए वाहन की कीमत पर कम से कम आठ प्रतिशत निर्माता छूट शामिल है।
वर्तमान नियमों के अनुसार भारत चरण-6 मानक वाले डीजल या संपीड़ित प्राकृतिक गैस वाहनों के खरीदारों को पांच वर्षों तक वाहन की श्रेणी के आधार पर प्रतिमाह 1,200 से 4,800 रुपये तक ईंधन कूपन का प्रावधान है। विद्युत वाहन खरीदने वालों के लिए वाहन की श्रेणी के अनुसार 64,000 रुपये से 2.56 लाख रुपये तक एकमुश्त प्रोत्साहन का प्रावधान है।
यदि तरलीकृत प्राकृतिक गैस वाहनों को भी इसी ढांचे में शामिल किया जाता है, तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उनके लिए सरकार किस तरह की आर्थिक सहायता तय करती है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि उन्हें वर्तमान संपीड़ित प्राकृतिक गैस वाहनों के समान ईंधन कूपन मिलेगा या अलग व्यवस्था बनाई जाएगी।
वाहन मालिकों के साथ निर्माताओं को भी मिल सकता है लाभ
योजना का संभावित विस्तार केवल वाहन मालिकों तक सीमित नहीं रहेगा। यदि तरलीकृत प्राकृतिक गैस से चलने वाले ट्रकों और बसों की मांग बढ़ती है तो वाहन निर्माता भी इस क्षेत्र में नए मॉडल और तकनीक विकसित करने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं। इससे प्राकृतिक गैस आधारित भारी वाहनों का बाजार विस्तार पा सकता है।
वर्तमान परिवर्तन योजना में वाहन निर्माताओं की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। अगस्त 2026 तक योजना के लिए 15 वाहन निर्माताओं के साथ समझौते किए जा चुके थे और 42 बैंक तथा गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान वाहन ऋण पर ब्याज सहायता देने के लिए इससे जुड़ चुके थे।
क्या इससे डीजल वाहनों की जगह तुरंत तरलीकृत प्राकृतिक गैस ले लेगी?
ऐसा मानना फिलहाल उचित नहीं होगा। तरलीकृत प्राकृतिक गैस का उपयोग बढ़ाने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता ईंधन भरने के पर्याप्त केंद्रों की है। भारी वाहन यदि लंबी दूरी तय करते हैं तो उनके मार्ग पर ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित होना जरूरी है। केवल वाहन उपलब्ध करा देने से परिवहन व्यवस्था नहीं बदल सकती।
भारत में तरलीकृत प्राकृतिक गैस के लिए आधारभूत ढांचा विकसित करने पर पहले से काम चल रहा है। नीति आयोग की रिपोर्ट में देश के प्रमुख मार्गों पर तरलीकृत प्राकृतिक गैस के ईंधन केंद्र विकसित करने की पहल का उल्लेख किया गया था।
इसलिए यदि सरकार परिवर्तन योजना में इस ईंधन को शामिल करती है तो इसके साथ ईंधन केंद्रों का विस्तार, आपूर्ति व्यवस्था और वाहनों की बिक्री तथा रखरखाव से जुड़ी सुविधाओं को भी समान गति से विकसित करना होगा।
दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लिए क्यों महत्वपूर्ण हो सकता है फैसला?
दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण की समस्या विशेष रूप से सर्दियों के दौरान गंभीर हो जाती है। व्यावसायिक वाहनों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए पहले से ही स्वच्छ ईंधन वाले वाहनों को प्राथमिकता देने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने दिल्ली में आने वाले व्यावसायिक मालवाहक वाहनों के लिए भारत चरण-6, संपीड़ित प्राकृतिक गैस, तरलीकृत प्राकृतिक गैस और विद्युत वाहनों को लेकर पहले ही स्वच्छ ईंधन संबंधी प्रावधान किए हैं।
इससे यह स्पष्ट होता है कि तरलीकृत प्राकृतिक गैस को दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की परिवहन व्यवस्था में पूरी तरह अनजान ईंधन नहीं माना जा रहा है। अब यदि परिवर्तन योजना के प्रोत्साहन ढांचे में भी इसे जगह मिलती है तो पुराने वाहनों को बदलने की प्रक्रिया में वाहन मालिकों को एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध हो सकता है।
क्या तरलीकृत प्राकृतिक गैस विद्युत वाहनों की जगह लेगी?
परिवर्तन योजना में तरलीकृत प्राकृतिक गैस को शामिल करने की चर्चा को विद्युत वाहनों के विकल्प के रूप में देखना उचित नहीं होगा। दोनों तकनीकों की अपनी अलग उपयोगिता है। विद्युत वाहन विशेष रूप से उन मार्गों और परिचालन परिस्थितियों में उपयोगी हो सकते हैं जहां चार्जिंग की सुविधा उपलब्ध हो और वाहन का दैनिक संचालन अपेक्षाकृत सीमित दूरी का हो। इसके विपरीत लंबी दूरी और भारी माल ढुलाई वाले वाहनों के लिए तरलीकृत प्राकृतिक गैस पर चर्चा अधिक दिखाई देती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारी मालवाहक वाहनों में विद्युत तकनीक तेजी से बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार 2025 में दुनिया भर में विद्युत ट्रकों की बिक्री दोगुनी होकर कुल ट्रक बिक्री का लगभग नौ प्रतिशत हो गई।
इसलिए भारत में भी आने वाले समय में परिवहन क्षेत्र एक ही ईंधन पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न तकनीकों के मिश्रण की ओर बढ़ सकता है।
सबसे बड़ा सवाल: फायदा किसे और कितनी जल्दी?
परिवर्तन योजना के विस्तार से सबसे बड़ा फायदा उन वाहन मालिकों को मिल सकता है जिनके पास पुराने भारत चरण-4 या उससे पहले के मानकों वाले ट्रक और बस हैं और जो पात्रता शर्तों के अंतर्गत आते हैं। लेकिन तरलीकृत प्राकृतिक गैस को लेकर वास्तविक लाभ तभी स्पष्ट होगा जब सरकार औपचारिक दिशा-निर्देश जारी करेगी।
योजना के मौजूदा ढांचे में दो लाख से अधिक पुराने ट्रकों और बसों को बदलने का लक्ष्य है। अगस्त 2026 के अंत तक 1,300 से अधिक लाभार्थियों का पंजीकरण हो चुका था। सरकार ने योजना को अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए परिवहन नगरों, टोल केंद्रों, ईंधन केंद्रों और क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों में जागरूकता अभियान भी शुरू किया है।
तरलीकृत प्राकृतिक गैस को परिवर्तन योजना में शामिल करने की संभावित चर्चा यह संकेत देती है कि भारत का स्वच्छ परिवहन संक्रमण केवल एक तकनीक पर आधारित नहीं रहना चाहता। भारी परिवहन क्षेत्र की अपनी अलग आवश्यकताएं हैं और यहां ईंधन की दूरी, भार क्षमता, भरने का समय तथा आधारभूत ढांचा जैसे विषय महत्वपूर्ण हैं।
फिर भी पर्यावरणीय दृष्टि से किसी भी नए ईंधन का मूल्यांकन केवल वाहन से निकलने वाले धुएं के आधार पर नहीं होना चाहिए। ईंधन के उत्पादन, परिवहन, भंडारण और उपयोग के पूरे चक्र को देखना आवश्यक है। तरलीकृत प्राकृतिक गैस से स्थानीय वायु प्रदूषण में कमी की संभावनाएं स्पष्ट हैं, लेकिन मीथेन उत्सर्जन और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता जैसे प्रश्न भी नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण रहेंगे।
अंततः यदि सरकार इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है तो पुराने ट्रकों और बसों को हटाने की प्रक्रिया में वाहन मालिकों को अधिक विकल्प मिल सकते हैं। इससे एक ओर पुराने प्रदूषणकारी वाहनों की संख्या कम करने में सहायता मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक गैस आधारित भारी परिवहन के लिए बाजार और आधारभूत ढांचे को गति मिल सकती है। लेकिन अंतिम लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार तरलीकृत प्राकृतिक गैस वाहनों के लिए किस प्रकार की आर्थिक सहायता, पात्रता और ईंधन संबंधी व्यवस्था तय करती है। फिलहाल इसे सरकार के विचाराधीन संभावित विस्तार के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि लागू हो चुकी व्यवस्था के रूप में।






