
संवाद 24 डेस्क। हिंदू पंचांग और ज्योतिष परंपरा में पंचक को एक विशेष अवधि माना गया है। जब चंद्रमा कुछ विशेष नक्षत्रों से होकर गुजरता है, तब बनने वाले इस काल को पंचक कहा जाता है। सितंबर 2026 में पंचक की शुरुआत 23 सितंबर की रात 9 बजकर 57 मिनट से बताई गई है और इसका समापन 28 सितंबर की सुबह लगभग 10 बजकर 16 मिनट पर होगा। इस बार पंचक बुधवार से आरंभ हो रहा है और कुछ ज्योतिषीय स्रोत इसे राज पंचक के नाम से संबोधित कर रहे हैं।
दिन में नहीं, रात से शुरू होगा पंचक
पंचक को लेकर सोशल मीडिया और समाचारों में ‘आज से पंचक शुरू’ जैसी सूचनाएं दिखाई दे रही हैं, लेकिन पंचांग के समय को ध्यान से समझना जरूरी है। उपलब्ध पंचांग गणनाओं के अनुसार 23 सितंबर को पंचक का आरंभ रात 9:57 बजे के आसपास होगा। इसका अर्थ है कि 23 सितंबर का पूरा दिन पंचक के अंतर्गत नहीं आएगा। पंचक की अवधि 28 सितंबर की सुबह लगभग 10:16 बजे तक बताई गई है। स्थान के अनुसार पंचांग गणना में कुछ मिनट का अंतर संभव है।
आखिर क्या होता है पंचक?
ज्योतिषीय परंपरा के अनुसार जब चंद्रमा धनिष्ठा के अंतिम चरण, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्रों से होकर गुजरता है, तब इस अवधि को पंचक कहा जाता है। इन पांच नक्षत्रों के कारण ही इसे पंचक नाम दिया गया है। सामान्यतः यह अवधि लगभग पांच दिनों के आसपास रहती है।
धार्मिक मान्यताओं में पंचक के दौरान कुछ विशिष्ट कार्यों को टालने की सलाह दी जाती है। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये नियम ज्योतिषीय और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इनके पीछे वैज्ञानिक कारण-परिणाम का प्रमाण स्थापित नहीं है। इसलिए इन्हें धार्मिक परंपरा के रूप में ही समझना उचित है।
‘राज पंचक’ नाम क्यों दिया जा रहा है?
पंचक के नामकरण को लेकर विभिन्न परंपराओं में अलग-अलग मत मिलते हैं। कुछ ज्योतिषीय स्रोत पंचक को उसके आरंभ होने वाले वार के आधार पर अलग नामों से बताते हैं। वर्तमान सितंबर 2026 के पंचक को कुछ समाचार स्रोत बुधवार से आरंभ होने के कारण ‘राज पंचक’ कह रहे हैं। वहीं कुछ पंचांग परंपराओं में बुधवार और गुरुवार से शुरू होने वाले पंचक को दोषमुक्त या अलग श्रेणी में माना जाता है।
इसलिए ‘राज पंचक’ शब्द को लेकर पाठकों को यह समझना चाहिए कि यह ज्योतिषीय वर्गीकरण है, कोई सरकारी या वैज्ञानिक श्रेणी नहीं।
पहला काम—दक्षिण दिशा की यात्रा से बचने की मान्यता
पंचक से जुड़े पारंपरिक नियमों में दक्षिण दिशा की यात्रा को प्रमुख रूप से वर्जित बताया जाता है। धार्मिक मान्यता में दक्षिण दिशा का संबंध यम से जोड़ा जाता है। इसी वजह से पंचक के दौरान दक्षिण दिशा की ओर यात्रा को टालने की सलाह दी जाती रही है।
हालांकि आधुनिक जीवन में यात्रा नौकरी, चिकित्सा, शिक्षा या अन्य आवश्यक कारणों से करनी पड़ सकती है। ऐसे में इस नियम को धार्मिक मान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए। आवश्यक यात्रा को लेकर कोई वैज्ञानिक निषेध मौजूद नहीं है।
दूसरा काम—घर की छत की ढलाई टालने की परंपरा
पंचक में घर की छत डालने या छत की ढलाई से बचने की भी काफी प्रचलित है। लोकमान्यता के अनुसार इस अवधि में छत का निर्माण करने से घर में परेशानी या आर्थिक नुकसान हो सकता है।
यही कारण है कि पंचक के दौरान निर्माण कार्य की योजना बनाने वाले लोग शुभ समय देखकर छत की ढलाई कराने की परंपरा का पालन करते हैं। हालांकि इस मान्यता को लेकर कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि पंचक में छत डालने से अनिवार्य रूप से कोई नुकसान होता है।
तीसरा काम—चारपाई या पलंग बनवाने से क्यों बचते हैं?
पारंपरिक पंचक नियमों में चारपाई, पलंग या खाट बनाने को भी वर्जित कार्यों में गिना जाता है। मान्यता है कि पंचक के दौरान इस तरह का कार्य करने से परिवार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। कुछ परंपराओं में नए पलंग या शय्या तैयार करने से भी बचने की सलाह दी जाती है।
यह नियम मुख्य रूप से लोकविश्वास और धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। इसे किसी चिकित्सकीय या वैज्ञानिक खतरे के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
चौथा काम—लकड़ी और ईंधन इकट्ठा करने की मनाही
पंचक के दौरान लकड़ी, ईंधन, घास या जलने वाली वस्तुओं का अनावश्यक रूप से संग्रह करने से बचने की परंपरा भी बताई गई है। परंपरागत मान्यता में इसे पंचक के पांच प्रमुख वर्जित कार्यों में शामिल किया जाता है।
आज के समय में इस नियम का व्यावहारिक महत्व पहले की तुलना में अलग हो सकता है। ग्रामीण जीवन में लकड़ी और ईंधन के संग्रह का संबंध दैनिक जीवन से था, जबकि वर्तमान शहरी जीवन में इसका स्वरूप काफी बदल चुका है। फिर भी धार्मिक परंपरा का पालन करने वाले परिवार इस नियम को अपनी मान्यता के अनुसार अपनाते हैं।
पांचवां और सबसे संवेदनशील नियम—अंतिम संस्कार
पंचक से जुड़ी मान्यताओं में पंचक के दौरान मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार से संबंधित विशेष विधि का उल्लेख मिलता है। परंपरा के अनुसार पंचक में अंतिम संस्कार करते समय विशेष शांति विधान करने की बात कही जाती है।
यह विषय अत्यंत संवेदनशील है। किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार को केवल पंचक के कारण अनिश्चित समय तक टालना उचित नहीं माना जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में परिवार को अपने धार्मिक आचार्य तथा स्थानीय परंपरा के अनुसार आवश्यक विधि की जानकारी लेनी चाहिए। स्वास्थ्य और प्रशासनिक परिस्थितियों में लागू नियमों को भी प्राथमिकता देना आवश्यक है।
क्या पंचक में हर शुभ काम बंद हो जाता है?
यह एक आम धारणा है कि पंचक लगते ही हर प्रकार का शुभ काम वर्जित हो जाता है। लेकिन उपलब्ध स्रोतों में पंचक से जुड़े नियमों की व्याख्या अलग-अलग मिलती है। कुछ स्रोत विशेष रूप से ऊपर बताए गए पांच कार्यों को वर्जित बताते हैं, जबकि कुछ ज्योतिषीय परंपराएं विवाह, गृहप्रवेश या अन्य शुभ कार्यों के लिए अलग से मुहूर्त देखने की सलाह देती हैं।
इसलिए यह कहना कि पंचक के पांच दिनों में हर शुभ काम बिल्कुल नहीं किया जा सकता, एक सार्वभौमिक नियम के रूप में सही नहीं होगा। किसी विशेष धार्मिक कार्य के लिए संबंधित पंचांग और स्थानीय परंपरा के अनुसार मुहूर्त देखना अधिक उचित है।
पूजा-पाठ और दान के लिए क्या मान्यता है?
पंचक के दौरान पूजा, जप, ध्यान, दान और धार्मिक गतिविधियों को लेकर सामान्यतः सकारात्मक मान्यताएं भी मिलती हैं। कई धार्मिक परंपराओं में इस अवधि को आध्यात्मिक साधना, मंत्र-जप और दान-पुण्य के लिए उपयोगी माना जाता है।
इसका अर्थ यह है कि पंचक को केवल ‘डरने’ या ‘अशुभ’ अवधि के रूप में देखना धार्मिक परंपरा की पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करता। पंचक से जुड़े निषेधों के साथ धार्मिक साधना और संयम की परंपराएं भी जुड़ी हुई हैं।
पंचक के नियमों को लेकर सबसे जरूरी सावधानी
आज के समय में पंचक से जुड़े संदेश इंटरनेट और सामाजिक माध्यमों पर तेजी से फैलते हैं। कई बार इनमें ऐसी बातें भी जोड़ दी जाती हैं जिनका उल्लेख पारंपरिक पंचक नियमों में नहीं मिलता। इसलिए किसी भी वायरल संदेश को धार्मिक सत्य मानने से पहले विश्वसनीय पंचांग या प्रमाणित स्रोत से समय और नियमों की पुष्टि करना जरूरी है।
विशेष रूप से ‘पंचक में यह काम करने से निश्चित रूप से अनर्थ होगा’ जैसे दावों को सावधानी से देखना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं का सम्मान किया जा सकता है, लेकिन उन्हें प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
इस बार की पंचक अवधि एक नजर में
सितंबर 2026 के इस पंचक का आरंभ 23 सितंबर की रात 9:57 बजे और समापन 28 सितंबर की सुबह लगभग 10:16 बजे बताया गया है। इस अवधि में पंचक से जुड़े पारंपरिक पांच प्रमुख निषेधों में दक्षिण दिशा की यात्रा, छत की ढलाई, चारपाई या पलंग बनाना, लकड़ी या ईंधन का संग्रह तथा पंचक शांति विधि के बिना अंतिम संस्कार को शामिल किया जाता है।
हालांकि अलग-अलग पंचांगों और परंपराओं में समय तथा नियमों की व्याख्या में मामूली अंतर हो सकता है। इसलिए किसी विशिष्ट धार्मिक आयोजन के लिए स्थानीय पंचांग के समय को प्राथमिकता देना चाहिए।
मान्यता समझें, अंधविश्वास नहीं
राज पंचक को लेकर लोगों में धार्मिक उत्सुकता स्वाभाविक है। पांच दिनों तक चलने वाली इस अवधि से जुड़े नियम भारतीय ज्योतिष और लोकपरंपरा का हिस्सा हैं। दक्षिण दिशा की यात्रा, छत की ढलाई, चारपाई बनाने, ईंधन संग्रह और अंतिम संस्कार से जुड़े विशेष नियम सदियों से चली आ रही मान्यताओं में मिलते हैं।
लेकिन इन मान्यताओं और वैज्ञानिक तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। पंचक के दौरान कोई आवश्यक यात्रा, चिकित्सा संबंधी कार्य या जीवन से जुड़ी अनिवार्य गतिविधि केवल भय के कारण रोक देना उचित नहीं है। धार्मिक विश्वास रखने वाले लोग अपनी परंपरा के अनुसार शुभ मुहूर्त और धार्मिक विधि का पालन कर सकते हैं।






