
संवाद 24 डेस्क। पुरी के भगवान जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी परंपराओं में कुछ रहस्य ऐसे हैं, जिनके बारे में सदियों से श्रद्धा, जिज्ञासा और अनेक कथाएं साथ-साथ चलती आई हैं। इनमें सबसे चर्चित रहस्य है भगवान जगन्नाथ की काठ की मूर्ति के भीतर मौजूद बताए जाने वाले ‘ब्रह्म पदार्थ’ का। इंटरनेट और लोकप्रचलित कथाओं में अक्सर यह दावा किया जाता है कि इस ब्रह्म पदार्थ के रूप में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का हृदय आज भी भगवान जगन्नाथ के विग्रह में मौजूद है और वह धड़कता है।
यह दावा सुनने में जितना रहस्यमय लगता है, उसके पीछे उतनी ही जटिल धार्मिक परंपरा है। लेकिन यहां आस्था और प्रमाण के बीच अंतर समझना जरूरी है। उपलब्ध शोध सामग्री में ब्रह्म पदार्थ की पहचान को लेकर कोई सर्वमान्य निष्कर्ष नहीं मिलता। ओडिशा सरकार की Odisha Review में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक समूहों ने ब्रह्म पदार्थ के बारे में अलग-अलग धारणाएं व्यक्त की हैं, लेकिन उसकी निश्चित पहचान प्रमाणित नहीं है।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि आस्था सही है या गलत, बल्कि तथ्यात्मक रूप से यह समझना जरूरी है कि ‘श्रीकृष्ण का जीवित हृदय’ वाली बात कहां से आई, ब्रह्म पदार्थ क्या है, नवकलेवर में क्या होता है और क्या किसी वैज्ञानिक जांच से इस दावे की पुष्टि हुई है?
सबसे पहले जानिए ब्रह्म पदार्थ क्या है
भगवान जगन्नाथ की परंपरा में काठ के विग्रहों को समय-समय पर नया शरीर दिया जाता है। इस प्रक्रिया को नवकलेवर कहा जाता है। ‘नव’ यानी नया और ‘कलेवर’ यानी शरीर। इस धार्मिक परंपरा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन के पुराने काष्ठ विग्रहों के स्थान पर नए विग्रह बनाए जाते हैं।
नए विग्रहों के निर्माण के लिए विशेष नीम के वृक्षों का चयन किया जाता है। यह सामान्य लकड़ी काटने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि अनेक धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ी विस्तृत परंपरा है। शोध सामग्री के अनुसार, इसके बाद पुराने विग्रहों में स्थित माने जाने वाले ‘ब्रह्म पदार्थ’ को नए विग्रहों में स्थानांतरित करने की गुप्त रस्म होती है। इसे घट परिवर्तन या ब्रह्म परिवर्तन से जोड़ा जाता है।
यहीं से इस पूरे रहस्य का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सामने आता है। आखिर यह ब्रह्म पदार्थ है क्या? इसका उत्तर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
क्या ब्रह्म पदार्थ सचमुच श्रीकृष्ण का हृदय है?
लोकप्रिय धार्मिक मान्यता में इसका संबंध श्रीकृष्ण से जोड़ा जाता है। इस परंपरा के एक रूप के अनुसार, श्रीकृष्ण के देह त्याग के बाद उनका अंतिम संस्कार हुआ। मान्यता है कि उनके शरीर का एक दिव्य अंश अग्नि से नष्ट नहीं हुआ। आगे चलकर यही दिव्य अवशेष समुद्र के रास्ते पुरी क्षेत्र तक पहुंचा और भगवान जगन्नाथ के दारु-विग्रह से जुड़ गया।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। उपलब्ध शोध सामग्री में इस अवशेष को हर जगह ‘हृदय’ नहीं कहा गया है। ओडिशा सरकार की Odisha Review में प्रकाशित सामग्री में लिखा गया है कि कुछ आदिवासी परंपराएं इसे श्रीकृष्ण के न जले हुए नाभि-भाग से जोड़ती हैं। दूसरी ओर अन्य परंपराओं में इसे अलग-अलग रूपों में समझा गया है। यानी ‘श्रीकृष्ण का हृदय’ वाली बात ब्रह्म पदार्थ की एकमात्र या सर्वमान्य पहचान नहीं है।
यही अंतर इस विषय को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ब्रह्म पदार्थ एक धार्मिक रहस्य है; उसे निश्चित रूप से श्रीकृष्ण का भौतिक हृदय कहना प्रमाणित तथ्य नहीं है।
श्रीकृष्ण की मृत्यु और अंतिम संस्कार की मूल कथा क्या कहती है?
इस दावे को समझने के लिए श्रीकृष्ण के देह त्याग की प्राचीन कथाओं को भी देखना जरूरी है। महाभारत के मौसल पर्व में श्रीकृष्ण के जीवन के अंतिम चरण का वर्णन मिलता है। जरा नामक शिकारी के बाण से घायल होने के बाद श्रीकृष्ण के देह त्याग और उसके बाद अर्जुन द्वारा अंतिम संस्कार किए जाने का उल्लेख मिलता है। महाभारत के उपलब्ध पाठ में कृष्ण और बलराम के शरीरों का अंतिम संस्कार किए जाने की बात कही गई है।
विष्णु पुराण में भी अर्जुन द्वारा कृष्ण और बलराम के अंतिम संस्कार से संबंधित विवरण मिलता है।
इसका अर्थ यह है कि महाभारत या विष्णु पुराण के इन उपलब्ध विवरणों में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया कि श्रीकृष्ण का हृदय सुरक्षित रह गया और बाद में उसे जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर स्थापित किया गया।
यही वह बिंदु है जहां पौराणिक आख्यान, क्षेत्रीय धार्मिक परंपरा और आधुनिक इंटरनेट पर प्रचलित कहानी एक-दूसरे से अलग हो जाती हैं।
फिर श्रीकृष्ण के हृदय वाली कथा आई कहां से?
भगवान जगन्नाथ और श्रीकृष्ण के संबंध की परंपरा बहुत गहरी है। ओडिशा की धार्मिक संस्कृति में जगन्नाथ को श्रीकृष्ण, विष्णु और पुरुषोत्तम से जोड़ा जाता है। इसी व्यापक धार्मिक संबंध के भीतर ब्रह्म पदार्थ को श्रीकृष्ण के अवशेष से जोड़ने वाली मान्यताएं विकसित हुईं।
एक शोध सामग्री में 15वीं शताब्दी के कवि सरला दास के ओड़िया महाभारत से जुड़ी परंपरा का उल्लेख मिलता है, जिसमें श्रीकृष्ण के शरीर के न जलने वाले अंश और समुद्र में बहने की कथा से जगन्नाथ परंपरा को जोड़ा गया है। यह कथा धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा के लिहाज से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाण के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
अर्थात यह कहना अधिक सटीक होगा कि श्रीकृष्ण के अवशेष और जगन्नाथ के ब्रह्म पदार्थ के बीच संबंध एक प्रचलित धार्मिक मान्यता और क्षेत्रीय परंपरा है।
क्या सच में आज भी धड़कता है श्रीकृष्ण का दिल?
यही वह दावा है जिसने इस रहस्य को सबसे अधिक लोकप्रिय बनाया है। सोशल मीडिया और विभिन्न वीडियो में कभी-कभी कहा जाता है कि नवकलेवर के समय जब ब्रह्म पदार्थ को पुराने विग्रह से नए विग्रह में स्थानांतरित किया जाता है, तब सेवायतों को उसके भीतर ‘धड़कन’ जैसी अनुभूति होती है।
लेकिन इस दावे के समर्थन में कोई सार्वजनिक वैज्ञानिक परीक्षण, मेडिकल प्रमाण या स्वतंत्र प्रयोगशाला रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है। ब्रह्म पदार्थ की वास्तविक पहचान ही सार्वजनिक नहीं है, इसलिए उसके जैविक हृदय होने की वैज्ञानिक पुष्टि का प्रश्न भी नहीं उठता।
हालिया चर्चाओं में भी यह स्पष्ट किया गया है कि ब्रह्म पदार्थ को लेकर अनेक मान्यताएं हैं, लेकिन उसे श्रीकृष्ण का भौतिक हृदय मानने की कोई स्वतंत्र रूप से सत्यापित वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है।
इसलिए ‘आज भी श्रीकृष्ण का दिल धड़क रहा है’ को धार्मिक विश्वास या लोकमान्यता के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, लेकिन इसे स्थापित वैज्ञानिक तथ्य कहना उचित नहीं होगा।
ब्रह्म पदार्थ को कोई देख क्यों नहीं सकता?
ब्रह्म पदार्थ की पहचान जगन्नाथ मंदिर की सबसे गोपनीय धार्मिक परंपराओं में मानी जाती है। नवकलेवर के दौरान इससे जुड़े अनुष्ठान सामान्य श्रद्धालुओं के लिए खुले नहीं होते। शोध सामग्री के अनुसार, विशेष सेवायत इस प्रक्रिया में भाग लेते हैं और परंपरागत गोपनीयता का पालन करते हैं।
यही गोपनीयता इस विषय के प्रति जिज्ञासा को और बढ़ाती है। जब कोई वस्तु सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं जाती और उसके बारे में कोई आधिकारिक विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं होता, तो उसके बारे में अलग-अलग कथाएं जन्म लेना स्वाभाविक है।
लेकिन पत्रकारिता की दृष्टि से यहां सावधानी जरूरी है। किसी रहस्य के बारे में जानकारी उपलब्ध न होना अपने आप में किसी खास दावे के सच होने का प्रमाण नहीं है।
क्या ब्रह्म पदार्थ केवल जगन्नाथ में होता है?
एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि नवकलेवर की प्रक्रिया केवल भगवान जगन्नाथ के विग्रह तक सीमित नहीं मानी जाती। जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन—इन चारों काष्ठ विग्रहों से जुड़ी ब्रह्म परिवर्तन की परंपरा का उल्लेख शोध साहित्य में मिलता है।
यही तथ्य ‘केवल श्रीकृष्ण का हृदय’ वाली इंटरनेट कथा पर एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा करता है। यदि ब्रह्म पदार्थ को केवल श्रीकृष्ण के हृदय के रूप में समझा जाए, तो अन्य विग्रहों में होने वाले संबंधित धार्मिक स्थानांतरण की व्याख्या कैसे की जाए? इसी कारण जगन्नाथ परंपरा के अध्येताओं के बीच ब्रह्म पदार्थ की पहचान को एक व्यापक धार्मिक अवधारणा के रूप में देखने की प्रवृत्ति मिलती है।
क्या ब्रह्म पदार्थ कोई पत्थर है?
ब्रह्म पदार्थ की पहचान को लेकर अलग-अलग धारणाएं हैं। ओडिशा सरकार की सामग्री में विभिन्न धार्मिक समूहों द्वारा इसके बारे में अलग-अलग मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। इनमें बौद्ध परंपरा से जुड़ी एक मान्यता, वैष्णव परंपरा से जुड़ी शालिग्राम की धारणा और आदिवासी परंपरा में श्रीकृष्ण के न जले हुए अंश से जुड़ी धारणा का उल्लेख है। लेकिन किसी एक मत को प्रमाणित अंतिम उत्तर नहीं बताया गया है।
इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—ब्रह्म पदार्थ का रहस्य केवल ‘कृष्ण का हृदय’ वाली एक कहानी तक सीमित नहीं है।
यह जगन्नाथ संस्कृति में दिव्यता के उस तत्व का प्रतीक है, जिसकी पहचान को जानबूझकर सार्वजनिक दायरे से बाहर रखा गया है।
नवकलेवर में आखिर होता क्या है?
नवकलेवर भगवान जगन्नाथ की परंपरा की सबसे विशिष्ट प्रक्रियाओं में से एक है। काष्ठ विग्रहों के लिए विशेष नीम के वृक्ष चुने जाते हैं। इसके लिए धार्मिक मानदंड निर्धारित हैं और वनयाग जैसी परंपराओं के माध्यम से सेवायत पवित्र दारु की खोज करते हैं।
नए विग्रह तैयार होने के बाद ब्रह्म पदार्थ को पुराने विग्रह से नए विग्रह में स्थानांतरित करने की गुप्त प्रक्रिया होती है। इसके बाद पुराने विग्रहों को मंदिर परिसर के कोइली वैकुंठ क्षेत्र में समाधि देने की परंपरा बताई जाती है। शोध साहित्य इस पूरी प्रक्रिया को ‘दिव्य तत्व के नए शरीर में पुनर्स्थापन’ के रूप में देखता है।
यहां धार्मिक दर्शन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश दिखाई देता है—शरीर बदलता है, लेकिन चेतना या दिव्य तत्व की निरंतरता बनी रहती है।
क्या यह पुनर्जन्म की अवधारणा से जुड़ा है?
जगन्नाथ परंपरा के अध्ययनों में नवकलेवर को कई बार मानव जीवन और पुनर्जन्म के प्रतीक के रूप में समझाया गया है। पुराने काष्ठ विग्रह का अंत और नए विग्रह में ब्रह्म पदार्थ का स्थानांतरण एक प्रतीकात्मक संदेश देता है कि शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा या दिव्य तत्व को सनातन माना जाता है।
इसी कारण नवकलेवर केवल मूर्तियों को बदलने की तकनीकी प्रक्रिया नहीं है। यह धार्मिक दर्शन में जीवन, मृत्यु, परिवर्तन और निरंतरता के प्रश्नों से जुड़ा अनुष्ठान है।
क्या ब्रह्म पदार्थ को कभी वैज्ञानिक जांच के लिए बाहर निकाला गया?
उपलब्ध सार्वजनिक सामग्री के आधार पर ऐसा कोई स्वतंत्र और प्रमाणित वैज्ञानिक परीक्षण सामने नहीं आया है जिसमें ब्रह्म पदार्थ को प्रयोगशाला में जांचकर यह निष्कर्ष दिया गया हो कि वह मानव हृदय का ऊतक है या श्रीकृष्ण का हृदय है।
इसका एक कारण स्वाभाविक रूप से धार्मिक गोपनीयता है। जिस तत्व को मंदिर परंपरा सार्वजनिक रूप से दिखाने या उसकी पहचान बताने की अनुमति नहीं देती, उसका वैज्ञानिक परीक्षण भी सामान्य परिस्थितियों में संभव नहीं है।
इसलिए वैज्ञानिक दृष्टि से वर्तमान स्थिति बहुत स्पष्ट है—दावे की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त सार्वजनिक प्रमाण मौजूद नहीं हैं।
क्या ‘जीवित दिल’ शब्द का कोई वैज्ञानिक अर्थ है?
यहां भाषा का फर्क भी समझना जरूरी है। यदि ‘जीवित दिल’ का अर्थ जैविक रूप से धड़कता हुआ मानव हृदय है, तो ऐसा अंग जीवित रहने के लिए रक्त संचार, ऑक्सीजन और जैविक परिस्थितियों पर निर्भर होता है। किसी प्राचीन व्यक्ति के हजारों वर्ष पुराने हृदय के उसी जैविक रूप में सुरक्षित रहकर लगातार धड़कते रहने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
इसलिए ‘धड़कता हुआ कृष्ण का हृदय’ वैज्ञानिक चिकित्सा या जीवविज्ञान के अर्थ में स्थापित तथ्य नहीं है। इसे धार्मिक आस्था की भाषा में समझना अलग बात है।
किसी भक्त के लिए ‘ब्रह्म पदार्थ’ श्रीकृष्ण की चेतना, दिव्यता या उपस्थिति का प्रतीक हो सकता है। लेकिन प्रतीकात्मक या आध्यात्मिक अर्थ को भौतिक जैविक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक पत्रकारिता के मानकों से अलग होगा।
क्या इसका अर्थ यह है कि जगन्नाथ की मान्यता गलत है?
बिल्कुल नहीं। किसी धार्मिक मान्यता के वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित न होने का अर्थ यह नहीं है कि उसका धार्मिक या सांस्कृतिक महत्व समाप्त हो जाता है।
भारत की अनेक धार्मिक परंपराएं प्रतीकों, अनुष्ठानों और मौखिक परंपराओं के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ी हैं। जगन्नाथ संस्कृति भी ऐसी ही बहुस्तरीय परंपरा है, जिसमें पुराण, स्थानीय लोकविश्वास, आदिवासी परंपराएं, वैष्णव भक्ति और मंदिर अनुष्ठान एक-दूसरे से जुड़े दिखाई देते हैं।
इसलिए ब्रह्म पदार्थ को लेकर श्रद्धालुओं की आस्था का सम्मान करते हुए यह बताना आवश्यक है कि आस्था और प्रमाण दो अलग-अलग स्तर हैं।
फिर भगवान जगन्नाथ की काठ की मूर्ति इतनी खास क्यों है?
भगवान जगन्नाथ की मूर्ति का काष्ठ से बना होना ही इस परंपरा की एक विशिष्ट विशेषता है। सामान्यतः मंदिरों में पत्थर या धातु के स्थायी विग्रह देखने को मिलते हैं, लेकिन पुरी में भगवान के विग्रह समय-समय पर नए काष्ठ शरीर में स्थापित किए जाते हैं।
इसी कारण जगन्नाथ परंपरा में ‘शरीर’ और ‘दिव्य तत्व’ के बीच संबंध बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। पुराने शरीर का अंत और नए शरीर में उसी ब्रह्म तत्व का प्रवेश धार्मिक दर्शन में निरंतरता का प्रतीक बनता है। शोध अध्ययनों में भी नवकलेवर को ‘दिव्य पुनः-शरीरीकरण’ की अवधारणा से जोड़ा गया है।
श्रीकृष्ण और जगन्नाथ का संबंध फिर क्या है?
भगवान जगन्नाथ को अनेक वैष्णव परंपराओं में श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है। यही कारण है कि श्रीकृष्ण से संबंधित कथाएं जगन्नाथ संस्कृति में गहराई से दिखाई देती हैं।
लेकिन किसी देवता को श्रीकृष्ण का स्वरूप मानना और मूर्ति के भीतर ऐतिहासिक रूप से श्रीकृष्ण का भौतिक अंग मौजूद होने का दावा करना—ये दो अलग बातें हैं।
पहली बात धार्मिक दर्शन और भक्ति से संबंधित है। दूसरी बात एक ऐतिहासिक-भौतिक दावा है, जिसके लिए प्रमाण की आवश्यकता होगी। उपलब्ध स्रोत दूसरी बात की पुष्टि नहीं करते।
रहस्य बरकरार है, लेकिन जवाब क्या है?
तो फिर मूल सवाल पर लौटें—क्या सच में भगवान जगन्नाथ की काठ की मूर्ति में भगवान श्रीकृष्ण का जीवित दिल अभी भी है?
तथ्यात्मक उत्तर है: इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
पुरी की धार्मिक परंपरा में ‘ब्रह्म पदार्थ’ का अस्तित्व और उसका पुराने काष्ठ विग्रह से नए विग्रह में स्थानांतरण एक महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा के रूप में वर्णित होता है। लेकिन ब्रह्म पदार्थ वास्तव में क्या है, इसकी सार्वजनिक रूप से प्रमाणित पहचान उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग परंपराएं इसे अलग-अलग रूपों में समझती हैं।
‘यह श्रीकृष्ण का हृदय है’—यह एक गहरी और लोकप्रिय धार्मिक मान्यता है। वहीं ‘यह आज भी जीवित है और धड़कता है’—इस दावे के समर्थन में कोई स्वतंत्र वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
रहस्य से ज्यादा महत्वपूर्ण है इसका संदेश
भगवान जगन्नाथ की परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है कि वह मनुष्य को शरीर और चेतना के अंतर पर विचार करने का अवसर देती है। नवकलेवर में पुराना काष्ठ शरीर बदल जाता है, लेकिन भक्तों की दृष्टि में भगवान की उपस्थिति बनी रहती है।
इसीलिए ब्रह्म पदार्थ को केवल किसी रहस्यमयी वस्तु की तलाश के रूप में देखना जगन्नाथ परंपरा के दार्शनिक अर्थ को छोटा कर सकता है। यह परंपरा जीवन और मृत्यु, परिवर्तन और निरंतरता तथा दृश्य शरीर और अदृश्य दिव्यता के बीच संबंध को समझने का अवसर देती है।
आस्था का रहस्य और तथ्य की सीमा
भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में श्रीकृष्ण का ‘जीवित दिल’ होने की कथा निश्चित रूप से जगन्नाथ संस्कृति से जुड़ी सबसे लोकप्रिय और रहस्यमयी मान्यताओं में से एक है। लेकिन उपलब्ध धार्मिक और शोध सामग्री इस बात की पुष्टि नहीं करती कि मूर्ति के भीतर वास्तव में श्रीकृष्ण का भौतिक हृदय मौजूद है या वह आज भी जैविक रूप से धड़क रहा है।
‘ब्रह्म पदार्थ’ की परंपरा वास्तविक धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा है, लेकिन उसकी पहचान आज भी गोपनीय है। ओडिशा सरकार की प्रकाशित सामग्री में भी इसके बारे में अलग-अलग मान्यताओं का उल्लेख है और यह स्पष्ट किया गया है कि किसी एक पहचान की पुष्टि नहीं हुई है।






