
संवाद 24 डेस्क। राजा सगर की कथा भारतीय पुराण और रामायण परंपरा की उन महत्वपूर्ण कथाओं में है, जिसके बिना गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कहानी पूरी नहीं होती। यह कथा एक ऐसे प्रतापी राजा से शुरू होती है, जिनके 60 हजार पुत्रों का उल्लेख मिलता है और जो अश्वमेध यज्ञ के दौरान एक रहस्यमय घटना में मारे गए। इसके बाद उनके उद्धार के लिए कई पीढ़ियों तक प्रयास चलता रहा। अंततः उनके वंशज भगीरथ ने ऐसी कठिन तपस्या की कि स्वर्ग की गंगा को पृथ्वी पर लाने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
आज गंगा को भारतीय संस्कृति में केवल एक नदी के रूप में नहीं, बल्कि पवित्र और मोक्षदायिनी धारा के रूप में देखा जाता है। गंगा के इस धार्मिक महत्व से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कड़ियों में राजा सगर, उनके 60 हजार पुत्र, कपिल मुनि और भगीरथ की कथा शामिल है। वाल्मीकि रामायण में भी भगवान राम को उनके पूर्वजों की यह कथा सुनाई जाती है और बताया जाता है कि किस प्रकार भगीरथ के प्रयास से सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ।
सूर्यवंश के प्रतापी राजा थे सगर
राजा सगर का संबंध इक्ष्वाकु अथवा सूर्यवंश से माना जाता है। पौराणिक वंश परंपरा में उनका स्थान महत्वपूर्ण है और आगे चलकर इसी वंश में अंशुमान, दिलीप और भगीरथ जैसे राजा हुए।
सगर के जीवन का एक बड़ा प्रसंग संतान प्राप्ति से जुड़ा है। विष्णु पुराण के अनुसार उनकी दो पत्नियां थीं—केशिनी और सुमति। संतान न होने के कारण राजा ने ऋषि और्व की शरण ली और उनसे वर प्राप्त किया। वर के अनुसार एक पत्नी से एक ऐसा पुत्र होना था जो वंश को आगे बढ़ाए, जबकि दूसरी पत्नी से 60 हजार पुत्र होने थे। केशिनी ने एक पुत्र का वर चुना और सुमति ने 60 हजार पुत्रों का। इसके बाद केशिनी से असमंजस और सुमति से 60 हजार पुत्रों के जन्म का वर्णन मिलता है।
हालांकि राजा सगर की कथा के अलग-अलग ग्रंथीय संस्करणों में संतान प्राप्ति के प्रसंग में कुछ अंतर दिखाई देता है। वाल्मीकि रामायण में भी सगर की दोनों रानियों और उनके वरदान का वर्णन मिलता है। इसलिए इस कथा को प्रस्तुत करते समय यह समझना जरूरी है कि पौराणिक साहित्य में एक ही आख्यान के विभिन्न पाठ और परंपराएं मिलती हैं।
60 हजार पुत्रों के जन्म की कथा इतनी अलग क्यों है?
राजा सगर के 60 हजार पुत्रों का जन्म सामान्य मानवीय जन्म की तरह नहीं बताया गया है। वाल्मीकि रामायण के बालकांड में सुमति के गर्भ से एक बड़े तुम्ब या लौकी के समान पिंड उत्पन्न होने और उससे 60 हजार पुत्रों के निकलने का उल्लेख मिलता है। उनका पालन घी से भरे पात्रों में किया गया और समय बीतने पर वे सभी युवा हुए।
यह विवरण कथा को सामान्य राजवंशीय इतिहास से अलग पौराणिक आख्यान का रूप देता है। इसी कारण सगर के 60 हजार पुत्रों का प्रसंग भारतीय धार्मिक साहित्य में विशेष रूप से चर्चित रहा है।
दूसरी ओर विष्णु पुराण में सुमति से 60 हजार पुत्रों के जन्म का वर्णन सीधे मिलता है। इस प्रकार दोनों ग्रंथों के विवरण में अंतर होते हुए भी कथा का मूल तत्व समान है—राजा सगर के पास असाधारण संख्या में पुत्र थे और आगे चलकर उन्हीं पुत्रों का विनाश गंगा अवतरण की पृष्ठभूमि बना।
असमंजस का आचरण बना पिता के लिए चिंता
सगर के पुत्रों में असमंजस का प्रसंग भी उल्लेखनीय है। विष्णु पुराण में असमंजस के बचपन से ही अनुचित आचरण का वर्णन मिलता है। उसके व्यवहार से राजा सगर चिंतित हुए और अंततः उन्होंने उसे अपने राज्य से अलग कर दिया। उसी ग्रंथ में यह भी कहा गया है कि सगर के 60 हजार पुत्र भी अपने बड़े भाई के आचरण से प्रभावित हुए।
लेकिन असमंजस का पुत्र अंशुमान इसके विपरीत गुणों वाला बताया गया है। वह आगे चलकर अपने दादा सगर और पूरे वंश के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यही प्रसंग पौराणिक कथा में एक महत्वपूर्ण विचार सामने रखता है—एक ही परिवार में जन्म लेने वाले लोगों का आचरण एक जैसा होना जरूरी नहीं है। व्यक्ति की पहचान उसके कर्म और व्यवहार से बनती है।
सगर ने क्यों किया अश्वमेध यज्ञ?
राजा सगर ने एक समय अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। अश्वमेध प्राचीन वैदिक राजसूय परंपराओं से जुड़ा एक महत्वपूर्ण यज्ञ था, जिसमें यज्ञ का घोड़ा छोड़ा जाता था और उसके मार्ग से राजा की राजनीतिक प्रभुता का प्रश्न जुड़ता था।
विष्णु पुराण के अनुसार सगर ने यज्ञ के घोड़े की रक्षा की जिम्मेदारी अपने पुत्रों को दी थी। लेकिन यज्ञ का घोड़ा अचानक गायब हो गया। सगर ने अपने पुत्रों को उसे खोजने का आदेश दिया।
यहीं से कथा एक ऐसे मोड़ पर पहुंचती है, जिसने आगे चलकर गंगा के पृथ्वी पर आने की पूरी पृष्ठभूमि तैयार कर दी।
अचानक गायब हो गया यज्ञ का घोड़ा
यज्ञ का घोड़ा कहां गया, यह पता लगाने के लिए सगर के पुत्रों ने चारों दिशाओं में खोज शुरू की। जब उन्हें घोड़ा नहीं मिला तो उन्होंने धरती के भीतर तक उसकी खोज करने का प्रयास किया।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार सगर के पुत्रों ने पृथ्वी को खोदते हुए गहराई तक जाने का मार्ग बनाया। इस दौरान उन्हें पृथ्वी को धारण करने वाले दिग्गजों के दर्शन हुए और वे आगे बढ़ते गए। अंततः वे उस स्थान पर पहुंचे जहां कपिल मुनि तपस्या में लीन थे और यज्ञ का घोड़ा भी वहां दिखाई दिया।
यहीं सगर-पुत्रों से एक ऐसी भूल हुई, जिसका परिणाम बेहद गंभीर रहा।
कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचकर क्या हुआ?
सगर के पुत्रों ने कपिल मुनि को यज्ञ का घोड़ा चुराने वाला समझ लिया। उन्होंने मुनि पर आरोप लगाया और उनके प्रति आक्रामक व्यवहार किया।
वाल्मीकि रामायण के वर्णन के अनुसार कपिल मुनि ने जब उनकी ओर देखा तो उनके तेज से सगर के 60 हजार पुत्र भस्म हो गए। रामायण के सारांश में इस प्रसंग को स्पष्ट रूप से बताया गया है कि कपिल के क्रोध से सगर के पुत्र भस्म हुए।
विष्णु पुराण में भी कपिल को अत्यंत ज्ञानी तपस्वी और विष्णु के अंश से संबंधित बताया गया है। वहां सगर के पुत्रों के विनाश की पृष्ठभूमि उनके अनुचित आचरण से जुड़ी हुई है।
लोकप्रिय कथाओं में इसे अक्सर कपिल मुनि के श्राप के रूप में कहा जाता है। हालांकि ग्रंथों के मूल विवरण में कपिल के तपोबल और तेज से उनके भस्म होने का वर्णन मिलता है। इसलिए संपादकीय लेख में दोनों को एक ही अर्थ में प्रस्तुत करने के बजाय ग्रंथानुसार अंतर बताना अधिक उचित है।
सगर के पुत्रों की भस्म के साथ रह गया अधूरा यज्ञ
सगर के पुत्र यज्ञ का घोड़ा खोजने निकले थे, लेकिन कपिल मुनि के आश्रम तक पहुंचने के बाद वे लौट नहीं सके। घोड़ा वहीं था, मगर उसे वापस लाने और सगर के पुत्रों के विनाश का समाचार देने की जिम्मेदारी अब अंशुमान के सामने थी।
सगर ने अपने पौत्र अंशुमान को खोज के लिए भेजा। अंशुमान उस मार्ग से आगे बढ़े जिसे सगर के पुत्रों ने खोदा था और कपिल मुनि के पास पहुंचे।
यहां अंशुमान का व्यवहार अपने चाचाओं से बिल्कुल अलग था। उन्होंने कपिल मुनि के प्रति सम्मान प्रकट किया और उनसे यज्ञ के घोड़े के बारे में जानकारी प्राप्त की।
अंशुमान को मिला वह वरदान जिसने आगे की राह दिखाई
विष्णु पुराण के अनुसार कपिल मुनि अंशुमान के व्यवहार से प्रसन्न हुए। उन्होंने अंशुमान को यज्ञ का घोड़ा ले जाने की अनुमति दी और बताया कि सगर के पुत्रों का उद्धार गंगा के पृथ्वी पर आने से होगा।
कथा के अनुसार जब स्वर्ग से आने वाली गंगा की धारा सगर के पुत्रों की अस्थियों और भस्म को स्पर्श करेगी, तब उनका उद्धार होगा।
यही वह क्षण था जब एक परिवार की त्रासदी आगे चलकर भारत की सबसे प्रसिद्ध धार्मिक कथाओं में बदल गई।
अंशुमान यज्ञ का घोड़ा लेकर लौटे और सगर ने अपना यज्ञ पूरा किया। लेकिन उनके पुत्रों का उद्धार अभी बाकी था।
एक पीढ़ी नहीं, कई पीढ़ियों तक चला प्रयास
सगर के पुत्रों के उद्धार की जिम्मेदारी अंशुमान ने संभाली। लेकिन वे गंगा को पृथ्वी पर लाने में सफल नहीं हो सके।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार सगर के बाद अंशुमान राजा बने। बाद में उन्होंने राज्य अपने पुत्र दिलीप को सौंप दिया और तपस्या के लिए हिमालय चले गए। दिलीप ने भी गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रयास किया, लेकिन वे सफल नहीं हो सके।
इस प्रकार सगर-पुत्रों के उद्धार का प्रश्न एक पीढ़ी का नहीं रहा। यह एक ऐसा अधूरा संकल्प बन गया, जिसे पूरा करने के लिए अगली पीढ़ियां प्रयास करती रहीं।
और फिर इस कथा में प्रवेश होता है उस राजा का, जिसका नाम आज भी असाधारण प्रयास का पर्याय माना जाता है—भगीरथ।
कौन थे भगीरथ?
भगीरथ राजा दिलीप के पुत्र और सगर के वंशज थे। वाल्मीकि रामायण में उन्हें इक्ष्वाकु वंश का राजा बताया गया है। उन्होंने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने का निश्चय किया।
भगीरथ के सामने चुनौती असाधारण थी। उन्हें केवल किसी नदी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लाना नहीं था, बल्कि पौराणिक मान्यता के अनुसार स्वर्ग में स्थित गंगा को पृथ्वी पर लाना था। उन्होंने इस उद्देश्य के लिए कठोर तपस्या आरंभ की।
भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न हुए ब्रह्मा
वाल्मीकि रामायण के अनुसार भगीरथ ने कठोर तपस्या की। लंबे समय तक तप करने के बाद ब्रह्मा प्रजापति उनके सामने प्रकट हुए और उनकी इच्छा पूछी।
भगीरथ ने प्रार्थना की कि गंगा पृथ्वी पर आएं और उनके पूर्वजों का उद्धार हो। ब्रह्मा ने उनकी इच्छा स्वीकार की, लेकिन साथ ही एक महत्वपूर्ण समस्या की ओर संकेत किया।
गंगा की धारा का वेग इतना प्रचंड था कि पृथ्वी सीधे उसे सहन नहीं कर सकती थी। इसलिए ब्रह्मा ने भगीरथ को भगवान शिव की आराधना करने का मार्ग बताया।
क्यों जरूरी थी भगवान शिव की तपस्या?
गंगा के पृथ्वी पर उतरने के लिए केवल ब्रह्मा की अनुमति पर्याप्त नहीं थी। उनके वेग को नियंत्रित करना आवश्यक था।
कथा के अनुसार यदि गंगा सीधे स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरतीं तो उनके प्रचंड वेग से पृथ्वी को नुकसान हो सकता था। इसलिए भगीरथ ने भगवान शिव की आराधना की।
यहां कथा में एक नया आयाम जुड़ता है—भगीरथ का संकल्प, ब्रह्मा की स्वीकृति और शिव की भूमिका।
तीनों के सहयोग से गंगा के पृथ्वी पर अवतरण का मार्ग तैयार होता है।
भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में क्यों धारण किया?
भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गंगा को धारण करने का संकल्प किया। जब गंगा पृथ्वी की ओर प्रवाहित हुईं तो शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में रोक लिया।
इस प्रसंग को भारतीय कला और धार्मिक परंपरा में ‘गंगाधर शिव’ के रूप में विशेष महत्व मिला है।
कथा का भाव यह है कि जिस शक्ति का वेग पृथ्वी के लिए असहनीय था, शिव ने उसे अपनी जटाओं में धारण करके नियंत्रित किया और फिर उसकी धारा को पृथ्वी पर प्रवाहित होने दिया।
इस तरह गंगा का अवतरण केवल भगीरथ की तपस्या का परिणाम नहीं, बल्कि ब्रह्मा, शिव और गंगा से जुड़े पौराणिक प्रसंगों का संयुक्त आख्यान बन जाता है।
पृथ्वी पर बह चलीं मां गंगा
शिव की जटाओं से निकलने के बाद गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे आगे बढ़ीं। भगीरथ उस मार्ग पर चलते गए जहां से गंगा की धारा को सगर के पुत्रों तक पहुंचना था।
कथा के अनुसार अंततः गंगा उस स्थान तक पहुंचीं जहां सगर के 60 हजार पुत्रों की भस्म पड़ी थी।
गंगा के जल के स्पर्श से उनका उद्धार हुआ।
वाल्मीकि रामायण के एक सर्ग में ब्रह्मा स्वयं भगीरथ से कहते हैं कि गंगा के जल से सगर के 60 हजार पुत्र मुक्त होकर देवताओं के समान स्वर्ग की ओर गए।
यहीं राजा सगर की कथा अपने सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंचती है।
इसी कारण गंगा को मोक्षदायिनी माना गया
सगर-पुत्रों के उद्धार की कथा ने गंगा को भारतीय धार्मिक चेतना में विशेष स्थान दिया। गंगा के जल को पवित्र मानने की परंपरा के पीछे अनेक धार्मिक आख्यान हैं और सगर-पुत्रों की कथा उनमें प्रमुख है।
विष्णु पुराण में कपिल मुनि अंशुमान को बताते हैं कि गंगा का जल सगर के पुत्रों के उद्धार का माध्यम बनेगा। उसी प्रसंग में गंगा की पवित्रता और उसके जल से मिलने वाले धार्मिक फल का वर्णन भी मिलता है।
यहां यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि मोक्ष या स्वर्ग की प्राप्ति धार्मिक मान्यता और पौराणिक आख्यान का विषय है, जिसे आधुनिक वैज्ञानिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
‘भगीरथ प्रयास’ क्यों कहा जाता है?
भगीरथ की कथा भारतीय भाषा और संस्कृति में इतनी गहराई से समाई कि उनके नाम से एक मुहावरा ही बन गया—‘भगीरथ प्रयास’।
इसका अर्थ होता है किसी अत्यंत कठिन कार्य को पूरा करने के लिए असाधारण धैर्य, परिश्रम और निरंतर प्रयास करना।
भगीरथ ने जिस कार्य को पूरा करने का संकल्प लिया था, वह एक पीढ़ी में पूरा नहीं हुआ। अंशुमान और दिलीप के प्रयासों के बाद भगीरथ ने इसे आगे बढ़ाया। वाल्मीकि रामायण में उनके कठोर तप और गंगा को पृथ्वी पर लाने के प्रयास का विस्तार मिलता है।
इसलिए भगीरथ का चरित्र केवल धार्मिक कथा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय भाषाओं में दृढ़ संकल्प के प्रतीक के रूप में भी स्थापित हुआ।
क्या सागर का नाम भी राजा सगर से जुड़ा है?
राजा सगर की कथा में एक और महत्वपूर्ण प्रसंग समुद्र से जुड़ा है। पौराणिक परंपरा में सगर के पुत्रों द्वारा धरती खोदने की घटना को ‘सागर’ नाम से जोड़ा जाता है।
विष्णु पुराण के वर्णन में सगर के पुत्रों द्वारा खोदे गए विशाल गड्ढे और उसके नामकरण का प्रसंग मिलता है।
इसे पौराणिक नाम-व्युत्पत्ति के रूप में समझना चाहिए, न कि समुद्र के निर्माण की आधुनिक वैज्ञानिक व्याख्या के रूप में।
सगर की कथा में छिपा है कर्म और विवेक का संदेश
राजा सगर की कथा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल 60 हजार पुत्रों का जन्म या गंगा का अवतरण नहीं है। इसके भीतर कर्म और उसके परिणाम का विचार भी दिखाई देता है।
सगर के पुत्र शक्तिशाली थे। वे बड़ी संख्या में थे और उन्हें अपने राजा पिता के यज्ञ की रक्षा का दायित्व मिला था। लेकिन कपिल मुनि के सामने उन्होंने परिस्थिति को समझने से पहले आरोप लगाया।
इसके विपरीत अंशुमान ने वही परिस्थिति शांत भाव से समझने का प्रयास किया। उन्होंने कपिल मुनि के प्रति सम्मान दिखाया और समाधान प्राप्त किया। इस विरोधाभास से कथा में यह संदेश उभरता है कि शक्ति के साथ विवेक और धैर्य भी आवश्यक है।
सगर से भगीरथ तक—एक अधूरे संकल्प की यात्रा
राजा सगर की कथा को यदि एक व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो यह केवल एक राजा और उसके पुत्रों की कहानी नहीं रह जाती।
यह एक ऐसी यात्रा है जो सगर से शुरू होती है, अंशुमान तक पहुंचती है, दिलीप के प्रयास से गुजरती है और भगीरथ की तपस्या में पूर्ण होती है।
सगर के पुत्रों का अंत तत्काल हुआ, लेकिन उनके उद्धार की राह कई पीढ़ियों तक बनी रही। इस दृष्टि से कथा का सबसे प्रभावशाली पक्ष यही है कि एक पीढ़ी की समस्या का समाधान कभी-कभी अगली पीढ़ी के संकल्प से पूरा होता है।
भगीरथ ने अपने पूर्वजों के अधूरे कार्य को अपना दायित्व माना और उसे पूरा करने के लिए तपस्या की।
अलग-अलग ग्रंथों में कथा के विवरण क्यों बदलते हैं?
राजा सगर और गंगा अवतरण की कथा वाल्मीकि रामायण, विष्णु पुराण, ब्रह्म पुराण और अन्य पौराणिक साहित्य में अलग-अलग रूपों में मिलती है। इसलिए इंटरनेट पर उपलब्ध कथाओं में कुछ अंतर दिखाई देना स्वाभाविक है।
उदाहरण के लिए, विष्णु पुराण में सगर की पत्नियों के नाम के साथ ऋषि और्व से मिले वरदान का वर्णन मिलता है।
वाल्मीकि रामायण में सगर की कथा विश्वामित्र द्वारा राम को सुनाए गए प्रसंग के रूप में आती है और वहां 60 हजार पुत्रों के जन्म, कपिल के आश्रम, अंशुमान, दिलीप और भगीरथ की वंश-परंपरा को क्रमबद्ध रूप से बताया गया है।
इसी तरह लोकप्रिय लोककथाओं में इंद्र द्वारा घोड़ा चुराने का प्रसंग प्रमुखता से मिलता है, जबकि सभी ग्रंथों में घटना का विवरण बिल्कुल समान नहीं है। इसलिए किसी एक लोकप्रचलित संस्करण को सभी पुराणों का समान विवरण मानना उचित नहीं होगा।
गंगासागर और सगर-पुत्रों की स्मृति
सगर और गंगा की कथा का संबंध आज के गंगासागर से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक परंपरा में गंगासागर को वह स्थान माना जाता है जहां गंगा समुद्र में मिलती हैं और जहां राजा सगर तथा उनके पुत्रों की कथा की स्मृति विशेष रूप से जुड़ी हुई है।
गंगासागर से संबंधित धार्मिक परंपराओं में मकर संक्रांति का स्नान भी महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि स्थानीय परंपराओं और विभिन्न ग्रंथों में कथा के विवरण अलग हो सकते हैं।
इस तरह सगर की कथा केवल ग्रंथों में सीमित नहीं रही, बल्कि तीर्थ, लोकविश्वास और धार्मिक परंपराओं का हिस्सा भी बन गई।
राजा सगर की कथा आज के समय में क्या सिखाती है?
इस पौराणिक कथा को आधुनिक संदर्भ में देखें तो इसके कई नैतिक और सांस्कृतिक पहलू सामने आते हैं।
पहला—सत्ता और शक्ति के साथ विवेक आवश्यक है। सगर के पुत्रों के पास शक्ति थी, लेकिन जल्दबाजी और गलत धारणा ने उन्हें विनाश की ओर पहुंचा दिया।
दूसरा—किसी व्यक्ति का आचरण उसके वंश से निर्धारित नहीं होता। असमंजस और अंशुमान के चरित्रों के माध्यम से कथा में यह अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।
तीसरा—बड़ा लक्ष्य लंबा संघर्ष मांग सकता है। अंशुमान और दिलीप की असफलता के बाद भी प्रयास बंद नहीं हुआ।
चौथा—भगीरथ का चरित्र धैर्य और संकल्प का उदाहरण बनता है। उन्होंने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए कठिन तपस्या की और अंततः गंगा को पृथ्वी पर लाने में सफल हुए।
सगर के पुत्रों से शुरू हुई कथा गंगा तक पहुंची
राजा सगर की कथा भारतीय पौराणिक परंपरा की एक ऐसी गाथा है, जिसमें एक साथ राजवंश, अश्वमेध यज्ञ, 60 हजार पुत्रों का जन्म, कपिल मुनि का तप, सगर-पुत्रों का विनाश, अंशुमान और दिलीप के प्रयास तथा भगीरथ की कठोर तपस्या जैसे अनेक प्रसंग जुड़े हैं।
कथा का आरंभ राजा सगर की संतान और राजसत्ता से होता है, लेकिन उसका चरम भगीरथ के तप और गंगा के पृथ्वी पर अवतरण में दिखाई देता है। सगर के पुत्रों के उद्धार की इच्छा कई पीढ़ियों तक अधूरी रही और अंततः भगीरथ ने इसे पूरा किया।
इसीलिए भारतीय संस्कृति में गंगा अवतरण की कथा केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि संकल्प, तपस्या, पीढ़ियों के दायित्व और कठिन लक्ष्य के लिए निरंतर प्रयास की कथा के रूप में भी देखी जाती है।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार गंगा के जल से सगर के 60 हजार पुत्रों का उद्धार हुआ और वे स्वर्ग को गए। यही वह प्रसंग है जिसने राजा सगर, भगीरथ और गंगा—इन तीनों नामों को भारतीय धार्मिक स्मृति में हमेशा के लिए एक-दूसरे से जोड़ दिया।






