आखिर कैसे पड़ा ‘हरतालिका’ तीज का नाम? पार्वती जी की इस कथा में छिपा है दिलचस्प रहस्य

संवाद 24 डेस्क। हरतालिका तीज केवल एक व्रत या पर्व का नाम नहीं है। इसके नाम के भीतर ही एक ऐसी पौराणिक कथा छिपी है, जिसमें माता पार्वती की दृढ़ इच्छा, तपस्या, सखी का साथ और भगवान शिव को पति रूप में पाने का संकल्प जुड़ा हुआ है। आम तौर पर लोग इस पर्व को सुहागिन महिलाओं के व्रत और शिव-पार्वती की पूजा के रूप में जानते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इसे ‘हरतालिका’ क्यों कहा जाता है? इस नाम का संबंध माता पार्वती को उनकी सखियों द्वारा एकांत वन में ले जाने की कथा से बताया जाता है। ‘हरित’ या ‘हर’ से हरण और ‘आलिका’ से सखी का अर्थ जोड़ा जाता है। यानी सामान्य अर्थ में हरतालिका का भाव हुआ—सखी द्वारा पार्वती को अपने साथ ले जाना या हरण कर ले जाना।
लेकिन इस कथा का सबसे रोचक पहलू यह है कि यहां ‘हरण’ का अर्थ किसी अपराध या जबरन अपहरण से समझना उचित नहीं होगा। पौराणिक आख्यान में यह पार्वती की इच्छा की रक्षा करने वाली उनकी सखियों की भूमिका के रूप में सामने आता है। जब पार्वती के विवाह को लेकर परिस्थितियां उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं थीं, तब उनकी सखियां उन्हें ऐसी जगह ले गईं जहां वे निर्बाध होकर अपनी साधना कर सकें। इसी घटना को हरतालिका नाम के पीछे की प्रमुख धार्मिक कथा माना जाता है।

14 सितंबर को मनाई जा रही है हरतालिका तीज
इस वर्ष यानी 2026 में हरतालिका तीज 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जा रही है। पंचांग गणना के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 13 सितंबर को सुबह शुरू हुई और 14 सितंबर की सुबह तक रही। उदया तिथि के आधार पर 14 सितंबर को हरतालिका तीज का व्रत रखा जा रहा है। दिल्ली के लिए उपलब्ध पंचांग गणना में पूजा का प्रातःकालीन मुहूर्त सुबह 6:05 बजे से 7:06 बजे तक बताया गया है। हालांकि स्थानीय पंचांग और स्थान के अनुसार मुहूर्त में कुछ अंतर हो सकता है।
हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। ‘तीज’ शब्द का संबंध तृतीया तिथि से माना जाता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। परंपरा में विवाहित महिलाएं पति की दीर्घायु, दांपत्य सुख और परिवार की मंगलकामना के लिए व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं मनचाहे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत करती हैं।

हरतालिका’ नाम में ही छिपी है पूरी कहानी
अब उस सवाल पर आते हैं जिसके कारण यह पर्व इतना खास बन जाता है—हरतालिका नाम आखिर आया कहां से?
पारंपरिक व्याख्या के अनुसार ‘हरतालिका’ शब्द को दो हिस्सों से समझा जाता है—हरित/हर और आलिका। यहां ‘हरित’ का संबंध हरण या अपने साथ ले जाने से तथा ‘आलिका’ का अर्थ सखी या महिला मित्र से जोड़ा जाता है। पौराणिक कथा में माता पार्वती की सखियां उन्हें उनके पिता हिमालय के घर से दूर एक घने वन में ले गई थीं, ताकि वे भगवान शिव को पति रूप में पाने की अपनी साधना पूरी कर सकें। इसी कारण व्रत का नाम हरितालिका या हरतालिका पड़ा, ऐसी परंपरागत मान्यता है।
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में ‘हरितालिका’ और प्रचलित हिंदी में ‘हरतालिका’—दोनों रूप देखने को मिलते हैं। इसलिए दोनों वर्तनी को लेकर बहुत अधिक विवाद की आवश्यकता नहीं है। संस्कृतनिष्ठ रूप ‘हरितालिका’ है, जबकि जनप्रचलित हिंदी में ‘हरतालिका तीज’ अधिक सामान्य है।

जब पार्वती ने बचपन से ही शिव को अपना वर मान लिया
हरतालिका तीज की कथा माता पार्वती की तपस्या से जुड़ी है। पौराणिक परंपरा में पार्वती को हिमालयराज और मैना की पुत्री बताया गया है। वे बाल्यकाल से ही भगवान शिव को पति रूप में पाने की इच्छा रखती थीं। कथा के अनुसार उन्होंने शिव की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या का संकल्प लिया।
यहां कथा केवल प्रेम या विवाह की इच्छा तक सीमित नहीं है। इसमें संकल्प और साधना को केंद्रीय स्थान दिया गया है। पार्वती का उद्देश्य स्पष्ट था और वे परिस्थितियों के बदलने के बावजूद अपने निर्णय से पीछे नहीं हटतीं।
विभिन्न परंपराओं में उनकी तपस्या की अवधि और स्वरूप के अलग-अलग विवरण मिलते हैं। कुछ कथाओं में लंबे समय तक कठिन तप, फलाहार, पत्तों का सेवन और अंततः अन्न-जल का त्याग करने जैसी बातें कही गई हैं। इसलिए इन विवरणों को एक ही ऐतिहासिक घटना की तरह नहीं, बल्कि अलग-अलग धार्मिक आख्यानों में विकसित कथा-परंपरा के रूप में देखना अधिक उचित है। आधुनिक स्रोतों में भी पार्वती की कठोर तपस्या को हरतालिका व्रत की कथा का प्रमुख आधार बताया गया है।

नारद और विवाह प्रस्ताव ने बदल दी कहानी की दिशा
लोकप्रिय हरतालिका व्रत कथा में आगे बताया जाता है कि हिमालयराज अपनी पुत्री के भविष्य को लेकर चिंतित थे। इसी दौरान नारद मुनि वहां पहुंचे और भगवान विष्णु की ओर से पार्वती के लिए विवाह प्रस्ताव की बात सामने आई। हिमालयराज इस प्रस्ताव के लिए सहमत हो गए।
यहीं कथा में महत्वपूर्ण मोड़ आता है।
पार्वती पहले से ही भगवान शिव को अपना पति मान चुकी थीं। उनके सामने अब ऐसी परिस्थिति थी जिसमें पिता की इच्छा और उनकी स्वयं की इच्छा के बीच अंतर दिखाई दे रहा था। वे न तो शिव के प्रति अपने संकल्प से पीछे हटना चाहती थीं और न ही पिता की आज्ञा की अवहेलना करना।
यही वह बिंदु है जहां उनकी सखियां कथा में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।

सखियां पार्वती को ले गईं घने वन में
कथा के अनुसार पार्वती की सखियां उनकी मनःस्थिति समझती थीं। उन्होंने पार्वती को उनके पिता के घर से दूर एक घने वन में ले जाने का निर्णय किया। इस तरह पार्वती को ऐसी जगह मिल गई जहां वे विवाह के दूसरे प्रस्ताव से अलग रहकर शिव की आराधना कर सकें।
यही घटना ‘हरतालिका’ नाम की सबसे प्रसिद्ध व्याख्या का आधार है। पार्वती को उनकी सखियों द्वारा हरण करके ले जाना—यानी ‘हरित’ और ‘आलिका’—हरतालिका नाम से जोड़ा गया है। एक पारंपरिक व्रतग्रंथीय पाठ में भी इस नाम की व्याख्या इसी भाव से की गई है कि सखियां उन्हें ले गई थीं, इसलिए व्रत का नाम हरितालिका हुआ।
यहां ‘सखी’ की भूमिका भी प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। कथा में वह केवल साथ रहने वाली महिला नहीं है, बल्कि पार्वती के संकल्प की सहायक बनकर सामने आती है।

वन में बनी मिट्टी की शिव प्रतिमा और शुरू हुई आराधना
घने वन में पहुंचने के बाद पार्वती ने अपनी साधना जारी रखी। परंपरागत कथा में बताया जाता है कि उन्होंने शिव की आराधना की और शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की। कई लोकप्रिय कथाओं में शिवलिंग को मिट्टी या बालू से बनाए जाने का उल्लेख मिलता है।
यही कारण है कि आज भी हरतालिका तीज की पूजा में मिट्टी से बने शिव-पार्वती के स्वरूप का विशेष महत्व दिखाई देता है। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा की विधि और प्रतिमाओं का स्वरूप अलग हो सकता है, लेकिन मूल भाव शिव और पार्वती की आराधना ही रहता है।
कथा का संदेश स्पष्ट है—पार्वती की साधना केवल इच्छा की अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि उसके लिए उन्होंने कठिन परिस्थितियों का सामना किया और अपने संकल्प को बनाए रखा।

जब शिव ने स्वीकार किया पार्वती का संकल्प
पौराणिक आख्यान के अनुसार पार्वती की कठोर साधना से भगवान शिव प्रसन्न हुए। उन्होंने पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार करने का वर दिया। इसके बाद हिमालयराज भी पार्वती की इच्छा के अनुसार उनके विवाह के लिए सहमत हो गए और आगे चलकर शिव-पार्वती का विवाह हुआ।
हरतालिका कथा में इस प्रसंग को व्रत की सफलता से जोड़ा जाता है। इसलिए यह पर्व केवल पारिवारिक सुख की कामना का अवसर नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प, तपस्या और अपनी इच्छा के प्रति निष्ठा का प्रतीक भी माना जाता है।
धार्मिक परंपरा में इसी कारण पार्वती को ‘गौरी’ और ‘उमा’ जैसे नामों से भी स्मरण किया जाता है और हरतालिका तीज पर उनकी विशेष पूजा की जाती है।

क्या यह कथा सचमुच किसी एक पुराण में मिलती है?
यह सवाल भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इंटरनेट पर हरतालिका तीज की कथा को कभी लिंग पुराण, कभी स्कंद पुराण, कभी भविष्योत्तर पुराण आदि से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है।
शोधपरक दृष्टि से यहां थोड़ी सावधानी जरूरी है। हरतालिका व्रत की परंपरा और उसकी कथा एक ही ग्रंथीय स्रोत से निर्धारित नहीं होती। महाराष्ट्र सरकार के मराठी विश्वकोश में प्रकाशित ‘हरितालिका व्रत’ संबंधी सामग्री बताती है कि इस व्रत का शास्त्रीय विधान निर्णयसिंधु और व्रतार्क जैसे निबंधग्रंथों में मिलता है। उसी स्रोत में व्रतराज ग्रंथ के हवाले से पार्वती को सखियों द्वारा ले जाने और ‘हरितालिका’ नाम की व्याख्या का उल्लेख किया गया है।
इसी तरह धर्मशास्त्र के इतिहास पर उपलब्ध एक अध्ययन में भी हरितालिका व्रत के मध्यकालीन व्रत-निबंधों में उल्लेख का संदर्भ मिलता है। उसमें व्रतराज से संबंधित नामकरण की व्याख्या भी दी गई है।
इसलिए किसी एक लोकप्रिय वेबसाइट की तरह यह कहना कि कथा केवल एक ही पुराण से आई है, पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। बेहतर यह कहना है कि हरतालिका व्रत की कथा विभिन्न धार्मिक ग्रंथीय और लोकपरंपराओं में अलग-अलग रूपों में संरक्षित और विकसित हुई है।

तीज’ केवल व्रत नहीं, स्त्री-संकल्प की परंपरा भी है
हरतालिका तीज को अक्सर पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है। यह इसकी प्रमुख धार्मिक मान्यताओं में से एक है। लेकिन कथा के भीतर इससे आगे का अर्थ भी मौजूद है।
पार्वती की कथा में एक महिला अपनी इच्छा को स्पष्ट रूप से पहचानती है और उसके लिए तपस्या करती है। वह परिस्थिति के दबाव में अपना संकल्प नहीं बदलती। उसकी सखियां उसके निर्णय का समर्थन करती हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो हरतालिका की कथा संकल्प, आत्मनिर्णय, सखी-सहयोग और आध्यात्मिक निष्ठा का सांस्कृतिक आख्यान भी बन जाती है।
इसीलिए इस पर्व का महत्व केवल वैवाहिक जीवन की मंगलकामना तक सीमित नहीं माना जा सकता। भारतीय लोकपरंपरा में व्रत और त्योहार अक्सर धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक संबंधों को भी मजबूत करते रहे हैं। हरतालिका में सखियों का साथ इसी सामाजिक पक्ष को सामने लाता है।

क्यों रखा जाता है निर्जला व्रत?
हरतालिका तीज के साथ निर्जला व्रत की परंपरा भी जुड़ी है। इसमें कई महिलाएं पूरे दिन भोजन और जल का त्याग करती हैं और शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। हालांकि व्रत की कठोरता और स्थानीय नियम अलग-अलग परिवारों तथा क्षेत्रों में भिन्न हो सकते हैं।
धार्मिक दृष्टि से निर्जल रहना तप और संयम का प्रतीक माना जाता है। आधुनिक स्वास्थ्य दृष्टि से हालांकि हर व्यक्ति के लिए कठोर निर्जला उपवास उपयुक्त हो, यह जरूरी नहीं है। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों या किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों को धार्मिक उपवास से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।
इसलिए व्रत की धार्मिक भावना का सम्मान करते हुए स्वास्थ्य संबंधी सावधानी को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

सोलह श्रृंगार से लेकर रातभर जागरण तक, कैसे बदली परंपरा?
हरतालिका तीज के अवसर पर महिलाएं पारंपरिक रूप से सोलह श्रृंगार करती हैं। मेहंदी, चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी, आभूषण और पारंपरिक परिधान इस पर्व के सांस्कृतिक रंग को और गहरा करते हैं। कई स्थानों पर महिलाएं सामूहिक रूप से तीज गीत गाती हैं, कथा सुनती हैं और रात में जागरण करती हैं।
पूजा में शिव-पार्वती की प्रतिमा या मिट्टी के स्वरूप की स्थापना, पूजन, कथा-श्रवण और आरती की परंपरा मिलती है। अगले दिन पारण किया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा सामग्री, कथा और अनुष्ठानों में स्थानीय विविधता देखने को मिलती है।
यही विविधता भारतीय त्योहारों की विशेषता है। एक ही पर्व अलग-अलग राज्यों में अलग रंग, भाषा, गीत और रीति के साथ दिखाई देता है।

हरतालिका तीज और शिव-पार्वती का संबंध इतना गहरा क्यों?
भारतीय धार्मिक परंपरा में शिव और पार्वती का संबंध केवल पति-पत्नी का संबंध नहीं है। इसे शिव और शक्ति के मिलन के रूप में भी देखा जाता है। शिव को चेतना और पार्वती को शक्ति का प्रतीक मानने वाली दार्शनिक परंपराएं भारतीय संस्कृति में लंबे समय से मौजूद हैं।
हरतालिका तीज की कथा इसी मिलन को एक स्त्री के संकल्प और साधना के माध्यम से सामने लाती है। पार्वती का तप और शिव का स्वीकार—दोनों मिलकर उस वैवाहिक एवं आध्यात्मिक आदर्श को स्थापित करते हैं, जिसकी स्मृति इस व्रत में की जाती है।
मराठी विश्वकोश की सामग्री में भी हरितालिका व्रत की कथा को पार्वती के शिव को पति रूप में प्राप्त करने और उनके ‘अर्धांग’ की स्थिति प्राप्त करने से जोड़ा गया है। यही अवधारणा आगे अर्धनारीश्वर के व्यापक धार्मिक प्रतीक से जुड़ती है।

नाम छोटा है, लेकिन कहानी सदियों पुरानी परंपरा समेटे है
हरतालिका शब्द को सुनते ही आज हमारे सामने सजधज कर पूजा करती महिलाएं, शिव-पार्वती की प्रतिमाएं और तीज के गीतों की तस्वीर आती है। लेकिन इस नाम की जड़ में एक ऐसी कथा है जो पार्वती की इच्छा और उनकी सखियों के सहयोग से शुरू होती है।
‘हर’ या ‘हरित’—हरण, और ‘आलिका’—सखी, यही पारंपरिक व्याख्या इस नाम को कथा से जोड़ती है। सखियां पार्वती को उस समय अपने साथ ले गईं जब उनके विवाह को लेकर ऐसी परिस्थिति बन रही थी जो उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं थी। वन में उन्होंने साधना की और अंततः शिव को पति रूप में प्राप्त करने की कथा सामने आती है।
यही कारण है कि हरतालिका तीज का नाम अपने आप में पूरी कहानी का संकेत देता है।

आज भी क्यों जीवित है हरतालिका की यह कथा?
समय बदला, समाज बदला, महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक भूमिका बदली, लेकिन हरतालिका तीज की लोकप्रियता कम नहीं हुई। इसका एक कारण यह भी है कि त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते। वे परिवार, समुदाय, स्मृति और सांस्कृतिक पहचान को जोड़ने का काम करते हैं।
हरतालिका तीज में महिलाएं पूजा के साथ अपनी सहेलियों और परिवार के साथ समय बिताती हैं। पारंपरिक गीत और कथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती है। नई पीढ़ी सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों से तीज की तस्वीरें और शुभकामनाएं साझा करती है, लेकिन मूल कथा आज भी वही है—पार्वती का संकल्प, सखियों का सहयोग और शिव की प्राप्ति।
यानी माध्यम बदल गया, लेकिन कथा की सांस्कृतिक स्मृति बनी रही।

हरतालिका तीज हमें क्या संदेश देती है?
हरतालिका तीज की कथा को केवल ‘मनचाहा वर पाने’ के व्रत के रूप में देखना इसके व्यापक सांस्कृतिक अर्थ को सीमित कर देगा। पार्वती की कथा हमें बताती है कि किसी उद्देश्य के प्रति निष्ठा, धैर्य और निरंतर प्रयास भारतीय धार्मिक आख्यानों में महत्वपूर्ण मूल्य रहे हैं।
दूसरा संदेश सखी-संबंध का है। पार्वती अकेली नहीं थीं। उनकी सखियां उनके साथ खड़ी हुईं। इसलिए हरतालिका की कथा में महिलाओं के आपसी सहयोग और भावनात्मक साथ की एक सुंदर तस्वीर भी दिखाई देती है।
तीसरा संदेश यह है कि परंपरा स्थिर नहीं होती। समय के साथ पूजा के तरीके, परिधान, गीत और सामाजिक संदर्भ बदलते रहे, लेकिन पर्व का मूल भाव आज भी जीवित है।

आखिर ‘हरतालिका’ नाम का रहस्य क्या है?
अगर पूरी कथा को एक वाक्य में समेटें तो उत्तर यही है—माता पार्वती को उनकी सखियां अपनी सहायता से घर से दूर वन में ले गईं, ताकि वे भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए अपनी साधना पूरी कर सकें। इसी ‘सखी द्वारा हरण करके ले जाने’ की कथा से ‘हरितालिका’ नाम की व्युत्पत्ति जोड़ी जाती है। और ‘तीज’ इसलिए, क्योंकि यह पर्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि से जुड़ा है।
इस तरह हरतालिका तीज का नाम केवल एक धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि माता पार्वती के संकल्प और उनकी सखियों के सहयोग की स्मृति भी है।
आज जब महिलाएं शिव-पार्वती की पूजा के सामने बैठकर हरतालिका की कथा सुनती हैं, तो वे केवल एक पुरानी पौराणिक कहानी नहीं दोहरा रही होतीं। वे उस सांस्कृतिक स्मृति को आगे बढ़ा रही होती हैं जिसमें प्रेम के साथ संकल्प है, आस्था के साथ तप है और व्यक्तिगत इच्छा के साथ सखी का साथ भी है।
यही वजह है कि सदियों पुरानी यह कथा आज भी हरतालिका तीज के नाम के साथ उतनी ही जीवंत दिखाई देती है।

Geeta Singh
Geeta Singh

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