
संवाद 24 नई दिल्ली। भारत की मेजबानी में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मंच से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वैश्विक व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव का आह्वान किया है। दुनिया के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में भारत ने स्पष्ट संदेश दिया कि विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं (ग्लोबल साउथ) को अब केवल ‘नियम मानने वाला’ (Rule Taker) बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि आगे बढ़कर ‘नियम बनाने वाला’ (Rule Shaper) बनना होगा। सम्मेलन के पहले ही दिन तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद सर्वसम्मति से पारित हुआ ‘नई दिल्ली घोषणापत्र 2026’ इस दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।
पुराने संस्थानों के सहारे नहीं चल सकती आधुनिक दुनिया
भारत मंडपम में आयोजित सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि विश्व बड़ी तेजी से बदल रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अब भी दशकों पुराने ढर्रे पर चल रही हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, विश्व व्यापार संगठन और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में आमूलचूल सुधार की आवश्यकता पर बल दिया। प्रधानमंत्री ने दो टूक कहा कि जब तक नीति-निर्माण और भविष्य की तकनीकों के मानक तय करने में विकासशील देशों की बराबर भागीदारी नहीं होगी, तब तक समावेशी विकास संभव नहीं है।
घोषणाओं को ठोस परिणामों में बदलने की चुनौती
शिखर सम्मेलन के दौरान ‘नई दिल्ली घोषणा 2026’ को सभी सदस्य देशों द्वारा बिना किसी विरोध के स्वीकार किए जाने को भारत की बड़ी रणनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि घोषणापत्र ने साझा संकल्पों की एक स्पष्ट दिशा तय कर दी है, किंतु असली कसौटी इन फैसलों को जमीन पर उतारने की है। केवल कागजी बयानों से काम नहीं चलेगा, बल्कि लिए गए निर्णयों और धरातल पर दिखने वाले परिणामों के बीच के अंतर को पाटना होगा।
स्थानीय मुद्रा और तकनीक पर साझा रुख
सम्मेलन में बहुपक्षीय व्यापार को सुगम बनाने, एकतरफा प्रतिबंधों का मुकाबला करने और सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने पर विशेष सहमति बनी। इसके अलावा ऊर्जा सुरक्षा, लचीली वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार को लेकर भी कार्ययोजना पर चर्चा हुई।






