
संवाद 24 फर्रुखाबाद। जनपद फर्रुखाबाद में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए निजी नर्सिंग होम, क्लीनिक और मानकों को ताक पर रखकर चलाए जा रहे तथाकथित आधुनिक अस्पतालों के खिलाफ जिला प्रशासन ने अब आर-पार की जंग छेड़ दी है। मरीजों की लाचारी और बीमारी को दुधारू गाय समझने वाले सिंडिकेट पर मंगलवार को उस समय बिजली गिर पड़ी, जब सिटी मजिस्ट्रेट पारुल तरार खुद दलबल के साथ सड़कों पर उतर आईं।
स्वास्थ्य विभाग और अग्निशमन (दमकल) विभाग की संयुक्त टीम के साथ दोपहर 1:00 बजे से 3:00 बजे तक चले दो घंटे के सघन औचक निरीक्षण अभियान ने पूरे शहर के स्वास्थ्य माफियाओं में हड़कंप मचा दिया। नेकपुर कलां से लेकर मसैनी चौराहे तक हुई इस बड़ी कार्रवाई में जहां बिना डॉक्टर के पैरामेडिकल स्टाफ द्वारा ओपीडी चला रहे एक अस्पताल का रजिस्ट्रेशन निरस्त करने की संस्तुति की गई, वहीं जनवरी माह से बिना किसी वैध पंजीकरण के बेधड़क संचालित हो रहे ‘अनभी हॉस्पिटल’ को सील कर ताला जड़ दिया गया।
डॉक्टर नदारद, पर्चे काट रहा था पैरामेडिकल स्टाफ
संयुक्त प्रशासनिक टीम ने मंगलवार दोपहर ठीक 1:00 बजे सबसे पहले नेकपुर कलां स्थित एक निजी अस्पताल पर अचानक छापा मारा। टीम के अचानक पहुंचते ही अस्पताल परिसर और स्वागत पटल (रिसेप्शन) पर अफरा-तफरी मच गई। जांच टीम ने जब अस्पताल के वैध दस्तावेजों की पड़ताल की, तो कागजों पर सब कुछ दुरुस्त नजर आया:
* दस्तावेज सही, पर धरातल पर धोखाधड़ी: अस्पताल का सीएमओ कार्यालय में नवीनीकृत पंजीकरण प्रमाण पत्र (Registration Certificate), मेडिकल स्टोर का ड्रग लाइसेंस और पैथोलॉजी लैब के दस्तावेज प्रथम दृष्टया वैध पाए गए।
* ओपीडी में कतारबद्ध मरीज, केबिन से डॉक्टर गायब: जब अधिकारी परामर्श कक्ष (OPD Room) की ओर बढ़े, तो वहां का नजारा चौंकाने वाला था। दर्जनों मरीज और उनके तीमारदार अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे, लेकिन कुर्सी पर कोई एमबीबीएस या विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं बैठा था।
* पैरामेडिकल स्टाफ बना ‘डॉक्टर’: एक साधारण पैरामेडिकल कर्मचारी डॉक्टर का चोगा ओढ़कर मरीजों की नब्ज टटोल रहा था, गंभीर बीमारियों की दवाएं लिख रहा था और जांच की सलाह दे रहा था। पूछताछ में वह कर्मचारी न तो कोई संतोषजनक डिग्री दिखा सका और न ही अधिकृत चिकित्सक की मौजूदगी का कोई प्रमाण दे पाया।
सिटी मजिस्ट्रेट पारुल तरार के निर्देश पर अधिकारियों ने अवैध रूप से चल रहे उस ओपीडी कक्ष को तुरंत बंद कराया। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने पाया कि यह सीधे तौर पर भारतीय चिकित्सा परिषद के नियमों का खुला उल्लंघन और मरीजों की जिंदगी से किया जाने वाला घोर खिलवाड़ है। मौके पर मौजूद डिप्टी सीएमओ ने अस्पताल के पंजीकरण को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की विधिक संस्तुति रिपोर्ट तैयार कर उच्चाधिकारियों को भेज दी।
बिना रजिस्ट्रेशन महीनों से चल रहा था ‘अनभी हॉस्पिटल’, प्रशासन ने जड़ा ताला
नेकपुर कलां के बाद संयुक्त टीम का अगला पड़ाव मसैनी चौराहा स्थित ‘अनभी हॉस्पिटल’ बना। जैसे ही प्रशासनिक गाड़ियां अस्पताल के बाहर रुकीं, अस्पताल के तथाकथित प्रबंधकों और स्टाफ में हड़कंप मच गया। यहां जो सच सामने आया, वह चिकित्सा जगत की सबसे स्याह तस्वीर पेश करने वाला था।
जनवरी से चल रही थी अवैध दुकान
जांच में खुलासा हुआ कि अनभी हॉस्पिटल स्वास्थ्य विभाग (सीएमओ कार्यालय) में बिना किसी वैध पंजीकरण या रिन्युअल के ही धड़ल्ले से चलाया जा रहा था। अस्पताल प्रबंधन पिछले कई महीनों (जनवरी से) से बिना किसी अनुज्ञा के 10 बेड का इन-पेशेंट अस्पताल संचालित कर रहा था।
4-5 मरीज मिले भर्ती, गायब थे विशेषज्ञ डॉक्टर
निरीक्षण के दौरान अस्पताल के वार्डों में 4 से 5 मरीज बेड पर भर्ती पाए गए, जिन्हें सलाइन ड्रिप और गंभीर दवाएं दी जा रही थीं। हैरानी की बात यह रही कि पूरे अस्पताल में एक भी अधिकृत ड्यूटी डॉक्टर या विशेषज्ञ चिकित्सक मौजूद नहीं था। जीवन रक्षक उपकरणों और इमरजेंसी केयर के नाम पर अस्पताल केवल एक खोखला ढांचा साबित हुआ।
मरीजों की सुरक्षित शिफ्टिंग और सीलिंग की कार्रवाई
सिटी मजिस्ट्रेट ने संवेदनशीलता और सख्ती का परिचय देते हुए सबसे पहले भर्ती मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित की:
* अधिकारियों ने भर्ती मरीजों और उनके तीमारदारों से बातचीत कर उनकी स्थिति का आकलन किया।
* मरीजों की सहमति और इच्छानुसार उन्हें सरकारी एंबुलेंस की मदद से लोहिया अस्पताल व अन्य अधिकृत व सुरक्षित चिकित्सालयों में शिफ्ट कराया गया।
* मरीजों के सुरक्षित बाहर निकलने के बाद प्रशासनिक टीम ने अस्पताल के इनडोर रजिस्टर, ओपीडी पर्चे, मेडिकल बिल और महत्वपूर्ण वित्तीय व प्रशासनिक दस्तावेज जब्त कर लिए।
* इसके बाद मुख्य द्वार पर लाल सील लगाकर अनभी हॉस्पिटल को पूरी तरह सील कर दिया गया।
अग्निशमन मानकों की अनदेखी: बड़े हादसे को न्योता दे रहे थे ये प्रतिष्ठान
छापेमारी के दौरान दमकल विभाग के मुख्य अग्निशमन अधिकारी (एफएसओ) और उनकी टीम ने अस्पतालों के अग्नि सुरक्षा तंत्र (Fire Safety Standards) की गहराई से पड़ताल की। जांच में सामने आया कि अधिकांश अवैध अस्पताल संकरी गलियों और कम चौड़े रास्तों पर बहुमंजिला इमारतों में चल रहे हैं, जहां आग लगने की सूरत में दमकल की गाड़ियों का पहुंचना तक नामुमकिन है।
* अग्निशामक यंत्रों की मियाद खत्म: अस्पतालों में लगे गिने-चुने अग्निशमन सिलेंडर एक्सपायरी डेट पार कर चुके थे।
* इमरजेंसी एग्जिट का अभाव: आपातकालीन निकास (Emergency Exit) के कोई रास्ते नहीं थे।
* स्मोक डिटेक्टर और अलार्म नदारद: वार्डों और आईसीयू जैसे संवेदनशील हिस्सों में धुएं की पहचान करने वाले ऑटोमैटिक स्प्रिंकलर या अलार्म सिस्टम स्थापित नहीं किए गए थे।
दमकल अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि बिना फायर एनओसी (No Objection Certificate) के संचालित किसी भी अस्पताल को मरीजों की जान जोखिम में डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
स्वास्थ्य व्यवस्था से खिलवाड़ पर सिटी मजिस्ट्रेट की दो टूक चेतावनी
कार्रवाई के उपरांत मीडिया से मुखातिब होते हुए सिटी मजिस्ट्रेट पारुल तरार ने बेहद कड़े शब्दों में अवैध नर्सिंग होम संचालकों को चेताया।
“जनपद में बिना वैध पंजीकरण, बिना पूर्णकालिक डॉक्टरों और बुनियादी सुरक्षा मानकों के अभाव में चल रहे अस्पतालों के खिलाफ लगातार गंभीर शिकायतें मिल रही थीं। जनता के स्वास्थ्य और उनके जीवन के साथ किसी भी सूरत में समझौता नहीं किया जाएगा। आज की कार्रवाई महज एक शुरुआत है। जो भी अस्पताल नियमों को ताक पर रखकर झोलाछापों के भरोसे आईसीयू या ओपीडी चलाएगा, उस पर एफआईआर दर्ज होगी, अस्पताल सील किए जाएंगे और गैंगस्टर एक्ट जैसी कठोर धाराओं के तहत कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।” — पारुल तरार, नगर मजिस्ट्रेट, फर्रुखाबाद
इस संयुक्त अभियान में डिप्टी सीएमओ डॉ. आर. सी. माथुर, दमकल विभाग से एफएसओ, राजस्व निरीक्षक, नगर पालिका परिषद की टीम और भारी संख्या में पुलिस बल मौजूद रहा।






