286 दिन का समंदरी चक्रव्यूह, उखड़ा पेंट और जंग के निशान: 5000 थके हुए अमेरिकी सैनिकों को लेकर जब थाईलैंड पहुंचा ‘सुपरकैरियर’ USS अब्राहम लिंकन

​संवाद 24 नई दिल्ली। आधुनिक समुद्री युद्धक इतिहास में किसी विशाल युद्धपोत का महीनों तक बिना रुके समंदर के तूफानों और तनावपूर्ण सैन्य मिशनों से जूझना कितना भारी पड़ सकता है, इसकी जीती-जागती मिसाल थाईलैंड के तट पर देखने को मिली। अमेरिकी नौसेना का विशालकाय परमाणु संचालित विमानवाहक युद्धपोत यूएसएस अब्राहम लिंकन (USS Abraham Lincoln – CVN 72) करीब 286 दिनों तक गहरे समुद्र में लगातार सक्रिय रहने के बाद थाईलैंड के लाएम चाबांग बंदरगाह पर पहुंच गया है। बंदरगाह पर जब यह दैत्याकार पोत लंगर डालने पहुंचा, तो इसका दृश्य किसी विजयी योद्धा जैसा तो था, लेकिन इसके बदन पर लगे जंग के गहरे निशान, उखड़ा हुआ पेंट और उस पर तैनात 5,000 नाविकों के चेहरों की थकान दुनिया भर की रक्षा रणनीतियों और सैनिकों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल खड़े कर गई।

​आधुनिक दौर का सबसे लंबा और कठिन मिशन
​अमेरिकी नौसेना के मानकों के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में किसी भी विमानवाहक पोत की तैनाती 6 से 9 महीने के बीच होती है। इस समयावधि के बाद जहाजों को डॉकयार्ड में नियमित मेंटेनेंस और सैनिकों को मानसिक-शारीरिक राहत दी जाती है। लेकिन यूएसएस अब्राहम लिंकन के मामले में अंतरराष्ट्रीय तनावों और रणनीतिक मजबूरियों ने इस नियम को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया। ​सैन डिएगो स्थित अपने होमपोर्ट से रवाना होने के बाद यह युद्धपोत सीधे तौर पर मध्य पूर्व और संवेदनशील समुद्री मार्गों में जटिल सैन्य अभियानों का केंद्र बन गया। लाल सागर, अरब सागर और फारस की खाड़ी के अशांत क्षेत्रों में यह पोत लगातार लड़ाकू विमानों की उड़ानों, नौसैनिक नाकाबंदी और ईरान समर्थित गतिविधियों पर पैनी नजर रखने के लिए तैनात रहा। इस अत्यधिक लंबे प्रवास ने इसे आधुनिक नौसैनिक इतिहास के सबसे लंबे निर्बाध अभियानों में से एक बना दिया।

​जंग की मोटी परत और फीका पड़ा ग्रे पेंट: जहाज की दुर्दशा
​लाएम चाबांग तट पर ली गई तस्वीरों ने रक्षा विश्लेषकों का ध्यान तेजी से अपनी ओर खींचा है। युद्धपोत की विशालकाय स्टील बॉडी, विशेष रूप से पानी की सतह से सटी वाटरलाइन के इर्द-गिर्द, भारी मात्रा में जंग की लाल-भूरी परतों से घिरी नजर आई। जहाज का प्रतिष्ठित स्लेटी रंग कई जगहों से पूरी तरह फीका पड़ चुका है। केवल लिंकन ही नहीं, बल्कि इसके स्ट्राइक ग्रुप में शामिल गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर और क्रूजर जहाजों पर भी लगातार खारे पानी, नमी और तेज हवाओं की मार साफ देखी जा सकती है। ​नौसेना विशेषज्ञों का कहना है कि जब कोई युद्धपोत इतने लंबे समय तक बिना किसी डॉक मेंटेनेंस के समंदर में रहता है, तो उसका रंग उतरना और जंग लगना स्वाभाविक भौतिक प्रक्रिया है। हालांकि, सक्रिय मिशन के दौरान जहाज की बॉडी को खुरच कर दोबारा पेंट करना लगभग असंभव होता है। रणनीतिकारों का मानना है कि यद्यपि सतही जंग से जहाज की रडार और मिसाइल प्रणाली की मारक क्षमता तुरंत प्रभावित नहीं होती, लेकिन लंबे समय तक मेंटेनेंस टलने से भविष्य में इसके ढांचे पर भारी तकनीकी मरम्मत का बोझ बढ़ जाता है।

​5,000 सैनिकों का मानसिक तनाव और राहत की तलाश
​इस पूरे मिशन का सबसे संवेदनशील पहलू जहाज पर तैनात करीब 5,000 नाविक और मरीन कमांडो रहे हैं। लगभग साढ़े नौ महीने तक एक बंद स्टील के ढांचे में लगातार खतरे के साए में रहना, परिवार से दूर होना और कड़े सैन्य प्रोटोकॉल का पालन करना सैनिकों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल चुका है। रिपोर्टों के अनुसार, इतने लंबे मिशन के दौरान चालक दल को नींद की कमी, भारी तनाव और भीषण थकान का सामना करना पड़ा। ​अमेरिकी नौसेना के रियर एडमिरल रॉबर्ट लौघ्रान ने चालक दल के त्याग और अभियानों की सराहना करते हुए कहा कि सैनिकों ने ऐतिहासिक सफलताएं हासिल की हैं और अब उन्हें मानसिक व शारीरिक रूप से खुद को रिचार्ज करने की सख्त जरूरत है। हाल ही में इस पोत की जिम्मेदारी दूसरे अमेरिकी विमानवाहक पोत यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन को सौंपी गई है, जिसके बाद अब लिंकन अपने वतन वापसी के रास्ते पर है।

​थाईलैंड में चार दिन का ठहराव, कोई युद्धाभ्यास नहीं
​थाईलैंड के तट पर यह युद्धपोत लगभग चार से पांच दिनों तक लंगर डाले रहेगा। अमेरिकी नौसेना ने स्पष्ट किया है कि इस प्रवास के दौरान थाईलैंड की सेना के साथ कोई संयुक्त सैन्य अभ्यास नहीं किया जाएगा। पूरा फोकस केवल सैनिकों के आराम, रिकवरी और उनके मानसिक तनाव को दूर करने पर केंद्रित है। ​नाविकों को नजदीकी पर्यटन केंद्र पटाया और आसपास के क्षेत्रों में घूमने और आराम करने की अनुमति दी गई है। 1954 से अमेरिका का रणनीतिक सहयोगी रहे थाईलैंड में अमेरिकी युद्धपोतों का आना सामान्य है, लेकिन यूएसएस अब्राहम लिंकन की यह यात्रा किसी शक्ति प्रदर्शन से ज्यादा समंदर की क्रूर परिस्थितियों और लंबे मिशनों के मानवीय मूल्य की दास्तां बयां कर रही है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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