‘भीख नहीं, हर्जाना चाहिए’: हिमालयी सुनामी से तबाह नेपाल ने चीन, अमेरिका और भारत पर क्यों मढ़ा दोष?

संवाद 24 नई दिल्ली। हिमालय की हसीन वादियों में बसा पड़ोसी मुल्क नेपाल इस समय इतिहास की सबसे भयावह प्राकृतिक विभीषिका से जूझ रहा है। हालांकि, इस बार नेपाल का रुख सिर्फ राहत शिविर लगाने और दुनिया के सामने हाथ फैलाने तक सीमित नहीं है। विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन के तांडव के बीच काठमांडू ने वैश्विक कूटनीति के पटल पर एक बड़ा धमाका कर दिया है। नेपाल सरकार ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि उसे किसी देश की दया या चैरिटी (दान) नहीं चाहिए, बल्कि भारी तबाही का ‘जलवायु मुआवजा’ (Climate Compensation) चाहिए। इसके साथ ही नेपाल ने दुनिया की तीन सबसे बड़ी औद्योगिक महाशक्तियों – चीन, अमेरिका और भारत – को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया है।

‘बाढ़ नहीं, 180 किमी/घंटे की रफ्तार वाली हिमालयी सुनामी’
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने हालिया जलप्रलय के भयावह मंजर को बयां करते हुए इसे सामान्य मौसमी आपदा मानने से साफ इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि हिमालय की घाटियों में जो घटा, वह कोई साधारण बाढ़ नहीं थी बल्कि एक पूर्ण रूपेण ‘हिमालयी सुनामी’ थी। विदेशी मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों से बातचीत में विदेश मंत्री ने बताया कि उफनती नदियों में पानी की लहरें 20 से 30 मीटर तक ऊंची उठ रही थीं। यह जलप्रलय करीब 180 किलोमीटर प्रति घंटे की जानलेवा गति से घाटियों की ओर बढ़ा, जिसने अपने रास्ते में आने वाले पुलों, बहुमंजिला इमारतों, हाइड्रोपावर परियोजनाओं और पूरे के पूरे गांवों को पलक झपकते ही मिट्टी और मलबे में तब्दील कर दिया। दर्जनों बस्तियां सिल्ट के दलदल में समा चुकी हैं और बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा जमींदोज हो चुका है।

‘गुनाहगार कोई और, सजा भुगत रहा नेपाल’
नेपाल की इस आक्रामक कूटनीति के पीछे का मूल तर्क पर्यावरण से जुड़ा है। काठमांडू का कहना है कि वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैसों के कुल उत्सर्जन में नेपाल की हिस्सेदारी न के बराबर – यानी एक प्रतिशत के बेहद छोटे अंश के बराबर – है। इसके बावजूद, जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और बढ़ते तापमान की सबसे भयानक मार इसी पर्वतीय मुल्क पर पड़ रही है। विदेश मंत्री खनाल के मुताबिक, दुनिया की प्रमुख औद्योगिक अर्थव्यवस्थाएं अपने कल-कारखानों और विकास की अंधी दौड़ से धरती का तापमान बढ़ा रही हैं, जिसके चलते हिमालय के संवेदनशील ग्लेशियर अभूतपूर्व गति से पिघल रहे हैं। ग्लेशियरों के फटने (GLOF) और मूसलाधार बारिश के अनियंत्रित पैटर्न ने नेपाल के भूगोल को तहस-नहस कर दिया है। नेपाल का सीधा सवाल है: जब प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन बड़े देश कर रहे हैं, तो उसकी कीमत नेपाल की मासूम जनता अपनी जान और माल गंवाकर क्यों चुकाए?

चीन, अमेरिका और भारत पर सीधे सवाल
नेपाल ने अपने कूटनीतिक रुख को ‘मदद से न्याय’ (Aid to Climate Justice) की ओर मोड़ते हुए अंतरराष्ट्रीय साझेदारों को औपचारिक ‘क्लाइमेट कंपेंसेशन क्लेम लेटर’ भेज दिया है। इतना ही नहीं, नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र (UN) से सीधे 5 अरब डॉलर (लगभग 41 हजार करोड़ रुपये से अधिक) के वित्तीय मुआवजे की औपचारिक मांग रख दी है। नेपाल ने रेखांकित किया कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन तालिका में चीन सबसे शीर्ष पर है, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका दूसरे और भारत तीसरे स्थान पर आते हैं। विदेश मंत्री ने तर्क दिया कि ऐतिहासिक और वर्तमान उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार इन औद्योगिक शक्तियों का यह नैतिक और अंतरराष्ट्रीय दायित्व बनता है कि वे नेपाल जैसे उच्च-जोखिम वाले जलवायु-संवेदनशील देशों को हुए नुकसान की पूरी भरपाई करें। नेपाल का कहना है कि यह कोई उपकार नहीं बल्कि ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ (Polluter Pays Principle) के तहत मिलने वाला हक है।

पूरे दक्षिण एशिया के लिए खतरे की घंटी
काठमांडू ने आगाह किया है कि यह संकट केवल नेपाल की सीमाओं तक सीमित रहने वाला नहीं है। हिमालय को ‘एशिया का वॉटर टावर’ कहा जाता है। यदि हिमालयी ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और पहाड़ों का दरकना इसी गति से जारी रहा, तो आगे चलकर त्रिशूली, कोशी, गंडक और अंततः गंगा जैसी विशाल नदियों का जल-प्रवाह पूरी तरह असंतुलित हो जाएगा। इससे आने वाले दशकों में भारत और बांग्लादेश समेत पूरे दक्षिण एशिया के अरबों लोगों की जल सुरक्षा, कृषि और आजीविका पर सीधा खतरा मंडराने लगेगा। नेपाल ने वैश्विक समुदाय को चेतावनी दी है कि यदि अभी उत्सर्जन पर सख्त अंकुश नहीं लगाया गया और प्रभावित पर्वतीय देशों को न्यायोचित क्षतिपूर्ति नहीं दी गई, तो हिमालय का यह क्रोध पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगा।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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