पौधों से बनेगी बिजली? क्या है बायो-सोलर टेक्नोलॉजी, कैसे काम करती है यह अनोखी तकनीक

संवाद 24 डेस्क। सोलर पैनल के बाद अब वैज्ञानिक ऊर्जा की दुनिया में प्रकृति के एक बेहद पुराने तंत्र—प्रकाश संश्लेषण—से प्रेरणा ले रहे हैं। विचार यह है कि पौधों द्वारा सूर्य की रोशनी को रासायनिक ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया से जुड़े इलेक्ट्रॉनों या जड़ों के आसपास मौजूद सूक्ष्मजीवों की गतिविधि को उपयोग में लाकर बिजली पैदा की जाए। इसी व्यापक क्षेत्र में बायो-सोलर टेक्नोलॉजी और प्लांट माइक्रोबियल फ्यूल सेल (PMFC) जैसी तकनीकों पर शोध हो रहा है। अमर उजाला की 24 अगस्त 2026 की रिपोर्ट में भी इस तकनीक को भविष्य में पौधों की मदद से ऊर्जा उत्पादन और मौजूदा सोलर सिस्टम को नई दिशा देने वाली तकनीक के रूप में बताया गया है। हालांकि, रिपोर्ट स्वयं स्पष्ट करती है कि यह तकनीक अभी परीक्षण और शोध के चरण में है तथा इसे मौजूदा सोलर पैनलों का विकल्प मानना जल्दबाजी होगी।

आखिर पौधे बिजली कैसे पैदा कर सकते हैं?
यहां सबसे पहले एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अंतर समझना जरूरी है। पौधे सीधे किसी सोलर पैनल की तरह बिजली पैदा नहीं करते। प्रकाश संश्लेषण के दौरान पौधे सूर्य की ऊर्जा का उपयोग करके कार्बन डाइऑक्साइड और पानी से कार्बनिक पदार्थ बनाते हैं। इस प्रक्रिया से जुड़ी रासायनिक ऊर्जा और पौधों की जड़ों से निकलने वाले कार्बनिक यौगिक आगे कुछ जैव-विद्युत प्रणालियों में ऊर्जा के स्रोत बन सकते हैं। शोध में प्लांट-माइक्रोबियल फ्यूल सेल इसी सिद्धांत का उपयोग करता है।
PMFC में पौधे की जड़ों के आसपास का क्षेत्र यानी राइजोस्पीयर बेहद महत्वपूर्ण होता है। पौधे जड़ों के माध्यम से शर्करा और अन्य कार्बनिक यौगिक छोड़ते हैं। मिट्टी में मौजूद इलेक्ट्रोकेमिकल रूप से सक्रिय सूक्ष्मजीव इन पदार्थों का उपयोग करते हैं और इस दौरान इलेक्ट्रॉन मुक्त होते हैं। उपयुक्त इलेक्ट्रोड इन इलेक्ट्रॉनों को एकत्र कर बाहरी सर्किट के जरिए विद्युत प्रवाह में बदल सकता है। इस तरह पौधा, मिट्टी के सूक्ष्मजीव और इलेक्ट्रोड मिलकर एक जैव-विद्युत प्रणाली बनाते हैं।

बायो-सोलर और सामान्य सोलर पैनल में क्या अंतर है?
सामान्य फोटोवोल्टिक सोलर पैनल में अर्धचालक पदार्थ सूर्य के प्रकाश को सीधे विद्युत ऊर्जा में बदलते हैं। इसके विपरीत पौधों पर आधारित जैव-विद्युत प्रणालियां जीवित पौधे, उनकी जैविक गतिविधियों और सूक्ष्मजीवों के बीच संबंध का इस्तेमाल करती हैं। इसलिए दोनों तकनीकों का मूल ऊर्जा स्रोत सूर्य का प्रकाश हो सकता है, लेकिन ऊर्जा को बिजली में बदलने का रास्ता अलग है।
कुछ शोध ऐसे फोटोसिंथेटिक बायो-सोलर सेल पर भी हो रहे हैं जिनमें जीवित पौधों या शैवाल की प्रकाश संश्लेषण संबंधी इलेक्ट्रॉन गतिविधि को सीधे इलेक्ट्रोड से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। यानी ‘बायो-सोलर’ एक व्यापक शोध क्षेत्र है, जबकि PMFC इसका एक विशिष्ट जैव-विद्युत दृष्टिकोण है।

जड़ों के नीचे छिपी है इस तकनीक की असली ताकत
इस तकनीक की सबसे दिलचस्प बात यह है कि बिजली पैदा करने में पौधे की केवल पत्तियां ही नहीं, बल्कि जड़ों के आसपास की मिट्टी और सूक्ष्मजीव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शोध के अनुसार, पौधों से निकलने वाले राइजो-डिपॉजिट्स सूक्ष्मजीवों के लिए ऊर्जा का स्रोत बनते हैं। ये सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों को तोड़ते हुए इलेक्ट्रॉन स्थानांतरित कर सकते हैं, जिन्हें इलेक्ट्रोड के जरिए विद्युत उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
यही कारण है कि PMFC को केवल ‘पौधे से बिजली’ कहना तकनीकी रूप से अधूरा होगा। अधिक सटीक रूप से यह पौधे-माइक्रोब-इलेक्ट्रोड प्रणाली है, जिसमें पौधे ऊर्जा का जैविक आधार उपलब्ध कराते हैं और सूक्ष्मजीव इलेक्ट्रॉन उत्पादन तथा स्थानांतरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

क्या इस तकनीक से मोबाइल या घर के उपकरण चलाए जा सकते हैं?
यहीं इस तकनीक को लेकर सबसे अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है। वैज्ञानिक प्रयोगों में पौधों से जैव-विद्युत उत्पादन सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया गया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आज एक गमले में इलेक्ट्रोड लगाने से घर की बिजली की जरूरत पूरी हो जाएगी।
विभिन्न प्रयोगों में बिजली का उत्पादन हुआ है, लेकिन उत्पादन की मात्रा पौधे की प्रजाति, मिट्टी, प्रकाश, जड़ों से निकलने वाले कार्बनिक पदार्थ, सूक्ष्मजीव समुदाय, इलेक्ट्रोड सामग्री और सिस्टम के डिजाइन जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है। पुराने प्रयोगों में कुछ PMFC प्रणालियों ने सीमित पावर डेंसिटी हासिल की है, जबकि हाल के शोध में डिजाइन और इलेक्ट्रोड सुधार के साथ बेहतर परिणामों की दिशा में काम जारी है।
इसलिए फिलहाल इसका व्यावहारिक उपयोग बड़े घरेलू उपकरणों की जगह कम ऊर्जा वाले सेंसर, पर्यावरण निगरानी उपकरण या विशेष परिस्थितियों में छोटे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम जैसे क्षेत्रों में अधिक संभावनाशील दिखाई देता है। 2026 के एक सम्मेलन-संबंधी शोध में PMFC आधारित प्रणाली से वर्टिकल गार्डन के पर्यावरणीय मॉनिटरिंग सेंसरों को बिजली देने की संभावना का अध्ययन भी किया गया है।

खेती और बिजली दोनों का साथ?
बायो-सोलर तकनीक की एक आकर्षक संभावना यह है कि इसमें पौधे को ऊर्जा उत्पादन के लिए नष्ट करना जरूरी नहीं होता। पारंपरिक बायोफ्यूल में अक्सर फसल या बायोमास को काटकर संसाधित किया जाता है, जबकि PMFC में जीवित पौधे और उनकी जड़ प्रणाली सिस्टम का हिस्सा बने रहते हैं। Wageningen University के शुरुआती शोध में भी जीवित पौधों और बैक्टीरिया के माध्यम से जैव-विद्युत उत्पादन का सिद्धांत प्रदर्शित किया गया था।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि हर कृषि फसल को व्यावसायिक स्तर पर बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। पौधे की प्रजाति और पर्यावरणीय परिस्थितियां प्रदर्शन पर बड़ा असर डालती हैं। एक प्रयोग में बैंगन, टमाटर और मिर्च जैसी सब्जियों के PMFC परीक्षण में पौधों की वृद्धि और विद्युत उत्पादन पर तनाव के प्रभाव भी देखे गए।

2026 में शोध किस दिशा में आगे बढ़ रहा है?
हालिया शोध यह संकेत देता है कि वैज्ञानिक अब केवल ‘क्या पौधों से बिजली बनाई जा सकती है’ के सवाल तक सीमित नहीं हैं। अब ध्यान इस बात पर है कि उत्पादन को अधिक स्थिर, कुशल और व्यावहारिक कैसे बनाया जाए। अप्रैल 2026 में प्रकाशित एक समीक्षा में PMFC को ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ नाइट्रोजन चक्र, जल उपचार, मिट्टी सुधार और टिकाऊ कृषि जैसी गतिविधियों से जोड़ने की संभावनाओं पर चर्चा की गई है। इसमें पौधे का चुनाव, माइक्रोबियल समुदाय और इलेक्ट्रोड डिजाइन को प्रदर्शन के प्रमुख कारकों में गिना गया है।
एक अन्य 2026 समीक्षा में भी यह सामने आया कि तकनीक के सामने इलेक्ट्रोड की कार्यक्षमता, अलग-अलग पौधों की प्रजातियों के अनुरूप प्रदर्शन, संचालन की स्थिरता और मानकीकरण जैसी चुनौतियां अभी मौजूद हैं।

सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
बायो-सोलर या PMFC तकनीक का सबसे बड़ा सवाल केवल बिजली पैदा करना नहीं, बल्कि पर्याप्त मात्रा में लगातार और आर्थिक रूप से उपयोगी बिजली पैदा करना है। शोध-समीक्षाओं में कम वोल्टेज, स्थिर आउटपुट की समस्या, सिस्टम की लागत, पौधों और माइक्रोबियल समुदायों में अंतर तथा लंबे समय तक संचालन जैसी चुनौतियों का उल्लेख किया गया है।
इसके अलावा बड़े पैमाने पर सिस्टम तैयार करना भी आसान नहीं है। प्रयोगशाला में किसी तकनीक का काम करना और हजारों घरों या बड़े औद्योगिक परिसर में उसका भरोसेमंद ढंग से काम करना दो अलग बातें हैं। इसलिए अभी इसे भविष्य की संभावनाशील तकनीक कहना अधिक उचित है, न कि तैयार व्यावसायिक बिजली समाधान।

पर्यावरण के लिए क्यों महत्वपूर्ण हो सकती है यह तकनीक?
यदि PMFC तकनीक को बड़े स्तर पर कुशल बनाया जा सके, तो इसकी खासियत यह हो सकती है कि ऊर्जा उत्पादन को पर्यावरणीय सेवाओं के साथ जोड़ा जा सके। उदाहरण के लिए कुछ PMFC प्रणालियों पर जल उपचार, प्रदूषित मिट्टी के सुधार और जैव-उपचार के साथ ऊर्जा उत्पादन को लेकर शोध हो रहा है। 2026 की समीक्षा में भी PMFC को स्वच्छ ऊर्जा, जल शोधन, टिकाऊ कृषि और जलवायु कार्रवाई जैसे सतत विकास लक्ष्यों से जोड़ने की संभावनाएं बताई गई हैं।

पौधे बिजली का भविष्य हैं या अभी एक वैज्ञानिक प्रयोग?
बायो-सोलर टेक्नोलॉजी का विचार निश्चित रूप से आकर्षक है ऐसी ऊर्जा व्यवस्था जिसमें सूर्य, पौधे, सूक्ष्मजीव और आधुनिक इलेक्ट्रोड तकनीक मिलकर बिजली उत्पादन में योगदान दें। लेकिन वैज्ञानिक तथ्य यह भी बताते हैं कि यह क्षेत्र अभी विकास और परीक्षण के दौर में है। अमर उजाला की रिपोर्ट भी इसे मौजूदा सोलर पैनलों का तत्काल विकल्प नहीं मानती और लागत, रखरखाव, टिकाऊपन तथा उत्पादन क्षमता पर आगे शोध की आवश्यकता बताती है।
फिर भी इस तकनीक की अहमियत कम नहीं होती। ऊर्जा की बढ़ती मांग और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था संभवतः किसी एक तकनीक पर निर्भर नहीं होगी। सोलर, विंड, बैटरी, बायोएनर्जी और जैव-विद्युत जैसी कई तकनीकें अलग-अलग परिस्थितियों में एक-दूसरे की पूरक बन सकती हैं।
इस लिहाज से पौधों से बिजली पैदा करने का विचार आज भले ही घरेलू बिजली का विकल्प न हो, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक दिशा जरूर है। भविष्य में संभव है कि पौधे सिर्फ हमारे लिए भोजन और ऑक्सीजन ही नहीं, बल्कि बेहद छोटे स्तर पर ऊर्जा और पर्यावरणीय सेवाओं का स्रोत भी बनें।

Geeta Singh
Geeta Singh

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *