क्या बदलने वाला है मध्य पूर्व का शक्ति संतुलन? ‘मक्का समझौते’ में ईरान की एंट्री पर टिकी दुनिया की नजरें

संवाद 24 तेहरान। पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक बड़ा रणनीतिक मोड़ देखने को मिल सकता है। सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक रक्षा समझौते में अब ईरान को भी शामिल होने का न्योता दिए जाने की खबरें सामने आई हैं। ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौता’ (Makkah Joint Defence Agreement) के नाम से जाने जाने वाले इस त्रिपक्षीय गठबंधन को कई रक्षा विशेषज्ञ ‘इस्लामिक नाटो’ की संज्ञा दे रहे हैं। यदि ईरान इस गठबंधन का हिस्सा बनता है, तो यह मध्य पूर्व में दशकों पुरानी कूटनीतिक और सैन्य प्रतिद्वंद्विता को हमेशा के लिए बदल कर रख सकता है।

​क्या है मक्का संयुक्त रक्षा समझौता?
​अगस्त के पहले सप्ताह में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बीच सऊदी अरब के मक्का स्थित अल-सफा पैलेस में इस त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। ​इस समझौते का मुख्य बिंदु नाटो (NATO) के बहुचर्चित ‘अनुच्छेद 5’ के सिद्धांतों पर आधारित है। इसके तहत प्रावधान किया गया है कि तीनों सदस्य देशों में से किसी भी एक पर किया गया सैन्य हमला तीनों देशों पर संयुक्त हमला माना जाएगा। तुर्किए के विदेश मंत्री हकन फिदान ने इसे तकनीकी रूप से नाटो जैसी ही सुरक्षा प्रतिबद्धता करार दिया था। इसके तहत सऊदी अरब का भारी वित्तीय निवेश, तुर्किए की अत्याधुनिक ड्रोन व रक्षा तकनीक और पाकिस्तान की सैन्य क्षमता मिलकर एक नया क्षेत्रीय सुरक्षा कवच तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं।

​ईरान को मिला न्योता: क्या हैं इसके कूटनीतिक मायने?
​रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान की संसदीय समाचार एजेंसी के वरिष्ठ अधिकारियों ने संकेत दिया है कि तेहरान को इस संयुक्त रक्षा ढांचे से जुड़ने का औपचारिक प्रस्ताव प्राप्त हुआ है और वह इस पर गंभीरता से विचार कर रहा है। हालांकि, सऊदी अरब, पाकिस्तान या तुर्किए की सरकारों की तरफ से अभी तक इस निमंत्रण को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। ​ईरान लंबे समय से पश्चिमी देशों (विशेषकर अमेरिका) के प्रभाव से मुक्त एक क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे की वकालत करता रहा है। ईरानी विदेश मंत्रालय और नेतृत्व ने पहले भी मुस्लिम देशों के बीच एकजुटता और क्षेत्रीय आत्मनिर्भरता पर जोर दिया है। यदि ईरान और सऊदी अरब एक ही सैन्य रक्षा छतरी के नीचे आते हैं, तो यह मध्य पूर्व में शिया-सुन्नी शक्ति संतुलन और ऐतिहासिक तनातनी को समाप्त करने की दिशा में एक अभूतपूर्व कदम साबित हो सकता है।

​वैश्विक और क्षेत्रीय राजनीति पर प्रभाव
​इस संभावित विस्तार के चलते दुनिया भर की महाशक्तियों की नजरें तेहरान और रियाद पर टिक गई हैं:
1- ​इजरायल और अमेरिका के लिए नई चुनौती: पिछले कुछ समय से मध्य पूर्व में चल रहे सैन्य तनाव के बीच यदि ईरान इस सुन्नी बहुल गठबंधन से जुड़ जाता है, तो यह इजरायल और पश्चिमी सुरक्षा ढांचे के लिए एक नया समीकरण खड़ा कर देगा।
2- ​मिस्र और अन्य देशों का रुख: तुर्किए पहले ही संकेत दे चुका है कि इस रक्षा गठबंधन का विस्तार आगे चलकर मिस्र और अन्य खाड़ी देशों तक भी किया जा सकता है।
3- ​भारत और रणनीतिक संतुलन: भारत के सऊदी अरब और ईरान दोनों के साथ गहरे कूटनीतिक व आर्थिक संबंध हैं। ऐसे में पाकिस्तान की मौजूदगी वाले इस सैन्य समझौते में नए घटनाक्रमों पर नई दिल्ली भी पूरी सतर्कता से नजर बनाए हुए है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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