लोअर दिबांग वैली का भीष्मकनगर: ईंटों में दर्ज एक भूली हुई सभ्यता की कहानी

संवाद 24 डेस्क। अरुणाचल प्रदेश के लोअर दिबांग वैली जिले में रोइंग से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित भीष्मकनगर केवल टूटे हुए ईंटों और मिट्टी-पत्थर की दीवारों का समूह नहीं है। यह पूर्वोत्तर भारत के उस ऐतिहासिक अतीत की महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक कड़ी है, जिसकी परतें आज भी पूरी तरह खुली नहीं हैं। सरकारी अभिलेख इसे क्षेत्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल बताते हैं, जबकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) इसके अवशेषों को चुटिया/सुतिया सत्ता से जोड़ता है, जिसने सादिया क्षेत्र में लगभग 11वीं से 16वीं शताब्दी के बीच प्रभाव रखा। दूसरी ओर, अरुणाचल प्रदेश के जिला प्रशासन और पर्यटन स्रोतों में इसकी प्राचीनता के लिए 8वीं से 12वीं शताब्दी तक की अलग-अलग तिथियां मिलती हैं। यही अंतर भीष्मकनगर को और रोचक बनाता है—क्योंकि इसका इतिहास अभी किसी एक अंतिम तारीख में बंद नहीं किया जा सकता। (Roing District⁠)

नाम में छिपी है इतिहास और लोकविश्वास की दोहरी परंपरा
भीष्मकनगर का नाम भारतीय पौराणिक परंपरा के राजा भीष्मक से जोड़ा जाता है, जिन्हें भगवान कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी के पिता के रूप में जाना जाता है। स्थानीय परंपराओं और पर्यटन साहित्य में इस क्षेत्र को राजा भीष्मक की नगरी तथा रुक्मिणी से संबंधित कथाओं से जोड़ा गया है। अरुणाचल पर्यटन भी इसे राजा भीष्मक की राजधानी से जुड़ी लोकप्रिय मान्यता के रूप में प्रस्तुत करता है। हालांकि, किसी पुरातात्त्विक स्थल की ऐतिहासिक पहचान और उससे जुड़ी धार्मिक अथवा लोककथा को समान प्रमाणिकता का विषय मानना उचित नहीं होगा। भीष्मकनगर के मामले में पुरातात्त्विक अवशेष इतिहास का भौतिक प्रमाण देते हैं, जबकि भीष्मक और रुक्मिणी से जुड़ी कथाएं क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृति और लोकपरंपरा को समझने में सहायता करती हैं। (Arunachal Tourism⁠)

1848 में पहली खोज से व्यवस्थित उत्खनन तक
भीष्मकनगर की आधुनिक पुरातात्त्विक पहचान अचानक नहीं बनी। जिला प्रशासन के अनुसार, इस स्थल का पहला अन्वेषण 1848 में I. Block द्वारा किया गया था। इसके बाद 1960 के दशक में यहां व्यवस्थित पुरातात्त्विक कार्य शुरू हुआ। सरकारी स्रोत 1965-70 के बीच हुए उत्खनन का उल्लेख करते हैं, जबकि अरुणाचल पर्यटन 1969-1973 के उत्खनन काल को रेखांकित करता है। शोध साहित्य में भी अलग-अलग चरणों में एल. एन. चक्रवर्ती और डॉ. वाई. ए. रायकर द्वारा किए गए उत्खननों का उल्लेख मिलता है। इन तिथियों में अंतर इस बात की ओर संकेत करता है कि स्थल पर पुरातात्त्विक काम एक ही अभियान में समाप्त नहीं हुआ, बल्कि कई चरणों में चलता रहा। (Roing District⁠)

ईंटों का किला, लेकिन साधारण किला नहीं
भीष्मकनगर की सबसे प्रभावशाली विशेषता इसकी स्थापत्य योजना है। केंद्रीय परिसर में लगभग 1,860.52 वर्ग मीटर के प्लिंथ क्षेत्र वाला ईंट-निर्मित ढांचा सामने आया है। इसमें तीन हॉल, दो विस्तार कक्ष और कुल छह प्रवेश मार्ग बताए गए हैं। परिसर के पूर्व और पश्चिम में दो उल्लेखनीय द्वार थे। इसके चारों ओर रैंपार्ट या परकोटे जैसी सुरक्षा व्यवस्था थी, जिसमें ईंट, पत्थर और मिट्टी का उपयोग किया गया था। उत्तर दिशा में प्राकृतिक पहाड़ी भू-आकृति स्वयं एक सुरक्षा अवरोध का काम करती थी। इस प्रकार यहां प्राकृतिक स्थलाकृति और मानव निर्मित रक्षा संरचना का संयोजन दिखाई देता है। (Roing District⁠)

पहाड़ बना प्रहरी, परकोटा बना सुरक्षा कवच
भीष्मकनगर की भौगोलिक स्थिति को समझे बिना उसके स्थापत्य को समझना कठिन है। पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी और नदी-घाटी वाले भूभाग में किसी बस्ती की सुरक्षा केवल दीवारों से नहीं होती थी। यहां उत्तर की ओर पहाड़ियों ने प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान की, जबकि अन्य दिशाओं में निर्मित परकोटे ने नगर की रक्षा को मजबूत किया। उपलब्ध विवरणों में परकोटे की मोटाई और ऊंचाई के प्रभावशाली आयाम भी मिलते हैं। अरुणाचल पर्यटन के अनुसार, पूर्व, पश्चिम और दक्षिण की ओर बनी दीवार लगभग 4.5 मीटर तक ऊंची और लगभग 6 मीटर चौड़ी बताई जाती है। इस संरचना में पत्थर और ईंटों की परतों का प्रयोग हुआ था। (Arunachal Tourism⁠)

उत्खनन से निकली वस्तुएं क्या बताती हैं?
किसी सभ्यता की कहानी केवल राजाओं के नामों से नहीं लिखी जाती; उसके दैनिक जीवन की झलक अक्सर मिट्टी के बर्तनों, खिलौनों, सजावटी वस्तुओं और निर्माण सामग्री में मिलती है। भीष्मकनगर के उत्खनन से बड़ी संख्या में चाक पर बनाए गए मिट्टी के बर्तन, पशु और पुष्प आकृतियों वाली टेराकोटा पट्टिकाएं, सजावटी टाइलें, घोड़े और हाथी की आकृतियां तथा अंकित ईंटें मिलीं। इन वस्तुओं से यह संकेत मिलता है कि यहां केवल सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण दुर्ग नहीं था, बल्कि विकसित शिल्प, निर्माण और घरेलू जीवन वाली आबादी भी मौजूद थी। (Roing District⁠)

मिट्टी की पट्टिकाओं में दिखाई देती है कलात्मक दुनिया
टेराकोटा पट्टिकाएं किसी भी पुरातात्त्विक स्थल के लिए महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि वे उस समय की कलात्मक रुचियों और प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियों की जानकारी दे सकती हैं। भीष्मकनगर से प्राप्त पट्टिकाओं पर पशु तथा पुष्प संबंधी आकृतियों का उल्लेख मिलता है। घोड़े और हाथी की टेराकोटा आकृतियां भी यहां की सामग्री-संस्कृति को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन खोजों को केवल सजावट के उदाहरण के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है; वे यह भी संकेत देती हैं कि निर्माण-कला के साथ-साथ अलंकरण और मूर्तिकला जैसी शिल्प परंपराएं भी विकसित थीं। (Roing District⁠)

अंकित ईंटें: शायद सबसे महत्वपूर्ण सुराग
भीष्मकनगर की पुरातात्त्विक सामग्री में अंकित ईंटों का विशेष महत्व है। उपलब्ध शोध में श्री श्री लक्ष्मीनारायण नाम से संबंधित अंकित ईंट का उल्लेख मिलता है और इसके आधार पर इस क्षेत्र को चुटिया राजा लक्ष्मीनारायण के समय से जोड़ने की संभावना व्यक्त की गई है। लिपि और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर इसे 15वीं शताब्दी के आरंभिक काल से जोड़ने की व्याख्या भी सामने आई है। हालांकि, इसे पूरे नगर के निर्माण की एकमात्र और निश्चित तारीख मानना उचित नहीं होगा। किसी बड़े पुरातात्त्विक परिसर में निर्माण, विस्तार और पुनर्निर्माण अलग-अलग कालखंडों में हुए हो सकते हैं। (Wikipedia⁠)

चुटिया राज्य से संबंध कितना मजबूत है?
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार भीष्मकनगर के अवशेष सामान्यतः चुटिया नाम से उल्लिखित उस टिबेटो-बर्मन समुदाय से संबंधित माने जाते हैं, जिसने सादिया क्षेत्र में मध्यकालीन अवधि में शासन किया। ASI इसे चुटिया सत्ता से जुड़े संरचनात्मक अवशेषों और एक संभावित राजधानी क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करता है। अरुणाचल प्रदेश के सांस्कृतिक विभाग की सूची में भी भीष्मकनगर को किले और आवासीय बस्ती के अवशेषों वाला केंद्रीय संरक्षित स्मारक बताया गया है। इसलिए भीष्मकनगर को केवल स्थानीय किंवदंती के आधार पर नहीं, बल्कि मध्यकालीन पूर्वोत्तर भारत की राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के संदर्भ में देखना अधिक उपयुक्त है। (Department of Cultural Affairs⁠)

लेकिन इसकी तारीख को लेकर भ्रम क्यों है?
भीष्मकनगर की सबसे दिलचस्प ऐतिहासिक पहेलियों में से एक इसकी काल-निर्धारण संबंधी असंगति है। जिला प्रशासन इसे 8वीं शताब्दी तक का संभावित स्थल बताता है। अरुणाचल पर्यटन इसे 12वीं शताब्दी से जोड़ता है। दूसरी ओर, राज्य के पुरातत्व विभाग की सूची में किले और आवासीय बस्ती के अवशेषों को 13वीं-14वीं शताब्दी का बताया गया है। ASI इसे चुटिया शासन के 11वीं-16वीं शताब्दी वाले व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में रखता है। इन स्रोतों को साथ रखकर देखने पर सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है कि स्थल का इतिहास एक लंबी अवधि में विकसित हुआ हो सकता है और अलग-अलग संरचनाओं या सांस्कृतिक परतों की तिथियां अलग हो सकती हैं। (Roing District⁠)

क्या भीष्मकनगर वास्तव में एक पूरा नगर था?
उत्खनन से प्राप्त संरचनाएं यह संकेत देती हैं कि यह केवल एक अकेला किला नहीं था। ASI इसे संरचनात्मक अवशेषों के समूह के रूप में वर्णित करता है, जबकि राज्य के पुरातत्व विभाग ने इसे किले और आवासीय बस्ती के अवशेषों के रूप में दर्ज किया है। केंद्रीय परिसर के अतिरिक्त परकोटा, द्वार और अन्य संभावित संरचनाएं एक संगठित बस्ती की ओर संकेत करती हैं। जिला पर्यटन सामग्री में भी इस परिसर के आसपास व्यापक पुरातात्त्विक क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। इसलिए भीष्मकनगर को केवल ‘एक पुराना किला’ कहना इसके पुरातात्त्विक महत्व को छोटा कर देना होगा। (Department of Cultural Affairs⁠)

पानी की व्यवस्था और नगर नियोजन के संकेत
उपलब्ध पुरातात्त्विक विवरणों में तीन प्राचीन जलाशयों या टैंकों का उल्लेख मिलता है। किसी भी बड़े स्थायी नगर के लिए जल प्रबंधन अत्यंत आवश्यक था, विशेषकर ऐसे क्षेत्र में जहां मानसूनी वर्षा और नदी-घाटी दोनों का प्रभाव हो। यदि ये जल संरचनाएं मूल नगर-योजना का हिस्सा थीं, तो वे बताती हैं कि भीष्मकनगर में रक्षा के साथ-साथ निवास और संसाधन प्रबंधन की जरूरतों को भी ध्यान में रखा गया था। यह उस धारणा को चुनौती देता है कि पूर्वोत्तर भारत के प्राचीन या मध्यकालीन पहाड़ी क्षेत्रों में केवल छोटे और अस्थायी निवास ही रहे होंगे। (Arunachal Tourism⁠)

Lower Dibang Valley की कहानी भी इससे बड़ी है
भीष्मकनगर को उसके आसपास के पुरातात्त्विक परिदृश्य से अलग करके देखना भी सही नहीं होगा। लोअर दिबांग वैली में मानव निवास के प्रमाण प्रागैतिहासिक काल तक जाते हैं। जिला प्रशासन के अनुसार, मिश्मी पहाड़ियों में नवपाषाण काल से संबंधित उपकरणों की खोज हुई है। भीष्मकनगर के उत्खनन के दौरान भी डॉ. वाई. ए. रायकर द्वारा कुछ पाषाण उपकरणों के संग्रह का उल्लेख मिलता है। रोइंग के आसपास बाद में भी नवपाषाण उपकरण मिलने की जानकारी दर्ज है। इसका अर्थ है कि यह भूभाग मानव गतिविधियों का बहुत पुराना क्षेत्र रहा है और भीष्मकनगर उस दीर्घकालिक इतिहास की एक बाद की, अधिक संगठित परत है। (Roing District⁠)

भीष्मकनगर और रुक्मिणी नाटी: दो स्थलों के बीच संबंध
रोइंग के आसपास का पुरातात्त्विक परिदृश्य केवल भीष्मकनगर तक सीमित नहीं है। लगभग 12 किलोमीटर दूर चिमिरी क्षेत्र में रुक्मिणी नाटी नामक स्थल पर भी ईंटों से बने प्राचीन अवशेष मिले हैं। 1970 के दशक में हुए उत्खनन में दो कक्षों के अवशेष सामने आए थे। वहां मिले मिट्टी के बर्तनों और ईंटों में भीष्मकनगर से समानता की चर्चा शोध साहित्य में हुई है। इससे यह संभावना महत्वपूर्ण बनती है कि आसपास के कई स्थलों को किसी व्यापक क्षेत्रीय राजनीतिक या सांस्कृतिक नेटवर्क के हिस्से के रूप में देखा जाए, न कि अलग-अलग और असंबद्ध खंडहरों के रूप में। (Roing District⁠)

इतिहास बनाम किंवदंती: दोनों को साथ पढ़ना जरूरी
भीष्मकनगर की पहचान का एक पहलू पुरातत्व है और दूसरा लोकस्मृति। राजा भीष्मक और रुक्मिणी से संबंधित परंपरा इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। Idu Mishmi समुदाय के साथ भी इस परंपरा के संबंधों का उल्लेख मिलता है। लेकिन इतिहास लेखन में किंवदंती को पुरातात्त्विक प्रमाण से अलग पहचानना जरूरी है। किसी स्थान का धार्मिक या सांस्कृतिक महत्व कम नहीं होता यदि उसकी हर कथा को पुरातात्त्विक तथ्य न माना जाए। बल्कि यही अंतर हमें यह समझने में मदद करता है कि कोई भूभाग लोगों की स्मृति में कैसे जीवित रहता है। भीष्मकनगर इसका अच्छा उदाहरण है—जहां ईंटें इतिहास की भाषा बोलती हैं और लोककथाएं सांस्कृतिक स्मृति की। (Arunachal Tourism⁠)

संरक्षण की चुनौती: खंडहर बचाना केवल दीवार बचाना नहीं
पुरातात्त्विक स्थल की सुरक्षा का अर्थ केवल उसकी दीवारों को खड़ा रखना नहीं है। मिट्टी, ईंट, जलनिकासी, वनस्पति, वर्षा और मानवीय गतिविधियां—ये सभी ऐसे अवशेषों को प्रभावित कर सकते हैं। भीष्मकनगर जैसे स्थल में संरक्षण की चुनौती और भी जटिल है क्योंकि इसकी पुरातात्त्विक संरचनाएं विस्तृत भूभाग और प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित हैं। राज्य के सांस्कृतिक मामलों के विभाग के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश में पुरातात्त्विक स्थलों की खोज, उत्खनन, संरक्षण, दस्तावेजीकरण और विकास के लिए संस्थागत कार्य किए जाते हैं। भीष्मकनगर केंद्रीय संरक्षित स्मारकों की सूची में भी दर्ज है। (Department of Cultural Affairs⁠)

पर्यटन की संभावनाएं, लेकिन विरासत की कीमत पर नहीं
रोइंग और लोअर दिबांग वैली की प्राकृतिक सुंदरता के साथ भीष्मकनगर ऐतिहासिक पर्यटन की महत्वपूर्ण कड़ी बन सकता है। जिला प्रशासन इसे प्रमुख पर्यटन स्थलों में गिनता है और सड़क मार्ग से रोइंग तथा आसपास के शहरों से पहुंच की जानकारी देता है। लेकिन पुरातात्त्विक पर्यटन तभी सार्थक होगा जब उसका केंद्र केवल तस्वीरें खींचना नहीं, बल्कि स्थल की समझ विकसित करना हो। बेहतर सूचना-पट्ट, पुरातात्त्विक व्याख्या केंद्र, स्थानीय समुदाय की भागीदारी, नियंत्रित पर्यटक आवागमन और वैज्ञानिक संरक्षण जैसी व्यवस्थाएं इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में अधिक उपयोगी होंगी। (Roing District⁠)

एक ईंट से खुल सकती है पूरी सभ्यता की कहानी
भीष्मकनगर की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही है कि यहां अभी भी कई प्रश्न खुले हैं। कौन-सा हिस्सा किस काल में बनाया गया? नगर का वास्तविक विस्तार कितना था? यहां रहने वाली आबादी का सामाजिक और आर्थिक ढांचा कैसा था? आसपास के दूसरे किलों और बस्तियों के साथ इसके संबंध क्या थे? अंकित ईंटों में दर्ज नाम और प्रतीकों का व्यापक राजनीतिक संदर्भ क्या था? इन प्रश्नों के उत्तर के लिए नए वैज्ञानिक उत्खनन, पुरातात्त्विक सर्वेक्षण, सामग्री-विज्ञान, भू-स्थानिक अध्ययन और उपलब्ध पुरानी खुदाई सामग्री की पुनः समीक्षा उपयोगी हो सकती है।

भीष्मकनगर की असली विरासत क्या है?
भीष्मकनगर की विरासत किसी एक राजा, एक राजवंश या एक धार्मिक कथा तक सीमित नहीं है। यह पूर्वोत्तर भारत में विकसित नगर-योजना, दुर्ग-निर्माण, ईंट तकनीक, टेराकोटा कला, जल प्रबंधन और क्षेत्रीय राजनीतिक इतिहास की बहुस्तरीय कहानी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और अरुणाचल प्रदेश सरकार के स्रोत इसके मध्यकालीन ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हैं, जबकि स्थानीय परंपराएं इसे भीष्मक और रुक्मिणी की स्मृति से जोड़ती हैं। यही बहुस्तरीयता इसे विशिष्ट बनाती है। (Guwahati Circle⁠)

खामोश खंडहर, लेकिन इतिहास की आवाज अब भी बाकी है
आज भीष्मकनगर में भव्य महल या ऊंचे किलेबंदी-टावर नहीं दिखाई देते। जो बचा है, वह मुख्यतः ईंटों, दीवारों, आधार-रचनाओं और पुरातात्त्विक अवशेषों का संसार है। लेकिन इतिहास की दृष्टि से यही अवशेष सबसे मूल्यवान हैं। वे बताते हैं कि लोअर दिबांग वैली को कभी केवल दूरस्थ पहाड़ी भूभाग समझना अधूरा दृष्टिकोण होगा। यहां संगठित बस्तियां, स्थापत्य कौशल, शिल्प परंपराएं और राजनीतिक गतिविधियां मौजूद थीं। भीष्मकनगर इसी लंबे इतिहास का मूर्त प्रमाण है।

अंततः भीष्मकनगर को समझने का सबसे सही तरीका शायद किसी एक निश्चित तारीख या किंवदंती को अंतिम सत्य मान लेना नहीं, बल्कि उपलब्ध पुरातात्त्विक प्रमाणों, ऐतिहासिक स्रोतों और स्थानीय सांस्कृतिक स्मृतियों को साथ रखकर देखना है। इसकी तिथि को लेकर सरकारी और शोध स्रोतों में अंतर स्वयं बताता है कि इस स्थल पर अभी और वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है। पर एक बात निर्विवाद है—लोअर दिबांग वैली की धरती में छिपे ये ईंटों के अवशेष पूर्वोत्तर भारत के अतीत को समझने के लिए असाधारण महत्व रखते हैं। भीष्मकनगर इसलिए केवल खंडहर नहीं, बल्कि एक ऐसा खुला ऐतिहासिक दस्तावेज है जिसकी कई पंक्तियां पढ़ी जा चुकी हैं और कई अभी भी पुरातत्वविदों की प्रतीक्षा कर रही हैं। (Roing District⁠)

इस लेख के लिए अरुणाचल प्रदेश के लोअर दिबांग वैली जिला प्रशासन, अरुणाचल प्रदेश के Department of Cultural Affairs, Archaeological Survey of India (Guwahati Circle), Arunachal Tourism तथा भारत सरकार के पर्यटन संबंधी उपलब्ध दस्तावेजों और प्रकाशित शोध-सामग्री का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। विशेष रूप से काल-निर्धारण के मामले में विभिन्न सरकारी स्रोतों के बीच मौजूद अंतर को ध्यान में रखते हुए दावों को सावधानीपूर्वक प्रस्तुत किया गया है। (Roing District⁠)

Radha Singh
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