वामन पुराण में तीन पगों का रहस्य: कैसे भगवान ने नाप लिया पूरा ब्रह्मांड छोटा-सा वामन रूप, विराट ब्रह्मांड और तीन कदमों में बदल गई पूरी कथा

संवाद 24 डेस्क। हिंदू पुराण परंपरा में भगवान विष्णु का वामन अवतार ऐसी कथा प्रस्तुत करता है, जिसमें एक ओर दान, वचन और धर्म की परीक्षा दिखाई देती है तो दूसरी ओर ईश्वर की विराट सत्ता का दर्शन होता है। राजा बलि के यज्ञ में एक छोटे-से ब्राह्मण बालक के रूप में पहुंचे भगवान वामन ने केवल तीन पग भूमि मांगी, लेकिन संकल्प पूरा होते ही उनका स्वरूप इतना विराट हो गया कि दो ही चरणों में समस्त लोकों को अपने भीतर समेट लिया। तीसरे चरण के लिए जब कोई स्थान शेष नहीं बचा, तब राजा बलि ने अपना सिर भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया।
यह प्रसंग केवल भगवान द्वारा ब्रह्मांड को नाप लेने की अद्भुत कथा नहीं है। इसके भीतर सत्ता, अहंकार, दान, वचनबद्धता, आत्मसमर्पण और ईश्वर की सर्वव्यापकता से जुड़े गहरे आध्यात्मिक संकेत छिपे हैं। वामन पुराण में वामन-त्रिविक्रम प्रसंग का वर्णन विस्तार से मिलता है और शोधपरक अध्ययनों में यह भी रेखांकित किया गया है कि वामन पुराण भगवान के विराट स्वरूप का विशेष रूप से विस्तृत चित्रण करने वाले ग्रंथों में शामिल है।

आखिर राजा बलि के सामने वामन रूप में क्यों आए भगवान?
राजा बलि प्रह्लाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र माने जाते हैं। पुराणों में उनका वर्णन अत्यंत शक्तिशाली, पराक्रमी और दानवीर शासक के रूप में मिलता है। उन्होंने अपनी शक्ति के बल पर देवताओं को पराजित कर स्वर्ग सहित तीनों लोकों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था। उनके दान की प्रसिद्धि भी दूर-दूर तक फैल चुकी थी। वामन पुराण के प्रसंग में बलि की इसी दानशीलता को कथा का महत्वपूर्ण आधार बनाया गया है।
देवताओं के अधिकारों और लोकव्यवस्था में उत्पन्न असंतुलन को दूर करने के लिए भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण किया। इस कथा में भगवान किसी युद्ध के मैदान में हथियार लेकर नहीं उतरते। वे एक विनम्र ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि के यज्ञस्थल पर पहुंचते हैं। यही इस प्रसंग की पहली बड़ी विशेषता है—जिस राजा को उसकी सेना और शक्ति से पराजित करना कठिन था, उसके सामने भगवान ने दान और वचन के मार्ग से धर्म की पुनर्स्थापना की।

यज्ञस्थल पर पहुंचे बालक ने मांगी केवल तीन पग भूमि
राजा बलि यज्ञ कर रहे थे। वामन उनके सामने पहुंचे तो राजा ने उनका सम्मान किया और उनसे मनचाहा दान मांगने का आग्रह किया। राजा की इच्छा थी कि याचक को उसकी आवश्यकता के अनुरूप भरपूर दान दिया जाए। लेकिन वामन ने जितना मांगा, वह सुनकर स्वयं बलि भी आश्चर्यचकित हुए—उन्हें केवल तीन पग भूमि चाहिए थी।
वामन पुराण के संबंधित प्रसंग में भगवान वामन द्वारा तीन पग भूमि मांगने का उल्लेख मिलता है। एक प्राचीन अध्ययन में वामन पुराण के श्लोक 33.49 का संदर्भ देते हुए बताया गया है कि वामन ने अपने अग्नि-साधना संबंधी प्रयोजन के लिए राजा से तीन पग भूमि मांगी।
यहां कथा एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है—जब राजा बलि इतना विशाल दान देने में सक्षम थे, तब भगवान ने केवल तीन कदम की भूमि ही क्यों मांगी?
आध्यात्मिक दृष्टि से इसका उत्तर कथा के अगले चरण में मिलता है। मनुष्य जिसे छोटा समझता है, वही उसके अहंकार की सबसे बड़ी परीक्षा बन सकता है। तीन पग भूमि वास्तव में भूमि का साधारण माप नहीं थी; यह राजा बलि की सत्ता, स्वामित्व-बोध और अंततः स्वयं के समर्पण की परीक्षा थी।

शुक्राचार्य ने पहचान लिया था वामन के पीछे छिपा विराट सत्य
राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य भगवान वामन के वास्तविक स्वरूप को पहचान गए। उन्होंने बलि को सावधान किया कि यह कोई साधारण ब्राह्मण बालक नहीं है। उनके अनुसार, वामन वास्तव में भगवान विष्णु हैं और यदि बलि ने अपना वचन दे दिया तो उसकी सारी संपत्ति और अधिकार उनसे छिन सकते हैं।
पुराण परंपरा में यह प्रसंग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां दो धर्म-संकट आमने-सामने दिखाई देते हैं। एक ओर गुरु की आज्ञा और अपने राज्य की रक्षा का प्रश्न था, दूसरी ओर दान का वचन निभाने की राजा बलि की प्रतिष्ठा। बलि ने अंततः अपने वचन से पीछे हटने से इनकार किया।
उनकी दृष्टि में यदि स्वयं भगवान किसी याचक के रूप में उनके द्वार पर आए हैं तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या हो सकता है। यही निर्णय आगे चलकर बलि को केवल एक शक्तिशाली राजा नहीं, बल्कि समर्पण और वचनबद्धता के प्रतीक के रूप में स्थापित करता है। वामन पुराण पर हुए अध्ययनों में भी बलि की दानशीलता और भगवान को दान देने की उनकी इच्छा को इस प्रसंग का केंद्रीय तत्व माना गया है।

संकल्प होते ही बदल गया पूरा दृश्य
राजा बलि ने तीन पग भूमि देने का संकल्प कर दिया। जैसे ही दान की प्रक्रिया पूरी हुई, कथा का सबसे अद्भुत चरण शुरू हुआ। छोटा-सा वामन रूप धीरे-धीरे विराट होने लगा। भगवान विष्णु ने त्रिविक्रम स्वरूप धारण किया।
वामन पुराण के श्लोकों पर आधारित विद्वत अध्ययन में बताया गया है कि जलदान के बाद वामन ने तत्काल ऐसा रूप धारण किया जिसमें समस्त देवताओं का स्वरूप समाहित था। इसके बाद उनका शरीर ब्रह्मांडीय विस्तार का प्रतीक बन गया।
यही वह क्षण है जहां ‘वामन’ ‘त्रिविक्रम’ बन जाते हैं। वामन का अर्थ है छोटा या बौना रूप, जबकि त्रिविक्रम का संबंध तीन महान चरणों से है। इसलिए यह परिवर्तन केवल शरीर के आकार का परिवर्तन नहीं है। यह सीमित दिखाई देने वाले ईश्वर के असीम स्वरूप का उद्घाटन है।

पहला पग—पृथ्वी से लेकर चराचर जगत तक
भगवान के विराट रूप का पहला चरण पृथ्वी और उसके चर-अचर जगत को समेट लेता है। वामन पुराण के एक विस्तृत वर्णन में स्पष्ट किया गया है कि भगवान ने अपने पहले चरण से संपूर्ण पृथ्वी को, उसके चल और अचल तत्वों सहित, व्याप्त कर लिया।
अर्थात राजा बलि जिस पृथ्वी को अपनी सत्ता और अधिकार के अंतर्गत मान रहे थे, वह एक क्षण में भगवान के चरण के सामने अत्यंत छोटी सिद्ध हो गई।
यहां कथा का आध्यात्मिक संदेश स्पष्ट है। मनुष्य किसी भूमि, भवन, राज्य, धन या पद को अपना कह सकता है, लेकिन वह वास्तव में उस विशाल सृष्टि का स्वामी नहीं है। उसका स्वामित्व सीमित और अस्थायी है। जिस पृथ्वी पर वह अधिकार का दावा करता है, वही पृथ्वी ईश्वर की विराट सत्ता में एक छोटे से अंश के समान दिखाई देती है।

दूसरा पग—स्वर्ग, उच्च लोक और आकाश भी हुए समाहित
पहले चरण में पृथ्वी को समेटने के बाद भगवान ने दूसरा चरण ऊर्ध्व लोकों की ओर बढ़ाया। वामन पुराण पर प्रकाशित शोध सामग्री के अनुसार दूसरे चरण में स्वर्ग के साथ महर्लोक, जनलोक और तपोलोक आदि उच्च क्षेत्रों के व्याप्त होने का वर्णन मिलता है।
यही वह क्षण था जब राजा बलि के सामने वास्तविकता पूरी तरह स्पष्ट हो गई। जिसे वह अपना साम्राज्य समझ रहे थे, वह भगवान के दो चरणों में ही समाप्त हो चुका था। पृथ्वी और उच्च लोकों पर भगवान के चरण पड़ चुके थे। अब तीसरे चरण के लिए कोई स्थान बचा ही नहीं था।
यहीं से कथा का सबसे गहरा आध्यात्मिक प्रश्न जन्म लेता है—जब पूरा ब्रह्मांड ही भगवान के दो चरणों में समा गया, तो तीसरा चरण कहां रखा जाए?

क्या सचमुच तीन कदमों में पूरा ब्रह्मांड नाप लिया गया?
इस प्रसंग को केवल आधुनिक भौतिक माप के आधार पर समझना उचित नहीं होगा। पुराणों की ब्रह्मांड-कल्पना आधुनिक खगोलीय मॉडल से अलग धार्मिक और दार्शनिक संरचना में व्यक्त होती है। इसलिए ‘ब्रह्मांड नापना’ यहां किसी आधुनिक वैज्ञानिक दूरी या किलोमीटर में मापने की बात नहीं है।
वामन पुराण के वर्णन में भगवान का विराट शरीर स्वयं ब्रह्मांडीय सत्ता का प्रतीक बन जाता है। शोध में उल्लेख है कि वामन पुराण ने दो स्थानों पर वामन के विराट स्वरूप का विशेष विस्तार से वर्णन किया है और उनके शरीर में संपूर्ण विश्व के विभिन्न तत्वों तथा लोकों की कल्पना की गई है।
इसलिए तीन पगों का रहस्य केवल यह नहीं कि भगवान ने कितनी दूरी तय की। असली अर्थ यह है कि जिसे मनुष्य ‘मेरा संसार’ समझता है, वह परम सत्ता की दृष्टि में सीमित है।

विराट स्वरूप में शरीर का प्रत्येक अंग बना ब्रह्मांड का प्रतीक
वामन के त्रिविक्रम स्वरूप का वर्णन पुराण परंपरा में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया गया है। इस विराट रूप में पृथ्वी चरणों पर, पर्वत घुटनों के नीचे, आकाश नाभि के आसपास और समुद्र शरीर के विभिन्न हिस्सों में कल्पित किए गए हैं। सूर्य उनकी आंखों में, अग्नि मुख में और दिशाएं उनके शरीर के अंगों में दिखाई जाती हैं।
इस कल्पना का उद्देश्य किसी शारीरिक आकृति का वास्तविक नक्शा बनाना नहीं है। यह बताना है कि ईश्वर से अलग कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। प्रकृति, देवता, दिशाएं, आकाश, जल, अग्नि, सूर्य, वेद और समस्त जीव-जगत—सब उसी विराट सत्ता में स्थित हैं।
यह विचार उपनिषदों और वैदिक परंपरा के उस व्यापक दर्शन से भी जुड़ता है जिसमें परम सत्ता को सर्वव्यापक माना गया है। वामन के विराट रूप में यही विचार कथा और प्रतीक के माध्यम से सामने आता है।

तीसरे पग की चुनौती और राजा बलि का सबसे बड़ा निर्णय
दो चरणों में सब कुछ समेट लेने के बाद भगवान ने राजा बलि से पूछा कि तीसरा चरण कहां रखा जाए। अब बलि के पास न भूमि बची थी, न राज्य और न वह संपत्ति जिसे वह अपना कह सकें।
यहीं राजा बलि की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है।
वह अपने वचन से पीछे नहीं हटते। वे अपना सिर भगवान के चरणों में अर्पित कर देते हैं। यही कथा का निर्णायक मोड़ है। वामन पुराण की परंपरा में तीसरे चरण का अपूर्ण रह जाना और बलि के समर्पण की ओर कथा का बढ़ना विशेष महत्व रखता है।
यहां ‘तीसरा पग’ किसी भौतिक भूमि पर नहीं पड़ता। वह राजा बलि के अहंकार पर पड़ता है। पहले दो चरणों में भगवान ने बाहरी संसार को अपने अधीन किया; तीसरे चरण में बलि ने अपना ‘मैं’ भगवान को समर्पित कर दिया।

तीसरा पग वास्तव में अहंकार पर पड़ा
यही इस कथा का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक रहस्य है।
पहला चरण—मेरा संसार।
दूसरा चरण—मेरी सत्ता।
तीसरा चरण—मेरा अहंकार।

राजा बलि ने भूमि, राज्य और संपत्ति का दान तो कर दिया था, लेकिन अंतिम दान स्वयं का था। जब उन्होंने अपना सिर भगवान के लिए प्रस्तुत किया, तब ‘मैं’ और ‘मेरा’ की सीमा समाप्त हो गई।
इस अर्थ में वामन का तीसरा पग किसी भूभाग को नहीं नापता, बल्कि मनुष्य के भीतर मौजूद अहंकार की सीमा को पार करता है। भगवान का चरण सिर पर रखना इसी आत्मसमर्पण का प्रतीक बन जाता है।
यही कारण है कि बलि की कथा केवल पराजय की कथा नहीं मानी जाती। वह एक ऐसे राजा की कथा बन जाती है जिसने अपनी शक्ति और संपत्ति खोकर भी आध्यात्मिक दृष्टि से एक बड़ी उपलब्धि प्राप्त की।

क्या भगवान ने बलि को दंड दिया या सम्मान?
लोकप्रिय कथाओं में कई बार इस प्रसंग को केवल इस रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि भगवान ने बलि को पाताल भेज दिया। लेकिन पुराण परंपरा का विस्तृत अध्ययन बताता है कि बलि के साथ भगवान का संबंध केवल दंड का नहीं है।
वामन पुराण संबंधी शोध में उल्लेख मिलता है कि भगवान ने तीनों लोकों को इंद्र को प्रदान किया और बलि की स्थिति के संबंध में भविष्य में इंद्र पद से जुड़ा वर भी वर्णित है।
श्रीमद्भागवत की विस्तृत कथा में बलि को सुतल लोक का अधिकार मिलता है और भगवान स्वयं उसकी रक्षा से जुड़े रहते हैं। इस तरह बलि का पाताल या सुतल की ओर जाना केवल दंडात्मक निर्वासन की तरह नहीं समझा जाना चाहिए। यह कथा के धार्मिक ढांचे में एक नई व्यवस्था और भगवान की कृपा से जुड़ा चरण है।

वामन पुराण में यह प्रसंग केवल विष्णु-कथा नहीं
वामन पुराण को केवल भगवान वामन की कथा पर केंद्रित ग्रंथ मानना भी सही नहीं होगा। पुराणों के अध्ययन पर आधारित शोध में बताया गया है कि वामन पुराण में शिव और विष्णु दोनों के प्रति धार्मिक समन्वय दिखाई देता है। इसमें वामनावतार की कथा भी एक से अधिक प्रसंगों में आती है।
अध्ययन के अनुसार वामन पुराण में वामन कथा तीन बार आती है—दो कथाओं में दैत्यराज बलि प्रमुख पात्र हैं, जबकि एक अन्य प्रसंग में धुंधु नामक दैत्य का उल्लेख मिलता है।
यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि पुराण साहित्य में किसी कथा के अनेक पाठ और संदर्भ हो सकते हैं। इसलिए वामन अवतार की लोकप्रिय कथा के प्रत्येक विवरण को केवल एक ही ग्रंथ का विशिष्ट विवरण मानना उचित नहीं होगा।

वेदों से जुड़ता है भगवान के तीन पगों का विचार
भगवान विष्णु के तीन पगों की अवधारणा वामन पुराण से कहीं पुरानी वैदिक परंपरा से जुड़ी हुई है। वैदिक साहित्य में विष्णु के ‘तीन पग’ एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में सामने आते हैं। बाद की पुराणिक परंपरा ने इसी विचार को वामन और राजा बलि की विस्तृत कथा के रूप में विकसित किया।
शोधपरक सामग्री में यह भी बताया गया है कि वामन कथा के विकास में वैदिक और ब्राह्मण साहित्य से लेकर रामायण और बाद के पुराणों तक क्रमिक विस्तार हुआ।
इस दृष्टि से वामन-त्रिविक्रम कथा केवल एक स्वतंत्र पौराणिक घटना नहीं है। यह भारतीय धार्मिक चिंतन में लंबे समय से मौजूद ‘विराट विष्णु’ और ‘तीन पगों’ की अवधारणा का विकसित रूप है।

तीन पगों का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
वामन भगवान के तीन पगों को अलग-अलग आध्यात्मिक स्तरों के रूप में भी समझा जा सकता है। हालांकि यह व्याख्या दार्शनिक है, इसे मूल कथा का शाब्दिक अर्थ नहीं मानना चाहिए।
पहला पग मनुष्य की भौतिक दुनिया पर संकेत करता है। धन, संपत्ति, भूमि, परिवार, पद और प्रतिष्ठा—ये सभी संसार में आवश्यक हैं, लेकिन स्थायी नहीं हैं।
दूसरा पग मानसिक और बौद्धिक संसार की सीमाओं की ओर संकेत करता है। मनुष्य अपनी बुद्धि, ज्ञान और शक्ति पर गर्व करता है, लेकिन विराट सृष्टि के सामने उसकी समझ सीमित है।
तीसरा पग अहंकार और आत्मसमर्पण का प्रतीक बनता है। जब मनुष्य यह स्वीकार करता है कि ‘सब कुछ मेरा नहीं है’, तभी उसके भीतर आध्यात्मिक परिवर्तन की शुरुआत होती है।
इस प्रकार तीन पगों की कथा को भौतिक अधिकार से आध्यात्मिक समर्पण तक की यात्रा के रूप में देखा जा सकता है।

वामन का छोटा रूप क्या संदेश देता है?
भगवान का वामन रूप अपने आप में अत्यंत गहरा प्रतीक है। ईश्वर को शक्तिशाली दिखाने के लिए हमेशा विशाल रूप की आवश्यकता नहीं होती। कथा की शुरुआत एक छोटे ब्राह्मण बालक से होती है, लेकिन वही छोटा रूप आगे चलकर विराट बन जाता है।
यह संदेश देता है कि बाहरी आकार और वास्तविक शक्ति एक ही चीज नहीं हैं।
राजा बलि के पास विशाल साम्राज्य, सेना और संपत्ति थी। भगवान के पास उस क्षण केवल एक छोटा-सा वामन रूप दिखाई दे रहा था। लेकिन कुछ ही क्षणों में शक्ति का वास्तविक केंद्र सामने आ गया।
यानी जो छोटा दिखाई देता है, उसे कमजोर समझ लेना मनुष्य की दृष्टि की सीमा हो सकती है।

दान का अर्थ केवल संपत्ति देना नहीं
राजा बलि की कथा भारतीय दान परंपरा के एक महत्वपूर्ण पक्ष को सामने लाती है। दान केवल धन या वस्तु देने का नाम नहीं है। दान का सबसे ऊंचा रूप तब सामने आता है जब मनुष्य अपनी आसक्ति छोड़ने के लिए तैयार होता है।
बलि ने पहले भूमि दी। फिर राज्य और संपत्ति भी उनके अधिकार में नहीं रहे। अंततः उन्होंने अपना सिर दे दिया।
यही क्रम दान को बाहरी वस्तु से आंतरिक समर्पण की ओर ले जाता है।
इसलिए वामन कथा का संदेश यह नहीं है कि अधिक से अधिक संपत्ति दान कर देना ही सर्वोच्च धर्म है। बल्कि यह है कि दान तभी पूर्ण होता है जब उसमें अहंकार का त्याग भी जुड़ जाए।

आज के जीवन में वामन के तीन पगों का क्या अर्थ है?
आधुनिक जीवन में भी यह कथा उतनी ही प्रासंगिक दिखाई देती है। आज मनुष्य के पास राजा बलि की तरह साम्राज्य भले न हों, लेकिन उसके पास अपना घर, व्यवसाय, पद, धन, सामाजिक प्रतिष्ठा, ज्ञान और डिजिटल दुनिया है। धीरे-धीरे इन चीजों के साथ ‘मेरा’ का भाव इतना मजबूत हो जाता है कि व्यक्ति अपनी वास्तविक सीमाएं भूल सकता है।
वामन कथा इसी ‘मेरा’ के भ्रम को चुनौती देती है।
पहला संदेश है—संपत्ति का उपयोग करें, लेकिन उसे अपना अंतिम सत्य न समझें।
दूसरा संदेश है—शक्ति और पद स्थायी नहीं हैं।
तीसरा संदेश है—वचन का मूल्य परिस्थिति से बड़ा हो सकता है।
और चौथा संदेश है—अहंकार का त्याग ही आत्मिक विकास की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

तीन पगों में ब्रह्मांड नापने की कथा का असली रहस्य
यदि इस पूरी कथा को एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है—भगवान ने दो कदमों में संसार को नापा और तीसरे कदम में मनुष्य के अहंकार को।
पहले दो कदमों में राजा बलि को यह दिखाया गया कि जिस पृथ्वी और स्वर्ग पर वह अधिकार समझता है, वह वास्तव में उसकी निजी संपत्ति नहीं है। तीसरे चरण में उससे पूछा गया कि अब वह क्या देगा। जब कुछ भी शेष नहीं रहा, तब बलि ने स्वयं को ही अर्पित कर दिया।
यही वह बिंदु है जहां बाहरी पराजय आध्यात्मिक विजय में बदल जाती है।
वामन पुराण के विराट स्वरूप-वर्णन में भगवान के शरीर में विश्व के विभिन्न तत्वों और लोकों के समाहित होने की कल्पना इसी व्यापक संदेश को पुष्ट करती है—संपूर्ण सृष्टि परम सत्ता में स्थित है और मनुष्य का स्वामित्व सीमित है।

वामन के तीन कदम, मनुष्य के जीवन की तीन सीख
वामन पुराण में भगवान वामन और राजा बलि की कथा केवल एक चमत्कारिक पौराणिक प्रसंग नहीं है। यह भारतीय दर्शन में शक्ति और विनम्रता, संपत्ति और त्याग, वचन और धर्म तथा अहंकार और आत्मसमर्पण के बीच संबंध को समझने का माध्यम भी है।
भगवान का पहला पग मनुष्य को उसकी भौतिक सीमाओं का बोध कराता है। दूसरा पग उसकी सत्ता और ज्ञान के अहंकार को छोटा करता है। तीसरा पग उसे स्वयं के भीतर झांकने के लिए बाध्य करता है।
राजा बलि की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं थी कि उन्होंने तीन पग भूमि दान की। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि जब तीसरे पग के लिए कुछ भी शेष नहीं रहा, तब उन्होंने अपना सिर आगे कर दिया।
यही कारण है कि वामन से त्रिविक्रम बनने की कथा आज भी भारतीय धार्मिक चेतना में जीवित है। इसमें एक छोटा-सा ब्राह्मण बालक अचानक विराट ब्रह्मांड बन जाता है और एक शक्तिशाली राजा अंततः अपने सिर को सबसे बड़ा दान बना देता है।
इस कथा का अंतिम संदेश शायद यही है—संसार कितना भी बड़ा क्यों न हो, मनुष्य का सबसे कठिन विजय-क्षेत्र उसका अपना अहंकार है। भगवान के तीन पगों की यात्रा अंततः ब्रह्मांड से मनुष्य के भीतर तक पहुंचती है।

Geeta Singh
Geeta Singh

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *