
संवाद 24 डेस्क। प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती। इसका ताजा उदाहरण हैं अमेरिका के मिनेसोटा में रहने वाली भारतीय मूल की 13 वर्षीय छात्रा एरिका (अरिका) कुंदू, जिन्होंने एक ऐसी वैज्ञानिक तकनीक विकसित की है जो भविष्य में फलों और सब्जियों पर मौजूद कीटनाशकों के अवशेषों को कम करने में मददगार साबित हो सकती है। खास बात यह है कि इस तकनीक में किसी महंगे रसायन का नहीं, बल्कि कृषि अपशिष्ट यानी मूंगफली के छिलकों का उपयोग किया गया है। उनके इस अभिनव प्रोजेक्ट “LIGNEX – A Novel Biosorption Based Approach that Uses Agricultural Waste Material to Eliminate Pesticide Residues from Fresh Produce” ने उन्हें प्रतिष्ठित 2026 3M Young Scientist Challenge के शीर्ष 10 फाइनलिस्टों में जगह दिलाई है।
आखिर क्या है एरिका कुंदू का आविष्कार?
आज दुनिया भर में फल और सब्जियों पर कीटनाशकों के अवशेष (Pesticide Residues) एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती माने जाते हैं। सामान्य पानी से धोने पर मिट्टी और कुछ रसायन तो हट जाते हैं, लेकिन कई बार कीटनाशकों के सूक्ष्म अवशेष सतह पर बने रहते हैं।
इसी समस्या का समाधान खोजने के लिए एरिका कुंदू ने कृषि अपशिष्ट के रूप में फेंके जाने वाले मूंगफली के छिलकों का अध्ययन किया। उन्होंने इन छिलकों को एक विशेष बायोसॉर्प्शन (Biosorption) प्रक्रिया के माध्यम से ऐसे पदार्थ में बदलने का तरीका विकसित किया, जो फलों और सब्जियों की सतह से कीटनाशकों के अवशेषों को आकर्षित कर अपने भीतर अवशोषित कर सकता है। यह तकनीक पर्यावरण-अनुकूल होने के साथ-साथ कम लागत वाली भी मानी जा रही है।
बायोसॉर्प्शन क्या है और यह कैसे काम करता है?
बायोसॉर्प्शन एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें प्राकृतिक जैविक पदार्थ कुछ रासायनिक तत्वों या प्रदूषकों को अपनी सतह पर बांध लेते हैं। इसे सरल भाषा में समझें तो यह किसी स्पंज की तरह कार्य करता है, जो पानी को सोख लेता है।
एरिका की तकनीक में तैयार किया गया मूंगफली के छिलकों का विशेष पदार्थ फलों और सब्जियों की सतह पर मौजूद कीटनाशक अवशेषों को आकर्षित करके पकड़ लेता है। इससे खाद्य पदार्थों पर रासायनिक अवशेषों की मात्रा कम करने की संभावना बनती है। हालांकि इस तकनीक को व्यापक व्यावसायिक उपयोग से पहले और वैज्ञानिक परीक्षणों तथा नियामकीय प्रक्रियाओं से गुजरना होगा।
कृषि अपशिष्ट को दिया नया जीवन
हर वर्ष बड़ी मात्रा में मूंगफली के छिलके कृषि अपशिष्ट के रूप में फेंक दिए जाते हैं। एरिका का नवाचार केवल खाद्य सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सर्कुलर इकोनॉमी और वेस्ट-टू-वैल्यू की अवधारणा को भी मजबूत करता है।
यदि भविष्य में यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल होती है तो इससे कृषि अपशिष्ट का बेहतर उपयोग हो सकेगा और पर्यावरण पर कचरे का दबाव भी कम होगा। यही कारण है कि वैज्ञानिक समुदाय इस तरह के शोध को टिकाऊ विकास (Sustainable Development) की दिशा में महत्वपूर्ण मानता है।
3M Young Scientist Challenge में मिली बड़ी पहचान
एरिका के प्रोजेक्ट को अमेरिका की प्रतिष्ठित 3M Young Scientist Challenge 2026 में शीर्ष 10 फाइनलिस्टों में चुना गया है। यह प्रतियोगिता 11 से 14 वर्ष आयु वर्ग के विद्यार्थियों के लिए आयोजित की जाती है, जिसमें वास्तविक समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत करने वाले छात्रों का चयन होता है।
फाइनलिस्ट बनने के बाद एरिका अब एक 3M वैज्ञानिक के साथ मिलकर अपने प्रोजेक्ट को और बेहतर बनाएंगी। इसके बाद अक्टूबर में होने वाले अंतिम चरण में वे 25,000 अमेरिकी डॉलर के ग्रैंड प्राइज और America’s Top Young Scientist का खिताब जीतने के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगी।
वैज्ञानिक सोच बचपन से ही थी मजबूत
एरिका कुंदू सातवीं कक्षा की छात्रा हैं और मिनेसोटा के Minnetonka Middle School East में पढ़ती हैं। विज्ञान के प्रति उनकी रुचि पहले से ही गहरी रही है। पिछले वर्ष उन्हें Minnesota State Merit Award भी मिल चुका है।
उन्होंने प्रतियोगिता के आयोजकों से कहा कि उनका उद्देश्य अपने इस नवाचार को आगे विकसित कर ऐसा उत्पाद बनाना है, जिसका लाभ आम लोगों तक पहुंच सके।
भविष्य का सपना: अंतरिक्ष विज्ञान में योगदान
एरिका का सपना केवल इस प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं है। उन्होंने बताया है कि भविष्य में वे Computational Biology में विशेषज्ञता हासिल कर Astrobiologist बनना चाहती हैं।
उनका लक्ष्य अंतरिक्ष यात्राओं के दौरान विकिरण (Radiation) के प्रभाव को कम करने से जुड़े शोध करना है। उनका मानना है कि इस क्षेत्र में होने वाला शोध केवल अंतरिक्ष मिशनों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कैंसर उपचार, उम्र बढ़ने से जुड़ी बीमारियों और कृषि विज्ञान जैसे क्षेत्रों में भी उपयोगी हो सकता है।
खाद्य सुरक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह शोध?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) समय-समय पर खाद्य पदार्थों में कीटनाशक अवशेषों की निगरानी पर जोर देते रहे हैं। आधुनिक कृषि में कीटनाशकों का उपयोग उत्पादन बढ़ाने के लिए किया जाता है, लेकिन उनका अत्यधिक या अनुचित उपयोग स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
ऐसे में प्राकृतिक, कम लागत वाले और पर्यावरण-अनुकूल समाधानों पर हो रहा शोध भविष्य की खाद्य सुरक्षा रणनीतियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। एरिका का नवाचार इसी दिशा में एक प्रेरक प्रयास माना जा रहा है।
भारतीय मूल के युवाओं की वैज्ञानिक उपलब्धियों में एक और नाम
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय मूल के कई छात्र विज्ञान, प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और चिकित्सा अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके हैं। एरिका कुंदू का नाम भी अब उसी सूची में जुड़ गया है।
उनकी उपलब्धि यह संदेश देती है कि यदि जिज्ञासा, वैज्ञानिक सोच और समस्या को हल करने का दृष्टिकोण हो तो कम उम्र में भी वैश्विक स्तर पर प्रभाव डालने वाले नवाचार किए जा सकते हैं।
विशेषज्ञ क्यों कर रहे हैं इस प्रयास की सराहना?
विशेषज्ञों के अनुसार एरिका का प्रोजेक्ट तीन कारणों से महत्वपूर्ण है—
यह कृषि अपशिष्ट का उपयोग करता है।
इसका उद्देश्य खाद्य सुरक्षा को बेहतर बनाना है।
यह कम लागत और पर्यावरण-अनुकूल समाधान की दिशा में काम करता है।
हालांकि इसे आम उपयोग में आने से पहले विस्तृत वैज्ञानिक परीक्षणों, प्रभावशीलता के मूल्यांकन और नियामकीय स्वीकृतियों की आवश्यकता होगी, लेकिन शुरुआती स्तर पर इसे एक अत्यंत आशाजनक नवाचार माना जा रहा है।
13 वर्षीय भारतीय मूल की एरिका कुंदू ने यह साबित कर दिया है कि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान खोजने का माध्यम भी है। मूंगफली के छिलकों जैसे साधारण कृषि अपशिष्ट को उपयोगी वैज्ञानिक संसाधन में बदलने का उनका प्रयास खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास—तीनों क्षेत्रों के लिए प्रेरणादायक है। यदि भविष्य में यह तकनीक सफलतापूर्वक विकसित होकर व्यापक उपयोग में आती है, तो यह फलों और सब्जियों की सुरक्षा बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।






