बिना सिगरेट पिए भी क्यों हो रहा है फेफड़ों का कैंसर? नई स्टडी ने DNA म्यूटेशन से जुड़ा चौंकाने वाला राज खोला

संवाद 24 डेस्क। लंबे समय से यह धारणा रही है कि फेफड़ों का कैंसर (Lung Cancer) मुख्य रूप से धूम्रपान करने वालों को होता है। हालांकि हाल के वर्षों में ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ी है जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया, फिर भी उन्हें फेफड़ों के कैंसर का सामना करना पड़ा। अब एक नई वैज्ञानिक स्टडी ने इस सवाल का महत्वपूर्ण जवाब खोजने की दिशा में बड़ी प्रगति की है। शोधकर्ताओं के अनुसार, केवल धूम्रपान ही नहीं, बल्कि वंशानुगत (Inherited) आनुवंशिक बदलाव, DNA की मरम्मत करने की क्षमता और कुछ छिपे हुए जीन संबंधी कारक भी इस बीमारी के जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं।

क्या कहती है नई स्टडी?
हालिया अध्ययन में वैज्ञानिकों ने धूम्रपान करने वाले और कभी धूम्रपान न करने वाले लोगों में फेफड़ों के कैंसर से जुड़े आनुवंशिक पैटर्न का विश्लेषण किया। अध्ययन में पाया गया कि दोनों समूहों में कैंसर बनने के कुछ जैविक रास्ते समान हो सकते हैं, लेकिन उनके पीछे काम करने वाले आनुवंशिक कारण अलग-अलग हो सकते हैं।
शोध के अनुसार कुछ लोगों में ऐसे वंशानुगत जीन पाए जाते हैं जो DNA को होने वाले नुकसान की प्रभावी मरम्मत कर लेते हैं। वहीं कुछ लोगों में यह सुरक्षा प्रणाली अपेक्षाकृत कमजोर होती है, जिससे धूम्रपान न करने के बावजूद कैंसर विकसित होने की आशंका बढ़ सकती है।

DNA म्यूटेशन की भूमिका क्यों है अहम?
हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका में DNA मौजूद होता है, जो कोशिकाओं के कामकाज का निर्देश देता है। जब DNA में असामान्य परिवर्तन (Mutation) होते हैं और शरीर उन्हें ठीक नहीं कर पाता, तब कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं। यही प्रक्रिया आगे चलकर कैंसर का कारण बन सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह अध्ययन इस बात को मजबूत करता है कि कैंसर केवल बाहरी कारणों का परिणाम नहीं है, बल्कि शरीर की आनुवंशिक संरचना भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

धूम्रपान न करने वालों में और कौन-कौन से जोखिम हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार धूम्रपान न करने वाले लोगों में भी कई ऐसे कारक हैं जो फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं। इनमें वायु प्रदूषण, सेकेंड हैंड स्मोक, रसोई में लंबे समय तक निकलने वाले धुएं का संपर्क, रेडॉन गैस, औद्योगिक रसायनों का संपर्क और कुछ आनुवंशिक परिवर्तन शामिल हैं। हाल के शोधों में वायु प्रदूषण और DNA में कैंसरकारी बदलावों के बीच भी संबंध सामने आया है।

भारत जैसे देशों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह शोध?
भारत सहित कई देशों में वायु प्रदूषण एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती है। विशेषज्ञों का मानना है कि धूम्रपान न करने वाले लोगों में फेफड़ों के कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए केवल धूम्रपान के इतिहास के आधार पर जोखिम का आकलन पर्याप्त नहीं है। आनुवंशिक जोखिम और पर्यावरणीय संपर्क दोनों को ध्यान में रखकर भविष्य में स्क्रीनिंग रणनीतियां विकसित की जा सकती हैं।

क्या जेनेटिक स्क्रीनिंग भविष्य बदल सकती है?
नई स्टडी का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि भविष्य में केवल यह पूछना कि व्यक्ति धूम्रपान करता है या नहीं, पर्याप्त नहीं होगा। यदि किसी व्यक्ति में DNA की मरम्मत से जुड़े जीन कमजोर हैं या परिवार में फेफड़ों के कैंसर का इतिहास है, तो उसकी पहचान पहले से करना संभव हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में जेनेटिक स्क्रीनिंग और व्यक्तिगत जोखिम मूल्यांकन से ऐसे लोगों की समय रहते पहचान की जा सकेगी, जिन्हें अधिक निगरानी या जल्दी जांच की आवश्यकता है।

किन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?
फेफड़ों के कैंसर के शुरुआती लक्षण कई बार सामान्य बीमारियों जैसे लग सकते हैं। यदि लगातार कई सप्ताह तक खांसी बनी रहे, खून वाली खांसी आए, सांस लेने में तकलीफ हो, सीने में लगातार दर्द रहे, बिना कारण वजन कम हो या बार-बार फेफड़ों में संक्रमण हो, तो चिकित्सक से तुरंत सलाह लेनी चाहिए। शुरुआती पहचान उपचार की सफलता की संभावना बढ़ा सकती है।

क्या धूम्रपान अब भी सबसे बड़ा कारण है?
नई स्टडी के बावजूद विशेषज्ञ यह स्पष्ट करते हैं कि धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण जोखिम कारक बना हुआ है। यह शोध केवल यह बताता है कि धूम्रपान न करने वाले लोग पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं और बीमारी के पीछे अन्य जैविक एवं पर्यावरणीय कारण भी हो सकते हैं। इसलिए तंबाकू से दूरी बनाए रखना आज भी सबसे प्रभावी बचाव उपायों में शामिल है।

विशेषज्ञों की सलाह
डॉक्टरों का कहना है कि स्वस्थ जीवनशैली अपनाना, धूम्रपान और सेकेंड हैंड स्मोक से बचना, घर और रसोई में उचित वेंटिलेशन रखना, प्रदूषण के संपर्क को यथासंभव कम करना और किसी भी संदिग्ध लक्षण को नजरअंदाज न करना फेफड़ों के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण कदम हैं। जिन लोगों के परिवार में फेफड़ों के कैंसर का इतिहास है, उन्हें नियमित चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए।

नई वैज्ञानिक स्टडी ने यह स्पष्ट किया है कि फेफड़ों का कैंसर केवल धूम्रपान से जुड़ी बीमारी नहीं है। आनुवंशिक बदलाव, DNA की मरम्मत करने की क्षमता और पर्यावरणीय जोखिम भी इस बीमारी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि यह शोध जोखिम की बेहतर समझ प्रदान करता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर गैर-धूम्रपान करने वाला व्यक्ति खतरे में है या हर आनुवंशिक बदलाव कैंसर का कारण बनेगा। विशेषज्ञों के अनुसार समय पर जांच, जोखिम कारकों की पहचान और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इस गंभीर बीमारी से बचाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं।

Geeta Singh
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