
संवाद 24 नई दिल्ली। देश के राष्ट्रीय प्रतीकों और संविधान के सम्मान को लेकर केंद्र सरकार एक और बड़ा और कड़ा कानून बनाने जा रही है। भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ का अपमान करने या इसके गायन में किसी भी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न करने वालों की अब खैर नहीं होगी। मोदी सरकार ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971’ (Prevention of Insults to National Honour Act, 1971) में एक ऐतिहासिक संशोधन करने जा रही है। इस नए संशोधन कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ का जानबूझकर अनादर करता है, इसका अपमान करता है या इसे गाए जाने के दौरान किसी प्रकार की बाधा डालता है, तो उसे अधिकतम 3 साल तक की जेल, भारी जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन इस महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक को उच्च सदन यानी राज्यसभा में पेश करने वाले हैं। सरकार के इस कदम के बाद एक बार फिर देश का राजनीतिक तापमान चढ़ना तय माना जा रहा है।
1971 के कानून में क्या बदलने जा रहा है?
अब तक भारत के ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम-1971’ के तहत मुख्य रूप से तीन चीजों के अपमान को दंडनीय अपराध माना जाता था:
- भारतीय राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा)
- भारत का संविधान
- राष्ट्रगान (‘जन गण मन’)
मूल 1971 के अधिनियम में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को स्पष्ट रूप से उस कानूनी सुरक्षा के दायरे में शामिल नहीं किया गया था जो दर्जा राष्ट्रगान या तिरंगे को हासिल था। हालांकि, समय-समय पर अदालतों में इसे लेकर याचिकाएं भी दाखिल की गईं। अब मोदी कैबिनेट ने इस विसंगति को दूर करते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी है। नए संशोधन के बाद राष्ट्रीय गीत को भी वही कानूनी सुरक्षा और संवैधानिक संरक्षण मिलेगा जो राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज को प्राप्त है। क्यों खास है यह समय? 150वीं जयंती और नया नियम राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय (बंकिम चंद्र चटर्जी) ने की थी। यह गीत भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देशभक्तों का सबसे बड़ा उद्घोष और ऊर्जा का स्रोत बना था।
हाल ही में केंद्र सरकार ने ‘वंदे मातरम’ की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में साल भर चलने वाले विशेष राष्ट्रव्यापी कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की है। इसी कड़ी में गृह मंत्रालय की ओर से सभी राज्य सरकारों और संघ शासित प्रदेशों को सख्त दिशा-निर्देश भी जारी किए गए हैं। इन निर्देशों के मुताबिक, अब उन सभी सरकारी और प्रशासनिक आयोजनों में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का गायन भी अनिवार्य कर दिया गया है, जहां राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ बजाया या गाया जाता है।
राजनीतिक सरगर्मी और सियासत का केंद्र बिंदु
‘वंदे मातरम’ को लेकर देश में विचारधारात्मक और राजनीतिक टकराव कोई नया नहीं है। पिछले कुछ दशकों से यह मुद्दा भारतीय राजनीति का एक बेहद संवेदनशील पहलू रहा है:
संसदीय बहस में टकराव के आसार: विपक्षी दलों का एक धड़ा हमेशा से ही ‘वंदे मातरम्’ की अनिवार्यता पर सवाल उठाता रहा है। ऐसे में जब गृह मंत्री अमित शाह सोमवार को इसे राज्यसभा की कार्यसूची के तहत सदन के पटल पर रखेंगे, तो विपक्षी दलों के कड़े विरोध और तीखी बहस के पूरे आसार हैं।
अल्पसंख्यक और सेक्युलर राजनीति बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) हमेशा से ‘वंदे मातरम’ को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आत्मा मानती रही है। भाजपा नेताओं का आरोप रहा है कि तुष्टिकरण की राजनीति के कारण अतीत में राष्ट्रीय गीत को वह उचित सम्मान और कानूनी दर्जा नहीं दिया गया जिसका वह हकदार था। वहीं, कुछ विपक्षी नेता और दल धार्मिक आधार पर इसके कुछ अंशों के गायन से परहेज करते रहे हैं।
बंगाल की अस्मिता से जुड़ाव: चूंकि इसके रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी बंगाल की धरती से थे, इसलिए भारतीय जनता पार्टी इसे बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय अस्मिता का गौरव मानकर पेश करती रही है।






