
संवाद 24 डेस्क। सनातन धर्म के अठारह महापुराणों में ब्रह्म पुराण का महत्वपूर्ण स्थान है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार इसे महापुराणों में प्रथम स्थान प्राप्त होने के कारण “आदि पुराण” भी कहा जाता है। यद्यपि इसका नाम ब्रह्मा से जुड़ा है, लेकिन इसमें केवल ब्रह्मा की महिमा ही नहीं, बल्कि भगवान विष्णु, भगवान शिव, सूर्यदेव, विभिन्न तीर्थों, ऋषियों, राजाओं और धर्म-अधर्म से जुड़ी अनेक प्रेरणादायक कथाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है। उपलब्ध पांडुलिपियों के अनुसार इसमें लगभग 245 अध्याय हैं, जिनमें सृष्टि, वंशावली, तीर्थ, धर्म, दान, व्रत, मोक्ष और अनेक पौराणिक आख्यानों का समावेश है।
सृष्टि की उत्पत्ति की कथा
ब्रह्म पुराण का प्रारंभ सृष्टि की उत्पत्ति के वर्णन से होता है। इसमें बताया गया है कि प्रारंभ में समस्त ब्रह्मांड जलमय था। उसी अनंत जल से हिरण्यगर्भ अर्थात दिव्य स्वर्ण अंडे की उत्पत्ति हुई। इसी हिरण्यगर्भ से ब्रह्मा प्रकट हुए और उन्होंने ईश्वर की प्रेरणा से सृष्टि रचना का कार्य आरंभ किया।
इसके बाद ब्रह्मा ने अपने मानस पुत्रों, प्रजापतियों, ऋषियों तथा विभिन्न जीवों की रचना की। आगे चलकर मनु और शतरूपा के माध्यम से मानव सृष्टि का विस्तार हुआ। यह कथा केवल ब्रह्मांड की उत्पत्ति का वर्णन नहीं करती, बल्कि यह भी बताती है कि समस्त सृष्टि एक ही परम चेतना की अभिव्यक्ति है।
मनु और शतरूपा की कथा
सृष्टि विस्तार के क्रम में ब्रह्मा ने स्वयंभुव मनु और शतरूपा की रचना की। इन्हीं दोनों से मानव वंश की शुरुआत मानी जाती है। इनके पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद तथा अन्य संतानों के माध्यम से विभिन्न राजवंशों और मानव समाज का विकास हुआ।
ब्रह्म पुराण इस कथा के माध्यम से केवल वंशावली नहीं बताता, बल्कि यह संदेश देता है कि समाज की स्थापना धर्म, मर्यादा और उत्तरदायित्व के आधार पर हुई है। यही कारण है कि मनु को मानव सभ्यता का प्रथम विधाता भी माना जाता है।
दक्ष प्रजापति और सृष्टि विस्तार का प्रसंग
ब्रह्म पुराण में दक्ष प्रजापति की कथा भी प्रमुखता से मिलती है। दक्ष ने अपनी पुत्रियों का विवाह विभिन्न ऋषियों और देवताओं से कराया, जिससे देव, दानव, गंधर्व, नाग, यक्ष, किन्नर और अनेक प्रजातियों का विस्तार हुआ।
यह कथा केवल पारिवारिक संबंधों का विवरण नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि सम्पूर्ण सृष्टि परस्पर जुड़ी हुई है और प्रत्येक जीव अपने अस्तित्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
ध्रुव की प्रेरणादायक कथा
ब्रह्म पुराण में राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव का उल्लेख भी मिलता है। सौतेली माता के अपमान से आहत होकर बालक ध्रुव वन में तपस्या करने चले जाते हैं। कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उन्हें दर्शन देते हैं और अचल ध्रुव पद प्रदान करते हैं, जो आज ध्रुव तारे के रूप में प्रसिद्ध है।
यह कथा बताती है कि आयु नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प, श्रद्धा और भक्ति ही मनुष्य को महान बनाती है। ध्रुव का चरित्र आज भी बच्चों और युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत माना जाता है।
राजा पृथु की कथा
ब्रह्म पुराण में राजा पृथु का वर्णन आदर्श शासक के रूप में मिलता है। कथा के अनुसार पृथ्वी पर जब अन्न का संकट उत्पन्न हुआ, तब राजा पृथु ने पृथ्वी का संरक्षण किया और प्रजा के कल्याण के लिए कृषि एवं संसाधनों के उचित उपयोग की व्यवस्था की।
इसी कथा से पृथ्वी को “पृथ्वी” नाम मिलने की मान्यता भी जुड़ी हुई है। यह प्रसंग बताता है कि एक आदर्श राजा का धर्म केवल शासन करना नहीं, बल्कि प्रजा के जीवन को समृद्ध बनाना भी है।
देवताओं और दानवों की उत्पत्ति
ब्रह्म पुराण में महर्षि कश्यप और उनकी पत्नियों से देवताओं, दैत्यों, नागों, पक्षियों तथा अन्य जीवों की उत्पत्ति का भी विस्तार से वर्णन मिलता है। इससे यह संदेश मिलता है कि सृष्टि में विविधता ईश्वर की योजना का हिस्सा है और प्रत्येक शक्ति का अपना स्थान है। देव और दानवों के संघर्ष को भी केवल युद्ध के रूप में नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म, संयम और अहंकार, प्रकाश और अज्ञान के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
सूर्यदेव की महिमा और साम्ब की कथा
ब्रह्म पुराण में सूर्योपासना का विशेष महत्व बताया गया है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब की प्रसिद्ध कथा मिलती है। मान्यता है कि शाप के कारण उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। उन्होंने कठोर सूर्य उपासना की, जिससे उन्हें रोगमुक्ति प्राप्त हुई। इसी प्रसंग के साथ सूर्य मंदिरों और विशेष रूप से सूर्य आराधना की परंपरा का महत्व भी बताया गया है। यह कथा विश्वास, तप और ईश्वर भक्ति के माध्यम से आत्मबल प्राप्त करने का संदेश देती है तथा सूर्योपासना को स्वास्थ्य और आध्यात्मिक साधना से जोड़ती है।
जगन्नाथ धाम की स्थापना की अद्भुत कथा
ब्रह्म पुराण में भगवान विष्णु के पवित्र धामों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिनमें पुरुषोत्तम क्षेत्र अर्थात वर्तमान पुरी का विशेष महत्व बताया गया है। इस क्षेत्र को स्वयं भगवान विष्णु का निवास स्थान माना गया है। पुराण के अनुसार राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उन्होंने दिव्य संकेत मिलने पर पुरुषोत्तम क्षेत्र में भगवान के मंदिर की स्थापना का संकल्प लिया।
कथा के अनुसार भगवान ने राजा को दिव्य काष्ठ (दारु) के रूप में दर्शन दिए। इसी पवित्र काष्ठ से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं निर्मित हुईं। यह कथा केवल मंदिर निर्माण की कहानी नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि सच्ची श्रद्धा और समर्पण से ईश्वर स्वयं अपने भक्तों का मार्ग प्रशस्त करते हैं। आज भी जगन्नाथ धाम चार धामों में प्रमुख स्थान रखता है और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
शेष कथाएं भाग 2 में पढ़िये …..






