
संवाद 24 डेस्क। सनातन धर्म के विशाल ग्रंथ-साहित्य में पुराणों का विशेष स्थान है। ये केवल धार्मिक आख्यान नहीं हैं, बल्कि इनमें सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्मांड की संरचना, धर्म, दर्शन, इतिहास, भूगोल और मानव जीवन के आदर्शों का विस्तृत वर्णन मिलता है। अठारह महापुराणों में शामिल ब्रह्म पुराण को अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इसमें सृष्टि की रचना से लेकर देवताओं, ऋषियों, राजाओं और तीर्थों तक का विस्तार से उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से ब्रह्म पुराण में त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) की अवधारणा को सृष्टि के संचालन का मूल आधार बताया गया है।
सनातन धर्म में त्रिदेव केवल तीन अलग-अलग देवता नहीं हैं, बल्कि वे एक ही परम सत्य या परम ब्रह्म की तीन प्रमुख कार्यात्मक शक्तियों के प्रतीक हैं। ब्रह्मा सृष्टि के सृजनकर्ता हैं, विष्णु पालनकर्ता हैं और भगवान शिव संहार तथा पुनर्निर्माण के अधिष्ठाता माने जाते हैं। ब्रह्म पुराण इन तीनों की भूमिका को केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रखता, बल्कि सृष्टि के शाश्वत नियम और ब्रह्मांडीय संतुलन के रूप में प्रस्तुत करता है।
ब्रह्म पुराण का महत्व
ब्रह्म पुराण को अठारह महापुराणों में प्रथम स्थान प्राप्त है। परंपरा के अनुसार इसमें लगभग 10 हजार श्लोक बताए गए हैं, हालांकि वर्तमान उपलब्ध संस्करणों में श्लोकों की संख्या अलग-अलग मिलती है। इस ग्रंथ का मुख्य विषय सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्मांड की रचना, मन्वंतर, देवताओं का वर्णन, विभिन्न तीर्थों की महिमा और धर्म के सिद्धांत हैं।
ब्रह्म पुराण की विशेषता यह है कि यह केवल धार्मिक अनुष्ठानों का ग्रंथ नहीं है, बल्कि इसमें दर्शन और जीवन प्रबंधन के अनेक सूत्र भी समाहित हैं। इसी कारण विद्वान इसे सनातन परंपरा के महत्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथों में भी शामिल करते हैं।
सृष्टि से पहले क्या था?
ब्रह्म पुराण के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति से पहले केवल परम ब्रह्म का अस्तित्व था। उस समय न पृथ्वी थी, न आकाश, न सूर्य, न चंद्रमा और न ही कोई जीव। चारों ओर केवल अनंत, अव्यक्त और निराकार परम सत्ता विद्यमान थी। उसी परम चेतना की इच्छा से सृष्टि की रचना का क्रम प्रारंभ हुआ।
पुराण के अनुसार सृष्टि की यह प्रक्रिया अचानक नहीं हुई, बल्कि क्रमिक रूप से विकसित हुई। सबसे पहले जल की उत्पत्ति हुई, जिसे “नार” कहा गया। इसी जल पर भगवान नारायण योगनिद्रा में स्थित हुए। यही अवस्था आगे चलकर सृष्टि की शुरुआत का आधार बनी।
ब्रह्मा की उत्पत्ति का वर्णन
ब्रह्म पुराण के अनुसार भगवान विष्णु की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। उसी कमल पर चार मुख वाले ब्रह्मा का जन्म हुआ। प्रारंभ में ब्रह्मा स्वयं अपनी उत्पत्ति को लेकर भ्रमित थे। उन्होंने चारों दिशाओं में अपने जन्म का कारण खोजने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली।
तब उन्होंने कठोर तपस्या की। तप के प्रभाव से उन्हें भगवान विष्णु का साक्षात्कार हुआ और सृष्टि निर्माण का दायित्व प्राप्त हुआ। इसके बाद ब्रह्मा ने देवताओं, ऋषियों, मनुओं, प्रजापतियों, जीव-जंतुओं और समस्त चर-अचर जगत की रचना प्रारंभ की।
यह प्रसंग इस बात का प्रतीक माना जाता है कि ज्ञान, धैर्य और तपस्या के माध्यम से ही सृजन की क्षमता विकसित होती है।
त्रिदेव की अवधारणा कैसे विकसित होती है?
ब्रह्म पुराण में सृष्टि के संचालन को एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया बताया गया है। केवल सृष्टि का निर्माण कर देना पर्याप्त नहीं है। उसका पालन-पोषण, संरक्षण और समय आने पर परिवर्तन भी आवश्यक है। इसी आवश्यकता के आधार पर त्रिदेव की अवधारणा सामने आती है।
ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, भगवान विष्णु उसका संरक्षण करते हैं और भगवान शिव आवश्यक होने पर संहार करते हैं। यहां संहार का अर्थ केवल विनाश नहीं है, बल्कि नई सृष्टि के लिए आवश्यक परिवर्तन और पुनर्निर्माण भी है।
यही कारण है कि सनातन धर्म में संहार को भी नकारात्मक नहीं माना गया, बल्कि सृष्टि चक्र का आवश्यक चरण बताया गया है।
ब्रह्मा : सृजन के देवता
ब्रह्मा को सृष्टि का प्रथम निर्माता कहा गया है। उन्होंने वेदों का प्राकट्य किया, मनुओं की रचना की और विभिन्न लोकों तथा जीवों का विस्तार किया। उनके चार मुख चारों वेदों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—के ज्ञान का प्रतीक माने जाते हैं।
ब्रह्मा का वाहन हंस विवेक और ज्ञान का प्रतीक है। हंस के बारे में कहा जाता है कि वह दूध और पानी को अलग करने की क्षमता रखता है। इसी प्रकार मनुष्य को भी सत्य और असत्य में भेद करने की शिक्षा दी गई है।
भगवान विष्णु : पालन और संरक्षण के प्रतीक
ब्रह्म पुराण के अनुसार भगवान विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता हैं। जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब वे विभिन्न अवतार लेकर संसार की रक्षा करते हैं।
मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण और अन्य अवतार इसी संरक्षण की भावना का विस्तार हैं। विष्णु केवल देवताओं के ही नहीं, बल्कि समस्त जीवों के कल्याण के लिए कार्य करते हैं।
उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म चार महत्वपूर्ण शक्तियों का प्रतीक हैं—धर्म, समय, शक्ति और करुणा।
भगवान शिव : संहार नहीं, परिवर्तन के देवता
सामान्य धारणा में शिव को केवल संहारक माना जाता है, लेकिन ब्रह्म पुराण में उनका स्वरूप इससे कहीं अधिक व्यापक है। शिव विनाश के माध्यम से नए निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
जिस प्रकार बीज को अंकुर बनने के लिए अपना पुराना स्वरूप छोड़ना पड़ता है, उसी प्रकार सृष्टि में भी परिवर्तन आवश्यक है। भगवान शिव इसी परिवर्तन के अधिष्ठाता हैं।
उनका तांडव केवल प्रलय का प्रतीक नहीं, बल्कि सृष्टि के नए चक्र के प्रारंभ का भी संकेत माना जाता है।
त्रिदेव वास्तव में तीन नहीं, एक ही शक्ति के तीन स्वरूप
ब्रह्म पुराण का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश परस्पर प्रतिस्पर्धी नहीं हैं। वे एक ही परम ब्रह्म की तीन कार्यात्मक अभिव्यक्तियां हैं।
जिस प्रकार एक ही सूर्य से प्रकाश, ऊष्मा और ऊर्जा प्राप्त होती है, उसी प्रकार एक ही परम सत्ता सृष्टि, पालन और संहार के रूप में कार्य करती है। इसलिए सनातन धर्म किसी एक देवता को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने के बजाय तीनों के सामूहिक महत्व को स्वीकार करता है। यही त्रिदेव की अवधारणा सनातन दर्शन को संतुलन, समन्वय और एकत्व का संदेश देती है।
क्रमशः – भाग-2 में पढ़ें:






