
संवाद 24 डेस्क। भारतीय सनातन परंपरा में सृष्टि की उत्पत्ति का प्रश्न केवल धार्मिक जिज्ञासा नहीं, बल्कि दर्शन, आध्यात्म और ब्रह्मांड विज्ञान का भी विषय रहा है। वेदों, उपनिषदों और पुराणों में सृष्टि की रचना के अनेक आयाम मिलते हैं। इन्हीं में ब्रह्म पुराण का विशेष स्थान है, जिसे अठारह महापुराणों में प्रथम माना जाता है। यह केवल देवताओं और राजवंशों की कथाओं का ग्रंथ नहीं, बल्कि सृष्टि के आरंभ, ब्रह्मांड की संरचना, कालचक्र, धर्म और मोक्ष जैसे गहन विषयों का भी विस्तृत विवेचन करता है।
ब्रह्म पुराण में वर्णित सृष्टि की उत्पत्ति आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मेल खाने का दावा नहीं करती, बल्कि यह आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक व्याख्या प्रस्तुत करती है। इसमें सृष्टि को ईश्वर की दिव्य इच्छा, ब्रह्म की शक्ति और कालचक्र का परिणाम बताया गया है। यही कारण है कि हजारों वर्षों बाद भी यह वर्णन भारतीय दार्शनिक चिंतन का महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है।
सृष्टि से पहले क्या था?
ब्रह्म पुराण के अनुसार सृष्टि के आरंभ से पहले न पृथ्वी थी, न आकाश, न दिन था, न रात। न कोई जीव था और न ही कोई स्थूल पदार्थ। उस समय केवल एक परम सत्य विद्यमान था, जिसे ब्रह्म, परमात्मा या नारायण कहा गया है। वही अनादि, अनंत और स्वयंभू सत्ता समस्त अस्तित्व का मूल कारण है।
यह अवस्था पूर्ण शांति और अद्वैत की थी। समय, दिशा, गति और परिवर्तन का भी कोई अस्तित्व नहीं था। पुराण इस स्थिति को ऐसी परम चेतना बताते हैं, जिससे आगे चलकर समस्त सृष्टि प्रकट हुई।
जल की उत्पत्ति और नारायण का योगनिद्रा स्वरूप
ब्रह्म पुराण के अनुसार सृष्टि की पहली अभिव्यक्ति जल के रूप में हुई। इस आद्य जल को “नार” कहा गया और उसी पर शयन करने के कारण परमात्मा “नारायण” कहलाए। यह जल सामान्य जल नहीं, बल्कि सृष्टि की मूल संभावना और जीवन का आधार माना गया है।
नारायण योगनिद्रा में स्थित होकर उचित समय की प्रतीक्षा करते हैं। यह प्रतीक है कि सृष्टि का निर्माण आकस्मिक नहीं बल्कि एक निश्चित कालचक्र के अनुसार होता है।
हिरण्यगर्भ का प्राकट्य
जब सृष्टि रचना का समय आया, तब उस दिव्य जल से एक स्वर्णिम अंडा प्रकट हुआ, जिसे हिरण्यगर्भ कहा गया। भारतीय दर्शन में हिरण्यगर्भ को समस्त ब्रह्मांड का बीज माना जाता है।
ब्रह्म पुराण बताता है कि यही स्वर्ण अंडा आगे चलकर सम्पूर्ण सृष्टि का आधार बना। इसमें समस्त लोक, ग्रह, तारे, देवता, जीव और प्रकृति सूक्ष्म रूप में विद्यमान थे। यही कारण है कि हिरण्यगर्भ को ब्रह्मांडीय गर्भ भी कहा जाता है।
ब्रह्मा का प्राकट्य कैसे हुआ?
हिरण्यगर्भ से भगवान ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ। ब्रह्मा को सृष्टि का रचनाकार कहा गया, लेकिन वे स्वयं परम ब्रह्म की इच्छा से उत्पन्न हुए। इस प्रकार ब्रह्म पुराण स्पष्ट करता है कि ब्रह्मा सर्वशक्तिमान परमात्मा नहीं, बल्कि सृष्टि निर्माण के लिए नियुक्त सृजनकर्ता हैं।
ब्रह्मा ने पहले स्वयं अपनी उत्पत्ति का रहस्य जानने का प्रयास किया, किंतु सफलता नहीं मिली। अंततः उन्होंने तपस्या की। तप के प्रभाव से उन्हें सृष्टि निर्माण का ज्ञान प्राप्त हुआ। यह संदेश देता है कि सृजन के लिए केवल शक्ति ही नहीं, बल्कि ज्ञान और तप भी आवश्यक हैं।
ब्रह्मांड की पहली रचना
ज्ञान प्राप्त करने के बाद ब्रह्मा ने सबसे पहले महत्तत्त्व, अहंकार, पंचमहाभूत, मन और इंद्रियों की रचना की। इसके बाद क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का निर्माण हुआ।
इसके पश्चात पर्वत, समुद्र, नदियाँ, वनस्पतियाँ, पशु-पक्षी तथा विभिन्न प्रकार के जीव अस्तित्व में आए। यह क्रम इस बात का संकेत देता है कि सृष्टि एक व्यवस्थित प्रक्रिया के माध्यम से विकसित हुई।
चौदह लोकों की स्थापना
ब्रह्म पुराण में ब्रह्मांड को केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं माना गया है। इसमें चौदह लोकों का वर्णन मिलता है।
ऊपरी सात लोक हैं—भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक, महर्लोक, जनलोक, तपलोक और सत्यलोक।
इसी प्रकार नीचे के सात लोक—अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल बताए गए हैं।
इन लोकों में विभिन्न प्रकार के देवता, ऋषि, सिद्ध, नाग और अन्य दिव्य प्राणियों का निवास बताया गया है।
प्रजापतियों और ऋषियों की उत्पत्ति
सृष्टि के विस्तार के लिए ब्रह्मा ने अपने मानस पुत्रों को उत्पन्न किया। इनमें सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वशिष्ठ, भृगु और नारद जैसे महर्षियों का उल्लेख मिलता है।
इन्हीं ऋषियों और प्रजापतियों के माध्यम से आगे चलकर देवता, मनुष्य, दानव, यक्ष, गंधर्व, किन्नर और अन्य जीवों की वंश परंपरा विकसित हुई।
मनु और मानव जाति की शुरुआत
ब्रह्म पुराण के अनुसार प्रत्येक कल्प में एक मनु होते हैं, जिनके नाम पर मन्वंतर चलता है। वर्तमान सृष्टि को वैवस्वत मनु का काल माना जाता है।
मनु और शतरूपा से मानव समाज की शुरुआत होती है। इसी कारण “मनुष्य” शब्द की उत्पत्ति “मनु” से मानी जाती है। यह वर्णन भारतीय संस्कृति में मानव उत्पत्ति की पौराणिक व्याख्या प्रस्तुत करता है।
सृष्टि केवल निर्माण नहीं, एक चक्र है
ब्रह्म पुराण का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि सृष्टि केवल एक बार नहीं बनी। इसमें सृष्टि, पालन और प्रलय का अनंत चक्र चलता रहता है।
जब एक कल्प समाप्त होता है तो प्रलय आती है और सम्पूर्ण सृष्टि पुनः सूक्ष्म रूप में परमात्मा में विलीन हो जाती है। फिर अगले कल्प में नई सृष्टि का आरंभ होता है। इस प्रकार ब्रह्मांड को निरंतर परिवर्तनशील माना गया है। शेष भाग 2 में….






