
संवाद 24 नई दिल्ली। भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद को लेकर हाल के दिनों में पैदा हुई राजनीतिक और कूटनीतिक हलचल के बीच नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने अपनी सरकार का रुख स्पष्ट किया है। नेपाल सरकार ने कहा है कि भारत के साथ सीमा संबंधी मुद्दों का समाधान केवल द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से ही किया जाएगा और किसी तीसरे देश की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है। हाल के दिनों में प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह के कुछ बयानों के बाद यह चर्चा तेज हो गई थी कि नेपाल भारत के साथ सीमा विवाद के समाधान के लिए अन्य देशों की सहायता चाहता है। इस बयान के बाद भारत की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि दोनों देशों के बीच किसी भी सीमा विवाद का समाधान केवल आपसी बातचीत से ही संभव है और किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार्य नहीं है।
सीमा विवाद पर नेपाल की नई स्पष्टता
नेपाल के विदेश मंत्रालय और सरकार के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने संसद में यह स्पष्ट किया कि नेपाल किसी भी प्रकार की विदेशी मध्यस्थता का समर्थन नहीं करता। सरकार का कहना है कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच वर्षों से स्थापित कूटनीतिक तंत्र के माध्यम से ही विवादों का समाधान निकाला जाएगा। नेपाल ने यह भी कहा कि यदि ऐतिहासिक दस्तावेजों या पुराने अभिलेखों की आवश्यकता होगी तो संबंधित देशों से केवल दस्तावेज प्राप्त किए जा सकते हैं, लेकिन किसी बाहरी देश को मध्यस्थ की भूमिका नहीं दी जाएगी।
किन क्षेत्रों को लेकर है विवाद?
भारत और नेपाल के बीच मुख्य रूप से कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्रों को लेकर लंबे समय से मतभेद बना हुआ है। नेपाल इन क्षेत्रों को अपना हिस्सा बताता है जबकि भारत भी इन क्षेत्रों पर अपना प्रशासनिक नियंत्रण बनाए हुए है। वर्ष 2020 में यह विवाद उस समय अधिक चर्चा में आया था जब नेपाल ने अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी कर इन क्षेत्रों को अपने भूभाग में शामिल दिखाया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत भी हुई।
भारत का स्पष्ट संदेश
भारत ने एक बार फिर दोहराया है कि सीमा से जुड़े सभी मुद्दों का समाधान केवल द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से ही किया जाएगा। भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया कि दोनों देशों के बीच स्थापित संवाद तंत्र मौजूद है और उसी के जरिए समाधान तलाशा जाना चाहिए। भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा, सांस्कृतिक संबंध, धार्मिक आस्था और आर्थिक सहयोग दोनों देशों के रिश्तों को विशेष बनाते हैं। ऐसे में सीमा विवाद को लेकर दोनों पक्ष किसी भी प्रकार के तनाव से बचने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज
नेपाल में प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह के बयान को लेकर राजनीतिक दलों के बीच भी बहस देखने को मिली। कुछ नेताओं ने इसे राष्ट्रीय हितों से जुड़ा मुद्दा बताया, जबकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और नेपाल के रिश्तों की संवेदनशीलता को देखते हुए संयमित कूटनीतिक भाषा की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। लाखों नेपाली नागरिक भारत में काम करते हैं और बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक नेपाल की यात्रा करते हैं। ऐसे में किसी भी विवाद का शांतिपूर्ण समाधान दोनों देशों के हित में है।
आगे क्या?
अब नेपाल सरकार की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण के बाद माना जा रहा है कि भारत और नेपाल के बीच पैदा हुई कूटनीतिक असहजता कम हो सकती है। दोनों देश आने वाले समय में सीमा से जुड़े मुद्दों पर औपचारिक वार्ता को आगे बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा विवाद के समाधान के लिए ऐतिहासिक दस्तावेज, तकनीकी सर्वेक्षण और आपसी विश्वास सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। भारत और नेपाल के मजबूत संबंधों को देखते हुए दोनों देशों से सकारात्मक समाधान की उम्मीद की जा रही है।






