भरतनाट्यम: मंदिरों से दुनिया के मंच तक पहुंची भारतीय संस्कृति की पहचान
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संवाद 24 डेस्क। भारतीय संस्कृति में शास्त्रीय नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहे, बल्कि वे अध्यात्म, परंपरा, भावनाओं और सामाजिक मूल्यों के संवाहक भी रहे हैं। इन्हीं शास्त्रीय नृत्यों में सबसे प्राचीन, समृद्ध और प्रभावशाली नृत्य शैली है भरतनाट्यम। दक्षिण भारत की धरती पर जन्मी यह नृत्य शैली आज केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय संस्कृति की पहचान बन चुकी है।
भरतनाट्यम को देखने वाला दर्शक केवल नृत्य नहीं देखता, बल्कि वह संगीत, अभिनय, भक्ति, अनुशासन और सौंदर्य का एक अद्भुत संगम अनुभव करता है। इसकी हर मुद्रा, हर भाव और हर ताल के पीछे एक गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि छिपी होती है।
मंदिरों से मंच तक का सफर
भरतनाट्यम की उत्पत्ति दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु के मंदिरों में मानी जाती है। प्रारंभिक समय में इसे “सादिर” या “दासी अट्टम” कहा जाता था और इसे मंदिरों में देवदासियों द्वारा भगवान की आराधना के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। यह केवल कला नहीं थी, बल्कि पूजा और भक्ति का हिस्सा मानी जाती थी।
भरतनाट्यम की जड़ें प्राचीन ग्रंथ नाट्यशास्त्र में मिलती हैं, जिसे भरतमुनि ने लिखा था। इस ग्रंथ में नृत्य, संगीत, अभिनय, भाव और मंचन के विस्तृत नियम बताए गए हैं। इसे भारतीय रंगकला और नृत्य का पहला वैज्ञानिक ग्रंथ माना जाता है।
भरतनाट्यम नाम का अर्थ क्या है?
भरतनाट्यम शब्द अपने आप में इसकी विशेषताओं को व्यक्त करता है। “भ” का अर्थ भाव, “र” का अर्थ राग, “त” का अर्थ ताल और “नाट्यम” का अर्थ नृत्य या अभिनय माना जाता है। यानी यह ऐसा नृत्य है जिसमें भाव, संगीत और लय का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।
यह नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि इस नृत्य शैली की आत्मा है। भरतनाट्यम में कलाकार अपने चेहरे के भाव, हाथों की मुद्राओं और शरीर की गतियों से कहानी कहता है। यही कारण है कि इसे “दृश्य कविता” भी कहा जाता है।
भाव, राग और ताल का अद्भुत मेल
भरतनाट्यम की सबसे बड़ी विशेषता इसकी संरचना है। इसमें नृत्य केवल शरीर की गतिविधि नहीं होता, बल्कि भावनाओं की प्रस्तुति भी होती है। इस नृत्य के तीन प्रमुख पक्ष होते हैं— नृत, नृत्य और नाट्य।
नृत का संबंध शुद्ध शारीरिक मुद्राओं और ताल से होता है। नृत्य में भाव और अभिव्यक्ति जुड़ जाती है, जबकि नाट्य में कलाकार पूरी कहानी या चरित्र को मंच पर जीवंत करता है।
भरतनाट्यम में आंखों की गति, चेहरे के हावभाव, हाथों की मुद्राएं और पैरों की ताल अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इसमें शरीर की मुद्राएं बहुत संतुलित, ज्यामितीय और अनुशासित होती हैं। यही कारण है कि इसे सबसे कठिन शास्त्रीय नृत्य शैलियों में गिना जाता है।
हस्तमुद्राओं में छिपी होती है भाषा
भरतनाट्यम की हस्तमुद्राएं इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक हैं। कलाकार केवल हाथों की मुद्राओं से पक्षी, फूल, नदी, सूर्य, युद्ध, प्रेम, क्रोध, करुणा और भक्ति जैसे भावों को प्रकट कर सकता है।
पताका मुद्रा, त्रिपताका मुद्रा, अर्धचंद्र मुद्रा और कटकमुख मुद्रा जैसी मुद्राएं दर्शकों तक पूरी कहानी पहुंचाने में मदद करती हैं। इन मुद्राओं का वर्णन भी नाट्यशास्त्र और अभिनय दर्पण जैसे ग्रंथों में मिलता है।
वेशभूषा और आभूषण भी बनाते हैं इसे खास
भरतनाट्यम की प्रस्तुति केवल नृत्य तक सीमित नहीं होती। इसकी पोशाक, आभूषण और मेकअप भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। नर्तकियां विशेष प्रकार की साड़ी पहनती हैं, जिसे इस तरह तैयार किया जाता है कि नृत्य करते समय उसकी प्लीट्स खुलकर सुंदर आकृति बनाएं।
पैरों में घुंघरू, माथे पर बिंदी, बालों में गजरा, आंखों का गहरा मेकअप और पारंपरिक आभूषण प्रस्तुति को और अधिक आकर्षक बनाते हैं। हाथों और पैरों में लगाया जाने वाला अलता मंच पर मुद्राओं को स्पष्ट दिखाने में मदद करता है।
भरतनाट्यम का पुनर्जागरण
एक समय ऐसा भी आया जब औपनिवेशिक दौर में देवदासी प्रथा के विरोध के साथ भरतनाट्यम भी उपेक्षा का शिकार होने लगा। समाज के कई वर्गों ने इसे गलत नजरिए से देखना शुरू कर दिया। लेकिन बाद में कुछ कलाकारों और विद्वानों ने इस कला को पुनर्जीवित करने का काम किया।
इस पुनर्जागरण में सबसे बड़ा योगदान रुक्मिणी देवी अरुंडेल का माना जाता है। उन्होंने भरतनाट्यम को मंदिरों और सीमित मंचों से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। उनके प्रयासों से यह नृत्य शैली फिर से सम्मान और लोकप्रियता हासिल कर सकी।
इसी तरह टी. बालासरस्वती, यामिनी कृष्णमूर्ति, पद्मा सुब्रह्मण्यम, लीला सैमसन और वैजयंतीमाला जैसी हस्तियों ने भी इस कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
आधुनिक दौर में भरतनाट्यम की बदलती पहचान
आज भरतनाट्यम केवल धार्मिक और पारंपरिक आयोजनों तक सीमित नहीं है। यह स्कूलों, विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक मंचों, अंतरराष्ट्रीय उत्सवों और डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंच चुका है।
आज की युवा पीढ़ी भरतनाट्यम को नए प्रयोगों के साथ भी प्रस्तुत कर रही है। कई कलाकार पारंपरिक शैली को बनाए रखते हुए आधुनिक संगीत, सामाजिक विषयों और नई कोरियोग्राफी के साथ इसे जोड़ रहे हैं। हालांकि इस पर बहस भी होती है कि परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
हाल ही में भारतीय नृत्यांगना हरिणी नीलकंतन ने लास वेगास में भरतनाट्यम और हिप-हॉप का फ्यूजन प्रस्तुत कर वैश्विक स्तर पर चर्चा बटोरी। इस प्रदर्शन ने यह साबित किया कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य आधुनिक मंचों पर भी उतना ही प्रभावशाली हो सकता है।
गुरु-शिष्य परंपरा आज भी है मजबूत
भरतनाट्यम की शिक्षा आज भी गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित मानी जाती है। इस नृत्य को सीखने के लिए वर्षों तक अनुशासन, अभ्यास और समर्पण की आवश्यकता होती है। केवल मुद्राएं सीख लेना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि कलाकार को संगीत, ताल, अभिनय, पौराणिक कथाओं और आध्यात्मिकता की भी समझ होनी चाहिए।
भरतनाट्यम का एक प्रशिक्षित कलाकार अपने शरीर को इस प्रकार नियंत्रित करता है कि उसका हर अंग भावनाओं को व्यक्त कर सके। यही कारण है कि इसे सीखना जितना कठिन है, उतना ही सम्मानजनक भी माना जाता है।
भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर
भरतनाट्यम केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंत आत्मा है। इसमें धर्म, दर्शन, इतिहास, संगीत, साहित्य और सौंदर्य का ऐसा संगम दिखाई देता है, जो शायद ही किसी अन्य कला रूप में मिले।
यह नृत्य हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है और यह याद दिलाता है कि भारतीय संस्कृति केवल किताबों में नहीं, बल्कि हमारी परंपराओं, कलाओं और अभिव्यक्तियों में भी जीवित है। तेजी से बदलती दुनिया में भरतनाट्यम जैसी कलाएं हमें हमारी पहचान और विरासत का महत्व समझाती हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि नई पीढ़ी इस कला को केवल मंचीय प्रदर्शन के रूप में न देखे, बल्कि इसे भारतीय सभ्यता और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक के रूप में समझे। तभी भरतनाट्यम आने वाले समय में भी अपनी भव्यता, गरिमा और प्रासंगिकता बनाए रख सकेगा।






