
आलू की गिरती कीमतों से परेशान किसानों ने अब गौशालाओं में आलू को पशु चारे के रूप में शामिल करने की मांग तेज कर दी है। आलू विकास विपणन सहकारी संघ के निदेशक अशोक कटियार के नेतृत्व में किसानों के प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार को पशुधन विकास एवं दुग्ध विकास मंत्री धर्मपाल सिंह को ज्ञापन सौंपा।
ज्ञापन में किसानों ने कहा कि प्रदेश में आलू के दाम लगातार गिर रहे हैं, जिससे किसान आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। दूसरी ओर सरकार गौशालाओं में छह से दस रुपये प्रति किलो की दर से भूसा खरीदकर पशुओं को खिला रही है। किसानों का तर्क है कि आलू भूसे की तुलना में अधिक पौष्टिक और सस्ता विकल्प हो सकता है, जिससे पशुओं को बेहतर पोषण मिलेगा और सरकार के खर्च में भी कमी आएगी।
किसानों ने सरकार से मांग की है कि गौशालाओं में आलू को वैकल्पिक पशु आहार के रूप में शामिल करने के लिए तत्काल नीति बनाई जाए। उनका कहना है कि यदि सरकार गौशालाओं में आलू की खरीद शुरू करती है तो इससे किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलेगा और आलू की बाजार में बनी मंदी से राहत मिल सकेगी।
प्रतिनिधिमंडल में भाजपा मंडल अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह, अतुल कुमार दीक्षित, प्रभाकर राजपूत, पूर्व मंडल अध्यक्ष रामलड़ैते राजपूत, ममता सिंह और सभासद अजीत दिवाकर भी मौजूद रहे। अशोक कटियार ने कहा कि आलू किसानों के हित में सरकार को विशेष नीति बनानी चाहिए और इस विषय पर संसद तथा विधानसभा का विशेष सत्र भी बुलाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जल्द ही मुख्यमंत्री से मिलकर भी यह मांग रखी जाएगी।
प्रदेश में पहले से चल रही है ‘कैटल फूड सिक्योरिटी हब’ योजना
प्रदेश सरकार पहले ही करीब 7500 गौशालाओं को ‘कैटल फूड सिक्योरिटी हब’ के रूप में विकसित करने की योजना पर काम कर रही है। इस योजना के तहत गोशालाओं को किसानों से जोड़कर हरे चारे की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने की तैयारी है। ऐसे में किसानों की यह नई मांग सरकार के लिए एक वैकल्पिक मॉडल के रूप में सामने आ सकती है, जिसमें आलू को भी पशु आहार की श्रेणी में शामिल किया जा सकता है।
गौशालाओं में चारे की व्यवस्था पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल
हाल के महीनों में प्रदेश की कई गौशालाओं में चारे और देखभाल की कमी को लेकर सवाल उठे हैं। बरेली में पशुधन मंत्री धर्मपाल सिंह के क्षेत्र की एक गौशाला में चारे की कमी के कारण गायों की मौत का मामला भी सामने आया था। ऐसे में किसान संगठन मानते हैं कि यदि स्थानीय स्तर पर सस्ते और उपलब्ध विकल्पों को बढ़ावा दिया जाए तो गौशालाओं की व्यवस्था बेहतर हो सकती है।






