इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा: 21 घंटे की बातचीत भी नहीं पिघला सकी अमेरिका-ईरान की दूरी
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संवाद 24 नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव को खत्म करने के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित उच्चस्तरीय शांति वार्ता आखिरकार बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई। करीब 21 घंटे तक चली इस मैराथन बातचीत से उम्मीदें तो बहुत थीं, लेकिन दोनों देशों के बीच गहरी मतभेद की खाई पाटी नहीं जा सकी। इस अहम बैठक में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जे डी वेंस कर रहे थे, जबकि ईरान की ओर से शीर्ष राजनीतिक और कूटनीतिक नेता शामिल थे। यह बातचीत ऐसे समय में हुई जब दोनों देशों के बीच एक नाजुक युद्धविराम लागू है और पूरी दुनिया की नजरें इस बैठक पर टिकी हुई थीं।
21 घंटे की बातचीत, फिर भी कोई सहमति नहीं
सूत्रों के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच लगातार कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन मुख्य मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी। अमेरिकी पक्ष ने ईरान से परमाणु हथियार कार्यक्रम पर स्थायी रोक की मांग की, जबकि ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता से जुड़ा मामला बताते हुए सख्त रुख अपनाया। अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने साफ कहा कि बातचीत “गंभीर और सार्थक” रही, लेकिन अंतिम समझौते तक पहुंचने में दोनों पक्ष असफल रहे। वहीं ईरान की ओर से आरोप लगाया गया कि अमेरिका की शर्तें अव्यावहारिक और एकतरफा थीं।
युद्धविराम पर भी मंडराया खतरा
इस वार्ता का सबसे बड़ा उद्देश्य मौजूदा युद्धविराम को स्थायी बनाना और मध्य पूर्व में शांति स्थापित करना था। लेकिन बातचीत विफल होने के बाद अब यह युद्धविराम भी खतरे में नजर आ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही कोई समझौता नहीं हुआ, तो क्षेत्र में फिर से तनाव बढ़ सकता है। इस संघर्ष का असर केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव वैश्विक तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम मार्ग पर।
पाकिस्तान बना कूटनीतिक केंद्र
इन ऐतिहासिक वार्ताओं की मेजबानी पाकिस्तान ने की, जहां सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। इस्लामाबाद के प्रमुख क्षेत्रों को सील कर दिया गया था और हजारों सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए थे। वार्ता एक हाई-सिक्योरिटी होटल में आयोजित हुई, जहां दोनों देशों के प्रतिनिधि कई दौर की बातचीत में शामिल हुए। पाकिस्तान की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में बेहद अहम मानी जा रही है, जिसने पहले भी दोनों देशों के बीच युद्धविराम कराने में मध्यस्थता की थी।
किन मुद्दों पर अटका मामला?
इस वार्ता में कई बड़े मुद्दे चर्चा में रहे –
ईरान का परमाणु कार्यक्रम
आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांग
होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष, खासकर लेबनान में स्थिति
इन सभी मुद्दों पर दोनों पक्षों की सोच बिल्कुल अलग रही, जिसके कारण समझौता संभव नहीं हो सका।
आगे क्या?
हालांकि बातचीत फिलहाल असफल रही है, लेकिन कूटनीतिक प्रयास पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। दोनों देशों के बीच आगे भी वार्ता जारी रहने की संभावना जताई जा रही है। पाकिस्तान समेत कई देश इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं कि किसी तरह स्थायी शांति का रास्ता निकाला जा सके। फिलहाल, इस असफल वार्ता ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका और ईरान के बीच विश्वास की कमी अभी भी सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि क्या कूटनीति इस टकराव को रोक पाती है या फिर दुनिया एक नए संकट की ओर बढ़ती है।






