
संवाद 24 डेस्क। भारत की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा—UPSC सिविल सेवा परीक्षा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हाल ही में संसद में एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया, जिसमें सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) के CSAT पेपर को खत्म करने या उसमें बदलाव की मांग की गई। यह मांग सिर्फ एक तकनीकी सुधार का सवाल नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व, समान अवसर और चयन प्रणाली की निष्पक्षता से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुकी है।
राज्यसभा में यह मुद्दा उठाते हुए एक वरिष्ठ सांसद ने कहा कि वर्तमान CSAT प्रणाली देश के विविध सामाजिक-शैक्षिक वर्गों के साथ न्याय नहीं करती। इस बहस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या UPSC की परीक्षा प्रणाली वास्तव में सभी पृष्ठभूमियों के उम्मीदवारों के लिए समान अवसर प्रदान करती है?
CSAT क्या है और इसकी भूमिका क्या है?
Civil Services Aptitude Test (CSAT), UPSC प्रारंभिक परीक्षा का दूसरा पेपर है, जिसे 2011 में लागू किया गया था। इसका उद्देश्य उम्मीदवारों की तार्किक क्षमता, विश्लेषणात्मक सोच और निर्णय लेने की योग्यता का परीक्षण करना है।
यह पेपर 200 अंकों का होता है और इसमें लगभग 80 प्रश्न पूछे जाते हैं। हालांकि, 2015 से इसे केवल क्वालिफाइंग पेपर बना दिया गया है, जिसमें उम्मीदवार को न्यूनतम 33% अंक लाने होते हैं। सिद्धांत रूप में यह बदलाव संतुलन बनाने के लिए किया गया था, लेकिन व्यवहार में यह अभी भी एक बड़ा विवाद बना हुआ है।
सांसद की मांग: CSAT ‘विविधता के लिए बाधा’
संसद में उठी मांग के अनुसार, CSAT को या तो पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए या उसमें व्यापक सुधार किए जाएं। सांसद का तर्क है कि यह पेपर विविधता के लिए सबसे बड़ी बाधा बन गया है।
उन्होंने कहा कि:
बड़ी संख्या में चयनित उम्मीदवार इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि से आते हैं आर्ट्स और ह्यूमैनिटीज़ के छात्र CSAT में संघर्ष करते हैं
इससे सिविल सेवा में असंतुलित प्रतिनिधित्व पैदा हो रहा है
यह तर्क सिर्फ आंकड़ों का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और प्रशासनिक संतुलन का सवाल है।
क्या वास्तव में CSAT पक्षपाती है?
CSAT के खिलाफ सबसे बड़ा आरोप यह है कि यह तकनीकी और गणितीय प्रश्नों पर आधारित होता है, जिससे विज्ञान और इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वाले छात्रों को लाभ मिलता है।
समस्या के मुख्य बिंदु:
गणित और लॉजिकल रीजनिंग का वर्चस्व
अंग्रेजी कॉम्प्रिहेंशन का दबाव
ग्रामीण और हिंदी माध्यम के छात्रों के लिए कठिनाई
हालांकि, यह भी सच है कि CSAT का उद्देश्य प्रशासनिक दक्षता को परखना है—जो केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि विश्लेषणात्मक क्षमता से भी जुड़ी होती है।
पारदर्शिता पर भी उठे सवाल
सांसद ने एक और गंभीर मुद्दा उठाया—CSAT में असफल उम्मीदवारों को उनके अंक या फीडबैक नहीं दिया जाता।
इससे:
उम्मीदवार अपनी कमजोरी नहीं समझ पाते
सुधार की प्रक्रिया बाधित होती है
चयन प्रक्रिया पर भरोसा कम होता है
यह मुद्दा UPSC जैसी संस्था के लिए बेहद संवेदनशील है, जो अपनी निष्पक्षता के लिए जानी जाती है।
इतिहास: CSAT की शुरुआत और बदलाव
CSAT को 2011 में लागू किया गया था, जब UPSC ने प्रारंभिक परीक्षा पैटर्न में बड़ा बदलाव किया।
. पहले क्या था?
एक सामान्य अध्ययन (GS) पेपर
एक वैकल्पिक विषय (Optional Subject)
. बाद में क्या हुआ?
दो अनिवार्य पेपर: GS और CSAT
2015 में CSAT को क्वालिफाइंग बनाया गया
इस बदलाव का उद्देश्य था:
रटने की प्रवृत्ति को कम करना
विश्लेषणात्मक सोच को बढ़ावा देना
लेकिन आज यही बदलाव विवाद का कारण बन गया है।
विशेषज्ञों की राय: सुधार जरूरी, समाप्ति नहीं
कई शिक्षा विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों का मानना है कि CSAT को पूरी तरह समाप्त करना समाधान नहीं है।
उनके अनुसार:
प्रशासनिक सेवा के लिए तार्किक क्षमता जरूरी है
निर्णय लेने की क्षमता का परीक्षण आवश्यक है
लेकिन प्रश्नों का स्तर और स्वरूप संतुलित होना चाहिए
कुछ विशेषज्ञों का सुझाव है:
गणितीय प्रश्नों की संख्या कम की जाए
भाषा आधारित प्रश्नों को सरल बनाया जाए
सभी माध्यमों के छात्रों के लिए समान अवसर सुनिश्चित किए जाएं
ग्रामीण बनाम शहरी: असमानता की जड़
CSAT विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू ग्रामीण और शहरी छात्रों के बीच की खाई है।
ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए:
संसाधनों की कमी
कोचिंग सुविधाओं का अभाव
अंग्रेजी भाषा में कमजोरी
ये सभी कारक CSAT को उनके लिए और कठिन बना देते हैं।
इसलिए यह मुद्दा सिर्फ परीक्षा का नहीं, बल्कि शिक्षा प्रणाली की असमानता का भी है।
UPSC की भूमिका: संतुलन की चुनौती
UPSC के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—मेरिट और समान अवसर के बीच संतुलन बनाना।
अगर CSAT को हटाया जाता है:
विश्लेषणात्मक क्षमता का परीक्षण कमजोर हो सकता है
अगर इसे यथावत रखा जाता है:
असमानता और बढ़ सकती है
इसलिए जरूरी है कि UPSC एक ऐसा मॉडल अपनाए जो:
सभी पृष्ठभूमियों के छात्रों के लिए न्यायसंगत हो
प्रशासनिक गुणवत्ता से समझौता न करे
क्या हो सकता है समाधान?
इस विवाद के समाधान के लिए कुछ संभावित विकल्प सामने आते हैं:
. CSAT का पुनर्गठन
कठिनाई स्तर कम करना
संतुलित प्रश्न वितरण
. पारदर्शिता बढ़ाना
सभी उम्मीदवारों को अंक और फीडबैक देना
. वैकल्पिक मॉडल
CSAT को इंटरव्यू या मेन्स में शामिल करना
. बहुभाषीय सुधार
हिंदी और अन्य भाषाओं में बेहतर अनुवाद
अभ्यर्थियों की प्रतिक्रिया: असंतोष और उम्मीद
UPSC अभ्यर्थियों के बीच इस मुद्दे पर मिश्रित प्रतिक्रिया है।
कुछ का कहना है:
CSAT अन्यायपूर्ण है
इसे हटाया जाना चाहिए
दूसरों का मानना है:
यह जरूरी स्किल्स को परखता है
लेकिन सुधार की जरूरत है
सोशल मीडिया और छात्र संगठनों में यह मुद्दा तेजी से फैल रहा है, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ रहा है।
राजनीति और परीक्षा: क्या यह सही दिशा है?
इस मुद्दे का एक राजनीतिक पहलू भी है। संसद में उठाई गई मांग से यह स्पष्ट है कि अब UPSC जैसी संस्थाएं भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन रही हैं।
यह सवाल उठता है कि:
क्या परीक्षा प्रणाली में बदलाव राजनीतिक दबाव में होना चाहिए? या इसे पूरी तरह विशेषज्ञों के हाथ में छोड़ना चाहिए?
भविष्य की दिशा: बदलाव तय, रूप अनिश्चित
यह स्पष्ट है कि CSAT पर विवाद जल्द खत्म होने वाला नहीं है।
संभावना है कि:
UPSC या सरकार इस पर समिति गठित करे
परीक्षा पैटर्न में आंशिक बदलाव हो
पारदर्शिता के नए नियम लागू हों
सुधार की राह पर UPSC
UPSC CSAT विवाद केवल एक परीक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि भारत की प्रशासनिक संरचना और सामाजिक न्याय का प्रतीक बन गया है।
जरूरत है:
संतुलित दृष्टिकोण की
विशेषज्ञों की सलाह की
और सबसे महत्वपूर्ण—उम्मीदवारों के विश्वास को बनाए रखने की यदि सही दिशा में सुधार किए जाते हैं, तो यह विवाद एक अवसर बन सकता है—एक अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण सिविल सेवा प्रणाली के निर्माण का।






