डिजिटल युग में निष्पक्ष मीडिया और साहित्य की भूमिका पर मंथन, फर्रुखाबाद में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आगाज़

भारतीय महाविद्यालय, फर्रुखाबाद में मंगलवार को दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ, जिसमें देश-विदेश के विद्वानों ने डिजिटल युग में मीडिया की निष्पक्षता और साहित्य की प्रासंगिकता पर गंभीर विचार-विमर्श शुरू किया। यह संगोष्ठी छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू), कानपुर के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के सहयोग से आयोजित की जा रही है।

साहित्य राष्ट्र की आत्मा को प्रकाशित करता हैप्रो. रवींद्र प्रताप सिंह

उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रवींद्र प्रताप सिंह ने साहित्य की केंद्रीय भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साहित्य वह मशाल है, जो राष्ट्र के अतीत, वर्तमान और भविष्य को आलोकित करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसके विचारों, मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत से होती है—जिसे साहित्य जीवंत बनाए रखता है।

राष्ट्र पुनरुत्थान के लिए मीडिया-साहित्य का समन्वय जरूरी

मुख्य अतिथि प्रो. राजेश कुमार द्विवेदी (निदेशक, महाविद्यालय विकास परिषद, सीएसजेएमयू) ने अपने संबोधन में कहा कि डिजिटल युग में मीडिया की निष्पक्षता और साहित्य की गहराई, दोनों मिलकर राष्ट्र पुनरुत्थान की मजबूत नींव रख सकते हैं। उन्होंने मीडिया को केंद्र बिंदु मानते हुए साहित्य और सिनेमा के माध्यम से नई राष्ट्रीय चेतना विकसित करने पर जोर दिया।

शैक्षणिक मंथन से बनता है राष्ट्रीय विमर्श

संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे प्रबंध समिति अध्यक्ष राजेंद्र कुमार त्रिपाठी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों का उद्देश्य केवल चर्चा नहीं, बल्कि शैक्षणिक मंथन के जरिए एक व्यापक राष्ट्रीय विमर्श तैयार करना होता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह आयोजन साहित्य और फिल्म अध्ययन के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित करेगा।

सिनेमा समाज का दर्पण, केवल मनोरंजन नहीं”

विशिष्ट वक्ता प्रो. नीरू टंडन (प्राचार्या, वीएसएसडी कॉलेज) ने मीडिया और फिल्म के जरिए सांस्कृतिक संरक्षण पर जोर दिया। वहीं, प्रो. जावा कुसुम सिंह ने सिनेमा को समाज का प्रभावशाली दर्पण बताते हुए कहा कि यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का मजबूत माध्यम भी है।

नॉर्वे से श्रीलंका तक, वैश्विक विद्वानों की भागीदारी

संगोष्ठी के संयोजक डॉ. निधीश कुमार सिंह ने बताया कि दो दिनों तक देश-विदेश के विद्वान, शोधार्थी और विशेषज्ञ अपने शोधपत्र प्रस्तुत करेंगे। सह-संयोजक डॉ. दिवाकर अवस्थी के अनुसार, इस संगोष्ठी में नॉर्वे, मॉरीशस, श्रीलंका और भारत के प्रतिष्ठित संस्थानों के विद्वान ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यम से भाग ले रहे हैं।

पुस्तक विमोचन और तकनीकी सत्र ने बढ़ाई अकादमिक गंभीरता

उद्घाटन सत्र के दौरान “भारतीय कृषि के विविध आयाम” और “विकसित भारत के निर्माण में संस्कृत वांग्मय की भूमिका” शीर्षक पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. ओम शंकर गुप्ता और सह-अध्यक्षता डॉ. मोनू कुमार मिश्रा ने की, जबकि संचालन डॉ. हरिओम कुमार ने किया।

विद्वानों और शिक्षाविदों की व्यापक उपस्थिति

कार्यक्रम में प्रबंध समिति के सदस्य, शिक्षाविद, शोधार्थी और साहित्य-समाज से जुड़े अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे। अंत में महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. रमण प्रकाश ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया।

Anuj Singh
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