ऑक्सफोर्ड से हजारों साल पहले थे नालंदा और तक्षशिला, जानिए भारत का गौरवशाली इतिहास
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संवाद 24 डेस्क। भारतीय संस्कृति का इतिहास केवल धर्म, दर्शन और आध्यात्मिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, शिक्षा और शोध की महान परंपरा का भी इतिहास है। आज जब विश्व आधुनिक विश्वविद्यालयों पर गर्व करता है, तब यह तथ्य उल्लेखनीय है कि हजारों वर्ष पहले भारत में ऐसे महान शिक्षण केंद्र थे, जहाँ विश्व के विभिन्न देशों से विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने आते थे। इनमें नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालय का नाम सबसे पहले लिया जाता है। ये केवल शिक्षण संस्थान नहीं थे, बल्कि भारतीय संस्कृति के उस स्वर्णिम युग के प्रतीक थे जिसमें ज्ञान को सर्वोच्च माना जाता था। इतिहासकारों के अनुसार तक्षशिला लगभग 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व से और नालंदा 5वीं शताब्दी ईस्वी से विश्व के प्रमुख शिक्षा-केंद्र रहे।
इन विश्वविद्यालयों ने भारतीय संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाई और यह सिद्ध किया कि भारत प्राचीन काल से ही ज्ञान, विज्ञान और विचार का अग्रदूत रहा है।
भारतीय संस्कृति में शिक्षा की परंपरा
भारतीय संस्कृति में शिक्षा को केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन का साधन माना गया। वेदों में कहा गया – सा विद्या या विमुक्तये, अर्थात जो मुक्ति दे वही विद्या है। गुरुकुल परंपरा से शुरू होकर शिक्षा की व्यवस्था धीरे-धीरे बड़े शिक्षण केंद्रों तक पहुँची और तक्षशिला तथा नालंदा जैसे विश्वविद्यालय अस्तित्व में आए।
इन संस्थानों की विशेषता यह थी कि
यहाँ धर्म के साथ विज्ञान भी पढ़ाया जाता था
शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण था
गुरु-शिष्य परंपरा को सर्वोच्च माना जाता था
विदेशी विद्यार्थियों के लिए भी द्वार खुले रहते थे
इसी कारण भारतीय शिक्षा प्रणाली विश्व में सबसे प्राचीन और समृद्ध मानी जाती है।
तक्षशिला विश्वविद्यालय : विश्व का प्राचीनतम शिक्षा केंद्र
तक्षशिला को विश्व के सबसे पुराने शिक्षा केंद्रों में गिना जाता है। यह वर्तमान पाकिस्तान के गांधार क्षेत्र में स्थित था और लगभग 600 ईसा पूर्व से शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा।
तक्षशिला की विशेषताएँ
यहाँ भारत, चीन, यूनान, फारस और मध्य एशिया से विद्यार्थी आते थे।
लगभग 60 से अधिक विषय पढ़ाए जाते थे।
प्रवेश की आयु लगभग 16 वर्ष मानी जाती थी।
यहाँ कोई केंद्रीकृत भवन नहीं था, बल्कि गुरु अपने आश्रम में शिक्षा देते थे।
पढ़ाए जाने वाले विषय
तक्षशिला में शिक्षा अत्यंत व्यापक थी।
वेद और दर्शन
व्याकरण और भाषा
आयुर्वेद और चिकित्सा
राजनीति और अर्थशास्त्र
युद्धकला और सैन्य विज्ञान
गणित और ज्योतिष
कला, संगीत और शिल्प
इतिहासकारों के अनुसार यहाँ 64 से अधिक विद्याएँ पढ़ाई जाती थीं।
महान विद्वान
तक्षशिला ने अनेक महान विद्वान दिए
पाणिनि – संस्कृत व्याकरण के महान आचार्य
चाणक्य – अर्थशास्त्र और राजनीति के ज्ञाता
जीवक – प्रसिद्ध चिकित्सक
चरक – आयुर्वेदाचार्य
इन विद्वानों ने भारतीय संस्कृति को विश्व में प्रतिष्ठा दिलाई।
तक्षशिला का पतन
लगातार आक्रमणों और राजनीतिक अस्थिरता के कारण 5वीं शताब्दी के आसपास तक्षशिला का पतन हो गया।
नालंदा विश्वविद्यालय : विश्व का प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय
तक्षशिला के बाद नालंदा ने विश्व शिक्षा जगत में सबसे ऊँचा स्थान प्राप्त किया। नालंदा की स्थापना गुप्तकाल में 5वीं शताब्दी में मानी जाती है और यह लगभग 800 वर्षों तक ज्ञान का केंद्र रहा।
नालंदा की विशेषताएँ
10,000 से अधिक विद्यार्थी
लगभग 2,000 आचार्य
विश्व का पहला आवासीय विश्वविद्यालय
विशाल पुस्तकालय “धर्मगंज”
बहुमंजिला अध्ययन भवन
इतिहास में वर्णन है कि नालंदा का पुस्तकालय इतना विशाल था कि उसमें लाखों पांडुलिपियाँ थीं।
अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय
नालंदा में निम्न देशों से विद्यार्थी आते थे
चीन
जापान
कोरिया
तिब्बत
श्रीलंका
दक्षिण-पूर्व एशिया
चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने नालंदा की अत्यधिक प्रशंसा की।
पढ़ाए जाने वाले विषय
नालंदा में केवल बौद्ध धर्म नहीं, बल्कि अनेक विषय पढ़ाए जाते थे
दर्शन
चिकित्सा
गणित
ज्योतिष
व्याकरण
तर्कशास्त्र
साहित्य
यह बहुविषयक शिक्षा प्रणाली आधुनिक विश्वविद्यालयों के समान थी।
नालंदा का विनाश
12वीं शताब्दी में आक्रमणों के कारण नालंदा का विनाश हुआ और हजारों ग्रंथ नष्ट हो गए, जिससे विश्व की एक महान ज्ञान परंपरा समाप्त हो गई।
भारतीय संस्कृति का वैश्विक प्रभाव
नालंदा और तक्षशिला के कारण भारत को
ज्ञान की भूमि
गुरु की भूमि
विश्व शिक्षक के रूप में जाना गया।
इन विश्वविद्यालयों से निकले विद्वानों ने
बौद्ध धर्म का प्रसार किया
आयुर्वेद को फैलाया
गणित और ज्योतिष को विकसित किया
दर्शन को विश्व तक पहुँचाया
इसी कारण प्राचीन भारत को विश्वगुरु कहा गया।
शिक्षा का उद्देश्य : केवल ज्ञान नहीं, संस्कार
इन विश्वविद्यालयों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यहाँ
चरित्र निर्माण
अनुशासन
आध्यात्मिकता
समाज सेवा पर बल दिया जाता था।
भारतीय संस्कृति में शिक्षा का लक्ष्य था –
विद्या से विनय, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म, और धर्म से सुख।
यह विचार आज भी भारतीय शिक्षा की पहचान है।
आधुनिक युग में नालंदा की पुनर्स्थापना
भारत सरकार ने नालंदा की परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की है, जिससे प्राचीन ज्ञान और आधुनिक शिक्षा का समन्वय हो सके।
यह प्रयास दर्शाता है कि भारत अपनी प्राचीन शिक्षा परंपरा को फिर से विश्व के सामने लाना चाहता है।
भारतीय संस्कृति के गौरव के प्रतीक
नालंदा और तक्षशिला केवल इतिहास नहीं हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति के गौरव के प्रतीक हैं। इनसे हमें यह सीख मिलती है कि
ज्ञान सबसे बड़ी शक्ति है
शिक्षा से सभ्यता बनती है
संस्कृति से राष्ट्र महान बनता है
आज आवश्यकता है कि हम अपनी शिक्षा प्रणाली को उसी आदर्श पर आधारित करें जिस पर प्राचीन भारत खड़ा था।
जब भारत था विश्वगुरु
नालंदा और तक्षशिला यह सिद्ध करते हैं कि भारत प्राचीन काल से ही शिक्षा, संस्कृति और ज्ञान का केंद्र रहा है। इन विश्वविद्यालयों ने दुनिया को यह संदेश दिया कि
शक्ति से नहीं, ज्ञान से विश्व जीता जाता है।
यदि भारत को फिर से विश्वगुरु बनना है, तो हमें अपनी उसी शिक्षा परंपरा को समझना होगा, जिसने हजारों वर्ष पहले पूरी दुनिया को ज्ञान दिया था।






