दिल्ली की सांसों पर ‘सिस्टम’ का पहरा! प्रदूषण मिटाने के लिए मिले थे करोड़ों, पर आधे से ज्यादा बजट फाइलों में ही रह गया दफन

Share your love

संवाद 24 नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में हर साल सर्दी शुरू होते ही प्रदूषण का मुद्दा गरमाने लगता है। सरकारें दावे करती हैं, नीतियां बनती हैं और भारी-भरकम बजट आवंटित किए जाते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि आपकी सांसों को स्वच्छ बनाने के लिए जो पैसा जारी किया गया था, एक विशेष रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि दिल्ली सरकार ने वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए आवंटित बजट का केवल 43 प्रतिशत ही खर्च किया है। यह खबर सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि उन लाखों दिल्लीवासियों की सेहत से जुड़ा सवाल है जो हर दिन जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। आइए जानते हैं कि आखिर बजट होने के बावजूद प्रदूषण के खिलाफ जंग में देरी क्यों हो रही है।

क्या कहते हैं आंकड़े?
ताजा रिपोर्ट के अनुसार, प्रदूषण नियंत्रण के विभिन्न प्रोजेक्ट्स के लिए जो फंड निर्धारित किया गया था, उसमें से 50 फीसदी से भी कम राशि का उपयोग हो सका है। इसका सीधा मतलब यह है कि स्मॉग टावर के रखरखाव, एंटी-डस्ट कैंपेन, इलेक्ट्रिक बसों के इंफ्रास्ट्रक्चर और वृक्षारोपण जैसे महत्वपूर्ण कार्यों की गति उम्मीद से काफी धीमी रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब पैसा मौजूद है, तो इच्छाशक्ति की कमी के कारण ये फंड बेकार पड़े रहे।

प्रदूषण के खिलाफ जंग में कहां हुई चूक?
दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर साल के अधिकांश समय ‘खराब’ श्रेणी में रहता है। ऐसे में फंड का इस्तेमाल न होना कई बड़े सवाल खड़े करता है:
स्मॉग टावर्स की स्थिति: करोड़ों की लागत से बने स्मॉग टावर्स कई बार तकनीकी या प्रशासनिक कारणों से बंद रहे। उनके संचालन और बिजली के बिलों के लिए आवंटित फंड का सही नियोजन नहीं हो सका।
धूल नियंत्रण (Dust Mitigation): दिल्ली की हवा में धूल एक बड़ा कारक है। सड़कों की मैकेनिकल स्वीपिंग और पानी के छिड़काव के लिए मशीनरी की खरीद में प्रशासनिक देरी देखी गई।
जन-जागरूकता अभियान: ‘रेड लाइट ऑन, गाड़ी ऑफ’ जैसे अभियानों के लिए जो बजट रखा गया था, उसका भी पूर्ण उपयोग नहीं हो पाया।

सियासत और प्रदूषण का जहरीला कॉकटेल
फंड के कम इस्तेमाल को लेकर अब राजनीति भी तेज हो गई है। विपक्ष का आरोप है कि दिल्ली सरकार विज्ञापन पर तो पूरा खर्च करती है, लेकिन असल जमीनी काम के लिए मिले बजट को खर्च करने में नाकाम रही है। वहीं, सरकार के सूत्रों का तर्क है कि कई प्रोजेक्ट्स के टेंडर प्रक्रिया में देरी और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की कमी के कारण पैसा समय पर खर्च नहीं हो सका।

आम जनता पर असर
बजट का इस्तेमाल न होने का सबसे बड़ा खामियाजा दिल्ली के बच्चों और बुजुर्गों को भुगतना पड़ रहा है। अस्पतालों में सांस के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों ने चिंता जताई कि यदि प्रदूषण रोकथाम के फंड का समय पर और सही इस्तेमाल नहीं हुआ, तो आने वाले सालों में स्वास्थ्य संकट और भी गहरा सकता है।

अब आगे क्या?
अगले वित्त वर्ष के लिए योजनाएं अभी से बनाई जा रही हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या पुराने बचे हुए फंड का उपयोग तेजी से किया जाएगा? पर्यावरणविदों का मानना है कि केवल बजट आवंटित करना काफी नहीं है, बल्कि एक ‘डेडिकेटेड टास्क फोर्स’ की जरूरत है जो यह सुनिश्चित करे कि हर एक रुपया प्रदूषण कम करने के सटीक काम में लगे।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Get regular updates on your mail from Samvad 24 News